...और खामोश हो रहे करघे
पश्मीना शॉल से लेकर कालीन तक कश्मीर के दस्तकारी ग्लोबल ब्रांड हैं, पर सस्ते उत्पादों की बाढ़ और कम मेहनताने की वजह से कई उस्ताद दस्तकार परंपरागत पेशे को तिलांजलि देने को मजबूर.

मोहम्मद मोअज्जम
थॉमस मूर ने अपने पुरबिया रोमांस लाला रुख (1817) में जब पश्चिम के लिए कश्मीर की खूबसूरती का बखान किया, उससे भी आधी सदी पहले यहां की दस्तकारी और खासकर परिधान और शॉल यूरोपीय राजधानियों में सिक्का जमा चुके थे. हर कोई पश्मीना और शहतूश के शॉलों पर लट्टू था. नेपोलियन ने ये महारानी जोसफीन को भेंट किए और महारानी विक्टोरिया ताउम्र इनकी मुरीद रहीं. हल्के और नर्म, गर्म और शानदार पैटर्न और डिजाइनों में बुने गए ऊनी कश्मीरी शॉल इतने शानदार होते हैं कि शॉलों की सबसे उम्दा किस्म को 'कश्मीरी’ ही कहा जाने लगा. कश्मीर की चीजों में शॉल तो अव्वल थे ही, अखरोट की लकड़ी पर बारीक नक्काशी वाले हस्तशिल्प, बेंत की टहनियों के शिल्प और कालीन भी बेशकीमती थे.
झेलम नदी के किनारे फैला श्रीनगर लंबे वक्त से कश्मीर के शीर्ष दस्तकारों और शिल्पकारों का घर रहा है, जहां वे ऐतिहासिक पुराने शहर की तंग गलियों में यहां-वहां बिखरे कारखानों में काम करते थे. दुनिया के फैशन पर अमिट छाप छोड़ने वाले इन दस्तकारों के वंशज अपने पुरखों से मिली पारंपरिक शिल्पकला को तिलांजलि देकर साधारण नौकरियां करने को मजबूर हैं, क्योंकि पीढ़ियों के समर्पित और हुनरमंद काम से आज उन्हें कंगाली के सिवा कुछ नहीं मिलता.
एक वक्त था जब श्रीनगर के ईदगाह नरवारा की करीब 400 अलग-अलग इकाइयों में दस्तकार शॉल बुनने से लेकर कशीदाकारी तक कश्मीर की शिल्पकला का हर हुनर सीखते और काम करते थे. इलाके में नक्काश से लेकर दस्तकार तक प्रतिभाओं की भीड़ लगी रहती थी. कुछ दशक पहले तक यहां के बाशिंदों को अपने बच्चों को पुरखों के नक्शे-कदम पर चलने के लिए कहना नहीं पड़ता था, क्योंकि मेहनताना अच्छा मिलता था. एहतेशाम हुसैन 1989 में स्कूल छोड़कर हथकरघे में काम करने लगे. शुरुआत में वे दुनिया के सबसे उम्दा और सबसे महंगे ऊन शहतूश के नाजुक और नरम धागे से हथकरघे पर शॉल बुनते. बाद में जब शहतूश की खरीद-फरोख्त पर पाबंदी लग गई, वे कमतर गुणवत्ता के पश्मीना ऊन का इस्तेमाल करने लगे.
शहतूश या पश्मीने से बुनाई की कला काफी पेचीदा और वक्त लेने वाली है, जिसमें हुनरमंद दस्तकारों को 10 माइक्रॉन से लेकर 16 माइक्रॉन तक यानी इनसानी बाल के रेशे (70 माइक्रॉन) से भी बहुत बारीक धागे पर काम करना होता है. शहतूश ऊन को तिब्बत के ऊंचे पठारों पर पाए जाने वाले चिरु हिरण के बालों से निकाला जाता था और सामान्यत: इससे ऊंचे और रसूखदार लोगों के पहनावे ही बनते थे. शहतूश शॉल वाकई अनमोल हैं.
