लाजवाब लेखिका
अनुराधा रॉय से साहित्य अकादमी पुरस्कार जीतने, उनकी किताब में उनके पसंदीदा किरदार और भारत में अकादमिक अध्ययन की स्थिति पर बातचीत.

आपके उपन्यास ऑल द लाइव्स वी नेवर लिव्ड को दुनियाभर के आलोचकों से खूब प्रशंसा मिली, पर इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार जीतते देखना कुछ खास है?
यह पुरस्कार बाकियों जैसा नहीं है. यह मेरी किताब को उन लेखकों के साथ ला खड़ा करता है जिन्हें पढ़ते हुए मैं बड़ी हुई हूं. मुझे महसूस हो रहा है कि मैं अंग्रेजी में भारतीय लेखन की परंपरा का हिस्सा हूं. खास यह भी है कि सरकारी पुरस्कार होने के बावजूद इसका फैसला एक स्वतंत्र निर्णायक मंडल करता है.
आपके उपन्यास के ऐतिहासिक किरदारों में कोई ऐसा भी है जो आपके ज्यादा नजदीक हो?
इस किताब में वॉल्टर स्पाइज मेरा चहेता है. इतना जहीन होने के बावजूद उसमें कोई गुरूर नहीं. वह जानवारों से हमदर्दी रखता है, उसे हर हाल में रचने और खुश रहने से कुछ भी रोक नहीं पाता, जेल और नजरबंदी तक नहीं.
आपका आखिरी उपन्यास द अर्थस्पिनर बहुत लोगों को पसंद आया. कुछ नई थीमों पर काम कर रही हैं, मन में या कागज पर?
मैं हर समय लिख नहीं रही होती हूं... और मुझे इसके बारे में बात करना तो कभी अच्छा नहीं लगता. पर मुझे लिखे गए एक उपन्यास की दुनिया से बाहर निकलकर दूसरे को सांसों में भरने के बीच कुछ समय जरूर चाहिए होता है.
साल 2000 में आप अकादमिक प्रकाशन परमानेंट ब्लैक की सह-संस्थापक बनीं. क्या भारत में अकादमिक अध्ययन जिंदा और तंदुरुस्त है?
जिंदा तो है, पर बहुत तंदुरुस्त नहीं है क्योंकि विरोध के लिए जगह रोज कम होती जा रही है. खुद को सेंसर करने की स्थिति और बत ढ़िया अकादमिक अध्ययन एक साथ संभव नहीं.
—श्रीवत्स नेवटिया.