शख्सियतः जिंदगी इम्तिहान लेती है

लीक से हटकर चलते हुए आईं अनगढ़ अभिनेत्री तिल्लोतमा शोम के लिए मेनस्ट्रीम में स्वीकार्यता से ज्यादा जरूरी मासूमियत को बचाए रखना.

तिल्लोतमा शोम
तिल्लोतमा शोम

लीक से हटकर चलते हुए आईं अनगढ़ अभिनेत्री तिल्लोतमा शोम के लिए मेनस्ट्रीम में स्वीकार्यता से ज्यादा जरूरी मासूमियत को बचाए रखना.

• थिएटर से आपकी गहरी वाबस्तगी रही है. मसरूफ होने के बाद उस बारे में क्या सोचती हैं?
थिएटर ने मेरे भीतर के ऐक्टर को हवा दी, उसका मुझ पर बहुत एहसान है. पर पहली ही फिल्म करने के बाद मुझे लग गया कि मैं कैमरे के सामने ज्यादा सहज हूं. कैमरे की इंटीमेसी मेरी पर्सनालिटी के माकूल बैठती है. थिएटर में सीधी प्रतिक्रिया मुझ पर थोड़ा भारी पड़ती थी.

बल्कि यूं कहें कि दर्शकों की तुरंत प्रतिक्रिया मुझे बहुत रास नहीं आती थी. कैमरा एक दोस्त की तरह चुपचाप आपके पास मौजूद है और आपके बिना कुछ दिखाए, जाहिर किए, वह सब देख पा रहा है.

• मॉनसून वेडिंग (2001) के जरिए सिनेमा में उतरने से लेकर सर में पूरी फिल्म अपने कंधे पर लेकर चलने के सफर को आप किस तरह से देखती हैं?
इसे आप काव्यात्मक, अजीबोगरीब और बेतुका-बेढंगा भी कह सकते हैं. यह उन कलाकारों को हौसला देने वाला है जो कितनी भी कोशिश करें पर फिट नहीं बैठ पाते. मैं खुद को बस अब तक के सफर की याद दिलाते हुए गहरी सांस लेने को और चलते रहने को कहती हूं, उस सड़क पर चलते रहने को जो ठीक लगती है, भले ही वह 'स्मार्ट च्वाइस’ न हो.

• तनिष्ठा चटर्जी, रसिका दुग्गल, अमृता सुभाष आदि आपकी समकक्ष हैं जिन्होंने एफटीआइआइ या एनएसडी से ट्रेनिंग ली. आपको ऐसी ट्रेनिंग की कमी खली कभी?
ट्रेनिंग बेशक बहुत जरूरी होती है. अभिनय से ज्यादा यह आपको खुद को पढऩा सिखाती है. मुझे तो जिंदगी ने, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी ने और सबसे ज्यादा न्यूयॉर्क की राइकर्स आइलैंड जेल ने सिखाया, जहां मैं काम करती थी. किसी भारतीय संस्था/समुदाय की छात्रा/सदस्य न बन पाने की कमी तो खलती है पर मैं अपने उन गुरुओं की शुक्रगुजार हूं जिन्होंने ढर्रे से हटकर मुझे सिखाया-पढ़ाया.

• आप उन अभिनेत्रियों में से हैं जो बॉलीवुड, हॉलीवुड और विश्व सिनेमा में एक साथ सक्रिय रही हैं. दुनिया भर की पटकथाओं के लिए अपने को तैयार किए रखना कितना चैलेंजिंग होता है?
हर सुबह इस चाहत के साथ उठना कि आज कुछ नया सीखना है, यही एक बेहतर तरीका है खुद को जीवंत रखने और उन चुनौतियों के लिए तैयार रहने का जो बिना दरवाजा खटखटाए सीधे आ पहुंचती हैं.

• इरफान के साथ आपने किस्सा, हिंदी मीडियम और अंग्रेजी मीडियम की. एक को-ऐक्टर के तौर पर उनमें ऐसा क्या था जिसे आप मिस करती हैं?
वे एक ऐसे पेशे में आध्यात्मिक और दूसरी अनमोल किस्म की चीजों के लिए स्पेस बना देते थे जो कि तमाम तरह की सौदेबाजियों और आंकड़ों के खेल से बजबजाता है. मैं उसी मासूमियत को जिंदा रखना चाहती हूं, भले इसके चलते मुझे मेनस्ट्रीम में कम या बिल्कुल भी न स्वीकारा जाए.

जिंदगी तभी जीने लायक है जब उसका अपना कोई फलसफा हो और जब किसी देखे हुए की बजाए अनदेखी चीजों को ज्यादा करीने से सहेजकर रखा जाए.
—शिवकेश

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