मगर चिरू संकटग्रस्त जानवर है और 1975 में संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार सम्मेलन (सीआइटीईएस) के तहत शहतूश के व्यापार पर दुनिया भर में पाबंदी लगा दी गई, जिस पर भारत ने भी दस्तखत किए. यह हिरण भारत के वन्यजीव (संरक्षण) कानून की अनुसूची 1 में भी दर्ज है, जिससे इसे सबसे ऊंचे दर्जे की सुरक्षा दी गई है.
फारूक अब्दुल्ला की अगुआई वाली जम्मू-कश्मीर की सरकार शुरुआत में अनिच्छुक थी, पर 2000 में उसने यह पाबंदी लागू कर दी, जिसका असर करीब 15,000 लोगों की आजीविका पर पड़ा. 2017 में कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी की अगुआई वाली संसदीय समिति ने यह पाबंदी हटाने की सिफारिश करते हुए इसकी बजाए 'चिरु बकरियों के संरक्षण और प्रजनन’ का सुझाव दिया. समिति ने कहा कि इससे कश्मीरियों को आजीविका मिलेगी.
पश्मीना ऊन लद्दाख में पाली जाने वाली चांगथंग बकरियों के बालों से निकाला जाता है. कच्चे ऊन से शॉल तैयार करने की प्रक्रिया में जितनी मेहनत लगती है, उतना ही हुनर भी. इसमें बालों को हटाना, रगड़ाई, निखारना, बुनाई, कताई, रंगाई, तराशना, साफ करना और कढ़ाई शामिल है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में असली पश्मीना के हजारों डॉलर दाम मिलते हैं.
फिर भी अफसोस की बात यह कि बहुत सारे दस्तकारों को, जो भावविभोर कर देने वाली ये खूबसूरत चीजें बनाने के लिए लगातार पसीना बहाते हैं, पूरा मेहनताना नहीं मिलता और वे गरीबी के जाल में फंसकर यह पेशा छोड़ रहे हैं. नतीजा यह कि सदियों में परवान चढ़ी यह हस्तकला हुनरमंद दस्तकार नहीं मिलने से धीरे-धीरे विलुप्त होने की तरफ बढ़ रही है. तीन बच्चों के पिता 52 वर्षीय हुसैन इस शिल्पकला को अपनाने पर अफसोस जाहिर करते हैं.
वे कहते हैं, ''सुबह स्कूल जाते वक्त मेरे बच्चे रोते थे क्योंकि मेरे पास उन्हें बिस्कुट या नाश्ता दिलाने के पैसे नहीं होते थे.’’ हुसैन ने अब यह काम छोड़ दिया है और सैनिटरीवेयर की दुकान में सेल्समैन बन गए. खिचड़ी दाढ़ी पर उंगलियां फैरते हुए वे संतुष्ट दिखते हैं क्योंकि अब वे तीन गुना जो कमाते हैं.
हुसैन कहते हैं कि इस कला से उन्हें रोजाना 300 रु. मिलते हैं जबकि दिहाड़ी मजदूर भी दिन में 700 रु. कमा लेता है और बीमे सहित सामाजिक सुरक्षा के फायदों का हकदार है, सो अलग. वे कहते हैं, ''बुनकर होने से...मैं अपने बच्चों की ट्यूशन फीस का खर्च नहीं उठा सकता. हमारी कड़ी मेहनत से दूसरे पैसा बना रहे हैं, जबकि हम दिन-ब-दिन और गरीब होते जा रहे हैं और सेहत भी बर्बाद हो रही है.’’ हालात बदलने की कोई सूरत न दिखने पर दस्तकार अपने हुनर को अपनी संततियों को देने से गुरेज करते हैं. हुसैन की तरह ज्यादातर दस्तकार अपने बच्चों को उन कमरों में फटकने तक नहीं देते जहां हथकरघे लगे हैं.
एक सरकारी दस्तावेज बताता है कि हाथ से बने कालीन, कानी शॉल, लकड़ी की नक्काशी खतमबंद, नमदा गलीचे, पेपर मैशे और अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी करने वाले दस्तकारों की जबरदस्त कमी हो गई है. चूंकि कश्मीरी हस्तशिल्प एक असंगठित क्षेत्र है इसलिए इसके सटीक आंकड़े नहीं हैं कि कितने दस्तकारों ने सेक्टर छोड़ दिया.
