'मैं किसी भी रेस में नहीं हूं’
नेटफ्लिक्स पर राजकुमार राव की नई फिल्म रिलीज होने जा रही है. पर वे कहते हैं कि उनका मुकाबला सिर्फ और सिर्फ खुद से है.

सिनेमा
नेटफ्लिक्स पर इसी 11 नवंबर को रिलीज हुई फिल्म मोनिका, ओ माइ डार्लिंग में राजकुमार राव के किरदार जयंत को हर कोई पसंद नहीं करेगा. न तो वे शाहिद या न्यूटन के आदर्शवादी हैं जिन्हें दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया, न बरेली की बर्फी (2017) और स्त्री (2018) के प्यारे-से चुगद हैं जिन्होंने हमारा दिल लुभाया था. राव के शब्दों में जयंत ''मौकापरस्त’’ और ''हालात का मारा’’ है. जिंदगी उसे अनैतिक रास्ते पर धकेल देती है.
ऐसे रास्ते पर जो मुर्दों, कमीने किरदारों यहां तक कि सांपों और रोबोट से अटा पड़ा है. यह राव के ही बूते की बात है कि वे जयंत की ''इन्सानियत’’ को उभारकर बाहर लाते हैं. ऐसे भी मुकाम आते हैं जब वे दर्शकों के मन में उसके प्रति कुछ अफसोस की भावना पैदा कर देते हैं. राव कहते हैं, ''मैंने उसे कभी विलेन की तरह नहीं देखा.
वह छोटे शहर का लड़का है जो आंखों में सपने पाले हुए है और एक अच्छी जिंदगी जीना चाहता है. मगर एक गलत कदम उठाते ही मुश्किल में पड़ जाता है. जब आप फंस जाते हैं तो बाहर निकलने के लिए हर मुमकिन कोशिश करते हैं. पूरी फिल्म सर्वाइवल के बारे में है. यानी कि हालात अपने माफिक न होने पर आप कैसे जीने के रास्ते खोजते-तलाशते हैं.’’
इसमें दो राय नहीं कि राव खुद सर्वाइवल की कला में माहिर हैं. उन्होंने पहली छाप एलएसडी: लव, सेक्स और धोखा (2010) में सुपरमार्केट के तिकड़मी सुपरवाइजर के किरदार में छोड़ी थी. 10 साल पहले वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता शाहिद आजमी की बायोपिक शाहिद (2012) में अपने अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता.
हॉरर-कॉमेडी स्त्री के साथ 100 करोड़ रुपए के क्लब में शामिल हुए भी उन्हें पांच साल हो गए. अपनी अदाकारी के बूते इस प्रतिस्पर्धी उद्योग में न केवल उन्होंने सर्वाइव किया बल्कि खूब फले-फूले. मुख्यत: स्वतंत्र फीचर फिल्मों से शुरू करने के बाद उनकी फिल्मों की फेहरिस्त में बड़े स्टुडियो से बनने वाली फिल्में भी जुड़ने लगी हैं.
इसमें शायद कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी राव ऐसे चुनिंदा ऐक्टर्स में से हैं जो ओटीटी प्लेटफॉर्म और बड़े परदे के बीच पूरे आत्मविश्वास के साथ आवाजाही करते आए हैं. मोनिका, ओ माइ डार्लिंग, द व्हाइट टाइगर (2021) और लूडो (2020) के बाद नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने वाली उनकी तीसरी फिल्म है. मोनिका... के बाद उनकी अगली फिल्म राज और डीके की गन्स ऐंड गुलाब्ज आएगी.
1990 के दशक की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म के अदाकारों में दलकीर, आदर्श गौरव और गुलशन देवैया भी हैं. मनी हाइस्ट (2017-2021) और स्किड गेम (2021) सरीखे शो की कामयाबी का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, ''दुनिया बदल गई है. हम चाहते हैं कि हमारी फिल्में देखी जाएं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे बड़े परदे पर आ रही हैं या छोटे परदे पर. स्ट्रीमिंग बराबरी से चलने वाला मजबूत उद्योग है जो अब यहां टिकने वाला है.’’
