...और जब चल पड़ा शिकारी

डॉक्यूमेंट्री और फिल्मों के एक नए सिलसिले ने सीरियल किलर को पूरी तरह से प्रोटैगनिस्ट की तरह प्रतिष्ठित कर दिया.

अभिषेक बच्चन बॉब बिस्वास में
अभिषेक बच्चन बॉब बिस्वास में

उत्तर प्रदेश के एक शख्स राजा कलंदर को 2013 में एक पत्रकार की हत्या का दोषी ठहराया गया. पुलिस ने दावा किया कि यह उसका अकेला जुर्म नहीं था—उसने कथित तौर पर कम से कम एक दर्जन और लोगों की हत्या की थी और जादू-टोना तथा नरभक्षीपना भी दिखाया था. कलंदर की कहानी इंडिया टुडे ओरिजिनल्स की सीरीज इंडियन प्रीडेटर: द डायरी ऑफ अ सीरियल किलर का विषय है.

तीन भागों की इस डॉक्यू-सीरीज के निर्देशक धीरज जिंदल कहते हैं, ''हम काफी उत्साहित थे. यह कुछ ऐसा नहीं था जो हमने पहले देखा या सुना हो. हमने इसकी छानबीन शुरू की तब पता चला कि इसका केवल 20 फीसद ही सामने आया है. ऐसा बहुत कुछ है जिसकी हम अपने शो के जरिए खोजबीन कर सकते हैं.’’

जिंदल की यह सीरीज सिनेमा में फिक्शन और नॉन-फिक्शन स्वरूप में क्राइम की कहानियों की तेज लहर के बीच आ रही है. डिज्नीप्लस हॉटस्टार की कठपुतली 2 सितंबर को रिलीज हो रही है, जिसमें अक्षय कुमार कसौली में हत्याओं के सिलसिले का पता लगा रहे पुलिस का किरदार निभा रहे हैं.

जुलाई में नेटिजफ्लिक्स ने इंडियन प्रीडेटर: द बुचर ऑफ दिल्ली रिलीज की, तीन भाग की इस सीरीज ने दिल्ली में हत्याओं के सिलसिले की खोजबीन की. पिछले साल अभिषेक बच्चन की अदाकारी से सजी बॉब बिस्वास आई, जो एक नृशंस हत्यारे पर बनी थी, जबकि सीरियल किलर कॉमेडी हंसमुख में वीर दास ने लतीफे छोड़े और खोपड़ियां फोड़ीं. जून में निठारी की हत्याओं पर आधारित फिल्म सेक्टर 36 की शूटिंग शुरू हुई.

इंडियन प्रीडेटर: द बुचर ऑफ दिल्ली की निर्देशक आयशा सूद कहती हैं कि कुछ साल पहले इस डॉक्यू-सीरीज के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था. ''अब अपराध कथाओं, डॉक्यूमेंटरी के दर्शक हैं क्योंकि यह प्लेटफॉर्म मौजूद है. शिल्प में भी निखार आया है. सस्पेंस और किस्सागोई को आदर्श रूप में सहेजने वाली इस विधा को सीरियल किलर नई जिंदगी देते हैं.’’ कठपुतली के लेखक असीम अरोड़ा कहते हैं, ''इसमें दर्शकों को बांधे रखने का जबरदस्त माद्दा है.’’

फिर चरित्र के अध्ययन की संभावना होती है. केरल में दो काल्पनिक हत्याओं का राज फाश करने वाली मलयालम फिल्म फॉरेंसिक (2020) के सह-लेखक और सह-निर्देशक अखिल पॉल कहते हैं, ''मुझे लगता है, लोग रहस्यमयी, अजीबोगरीब, वर्जित और गूढ़ चीजों की तरफ आकर्षिक होते हैं.’’

जुलाई में जी5 ने इसका हिंदी रीमेक रिलीज किया. पॉल यह भी कहते हैं, ''हकीकत यह है कि सीरियल किलर अपने हौलनाक कारनामों का आनंद लेते हैं... वे अक्सर सयाने और भरोसेमंद शख्स होते हैं और मीडिया में उन्हें खौफनाक मास्टरमाइंड की तरह पेश किया जाता है, यह सब मिलकर उन्हें मनोरंजक कहानी का एकदम सही पात्र बना देता है.’’

कुछ फिल्मकारों के लिए अपराध तो बस एक पहलू है. जिंदल कहते हैं, ''बात यह नहीं कि कितनी हत्याएं हुईं, बात उनके दिलो-दिमाग में उतरने की है.’’ उन्हें अपने मुख्य किरदार से जेल में छह घंटे इंटरव्यू करने का दुर्लभ मौका भी मिला, जो चुनौती भरा भी था और रोमांचक भी. जिंदल के मन में ऐसे विचार तक उठने लगे कि उनके सामने बैठा यह सजायाफ्ता हत्यारा वाकई मासूम था.

सूद के लिए यह दिल्ली के हत्यारे के इर्द-गिर्द विषयगत सरोकार की खोजबीन का मामला भी था: उसका सामाजिक तबका, माइग्रेशन और उसकी मानसिक दशा. वे कहती हैं, ''उम्दा कहानी आपको अलग दरवाजे खोलने देती है.’’

दिल्ली में रहने और अपराधों पर करीबी नजर रखने के बावजूद सूद को इस अपराधी और उसके अपराधों के बारे में तभी पता चला जब निर्देशन के लिए उनसे संपर्क किया गया. वजह शायद यह थी कि हत्यारा अपने शिकारों की तरह गरीब और कामकाजी तबके का था और इस वजह से उसके अपराध उस तरह से दिखाई नहीं दिए.

—भाव्या डोरे

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