सेहतः दाने-दाने में है दम पर सेहतमंद न हो जाएं बेदम
सरकार की ओर से फोर्टिफाइड चावल को राष्ट्रीय मानक बनाना सुविचारित कदम है, लेकिन विशेषज्ञ पोषक तत्वों की अधिकता से होने वाले जोखिमों के प्रति कर रहे हैं आगाह.

भारत के 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि सरकार 2024 तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और महिलाओं और बच्चों को लक्षित खाद्य योजनाओं के माध्यम से ऊपर से मिलाए गए पोषक तत्वों से युक्त चावल (फोर्टिफाइड राइस) की आपूर्ति करेगी.
खून की कमी या एनीमिया और कुपोषण से निपटने की दिशा में बड़े प्रयास के रूप में, केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय 2021-22 से एकीकृत बाल विकास सेवा (आइसीडीएस) योजना और मध्याह्न भोजन योजना (एमडीएमएस) के माध्यम से फोर्टिफाइड चावल का वितरण शुरू करेगा.
इसमें 112 आकांक्षी जिलों (खराब सामाजिक-आर्थिक संकेतक वाले) पर विशेष जोर रहेगा. इस वर्ष के लिए, केंद्र ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत पीडीएस, एमडीएमएस और आइसीडीएस योजना के लिए 3.28 करोड़ टन चावल आवंटित किया है. लेकिन 2024 तक चावल की पूरी आपूर्ति को फोर्टिफाइड चावल के रूप में उपलब्ध कराना, कठिन लक्ष्य लगता है.
राइस फोर्टिफिकेशन की प्रक्रिया में अनाज में आयरन, विटामिन बी12 और फोलिक एसिड जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों से समृद्ध किया जाता है ताकि पूरे देश में बड़े पैमाने पर कुपोषित और इसके जोखिम वाली बड़ी आबादी को पोषण उपलब्ध कराया जा सके. भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्रधिकरण (एफएसएसएआइ) के मानदंडों के अनुसार, एक किलो फोर्टीफाइ चावल में आयरन (28 एमजी से 42.5 एमजी), फोलिक एसिड (75-125 एमसीजी) और विटामिन बी 12 0.75-1.25 एमजी) होना चाहिए.
आयरन की कमी और एनीमिया से पीड़ित लोगों की दुनिया में सबसे ज्यादा संख्या भारत में है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-4) के अनुसार, 59 प्रतिशत बच्चों और 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में खून की कमी है. बाल और मातृ कुपोषण की देश में बीमारियों के बोझ में 15 प्रतिशत की हिस्सेदारी है. साल 2015-16 में हुए एनएफएचएस-4 में पाया गया कि पांच साल तक के बच्चों में कम वजन, बौनापन और दुर्बलता का औसत क्रमश: 35.7, 38.4 और 21 प्रतिशत है.
केंद्र सरकार का मानना है कि अतिरिक्त पोषक तत्वों से युक्त फोर्टिफाइड चावल, कुपोषण से लड़ने में रामबाण साबित होगा. सरकार नीति आयोग और एफएसएसएआइ के अलावा टाटा ट्रस्ट, विश्व खाद्य कार्यक्रम, पाथ और न्यूट्रिशन इंटरनेशनल जैसे गैर-सरकारी हितधारकों के साथ परामर्श से आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने और आपूर्ति संबंधी अन्य परेशानियों को दूर करने पर काम कर रही है. दुनिया में उत्पन्न कुल चावल का पांचवां हिस्सा भारत में पैदा होता है. प्रति व्यक्ति 6.8 किलो प्रति माह खपत के साथ, यह चावल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है.
आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ में 2019-20 से फोर्टिफाइड चावल आपूर्ति की एक पायलट योजना (हर राज्य के एक जिले में) चल रही है और इसे विस्तार देते हुए मध्य प्रदेश, तेलंगाना, उत्तराखंड, केरल और झारखंड में भी शुरू करने की योजना है. परियोजना के प्रारंभिक आंकड़े बताते हैं कि लाभार्थी फोर्टिफाइड चावल पसंद कर रहे हैं.
किसी भी खाद्य पदार्थ को फोर्टिफाइ करने के पीछे उद्देश्य भोजन की पोषण गुणवत्ता में सुधार करना है ताकि जो लोग अल्प जोखिम में हैं उन्हें स्वास्थ्यकर आहार देकर स्वास्थ्य लाभ प्रदान किया जा सके. इसके लिए तय मात्रा में खाद्य योजकों या फूड एडिटिव का उपयोग करना होता है.
