खनक-हनक वाली कंगना
सुहानी सिंह ‘न्याय’ के लिए कंगना रनौत की तीखी जंग का निशाना बॉलीवुड से आगे बढ़कर महाराष्ट्र सरकार की ओर मुड़ गया है. अब कई दुश्मनों के साथ, उन्हें केंद्र सरकार से वाइ-प्लस सुरक्षा मिलने के लिए भी शायद तर्क मिल गया है

जनवरी के 24 तारीख को कंगना रनौत की अदाकारी से सजी फिल्म पंगा रिलीज हुई थी. यह कब आई और कब चली गई, पता ही नहीं चला. अलबत्ता जो पंगा ज्यादा लोगों ने देखा, वह 16 जून को आया, जब उन्होंने एक वीडियो जारी किया और अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के लिए 'मूवी माफिया’ को जिम्मेदार ठहराया.
इस तरह 'सुशांत के लिए न्याय’ अभियान में एक धर्मयोद्धा की तरह रनौत का उत्थान शुरू हुआ और वे खबरों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर इस अफसाने को प्रभावित करने लगीं. शुरुआत में उनकी नाराजगी फिल्म जगत तक सीमित थी, जिसे वे मजाक उड़ाते हुए 'बुलीवुड’ कहती हैं. मगर जांच के आगे बढऩे के साथ उनके निशाने की फेहरिस्त भी बढ़ती गई.
इनमें महाराष्ट्र के दो ताकतवर समूह—मुंबई पुलिस और शिव सेना—भी शामिल थे. राम मंदिर से लेकर आरक्षण तक कई सारे मुद्दों पर सामाजिक-राजनैतिक टिप्पणीकार की अपनी नई भूमिका में रनौत हमेशा की तरह बेबाक और बेधड़क हैं. उत्पीडि़त होने की भावना यहां भी है, पर उसके साथ भड़कीला शेखीबाजी भी खूब दिखाई देता है.
प्रोड्यूसर अशोक पंडित कहते हैं, ''मैं उनकी हिम्मत की दाद देता हूं.’’ पंडित फिल्मी दुनिया के उन बहुत कम लोगों में से थे जो 9 सितंबर को उनके समर्थन में आगे आए, जब बीएमसी (बृहन्मुंबई नगर निगम) ने नक्शे में गैरकानूनी बदलावों का आरोप लगाकर मुंबई के बांद्रा में उनके दफ्तर का एक हिस्सा ढहा दिया.
रनौत के पास उन लोगों की फेहरिस्त है जिन्हें वे दुश्मन मानती हैं और यह फेहरिस्त दिन-ब-दिन लंबी होती जा रही है. बीते तीन महीनों में उन्हें फिल्म जगत की कई शख्सियतों को ललकारते हुए देखा गया है, चाहे वह सुशांत की मौत पर उनकी 'खामोशी’ को लेकर हो या कथित भाई-भतीजावाद को लेकर. उनकी सबसे चुनिंदा आलोचनाओं के निशाने पर करण जौहर रहे हैं.
अन्य चुनिंदा लोगों में महेश भट्ट, आदित्य चोपड़ा, दीपिका पादुकोण, आलिया भट्ट, तापसी पन्नू, आयुष्मान खुराना, रणवीर सिंह, रणबीर कपूर, अयान मुखर्जी और विकी कौशल शामिल हैं. इनमें से बहुत कम ने ही कोई पलटवार किया. पत्रकार से फिल्मकार बने विनोद कापड़ी कहते हैं, ''फिल्म उद्योग के साथ दिक्कत यह है कि हर किसी को लगता है कि उनके खिलाफ बोलना केंद्र सरकार के खिलाफ बोलना है.
यह रीढ़हीन उद्योग है. वे झमेले में पडऩा नहीं चाहते. सबको अपने हितों का ख्याल है. बस पैसा बना रहे और प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी खींचने का मौका मिलता रहे.’’ कुछेक ने जवाब भी दिया तो रनौत का नाम लिए बगैर दिया. कंगना के खिलाफ गिरोहबंदी का आरोप लगाए जाने के बाद पन्नू ने लिखा, ''ऐसा मत होने दो कि कड़वाहट से भरे, नाखुश लोग तुम्हें घसीटकर अपने स्तर पर ले आएं. उनके व्यवहार का उदाहरण की तरह इस्तेमाल करो कि कैसा व्यवहार न करें और आभारी रहें कि तुम उनके जैसे कतई नहीं हो.’’