कश्मीर यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रो. इम्तियाजुल हक कहते हैं कि कश्मीर एक मजदूरों के संकट से गुजरती अर्थव्यवस्था है और करीब आठ लाख प्रवासी सालाना यहां काम करने आते हैं. इससे मजदूरी की दर बढ़ गई है जिससे कम कमाने वाले दक्ष शिल्पी काम छोड़कर निर्माण मजदूर जैसे काम करने लगे हैं. इसके फलस्वरूप कश्मीरी हस्तशिल्प का उत्पादन और निर्यात घट गया है.
मिसाल के तौर पर नब्बे साल से ऊपर के गुलाम मोहम्मद और उनके चार बेटों ने अखरोट की नक्काशी का काम किया लेकिन आगामी पीढ़ी के किसी सदस्य ने यह काम नहीं अपनाया. बजाए इसके वे काम के लिए पश्चिम एशिया चले गए और अब अपने पिता को भी यह काम छोड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं.
जहूर अहमद इस काम को छोड़ने की वजह बयान करते हुए कहते हैं, ''बच्चे हमें कारखाना चलाने देने के इच्छुक नहीं हैं.’’ हुसैन इसकी वजह कम मेहनताने के अलावा शरीर की कमजोरी को 'धीमा जहर’ करार देते हैं—यह पेशा लगातार बैठे रहने की वजह से हड्डियों की बीमारी और आंखें खराब होने का पेशागत खतरे झेल रहा है. वे कहते हैं, ''यह व्यापार दस्तकारों का खून चूस लेता है पर हमें शोषण के सिवा कुछ नहीं मिलता.’’
यूरोप अब भी कश्मीरी दस्तकारी पर लट्टू है, पश्चिम एशिया और चीन में भी इसका बड़ा बाजार है. नौ लाख से ज्यादा लोग इस धंधे से सीधे जुड़े हैं, जिनमें सरकार के हस्तशिल्प और हथकरघा महकमे में पंजीकृत 2.8 लाख दस्तकार भी हैं. इनमें 66,000 बुनकर हैं और बाकी अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी, पेपर मैशे, क्रोशिये की कढ़ाई और अन्य दस्तकारियों में लगे हैं. मगर यहां भी उदासी घेर रही है—बीते दशक में सालाना व्यापार में तेज गिरावट आई और निर्यात घटा. निर्यात 2013 में करीब 1,700 करोड़ रुपए से घटकर 2021 में 563 करोड़ रुपए पर आ गया.
अफसर इस तेज गिरावट का दोष महामारी को देते हैं, तो निर्यातकों और दस्तकारों को इस झटके में धूर्त दुश्मन दिखता है—मशीन से बने उत्पाद 'असली’ कश्मीरी दस्तकारी बताकर बेचे जा रहे हैं. इस तरह मशीन से बना नकली 'पश्मीना शॉल’ 3,000 रुपए में अनजान ग्राहक को बेचा जाता है, जिससे पश्मीना ब्रांड का अवमूल्यन भी होता है. विदेशी ग्राहक अब प्रयोगशालाओं से माल के असली होने की जांच करवाते हैं.
मिलों में बने उत्पादों ने दस्तकारों को बेरोजगार कर दिया है. इनमें रेशों से चरखों पर बारीक तागा कातने वाली औरतों से लेकर बुनकर तक शामिल हैं. कश्मीर पश्मीना कारीगर यूनियन के संस्थापक रऊफ अहमद कुरैशी, जो अब भी महिला कामगारों से ही दस्तकारी के शॉल बनवाते हैं, कहते हैं कि मशीनों ने उनके धंधे को बर्बाद कर दिया. वे कहते हैं, ''एक कताई की मशीन दिन में 10-20 फीसद नायलॉन के साथ पश्मीने के 200 ग्राम या कुछ ज्यादा रेशों की कताई करती है.
इसका धागा सस्ता है जिसकी कीमत 8,000 रुपए से 20,000 रुपए किलो है.’’ मगर कुरैशी कहते हैं कि पारंपरिक चरखे पर ऊन से काता गया धागा/तागा 100 फीसद शुद्ध होता है और इसकी कीमत 40,000-50,000 रुपए किलो है. वे कहते हैं, ''स्पिनरों पर बना धागा बिजली के करघों से बुना जाता है जिनकी क्षमता दिन में 100 शॉल बनाने की है.