क्या फोर्टिफाइड चावल से लाभ होगा?
जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों में सूक्ष्म पोषक तत्वों या माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी दूर करने के लिए आहार को अतिरिक्त पोषणयुक्त बनाना सबसे स्थायी उपायों में से एक है. यह न केवल कम खर्चीला, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित और विश्वस्तर पर मान्यता प्राप्त है, बल्कि पहले से चल रही खाद्य वितरण योजनाओं के माध्यम से लक्षित आबादी को इसकी आपूर्ति भी आसानी से सुनिश्चित की जा सकती है.
पीडीएस, आइसीडीएस योजना और एमडीएमएस जैसे सरकारी खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों में चावल की खपत सबसे अधिक है. यही वजह फोर्टिफाइ करने के लिए चावल को ही एक आदर्श विकल्प बनाती है. यह माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी (छिपी भूख) से निपटने में मदद कर सकता है. जिनकी कमी से आबादी के एक बड़े वर्ग का स्वास्थ्य जोखिम में बना रहता है.
प्रजनन आयु वाली महिलाएं, बच्चे और किशोर सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं. पायलट प्रोजेक्ट में सरकार की साझीदार संस्था न्यूट्रिशन इंटरनेशनल की भारत में निदेशक, मिनी वर्गीज कहती हैं, ''भारत में चावल की औसत खपत के आधार पर कहा जा सकता है कि फोर्टिफाइड चावल से आयरन के अनुशंसित आहार अंश (आरडीए) के 30-50 प्रतिशत तक की पूर्ति की जा सकती है जिसकी वयस्कों को रोज जरूरत होती है.
सुव्यवस्थित निगरानी में किए गए ट्रायल, जिनमें गोलियों के माध्यम से आयरन का 100 प्रतिशत आरडीए सुनिश्चित किया गया था, का परिणाम 10 महीने के भीतर नजर आने लगा. लेकिन फोर्टिफाइड चावल के साथ किया गया ट्रायल असर दिखाने में कम से कम 24 महीने का समय लेता है.’’
न्यूट्रिशन इंटरनेशनल ने सरकार के फूड फोर्टिफिकेशन रिसोर्स सेंटर (एफएफआरसी) के सहयोग से इस साल फरवरी में मध्य प्रदेश के तीन जिलों में फोर्टिफाइड चावल के लिए स्वीकार्यता का अध्ययन किया. आइसीडीएस योजना और एमडीएमएस के 400 से अधिक लाभार्थियों को फोर्टिफाइड चावल से तैयार खिचड़ी और खीर परोसी गई.
उनमें से 80 प्रतिशत से अधिक ने इसे पसंद किया और 60 प्रतिशत से अधिक ने कहा कि अगर पीडीएस, एमडीएमएस और आइसीडीएस योजना के माध्यम से फोर्टिफाइड चावल उपलब्ध कराया जाए तो वे इसे खाना पसंद करेंगे. तीन जिलों में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि फोर्टिफाइड चावल और सामान्य पीडीएस चावल में देखने में कोई अंतर नहीं नजर आता और न ही धोते और पकाते समय इसमें कोई फर्क दिखा था.
वर्गीज कहती हैं, ''कई अध्ययनों ने फोर्टिफाइड चावल की प्रभावकारिता को दर्शाया है. भारत सहित 25 से अधिक देशों में 17 से अधिक वैज्ञानिक अध्ययनों ने प्रदर्शित किया है कि बाहर से अतिरिक्त पोषण मिलाए गए फोर्टिफाइड चावल का सेवन, महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित और प्रभावी है. यह शरीर में आयरन की कमी को काफी हद तक दूर कर सकता है.’’
हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पोषण संस्थान की ओर से पड़ोसी रंगा रेड्डी जिले में सितंबर 2011 में की गई डबल-ब्लाइंड प्लेसीबो-कंट्रोल्ड स्टडी से पता चला है कि फोर्टिफाइड चावल के माध्यम से स्कूली बच्चों को प्रदान किए गए माइक्रोनाइज्ड फेरिक पायरोफॉस्फेट के नियमित सेवन से उनमें आयरन की कमी दूर हुई थी. डबल-ब्लाइंड स्टडी एक ऐसा परीक्षण है जिसमें न तो प्रतिभागी और न ही प्रयोगकर्ता को यह जानकारी होती है कि वे किसी अध्ययन का हिस्सा हैं.
