रौशनी बहुत है इस चिराग में

परेश मैती सरीखी कामयाबी कम ही चित्रकारों को नसीब होती है. अब उनकी नई एक्जिबिशन इनफाइनाइट लाइट को ही लीजिए. चार शहरों में जारी इस शो में उनके काम की मात्रा और कलात्मक साधना दोनों का गहरा मेल.

परेश मैती
परेश मैती

 प्रदर्शनी का नाम इनफाइनाइट लाइट क्यों रखा?

पचासेक साल पहले, सात साल की उम्र में ही अपने शहर तामलुक (बंगाल) में मुझे एहसास हो गया था रौशनी के बिना जीवन असंभव है. आज भी दिन में कभी भी मुझे बाहर बैठना पसंद है, दोपहर हो या ढलती शाम. रौशनी विजुअल कम्युनिकेशन और विजुअल आर्ट का अभिन्न हिस्सा है. इसीलिए यह शीर्षक दिया.

 आपकी प्रदर्शनी चार शहरों में टंग रही है—दिल्ली (आर्ट अलाइव गैलरी), मुंबई (आर्ट म्यूजिंग्स), कोलकाता (सीआइएमए), बेंगलूरू (गैलरी सुमुखा). एक साथ इतनी जगह, कैसा लग रहा है?

मैं अपना काम देश के चारों कोनों पर टांगना चाहता था. मेरी इच्छा थी कि लोग 32 साल के मेरे काम को निहारें. इसके अलावा जितने लोग अमूमन मेरे काम को देखने आते हैं और रखे गए काम की संख्या—450—को देखते हुए भी मुझे लगा कि इस सिंहावलोकन का विजन थोड़ा अलग होना चाहिए.

 आप तो मूर्तिशिल्प, चित्रकारी, इंस्टॉलेशन जैसे कई माध्यमों में कामयाब रहे हैं. कोई पसंदीदा भी है?

यह तो एक मां से पसंदीदा बच्चे का नाम पूछने जैसा हो गया. मुझे हर माध्यम में हाथ आजमाना पसंद है, वह स्कल्प्चर हो या वॉटरकलर. किसी भी चीज, यहां तक कि कुर्सी और कपड़ों से भी कला सृजित हो सकती है. उसे पेपर और कैनवास तक ही सीमित क्यों रखा जाए.

 बनारस को आपने बार-बार चित्रित किया है. क्या आज का बनारस अपने जादू पर खरा उतरता है?

बनारस में तो हर लम्हा एक नया जादू, एक नई जबान, एक नई रौशनी उभरती है. वह शहर इतिहास की सीमाओं से परे है. आपकी हर संवेदना, हर खयाल से बनारस जुड़ा मिलता है. सीढ़ियां झाड़कर कहीं भी बैठ जाइए, जिंदगी से मौत तक हर पहलू नजर आ जाएगा.

—श्रीवत्स नेवटिया

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