शख्सियतः हर हाल में जीने का फन
1962 के भारत-चीन युद्ध पर बनी नई सीरीज के अपने किरदार की तरह बेबाक बोलने वाले अभय देओल ने अपना करियर धारा के खिलाफ खड़े रहकर बनाया है.

युद्ध की कथाभूमि पर तो बहुत-सी फिल्में/सीरीज बनीं लेकिन 1962 का भारत-चीन युद्ध इस लिहाज से लगभग अछूता ही रहा है...
चीन के साथ हुए युद्ध में हम इसलिए नहीं झांकना चाहते क्योंकि उसमें हार गए थे. हम जीते युद्धों का ही महिमागान करते हैं. देखिए, जमीन की जीत-हार भले होती हो पर मुझे नहीं लगता कि युद्ध में कोई जीतता-हारता है. 1962: द वार इन द हिल्स में उस एक लड़ाई पर है जिसे हम जीते और जिसका जश्न मनाया.
युद्ध पर बनी प्रस्तुतियों का कथानक अमूमन अतिराष्ट्रवाद की चाशनी में डूबा होता है. डिज्नी+हॉटस्टार की यह सीरीज उस पर क्या रुख अख्तियार करती है?
महेश (मांजरेकर, निर्देशक) उस मामले में खासे संवेदनशील हैं. मैं युद्ध-विरोधी हूं. उसके पक्ष में जाने वाला कोई भी काम मैं नहीं कर सकता. यह सीरीज सैनिकों के परिजनों और सामाजिक ताने-बाने पर पडऩे वाले युद्ध के असर पर केंद्रित है. इसी मामले में यह बाकियों से अलग है. यह नायकों ही नहीं, दुश्मनों के प्रति भी समानुभूति रखती है.
आपकी फिल्मों ने आपकी स्वतंत्र सोच वाली संवेदनाओं का इजहार किया है. ओटीटी पर उनका प्रसारण क्या आपके लिए कोई कारगर विकल्प है?
शुरू-शुरू में मैंने डेब्यू डायरेक्टर्स और नए लेखकों के साथ जोखिम लिया लेकिन सिमटते सिनेमाघरों के साथ वह संभावना भी सिमटती गई. मुख्य धारा में न गिनी जाने वाली प्रस्तुतियों के लिए स्वस्थ स्पर्धा की जगह है ओटीटी. उसका कंटेंट बॉलीवुड से कहीं बेहतर और व्यवस्थित है.
समाज-राजनीति पर अपने विचार आप खुलकर साझा करते हैं. उसके नतीजों की आपको परवाह नहीं होती?
आज हर बात पर किसी न किसी की भावनाएं आहत हो जा रही हैं. अपने बयानों का नतीजा मैं भुगतता रहा हूं लेकिन मैं सच साफ-साफ बोलता आया हूं. पर यह भी सच है कि मैं अपेक्षाकृत सुरक्षित हूं और पुरुष हूं. मैं सबको ऐसा करने की सलाह नहीं दूंगा. जान बचाए रखना भी अहम है.