कुछ लोगों के लिए रनौत के हालिया बयानों से राजनीति में भावी करियर की झलक मिलती है. हालांकि रनौत ने ऐसी किसी महत्वाकांक्षा से इनकार किया है. ट्विटर पर उन्होंने कहा कि वे दो बार भाजपा का टिकट ठुकरा चुकी हैं और उनकी लोकप्रियता के साथ-साथ ‘सालाना आमदनी कई कामयाब मंत्रियों और राजनीतिज्ञों से कहीं ज्यादा है.’ अलबत्ता राजनीति उनके परिवार के रग-रग में बसी है.
अभिनेत्री ने कहा कि उनके दादा लगातार तीन कार्यकाल कांग्रेस के विधायक रहे थे और उनका 'परिवार गृह राज्य की राजनीति में इतना लोकप्रिय है कि गैंगस्टर (उनकी पहले-पहल फिल्म) के बाद मुझे तकरीबन हर साल कांग्रेस की तरफ से प्रस्ताव मिले थे.’ वे यह भी कहती हैं कि महज इसलिए कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुखर समर्थक हैं, वे 'भाजपा की कठपुतली’ नहीं हो जातीं.
जिस एक मामले में सत्तारूढ़ पार्टी के साथ उनके विचार मिलते हैं, वह राष्ट्रवाद के मुद्दे की अगुआई करना है. पहले ट्विटर पर एक टीम उनकी तरफ से अकाउंट चलाती थी. जब वे खुद 21 अगस्त को आधिकारिक तौर पर ट्विटर से जुड़ीं, तो उन्होंने लिखा कि इस प्लेटफॉर्म से जुडऩे का उनका एकमात्र मकसद है 'राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद.’ यह वही प्लेटफॉर्म था जिसका उन्होंने पहले इसी साल अपनी बहन-मैनेजर रंगोली का अकाउंट ब्लॉक कर दिए जाने के बाद मखौल उड़ाया था.
रनौत की फिल्म योजना से भी इसी छवि की झलक मिलती है. अपनी आने वाली फिल्म तेजस में वे भारतीय वायु सेना की लड़ाकू पायलट की भूमिका अदा कर रही हैं. इसकी पहली झलकियां साझा करते हुए उन्होंने कहा, ''मैं उम्मीद करती हूं कि इस फिल्म से हम आज के नौजवानों के मन में देशभक्ति और गर्व की भावना भर सकेंगे.’’ निर्देशक के तौर पर उनकी दूसरी, और उनके बैनर मणिकर्णिका फिल्म्स के तहत पहली फिल्म, अयोध्या पर एक प्रोजेक्ट है.
बाहुबली के लिए मशहूर के.वी. विजयेंद्र प्रसाद ने यह फिल्म लिखी है. रनौत ने कहा कि इस फिल्म अपराजित अयोध्या में छह सदियों का कालखंड समाया है और इसमें राम मंदिर का शिलान्यास दिखाया जाएगा. उन्होंने पिंकविला से कहा, ''इसमें कई असली मुस्लिम किरदार हैं जो राम मंदिर के पक्ष में लड़े थे. यह आस्था, समर्पण और सबसे ज्यादा देश की एकता की कहानी है.’’
उनके अन्य प्रोजेक्ट में थलैवी है जो तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता पर बहुभाषीय बायोपिक है. बताया जाता है कि इसके लिए उन्हें 24 करोड़ रुपए जितनी भारी-भरकम धनराशि मिली है.
किसी को लग सकता है कि जिस उद्योग ने उन्हें स्टार बनाया, उसे ही बदनाम करके वे अपनी कामयाबी की सीढिय़ों को ही गिराने का जोखिम उठा रही हैं. लेकिन इससे उनके सेलेब्रिटी के दर्जे पर कोई आंच आती नहीं लगती है. सिनेमैटोग्राफर पी.सी. श्रीराम खुलेआम स्वीकार करते हैं कि उन्होंने एक फिल्म इसलिए ठुकरा दी थी कि उसमें रनौत काम कर रही थीं.
फिल्मी दुनिया की गप यह कहती है कि दूसरे बड़े पेशेवरों ने भी उनके साथ काम करने को लेकर एतराज जाहिर किए हैं. नसीरुद्दीन शाह भी खुलकर बोलने से हिचकिचाते नहीं और रनौत के विवादास्पद मुद्दे—मूवी माफिया के हाथों सुशांत की 'हत्या’—पर तंज कसते हैं. उन्होंने इंडिया टुडे टीवी से कहा, ''हर वह शख्स जिसके दिलो-दिमाग में व्यावसायिक उद्योग को लेकर जरा-सी भी कुंठा है, वह प्रेस के सामने उल्टियां करता रहा है. यह बेहद घिनौना है.