हालांकि एक लिहाज से राव हमेशा दूसरों से आगे रहे. 2017 में ही उन्होंने आल्टबालाजी की सीरीज बोस: डेड/एलाइव (2017) के लिए अपने सिर का एक हिस्सा मुंडवा लिया. जल्द ही राव के कई संगी-साथी उन्हीं के नक्शेकदम पर चल पड़े. ओटीटी प्लेटफॉर्म न केवल उन्हें भाषा और भूगोल की सरहदों के पार जाने का मौका देते हैं, बल्कि इसके जरिए वे नए दर्शक भी खोज पाते हैं.
राव अलबत्ता इस पर जरूर अफसोस जाहिर करते हैं कि कोविड-19 महामारी के बाद सिनेमा और ओटीटी के रूप में इन दो प्लेटफॉर्मों के बीच बंटवारे की लकीरें कुछ ज्यादा ही गहरी हो गई हैं. वे कहते हैं, ''आप लोगों को अन्न्सर यह कहते सुन सकते हैं, 'यह तो ओटीटी फिल्म है!’ अरे भई, फिल्म तो फिल्म होती है. वे दोनों प्लेटफॉर्म पर मौजूद रहेंगी. मैं उम्मीद करता हूं लोग फिल्मों को खानों में रखना बंद कर देंगे.’’
मोनिका, ओ माइ डार्लिंग राजकुमार राव का वह पहलू सामने लाती है जो जाना-पहचाना भी है और जबरदस्त भी. यानी कि एक मामूली-सा लेकिन अक्सर थोड़ा टेढ़ा-अटपटा आदमी जो कि असामान्य-सी स्थितियों से घिर गया है. ट्रैप्ड (2016), रूही (2021) और बधाई दो (2022) सरीखी राव की कई फिल्में इसी पैटर्न पर चलती हैं. उन्हीं के शब्दों में, ''कुछ कहानियां मुझे उन चीजों के बारे में बात करने का मौका देती हैं जिनमें मैं यकीन करता हूं और जिन पर मुझ फख्र है.’’
उनमें से सब बॉक्स ऑफिस पर सेंध भले न लगा पाएं, लेकिन राव ने भरोसेमंद अभिनेता के तौर पर अपनी एक अलहदा पहचान तो बना ली है. उसी का नतीजा है कि कुछ भी हो, वे फिल्में नतीजा देती हैं. पर यह भी अजीब है कि वे इसका श्रेय नहीं चाहते. वे कहते हैं, ''देखिए अभिनेता उस बड़ी तस्वीर का छोटा-सा हिस्सा है. सबसे ज्यादा अहमियत फिल्म की है. कोई अभिनेता यह सुनना नहीं चाहेगा कि 'तुम तो अच्छे थे, पर फिल्म मेरे लिए अच्छी नहीं रही.’
इसके बजाय मैं चाहूंगा कि लोग कहें, 'बहुत अच्छी फिल्म है.’’’ भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीआइआइ) का ग्रेजुएट यह अदाकार इस बात का शुक्रगुजार है कि उसकी कुछ फिल्मों को ''बहुत अच्छी’’ का दर्जा मिला. वे ऐसे वन्न्त में आगे बढ़ रहे हैं जब ''कंटेट-ड्रिवन’’ (मजमून के बूते चलने वाली फिल्में) मुहावरे का इस्तेमाल तो बहुत लोग करते हैं पर फिल्म स्टुडियोज के आका इसे गंभीरता से नहीं लेते. वे कहते हैं, ''इन सबसे ज्यादा अहमियत बस कहानियों और परदे पर किरदार अदा करते अदाकारों की है.’’
अगले साल राव धर्मा बैनर के तले अपनी पहली फिल्म मिस्टर ऐंड मिसेज माही में काम करेंगे, जिसमें जान्हवी कपूर भी हैं. राव कुबूलते हैं कि करण जौहर प्रोडक्शन के सेट का मिजाज अलग है, पर उन्हें यह भी भरोसा है कि यह फिल्म भी शाहिद जैसी ''नेकनीयती’’ से बनाई जाएगी.
पुराना 'राज’ कहीं नहीं जा रहा है, भले ही उस पर दांव कितना भी बढ़ता जा रहा हो. अब भी कहानी ही सबसे ऊपर है; वह जितनी सरल और सच्ची हो उतना अच्छा. ''व्यावसायिक स्टार होने की कोशिश में आप अपने को भ्रष्ट नहीं कर सकते. मैं किसी दौड़ में नहीं हूं. मैं अभिनेता के तौर पर विकसित होना चाहता हूं, खुद को तलाशना और उकसाना चाहता हूं. यही अकेला एजेंडा है.’’