डरते हुए जीना भी कोई जीना है!

हाल में रिलीज हुई विक्रम वेधा में एक अहम किरदार निभाने वालीं राधिका आप्टे का कहना है कि दोयम दर्जे की फिल्में करने की बजाय भविष्य में वे खुद स्क्रिप्ट-राइटिंग और डायरेक्शन करना पसंद करेंगी.

राधिका आप्टे
राधिका आप्टे

 आपने खुद को हमेशा एक बेखौफ-दबंग ऐक्टर की तरह पेश किया है. उस लिहाज से आपकी जर्नी कैसी रही है?

बेखौफ रही, शायद इसलिए कि नाकाम होने का कभी डर नहीं रहा. यह आत्मविश्वास नहीं बल्कि सच को स्वीकारना है. मुझे कैमरे के सामने होने का कोई खौफ नहीं होता. शायद इसीलिए मैं कॉन्फिडेंट दिखती हूं. ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? आप कह सकते हैं कि आपको मेरी फिल्म अच्छी नहीं लगी. इस तरह की बात से मुझे बाल बराबर भी डर नहीं लगता.

 विक्रम वेधा और आपकी अगली फिल्म मोनिका, ओ माइ डार्लिंग दोनों ही टेक्निकली देखें तो नियो नॉएर हैं पर दोनों आपसे बिल्कुल अलहदा किस्म की मांग करती हैं...

मोनिका, ओ माइ डार्लिंग ने ऐक्टर के तौर पर सचमुच मुझे चैलेंज किया. डायरेक्टर वासन बाला की मुझसे जिस तरह के ह्यूमर की डिमांड थी, वह यकीनन काफी मुश्किल था. इसके ठीक उलट विक्रम वेधा के किरदार में मैं ज्यादा कंफर्टेबल थी क्योंकि इस तरह के रोल पहले मैंने किए हुए थे.

 आगे की जिंदगी के बारे में क्या सोचती हैं?

मैं ज्यादा दूर की सोचती नहीं. पर अब पहले के मुकाबले बहुत कम काम लेने का फैसला किया है. अब स्क्रिप्टराइटिंग पढ़ रही हूं तो ज्यादा काम करने का टाइम वैसे भी नहीं है. महामारी ने लिखना शुरू करने का मौका मुहैया किया. जितना ही लिखती, उतना ही उसके बारे में सीखने की ललक बढ़ती. मुझे मिलने वाले रोल्स में मजा नहीं आ रहा था, इसलिए यह ख्याल आया. आगे क्या होगा, पता नहीं, पर मैं सचमुच लिखना और डायरेक्ट करना चाहती हूं.

 विक्रम वेधा के किस पहलू से आप सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं?

इंडियन सिनेमा में बॉलीवुड और दूसरी इंडस्ट्रीज में अच्छाई और बुराई को अंडरलाइन करती हुई ऐक्शनन फिल्में बनती ही आई हैं. लेकिन कहानियों को काले-सफेद के बस इसी फ्रेम में समेट देना मुझे हमेशा ही परेशान करता रहा है.

विक्रम वेधा दरअसल इसी को चैलेंज करती है. यहां तक कि छोटा-सा होने के बावजूद फिल्म में मेरा खुद का किरदार एक मौजूं सवाल उठाता है कि जिस दुनिया में लोग इस छोर या उस छोर पर जी रहे हों, उसमें आप कैसे रास्ता खोजें.

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