हर दिन एक नया रूप

ओमिक्रॉन के तरह-तरह के उपरूप और मिश्रित रूप दुनिया भर में घूम रहे हैं. क्या यह वायरस ज्यादा जानलेवा रूप बदल रहा है? और क्या भारत को परेशान होना चाहिए?

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सोनाली आचार्जी

मई की 31 तारीख को भारत में कोविड-19 के करीब 17,000 सक्रिय मामले थे. जनवरी के मध्य में इसके बिल्कुल नए रूप बीए.2 (जिसे ग्रीक अक्षर ओमिक्रॉन नाम दिया गया) के भारत आने के बाद इस आंकड़े में नाटकीय वृद्धि नहीं हुई है. यह सबसे पहले 24 नवंबर, 2021 को दक्षिण अफ्रीका में मिला और तब से दुनिया भर की सुर्खियों में छाया हुआ है. ओमिक्रॉन ने अब अपना परिवार बढ़ाकर कुछ गौरतलब उपरूपों (सब-वैरिएंट्स) को इसमें शामिल कर लिया है, जो कई देशों में तेज उछाल की वजह बन रहे हैं.

मसलन, ओमिक्रॉन का बीए.2.12.1 उपरूप अब अमेरिका में करीब 26 फीसद कोविड जीनोम के लिए जिम्मेदार है जबकि बीए.4 और बीए.5 दक्षिण अफ्रीका में तेजी से फैल रहे हैं और ये 90 फीसद से ज्यादा अनुक्रमित जीनोम में पाए गए हैं. बीए.2 और इसके उपरूप, जो मूल ओमिक्रॉन (बी.1.1.529) के रूप बदलने से पैदा हुए, हांगकांग, चीन और दक्षिण अफ्रीका में जबरदस्त उछाल पैदा कर रहे हैं, जहां पहले लगाए गए सख्त लॉकडाउन ने बड़ी आबादी को कोविड के संपर्क में नहीं आने दिया.

डेल्टा, अल्फा और बीटा सरीखे पिछले रूपों के विपरीत ओमिक्रॉन के उपरूपों ने मूल रूप से कहीं ज्यादा सुर्खियां पैदा कीं. इससे कई लोग यह सोचकर डर गए कि कोविड अपने नए रूपों में 'ज्यादा चालाक’ होता जा रहा है और भारत में जबरदस्त नई लहर बस आने वाली है. विशेषज्ञ इसकी तस्दीक नहीं करेंगे, पर सावधान रहने की सलाह जरूर दे रहे हैं.

पुणे स्थित राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (एनआइवी) की डायरेक्टर प्रिया अब्राहम कहती हैं, ''हमारे यहां वैसी उछाल नहीं है जैसी दुनिया के दूसरे हिस्सों में है, पर ये लहरें डरावनी याद दिलाती हैं कि वायरस आसपास ही है. यह दुनिया के दूसरे हिस्से में, या भारत में ही, रूप बदल सकता है और बिल्कुल नए रूप में लौट सकता है. हमें पक्के तौर पर नहीं पता, पर संभावना बनी हुई है. इसलिए हम सावधान रहने की संस्कृति को तिलांजलि नहीं दे सकते.’’

कई लोगों को शक था कि मई की शुरुआत में भारत नई लहर के शिकंजे में था. दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र में तब पॉजिटिव दर 10 फीसद से ऊपर थी, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की स्वीकृत 5 फीसद दर से दोगुनी थी. अलबत्ता ज्यादातर मामलों में बीमारी बेहद हल्की मालूम देती थी.

गुड़गांव के मेदांता—द मेडिसिटी की आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. सुशीला कटारिया कहती हैं, ''लोग अब टेलीमेडिसिन के जरिए घरों पर ही ठीक हो रहे हैं. लोग स्वभाववश भूल जाते हैं कि बुजुर्ग या कम रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग अब भी काफी जोखिम से घिरे हैं. अगर किसी को लक्षण हैं तो उसे जांच करवाना, अलग-थलग रहना और इलाज करना चाहिए.’’