इस बात में किसी की दिलचस्पी नहीं कि सुशांत के लिए इंसाफ का बीड़ा अपने कंधों पर उठा लेने वाली किसी अर्द्ध-शिक्षित तारिका की क्या राय है.’’ मगर फिल्म उद्योग ने रनौत के हमलों को लेकर मोटे तौर पर अपने होंठ सिल रखे हैं.
बॉलीवुड अगर सॉफ्ट टारगेट है, तो महाराष्ट्र के सत्ताधारियों से पंगा लेना कहीं ज्यादा मुश्किल काम है. महाराष्ट्र सरकार के साथ रनौत का पंगा तब शुरू हुआ जब उन्होंने सुशांत के मामले को सीबीआइ को सौंपे जाने का स्वागत किया और घटिया जांच के लिए मुंबई पुलिस की आलोचना की.
जब उन्होंने स्वेच्छा से बॉलीवुड और ड्रग माफिया के बीच सांठ-गांठ की जानकारी देने की पेशकश की, इस शर्त पर कि उन्हें सुरक्षा दी जाए, तब उन्होंने यह जानकारी मुंबई पुलिस को देने से इनकार कर दिया. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ''असल में मूवी माफिया के गुंडों से ज्यादा अब मैं मुंबई पुलिस से ज्यादा भयभीत हूं...
मुझे या तो (हिमाचल प्रदेश) सरकार से या केंद्र से सुरक्षा की जरूरत होगी.’’ राज्यसभा सांसद और शिवसेना के नेता संजय राउत ने पलटवार करते हुए कहा कि अगर वे मुंबई में सुरक्षित महसूस नहीं करतीं तो वे हिमाचल में ही रह सकती हैं. रनौत ने जवाब में कहा, ''मुंबई पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की तरह क्यों महसूस हो रही है?’’
और फिर कंगना-शिव सेना के बीच जंग शुरू हो गई. रनौत ने और एक कदम आगे बढ़कर सेना की हुकूमत की तुलना तालिबान से कर दी. अगले दिन, उसे 'सोनिया सेना’ कह डाला. इस प्रक्रिया में उन्हें वह मिल गया जो वे चाहती थीं. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उनके लिए वाइ-प्लस सुरक्षा को मंजूरी दे दी.
रनौत का कारवां शान से बढ़ रहा है. बीएमसी ने जिस चुस्ती-फुर्ती से उनके जायदाद में तोड़-फोड़ की, उससे उनका खुद को पीडि़त के तौर पर पेश करना और समर्थन जुटाने की क्षमता भी बढ़ गई है. वे राजनैतिक महत्वाकांक्षा होने से भले इनकार करें, पर उनकी गतिविधियां बताती हैं कि वे इस खेल को खेलना बखूबी जानती हैं.
मुंबई लौटने पर रनौत ने अपने बंगले में आंशिक तोड़-फोड़ की तुलना राम मंदिर पर बाबर के हमले से की. अपने दफ्तर के बाहर खड़े शिवसेना की अगुआई वाले बीएमसी के अफसरों की तस्वीरें उन्होंने ‘बाबर और उसकी सेना’ कैप्शन के साथ ट्वीट कीं. दफ्तर के मलबे की तस्वीर 'पाकिस्तान’ शीर्षक से ट्वीट की तथा तंज को और नुकीला बनाने के लिए उसके साथ हैशटैग डेथऑफडेमोक्रेसी जोड़ दिया.
इस घटना से न केवल उनके हौसले और बुलंद हो गए—इतने कि उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को एक वीडियो में 'तुझे’ कहकर संबोधित कर दिया. रनौत ने कहा कि अब वे कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा पर भी एक फिल्म बनाएंगी, क्योंकि बीएमसी के साथ झगड़े के बाद उन्होंने वैसा ही महसूस किया जैसा कश्मीर पंडितों ने अपने घरों से बेदखल कर दिए जाने के बाद किया था.
जाहिर है, रनौत ने अपने मकसद को वाम और दक्षिण के बीच जंग में बदल दिया है. उनके पास मंच है, दर्शक हैं और ढेर सारे मुरीद हैं. उन्होंने कहा है कि फिल्मों को अलविदा कहने से पहले उन्हें एक लक्ष्य पूरा करना है और वह है 'एक ब्लॉकब्लस्टर जोड़ना’ जो उनकी अब तक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म को भी पीछे छोड़ दे.
तब तक वे उस किरदार को निभाने का मजा ले रही हैं जिसमें वे सहज ही रची-बसी हैं—मुखर होकर बोलने वाली रनौत. इसके लिए वे राष्ट्रीय पुरस्कार तो नहीं जीत पाएंगी, लेकिन उन्हें सबका ध्यान आकर्षित करने में कामयाब हो रही हैं, जो सितारों की असली पसंदीदा नशा है.