मार्च 2012 में सेंट जॉन्स नेशनल एकेडमी ऑफ हेल्थ साइंसेज, बेंगलूरू और द माइक्रोन्यूट्रिएंट इनिशिएटिव (न्यूट्रिशन इंटरनेशनल का पूर्व नाम) ने बेंगलूरू में इसी तरह का एक अध्ययन किया था. एक स्कूल में मध्याह्न भोजन कार्यक्रम के माध्यम से सात महीने तक फोर्टिफाइड चावल दिया गया.
इसका सेवन करने वाले बच्चों में भी आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया के मामले 30 प्रतिशत से घटकर 15 प्रतिशत हो जाने के संकेत मिले थे. अध्ययन से पता चला है कि फोर्टिफाइड चावल (प्रति 100 ग्राम पर 3-5 मिलीग्राम आयरन से युक्त) और प्राकृतिक चावल में, पके और बिना पके दोनों ही रूपों में कोई अंतर नहीं नजर आता था.
इंटरनेशनल यूनियन ऑफ फूड साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी के अध्यक्ष और सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट, मैसूरू के पूर्व निदेशक डॉ. वी. प्रकाश जोर देकर कहते हैं, ''फूड फोर्टिफिकेशन एक अच्छा कदम है, लेकिन इसका वास्तविक असर दिखने में वक्त लगता है. चावल भारत के कई हिस्सों में मुख्य भोजन है और इसके साथ खाए जाने वाले अन्य खाद्य पदार्थों के माध्यम से दैनिक आधार पर आवश्यक माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की आपूर्ति की जा सकती है. उम्मीद है कि इसके साथ पर्याप्त प्रोटीन और अन्य माइक्रो और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स भी प्रदान किए जाएंगे.’’
छुपे हुए स्वास्थ्य जोखिम
अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि चावल को एक या दो पोषक तत्वों के साथ लैस कर देना पोषण संबंधी कमियों का समाधान नहीं है क्योंकि बच्चों के आहार में जब तक पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तायुक्त प्रोटीन सुनिश्चित नहीं किया जाता, उनके स्वास्थ्य की समस्या बनी रहेगी. विशेषज्ञ आहार में ऊपर से अतिरिक्त पोषक तत्वों को मिलाने के कारण माइक्रोन्यूट्रिएंट्स के अधिक सेवन के प्रतिकूल प्रभावों को लेकर भी आगाह करते हैं.
जुलाई 2021 में द अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रिशन में प्रकाशित एक पेपर में इसके बजाए आहार विविधता में सुधार को अधिक कारगर बताया गया है. बेंगलूरू स्थित सेंट जॉन्स नेशनल एकेडमी ऑफ हेल्थ साइंसेज के फिजियोलॉजी विभाग के डॉ. अनुरा वी. कुरपद के नेतृत्व में हुए अध्ययन में अत्यधिक सावधानी बरतने पर बल दिया गया है क्योंकि पोषक तत्व भी दवाओं की तरह तभी फायदेमंद होते हैं, अगर उनकी सही खुराक ली जाए. लेकिन बहुत अधिक मात्रा में सेवन करने पर उनके फायदेमंद होने के बजाए नुक्सानदेह होने की अधिक संभावना रहती है.
पेपर में तर्क दिया गया है कि देश में एनीमिया को लेकर जो अनुमान हैं वे वास्तविकता से कहीं अधिक हैं. इसके लिए मुख्य रूप से तीन कारक जिम्मेदार हैं—बच्चों या गर्भवती महिलाओं में एनीमिया के लिए जो हीमोग्लोबिन का स्तर तय किया गया है वह अनुचित है; जांच के लिए आवश्यक खून का नमूना नसों से निकालने के बजाए कैपिलरी ब्लड सैंपल (उंगली में चुभाकर निकाले गए खून से नमूना लेना) को अपनाने की प्रथा; और आयरन की दैनिक आवश्यकता का बेंचमार्क अधिक होना, जिसे हाल ही में संशोधित करके घटा दिया गया है.
कुरपद कहते हैं, ‘‘आपको भारतीय आहार में 15-18 मिलीग्राम की दैनिक जरूरत की पूर्ति के लिए अनाज को फोर्टिफाइ करने की जरूरत नहीं है. हमें यह विचार करने की आवश्यकता है कि क्या आयरन की कमी इसलिए तो नहीं है क्योंकि हम आयरन को अवशोषित नहीं कर पा रहे हैं और कहीं एनीमिया की कुछ अन्य वजहें तो नहीं हैं. आहार में अधिक से अधिक आयरन को शामिल करने से आबादी के एक हिस्से के लिए आयरन की सहनीय ऊपरी सीमा से अधिक सेवन का खतरा पैदा हो सकता है.’’