चिकित्सा विशेषज्ञ एकमत से आगाह करते हैं कि हमें सामूहिक सतर्कता में महज इसलिए ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि सरकारी आंकड़े कम हैं या बीमारी हल्की मालूम देती है. बेंगलूरू स्थित टाटा इंस्टीट्यूट फॉर जेनेटिक्स ऐंड सोसाइटी के डायरेक्टर डॉ. राकेश मिश्र कहते हैं, ''हरेक जीव की तरह हर वायरस भी जिंदा रहना चाहता है.

ऐसा कोई संकेत नहीं है कि मौजूदा ढेर सारे उपरूप असामान्य हैं या उछाल पैदा करेंगे. मगर यह तो दिख ही रहा है कि कोविड जिंदा रहने की कोशिश कर रहा है. अब भी हो सकता है कि बिल्कुल नया रूप आ जाए और एक और लहर पैदा कर दे.’’

और ग्रीक अक्षर नहीं
जीआइएसएआइडी प्लेटफॉर्म पर जनवरी 2020 से रिकॉर्ड 1.1 करोड़ कोविड जीनोम अपलोड किए गए हैं. इसके मुकाबले इन्फ्लुएंजा के वायरस एपिफ्लू के मई 2008 से महज 16 लाख रूप अपलोड किए गए. यह कहना मुश्किल है कि कोविड दूसरे ज्यादातर वायरसों के मुकाबले ज्यादा तेजी से रूप बदल रहा है या शोधकर्ता इसका ज्यादा डेटा अपलोड कर रहे हैं.

कोविड के बहुतायत रूप मामूली हैं और उनकी जगह नए तथा चुस्त-दुरुस्त रूप लगातार उभर रहे हैं. फिर एक नया रूप उभरता है जो इनसान को संक्रमित करने में सक्षम है और इस कदर सक्षम कि दूसरे रूपों की जगह ले लेता है और उन लोगों को भी संक्रमित करता है जो पिछले रूपों से पीड़ित रहे हैं. ऐसे हरेक रूप को हालांकि ग्रीक अक्षर का अलग नाम नहीं दिया जाता.

ध्यान खींचने वाले किसी भी रूप को आम तौर पर एक बायोइन्फॉर्मेटिक्स प्रणाली में डाल दिया जाता है, जिसे पैंगो कहते हैं. यह फिर सैकड़ों दूसरे नमूनों से इस डेटा की तुलना करके पता लगाता है कि यह कोविड वंशावली का ही बिल्कुल नया रूप है या किसी पुराने रूप का उपरूप भर है. बीए.1, बीए.2, बीए.3, बीए.4 और बीए.5 अपने पूर्वज ओमिक्रॉन की पांच पहली शाखाएं हैं.

बीए.2.12.1 उपरूप बीए.2 वंश से निकली 12वीं संतति है और 12वीं प्रजाति की पहली शाखा है जिसे नाम दिया गया है. दरअसल, ये रूप नए अवतार तो हैं लेकिन उनके रूपांतरण इतने ज्यादा भिन्न नहीं हैं कि उन्हें नया प्रकार माना जाए और ग्रीक अक्षर का नाम दिया जाए.

जब एक रूप रोग प्रतिरोधक प्रणाली से दूसरों के मुकाबले ज्यादा असरदार ढंग से बच निकलता है या ज्यादा गंभीर बीमारी पैदा करता है या ज्यादा संक्रामक होता है, केवल तभी डब्ल्यूएचओ उसे 'वैरिएंट ऑफ कंसर्न’ या चिंताजनक रूप करार देकर ग्रीक अक्षर का नाम देता है. अभी तक कोविड के केवल पांच रूप इस कसौटी पर खरे उतरे हैं—अल्फा, बीटा, गामा, डेल्टा और अब ओमिक्रॉन.