इसे 'कश्मीरी पश्मीना’ कहकर बेचा जाता है, जिससे हमारी विरासत के लिए खतरा पैदा हो रहा है. ग्राहक को धोखेबाजों से बचाने के लिए उन्हें मशीन से बना लेबल लगाना चाहिए.’’ केंद्र सरकार प्राधिकारियों से अवैध मशीनें बंद करने और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पश्मीना से बनी चीजों पर जीआइ टैग (जो इसे 2008 में मिला) पर जोर देने को कहती रही है.
चूंकि जीआइ टैग एक इलाके के अनूठे उत्पादों की पहचान स्थापित करता है, इस पर जोर देने से नकली माल के बाहर होने की उम्मीद है. उत्पाद की जांच प्रयोगशाला में की जाएगी और असली माल पर रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआइडी) टैग लगाया जाएगा. कश्मीर के सात हस्तशिल्पों ने जीआइ हासिल किया है जिनमें पश्मीना, अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी, पेपर मैशे, सोजनी कढ़ाई, कानी शॉल, कालीन और खतमबंद शामिल हैं.
कश्मीरी दस्तकारों की नुमाइंदगी करने वाले संगठन तहफ्फुज के सलाहकार रऊफ वडेरा कहते हैं कि इस मान्यता से वैश्विक बाजारों में दाखिल हो पाए हैं, पर अब मुख्य चिंता यह होनी चाहिए कि दस्तकारों को हुनर विकास के मौकों के अलावा सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा दी जाए. वे कहते हैं, ''दस्तकारों को हुनर के स्तर के आधार पर न्यूनतम मेहनताना देना पक्का करने के लिए अलग श्रम सुरक्षा नीति लानी चाहिए. साथ ही, आकस्मिक जरूरतों, स्वास्थ्य बीमा, बच्चों की पढ़ाई और उचित दाम पर कच्चे माल की आपूर्ति के लिए निधि की जरूरत है.’’
कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (केसीसीआइ) के प्रेसिडेंट शेख आशिक कश्मीर के उन कारोबारी अगुआओं में थे जो 5 अप्रैल को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले. उन्होंने ज्ञापन देकर दस्तकारी की चीजों पर करों से छूट देने की मांग की. उनके प्रस्तावों में उद्योग को संगठित क्षेत्र बनने की तरफ ले जाने और इस तरह शिल्पकारों की हालत सुधारने के लिए विशेष उत्पादन केंद्रों की स्थापना भी शामिल थी.
कश्मीर हस्तशिल्प और हथकरघा के डायरेक्टर तारिक अहमद जरगर कहते हैं कि दस्तकारों को 2021 में शुरू की गई कारखानदार योजना का फायदा मिल रहा है. इस योजना का उद्देश्य दस्तकारों के हुनर में सुधार लाकर दस्तकारी में नई जान फूंकना है. इस कार्यक्रम के तहत हर प्रशिक्षणार्थी दस्तकारी को 2,000 रुपए महीना प्रोत्साहन लाभ दिया गया है.
बाद में हरेक योग्यता प्राप्त दस्तकार को दो किस्तों में 50,000 रुपए दिए जाते हैं. जरगर कहते हैं, ''हम अंतरराष्ट्रीय बाजार की जरूरतों के हिसाब से ब्रांडिंग, पैकेजिंग और नए डिजाइन लाने पर काम कर रहे हैं. इसके अलावा, हम नए बाजारों और खासकर अमेरिका पर ध्यान दे रहे हैं, जिनका दोहन नहीं हुआ है.’’ उम्मीद है कि योजना की बदौलत दुनिया के सबसे उम्दा दस्तकारों में से कुछ अभावों की वजह से अपना काम छोड़ने को मजबूर नहीं होंगे.
कश्मीरी हस्तशिल्प का निर्यात पिछले दशक में तेजी से गिरा है और शिल्पी मानते हैं कि इसकी वजह मशीन निर्मित उत्पादों को असली कश्मीरी उत्पाद कहकर बेचा जाना है जिससे आखिरकार असली ब्रांड की साख बिगड़ती है.