कुरपद चावल के अनिवार्य फोर्टिफिकेशन को घबराहट में ''बिना ठीक से विचार लिया गया फैसला’’ बताते हैं. वे कहते हैं, ''पिछले 20 वर्षों से यह सर्वविदित है कि आयरन के अधिक सेवन से मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है. भारत पहले ही दुनिया की मधुमेह राजधानी बन चुका है. आरडीए इसका गलत माप है. हमें एनआइएन (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन) की 2020 की संशोधित आहार संबंधी सिफारिशों का पालन करना चाहिए, जो कि आरडीए का आधा है. जब हम इन्हें लेते हैं तो कई आहार खुद ही पर्याप्त हो जाते हैं.’’
सबको इसकी जरूरत नहीं
सरकार की योजना चावल और यहां तक कि खाद्य तेलों को अनिवार्य रूप से फोर्टिफाइ करने की है. देश की अनुमानित 28,000 राइस मिलों में तैयार होने वाले सारे चावल को फोर्टिफाइ करना भारी-भरकम काम होगा. वर्तमान में भारत के पास सालाना 15,000 टन अनाज फोर्टिफाइ करने की क्षमता है.
यह 2024 तक महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है. जिन 112 जिलों को चिह्नित किया गया है, केवल उनके ही पीडीएस, आंगनवाड़ी और एमडीएमएस आपूर्ति को कवर करने के लिए हमारी वार्षिक क्षमता 1,30,000 टन होनी चाहिए. 2024 में पूरे देश में पीडीएस को कवर करने के लिए कम से कम 3,50,000 टन फोर्टिफाइड अनाज की जरूरत होगी.
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) को कहा गया है कि वह चावल मिलों को नियमित चावल में पोषण के दाने मिलाने के लिए आवश्यक सम्मिश्रण मशीनों से लैस कराए. राइस मिल संचालकों को इसके लिए तत्काल निवेश की जरूरत होगी और सरकार इसके लिए उन्हें ऋण और अन्य प्रोत्साहन देने पर विचार कर सकती है. चूंकि फोर्टिफाइड दाने, सामान्य चावल के दानों जैसे ही दिखते हैं और उनके स्वाद में भी कोई फर्क नहीं होता, इसलिए गुणवत्ता जांच और निगरानी की भी आवश्यकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि चावल को अनिवार्य रूप से अतिरिक्त पोषक तत्वों से युक्त करने से आबादी का वह समूह भी इसके सेवन को मजबूर होगा, जिन्हें खाद्य योजक लेने की जरूरत नहीं है. ऐसे लोगों को फोर्टिफाइड चावल खाने से फायदे की जगह नुक्सान भी हो सकता है.
अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ. रमेश वी. भट कहते हैं, ''खाद्य कानूनों के सुरक्षा उपायों के बावजूद चावल को अनिवार्य रूप से फोर्टिफाइ किए जाने का फैसला खाद्य सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा करता है. खाद्य सुरक्षा कानूनों का कार्यान्वयन मुख्य रूप से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर छोड़ दिया गया है; और कई राज्यों में इसका पालन उचित तरीके से नहीं किया जाता.’’
फोर्टिफाइ करना या अनाज में ऊपर से कुछ पोषक तत्व मिला देना, निवारक हस्तक्षेप है न कि उपचारात्मक हस्तक्षेप. यह मध्यम अवधि में हल्के एनीमिया और लंबे समय में गंभीर एनीमिया को रोकने में मददगार हो सकता है. इसके लिए केवल फोर्टिफाइ किया गया अनाज पर्याप्त नहीं होगा, उसे आहार में विविधता के साथ पूरक समर्थन की जरूरत होगी.
वर्गीज कहती हैं, ''लोग बदलावों को स्वीकार करने में समय लेते हैं. अनाज को फोर्टिफाइ करने से प्राप्त होने वाले स्वास्थ्य लाभों के प्रति जागरूकता पैदा करने और इससे जुड़े मिथकों को दूर करने के लिए मजबूत जागरूकता रणनीति की जरूरत है.’’ लेकिन डॉ. कुरपद इस उपाय के साथ चेतावनी जोड़ देते हैं, ''इलाज, रोग बन सकता है.’’ ठ्ठ
‘‘आयरन के अधिक सेवन का संबंध मधुमेह का खतरा बढ़ने से है. हम पहले ही विश्व की मधुमेह राजधानी बन चुके हैं’’
डॉ. अनुरा वी. कुरपद सेंट जॉन्स नेशनल एकेडमी ऑफ हेल्थ साइंसेज, बेंगलूरू