उन्हें ग्रीक अक्षर का नाम मिला हो या नहीं, ओमिक्रॉन परिवार लहरें पैदा करता रहा है. संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. कीर्ति सबनीस कहती हैं, ''इसके उपरूप दूसरे देशों में लहरें पैदा कर रहे हैं इसलिए उनके बारे में ज्यादा सुनाई देता है.’’

कुछ लोगों का कहना है कि ओमिक्रॉन के उपरूप अलग ग्रीक अक्षरों के हकदार हैं. बीए.4 और बीए.2.12.1 सरीखे उपरूप ओमिक्रॉन के दूसरे उपरूपों से हासिल रोग प्रतिरोधक क्षमता को धराशायी कर सकते हैं. इससे आम जनता को महामारी पर नियंत्रण के उपायों को समझने और मानने में मदद मिलेगी.

मगर डब्ल्यूएचओ ने कहा कि ये उपरूप अपने रूपांतरणों में इतने अलग नहीं हैं कि उन्हें पूरी तरह नया रूप कहा जा सके. डेल्टा के भी अपने उपरूप हैं. इनमें सबसे ज्यादा जिक्र एवाइ.4.2 का हुआ, जिसे डेल्टा प्लस कहा गया. मगर डेल्टा परिवार के महज एक रूप ने दुनिया भर में एक ही लहर पैदा की, वहीं ओमिक्रॉन के अलग-अलग रूप देशों में अलग-अलग लहरें पैदा कर रहे हैं.

बदलते रूपों का खतरा
ऐसा ही मुकाबला तब भी हुआ था जब कोविड पहली बार आया था और कई सारे रूपों ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लहरें पैदा की थीं. वुहान से आए मूल रूप ने भारत को खूब परेशान किया था. उधर, दक्षिण अफ्रीका में पहली लहर बीटा से और ब्राजील में गामा से आई थी. ओमिक्रॉन की उपशाखाएं अब यही करती मालूम देती हैं. अभी तक 100 से ज्यादा उपरूप मिले हैं, जिनमें से हरेक रूप बदलकर और अपनी नकल पैदा करने में कामयाब होकर दूसरे को दबाने की भरपूर कोशिश कर रहा है.

बीए.2 ओमिक्रॉन का सबसे ताकतवर रूप बनकर उभरा है और अपने 21 उपरूपों के साथ दुनिया भर में दबदबा कायम कर रहा है. इसने अपने भीतर और अपने कांटेदार प्रोटीन उभार में बदलावों की बहुलता के दम पर यह हैसियत हासिल की है. बीए.2 जीनोम में एमिनो एसिड के 53 बदले हुए रूप हैं, जिनमें से 29 कांटेदार उभार में हैं, जो पिछले रूपों के बदलावों से बहुत ज्यादा हैं. इन्हीं बदलावों के कारण यह ज्यादा संक्रामक है और इनसानों में पिछले संक्रमणों और/या टीकों से बने ऐंटीबॉडी से बच निकलता है.

हालांकि बीए.2 को अब नई चुनौती मिलती मालूम दे रही है. अमेरिका में बीए.2.12.1 लगता है कि बीए.2 से कमान अपने हाथ में ले रहा है, उसी तरह जैसे बीए.2 ने बीए.1 से ली थी. अमेरिका के सेंटर्स ऑफ डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन के एक हालिया विश्लेषण से संकेत मिलता है कि बीए.2.12.1 कम से कम 19 फीसद नए मामलों के लिए जिम्मेदार है जबकि बीए.2 वंश की संततियां कुल मिलाकर 90 फीसद मामलों के लिए जिम्मेदार हैं. यह देश पहले बीए.1 से पैदा लहर भी झेल चुका है.

