जनता के संघर्ष की दास्तान

पी. साईनाथ की नई किताब आजादी हासिल करने वाले साधारण महिलाओं-पुरुषों की असाधारण कहानियां बयां करती है.

 पी. साईनाथ
पी. साईनाथ

सौगत दासगुप्ता

पत्रकार पी. साईनाथ की ताजातरीन किताब का शीर्षक है—द लास्ट हीरोज यानी आखिरी नायक. यह मुहावरा किताब में शामिल आजादी के हरकारों के साथ किताब के लेखक पर भी लागू होता है. वजह ये है कि मीडिया के अक्सर व्याकुल और विभाजित लैंडस्केप पर साईनाथ भारतीय पत्रकारिता के बहुत थोड़े-से नायकों में हैं.

इसमें दो राय नहीं कि वे भारत के बचे-खुचे अकेले नामचीन पत्रकार हैं जिन्होंने उन ग्रामीण गरीबों के दु:ख-दर्द पर ध्यान देने को अपना लक्ष्य बनाया. वे देहाती हिंदुस्तानी जो अब भी देश की विशाल बहुसंख्या का निर्माण करते हैं और जिन्हें सरकार तथा मीडिया ने भी भुलाया और एक तरफ छोड़ा हुआ है.

पूरी जिंदगी जिस काम को वे करते आए, उसी को आगे बढ़ाते हुए द लास्ट हीरोज में साईनाथ आमफहम लोगों की, ''किसानों, भूमिहीन मजदूरों, कामगारों, हरकारों, वनोपज बीनने वालों, घर बनाने वालों, घरेलू नौकरों... यहां तक कि कुलीन जमींदार परिवारों के दो-एक बागी सदस्यों की भी’’ कहानियां सुनाते हैं.

वे उन लोगों की दास्तां सुनाते हैं जिनकी बहादुरी को न कभी मान्यता दी गई और न जिसे सेलिब्रेट किया गया. ओडिशा के बाजी मोहम्मद को ही लीजिए, जिनका 2013 में 103 बरस की उम्र में इंतकाल हुआ. वे गांधी से मिले थे और जिन्हें ओडिशा लौट जाने की सख्त हिदायत दी गई थी. गांधी ने मोहम्मद से कहा, ''जेल जाओ, लाठी खाओ. देश के लिए बलिदान दो.’’

यह हिदायत और सत्याग्रह का जज्बा ताउम्र मोहम्मद में जिंदा रहा. साईनाथ अध्याय की शुरुआत इस तरह करते हैं कि मोहम्मद एक शामियाने के नीचे बैठे हैं. मोहम्मद कहते हैं, ''उन्होंने इसे तोड़-फोड़कर गिरा दिया. हम बैठे रहे. उन्होंने हमारे ऊपर पानी डाला...उन्होंने मिट्टी को गीला करने की कोशिश की ताकि हमारे लिए बैठना मुश्किल हो जाए.

हम खामोश बैठे रहे. फिर जब मैं पानी पीने गया और नल के पास झुका, उन्होंने दीवार में लड़ाकर मेरी खोपड़ी फोड़ दी.’’ साईनाथ स्पष्ट करते हैं कि मोहम्मद कोई 1942 की ब्रिटिश बर्बरता का वाकया नहीं याद कर रहे थे. वे ''नितांत शांत लहजे में, मन में कसैलापन लाए बगैर 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के दौरान अयोध्या में उन पर हुए शातिर हमले का वर्णन कर रहे हैं.’’ उस वक्त वे सत्तर के थे.

साईनाथ इन महिलाओं-पुरुषों को स्वतंत्रता सेनानी कहते हैं, ऐसे महिला-पुरुष जिन्होंने अहिंसा और इंकलाब के मूल्यों को आत्मसात किया, जो ''सुनहरी पीढ़ी’’ थे. वे कहते हैं कि पांच-छह सालों में इस पीढ़ी का एक भी नुमाइंदा जिंदा नहीं रह जाएगा. साईनाथ आगे लिखते हैं, ''मुझे लगता है कि यह बड़ी ही परेशान करने वाली बात है. मौजूदा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियां अपने देश की आजादी के सच्चे सेनानियों के साथ न तो बैठेंगी, न सुनेंगी, न जुड़ेंगी और न बोलेंगी.’’

ऐसे में इस किताब की मंशा उन लोगों को शृद्धांजलि देने की भी है और उनके बारे में लोगों को बताने-शिक्षित करने की भी है. दरअसल यह युवाओं को ध्यान में रखकर लिखी गई है. इसके 16 में से हरेक अध्याय के अंत में क्यूआर कोड है, ताकि इसके नौजवान पाठक आगे उन कहानियों का ऑनलाइन पीछा कर सकें, अभी-अभी पढ़े पाठ से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो देख सकें. साईनाथ कहते हैं कि यह युवाओं को दिखाने-बताने की कोशिश है कि ये कहानियां उस सरकारी इतिहास के विकल्प जैसी हैं जो बिल्कुल नीरस और बेजान-सा होता है. और यह भी कि इतिहास को कुछ इस अंदाज में बताया-पढ़ाया जाना चाहिए.

