पुस्तक समीक्षाः एक नेता की अज्ञात यात्रा
नेहरू के शव के पास खड़े इस व्यक्ति का चेहरा लोग अभी भूल भी नहीं पाए थे कि 'गुमनामी बाबा’ के नेता जी होने की चर्चा ने जोर पकड़ लिया.

संध्या द्विवेदी
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के पार्थिव शरीर के जनता दर्शन की तस्वीरें जब अखबारों में छपीं तो एक बार फिर सुभाष चंद्र बोस की मौत पर सवाल उठने लगे. दरअसल, 1964 में छपी नेहरू की शव यात्रा की एक तस्वीर जिसमें उनके पार्थिव शरीर के सिरहाने बोस से मिलती-जुलती शक्ल और कद-काठी वाले व्यक्ति को देखकर कयास लगाए गए कि नेता जी जिंदा हैं.
नेहरू के शव के पास खड़े इस व्यक्ति का चेहरा लोग अभी भूल भी नहीं पाए थे कि 'गुमनामी बाबा’ के नेता जी होने की चर्चा ने जोर पकड़ लिया. फैजाबाद के 'गुमनामी बाबा’ की मौत 16 सितंबर 1985 में हुई. स्थानीय प्रशासन ने तिरंगे में लपेटकर उनका दाह संस्कार गुफ्तार घाट में किया. गुमनामी बाबा के स्मारक पर जन्मतिथि की जगह वही तारीख लिखी गई जिस दिन सुभाष बोस पैदा हुए थे. मौत के दिन को लिखने की बजाए वहां तीन प्रश्नवाचक चिन्ह भारतीय जनमानस में रह-रहकर उठने वाले सवालों का ही प्रतीक हैं. सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा के लेखक ने किंवदंतियों से लेकर नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मौत पर शक पैदा करने वाले दस्तावेजों का सिलसिलेवार ढंग से जिक्र किया है.
'आजाद हिंद फौज’ के खिलाफ जाते हालात से लेकर अब तक की सरकारों के रवैए का जिक्र प्रमाणिकता के साथ किया गया है. बोस की मौत की जांच के लिए अब तक बने तीनों आयोगों (शहनवाज, खोसला और फिर मुखर्जी आयोग) में की गई पड़ताल को बिंदुवार ढंग से लिपिबद्ध करना, खुद लेखक के भीतर बोस की मौत के रहस्य की गुत्थी को समझने की जिज्ञासा को परिलक्षित करता है. भाजपा काल में बने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट साफ कह रही थी कि बोस की मौत हवाई हादसे में नहीं हुई थी. इस आयोग ने अस्पताल से लेकर शवदाह-गृह और एयरपोर्ट तक मौत के रिकॉर्ड की गैरमौजूदगी को बोस की मौत पर संशय करने के लिए सबसे मजबूत आधार माना.
यह किताब यह भी बताती है कि बोस की मौत के रहस्य को लेकर देश ही नहीं, उनका परिवार भी बंटा हुआ है. मिसाल के तौर पर उनके बड़े भाई शरत चंद्र को लगता था कि सुभाष बोस वापस लौटेंगे तो दूसरी तरफ उनकी बेटी अनीता ने उनकी मौत को करीब-करीब स्वीकार कर लिया था. बोस की मौत की रहस्यमयी गलियों में भटकते-भटकते लेखक ने जिस खूबी के साथ उनके व्यक्तित्व का चित्रांकन किया है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है.
किताब में जिस तरह से आधुनिक इतिहास के शायद सबसे रहस्यमयी दिन 18 अगस्त, 1945 के संशय भरे संसार को बताने के लिए जापान की मेडिकल रिपोर्ट, रूस के कुछ दस्तावेजों और आयोगों में दर्ज सुबूतों का हवाला दिया गया है वह लेखक की जिज्ञासा और खोजी प्रवृत्ति को उजागर करती है.
हालांकि जांच आयोगों की प्रतियां और बोस की कुछ और पुरानी तस्वीरें इस किताब को और रोचक बना सकती थीं. तकरीबन सात दशकों से बोस की मौत का मुद्दा रह-रहकर सुलगता रहता है. संशय और सनसनी इस मुद्दे के साथ चस्पां हो गए हैं. लेकिन सनसनी भरी भाषा के इतर सरल और तथ्यपरक ढंग से नेता जी सुभाष चंद्र बोस की जिंदगी के हर पहलू को जिस तरह से लेखक ने उठाया है वह सराहनीय है. ठ्ठ
किताबः सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा
लेखक: संजय श्रीवास्तव
प्रकाशक: संवाद प्रकाशन
मूल्य: 300 रु.