ओमिक्रॉन का पहला रूप प्रजनन में अगर डेल्टा के मुकाबले तीन गुना ज्यादा मजबूत था, तो बीए.2 ओमिक्रॉन के पहले रूप से अपनी नकल पैदा करने में 30 फीसद ज्यादा समर्थ है और बीए.2.12.1 ऐसा करने में 25 फीसद ज्यादा समर्थ है. ये उपरूप नासिका ऊतकों से आगे की कोशिकाओं को संक्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं.

बीए.2.12.1, बीए.4 और बीए.5 में एक म्यूटेशन या बदलाव एल452 है, जिसे लेकर विशेषज्ञ खास तौर पर चिंतित हैं, क्योंकि यह वायरस को नासिका और फेफड़ों दोनों के ऊतकों को संक्रमित करने देता है, जबकि मूल ओमिक्रॉन केवल नासिका ऊतकों पर असर डालता था.

दिलचस्प यह है कि ओमिक्रॉन ने कई सारे मिश्रित या पुनर्संयोजक रूपों की चिंगारी भड़का दी है, जो दो उपरूपों का मिश्रण हैं. बीए.1 और बीए.2 के बीच संसर्ग से एक्सई, एक्सजी, एक्सएच, एक्सजे, एक्सके, एक्सएल, एक्सएन, एक्सपी, एक्सक्यू और एक्सआर का जन्म हुआ. ओमिक्रॉन और डेल्टा ने एक्सडी और एक्सएफ पुनर्संयोजक रूपों का निर्माण किया. ये दुनिया भर में देखे गए हैं, पर ओमिक्रॉन के पुनर्संयोजक रूप मातृ-पितृ रूप से बहुत ज्यादा अलग नहीं हैं.

मगर डेल्टा-ओमिक्रॉन के मिश्रित रूप में डेल्टा के संरचनागत प्रोटीन मौजूद हैं और जिन दो देशों फ्रांस और ब्रिटेन में ये पाए गए हैं, वहां के विशेषज्ञ नजदीक से इनकी निगरानी कर रहे हैं. वाशी, नवी मुंबई के फोर्टिस अस्पताल की आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. फरह इंगले कहती हैं, ''हमें नहीं पता कि किस रूप में इतने पर्याप्त नए बदलाव होंगे कि वह पूरी तरह नया रूप बन जाएगा. ओमिक्रॉन के उपरूपों में भी अत्यधिक जोखिम वाले समूहों—बुजुर्ग, दूसरी बीमारियों से ग्रस्त लोग और जिन्हें टीके नहीं लगे हैं—को नुक्सान पहुंचाने की क्षमता है.’’

भारत को चिंतित होना चाहिए?
फिलहाल प्राकृतिक रूप से और वैक्सीन से हासिल रोग प्रतिरोधक क्षमता गंभीर बीमारी और मौत से कुछ हद तक बचाव देती है, यह बात भारत में ओमिक्रॉन के हल्का होने की धारणा को खुराक दे रही है. हालांकि हांगकांग का अनुभव अलग रहा. बीए.2.2 के आगमन के साथ वहां 11 लाख संक्रमण और 8,000 से ज्यादा मौतें दर्ज की गईं, जबकि महामारी के पहले दो सालों में 12,613 प्रमाणित मामले और 213 मौतें बताई गई थीं.

मार्च 2022 में मेडआर्काइव पर प्रकाशित समीक्षा-पूर्व शोधपत्र से पता चला कि जिन्हें टीके नहीं लगे हैं और जो पहले कोविड के संपर्क में आ चुके हैं, उन्हें भी इस रूप से मौत खतरा पहले के रूपों जितना ही था. इसका मतलब फिर शायद वायरस हल्का नहीं है बल्कि मानव रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत हो रही है.