वे बताते हैं कि अब भी अगर आप भारत सरकार की 'आजादी का अमृत महोत्सव’ वेबसाइट के होमपेज पर जाएं, तो ''उस पर एक भी जीवित स्वतंत्रता सेनानी की न तो कोई तस्वीर है, न कोई वीडियो, न कहानी, न एक भी बयान या उद्धरण और न एक भी चित्रांकन.’’

जहां तक मौजूदा निजाम को लेकर साईनाथ के आलोचनात्मक होने की बात है, तो उनकी यह किताब तो दशकों की तैयारी के बाद आई है. वे कहते हैं कि यह काम फौरन अंजाम देना इसलिए जरूरी हो गया क्योंकि ये कहानियां ऐसे वक्त दर्ज की जानी थी जब उनके पात्र उनके साथ अब भी देर तक और साफगोई से बोल पा रहे थे.

इस किताब के पाठों में ज्यादातर पुराने साईनाथ के लेखों को नए ढंग से लिखा गया है. ये लेख उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के भूले-बिसरे नायकों को मुक्चयधारा की नजर में लाने की कोशिश को आगे बढ़ाते हुए अपने करियर के दौरान विभिन्न अखबारों के लिए लिखे थे.

वे इन साधारण-से भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की उपेक्षा की जड़ें मेरठ में हुए 1857 के विद्रोह में खोजते हैं. वे कहते हैं, ''मेरठ और कानपुर में विद्रोह करने वाला सिपाही मेरठ और कानपुर का नहीं था. आज दिन तक वह भारतीय सिपाही ही है. भारतीय जवान दरअसल वर्दी पहने हुए किसान ही तो है. उसे गांवों का मिजाज दिखाना होता है.’’

इस लिहाज से द लास्ट हीरोज किताब उतनी ही मौजूदा वक्त के भारत के बारे में भी है, जितनी वह स्वतंत्रता के संघर्ष के बारे में है. पिछले साल दिल्ली में हुए किसानों के विरोध प्रदर्शन का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, ''जब मैं मंच पर बोल रहा था, दर्जनों दर्जन पूर्व-सैनिक और करीब 200 मेडल मुझे ताक रहे थे.’’

2014 में साईनाथ की ओर से स्थापित पुरस्कार-विजेता मल्टीमीडिया प्लेटफॉर्म पीपल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया (पीएआरआइ) में एक रिपोर्टर ने इनमें से पांच सैनिकों की कहानी छापी की. उन पांचों ने कुल 63 मेडल जीते. साईनाथ थोड़ा व्यंग्य में कहते हैं, ''ये राष्ट्र-विरोधी और खालिस्तानी थे!’’

पूरी किताब में साईनाथ जोर देकर कहते हैं कि साधारण लोग महत्वाकांक्षा या वाह-वाही से प्रेरित नहीं होते. बल्कि उनकी प्रेरणा आजादी होती है. उनके लिए यह वजूद की लड़ाई है—अपनी जमीन, अपनी रोजी-रोटी और अपनी जीवनशैली को बचाने की चाहत. यह किताब साधारण स्वतंत्रता सेनानियों के असाधारण जज्बे को रेखांकित करती है. किताब के आशावाद के बावजूद वह इसके भीतर बहते करुणा के शोकाकुल स्वर से बच नहीं सकती.

किताब की प्रस्तावना में कैप्टन भाऊ का एक उद्धरण है. भाऊ किताब के छठे अध्याय के पात्र हैं. वे कहते हैं, ''हम दो चीजों के लिए लड़े, (खुद की) आजादी और (देश की) स्वतंत्रता की खातिर. हमने स्वतंत्रता हासिल की.’’ बदकिस्मती से आजादी हासिल करना भावी पीढ़ियों के जिम्मे है.

साईनाथ की किताब और उनकी पत्रकारिता का भी तो यही संदेश है कि संघर्ष जारी रहे. यह साधारण लोगों की जिम्मेदारी है कि वे सत्ता की ज्यादतियों का प्रतिकार करें. और यह स्वतंत्र चेतना वाले पत्रकारों की घटती तादाद पर है कि वे लोगों के प्रतिकार को दर्ज करें.

द लास्ट हीरोज: फुट सोल्जर्स ऑफ इंडियन फ्रीडम
लेखक:
पी साईनाथ
प्रकाशक: पेंग्विन वाइकिंग
कीमत: 499
युवा पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई द लास्ट हीरोज साधारण-से असाधारण नायकों के प्रति शृद्धांजलि भी है और उनके बारे में दूसरों को बताने का प्रयास भी.

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