हालांकि रोग प्रतिरोधक क्षमता शायद हमेशा काफी न हो. बीए.2.12.1, जो बीए.2 के मुकाबले रोग प्रतिरोधक क्षमता से बच निकलने वाले कहीं ज्यादा बदलावों के साथ आता है, अमेरिका में एक लहर पैदा कर चुका है, जहां दैनिक मामले फिर 1,00,000 से ऊपर हैं. विशेषज्ञों ने भविष्यवाणी की थी कि बीए.2 से बने ऐंटीबॉडी नए उपरूपों को रोक सकते हैं, लेकिन फिलहाल ऐसा होता नहीं दिखता.

भारत में पिछला बड़ा प्रकोप बीए.2 की अगुआई में आया था. ताजातरीन डेटा के मुताबिक, बीए.2 उप-वंश प्रभावी बना हुआ है और मई 2022 के शुरुआती दिनों तक 63.5 फीसद जेनेटिक अनुक्रमों के लिए जिम्मेदार था, जिसके बाद बीए.2.10 (14 फीसद) और बीए.2.38 (8-9 फीसद) थे. उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, तेलंगाना, हरियाणा और राजस्थान में पाया गया अब तक का आखिरी रूप के417टी ऐसे बदलाव के साथ आया है जो वायरस के फैलने को आसान बनाने के लिए जाना जाता है.

जांच की परेशानियां
एक और दिक्कत यह है कि भारत में कोविड का वास्तविक फैलाव शायद हमें कभी पता न चले क्योंकि बहुत सारे लोग घर पर ही जांच का विकल्प चुन रहे हैं. आरटी-पीसीआर के विपरीत घर पर किए गए टेस्ट के नतीजे घोषित करना पूरी तरह उन लोगों पर निर्भर है. गलत ढंग से किए गए होम टेस्ट के नतीजतन फाल्स नेगेटिव आने की भी ज्यादा संभावना है. इसलिए यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इस महीने की शुरुआत में कुछ राज्यों में मामले महज कुछ हजार बढ़े थे या सैकड़ों हजार बढ़े थे.

जनवरी में 2,00,000 लोगों ने घर पर ऐंटीजन टेस्ट किया और आइसीएमआर (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) को इसकी सूचना दी, जबकि पूरे 2021 में महज 3,000 लोगों ने ऐसा किया था. आरटी-पीसीआर टेस्ट की संख्या घट रही है, जो 29 मई को केवल 2,78,267 लोगों ने करवाए, जबकि 23 जनवरी को 14 लाख लोगों ने करवाए थे.

दिल्ली के महाजन इमेजिंग के संस्थापक और चीफ रेडियोलॉजिस्ट डॉ. हर्ष महाजन कहते हैं, ''होम टेस्ट की वजह से आरटी-पीसीआर की मांग में कमी आई है. बात यह भी है कि कई देश नेगेटिव रिपोर्ट पर जोर नहीं देते बल्कि इसके बजाए वैक्सीन सर्टिफिकेट को देते हैं.’’

इसका मतलब है कि भारत को अपनी वास्तविक पॉजिटिव दर पता न चल रही हो. महाराष्ट्र में दवा दुकानदार होम टेस्ट किट खरीदने वालों का रिकॉर्ड रखते हैं, पर दूसरे राज्य इतने सक्रिय नहीं हैं. दिल्ली स्थित पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, ''टेस्ट में पॉजिटिव निकलने वाले लोगों की संख्या देश में फैलाव और नए रूपों का पक्का पता लगाने के लिए जरूरी डेटा है.’’

विशेषज्ञों को लगता है कि नए रूपों का असर कम करने में केवल वैक्सीन मदद करेगी. डॉ. रेड्डी कहते हैं, ''हमें ज्यादा लंबे समय की प्रतिरोधक क्षमता वाली वैक्सीन विकसित करने की जरूरत है.’’ ऐसा होने तक बूस्टर बेहद जरूरी हैं. आपको कतई नहीं पता कि नया रूप कब हमला करेगा. अगर उसने पहले ही कर न दिया हो. 

 

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