हिंदी-उर्दू की साझी विरासत

1936 में प्रेमचंद की अगुआई में प्रगतिशील लेखक संघ का सम्मेलन हुआ और 'हमारी ही हिंदी, हमारी ही उर्दू' की सांझी विरासत फिर से सरसब्ज होनी शुरू हुई. इस अभियान में रामनरेश त्रिपाठी, अयोध्या प्रसाद गोयलीय, रामनाथ सुमन, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, शमशेर, प्रकाश पंडित, सरस्वती सरन कैफ का महती योगदान है.

उर्दू अदब के सरोकार
उर्दू अदब के सरोकार

सुरेश सलिल

अट्ठारह सौ सत्तावन की लड़ाई में देशभक्त शक्तियों की पराजय के बाद बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार करके लाल किले में उन पर मुकदमा चलाया गया था. इक्कीस दिन तक चली अदालती कार्यवाही के दौरान ब्रिटिश सरकार के पैरवीकार डिप्टी जज एडवोकेट जनरल मेजर एफ. जे. हैरियट ने अपने बयान में कहा था कि सरकार के विरुद्ध ''देश के हिंदू और मुसलमानों का एक साथ मिलकर युद्ध करना बिल्कुल नया अवसर है.''

इस बयान में यह हिदायत साफ छिपी है कि आइंदा ऐसा नहीं होने देना है. उसके बाद क्या हुआ, यह आपसे और हमसे छिपा नहीं है. सर सैयद और दयानंद की मजहबी भेद-नीति और हंटर कमिशन के जरिए शुरू किए गए भाषाई वैमनस्य ने हमारी सदियों पुरानी साझी विरासत को तार-तार करने में कोई कसर उठा न रखी.

लेकिन यहां हमारा उद्देश्य सिर्फ भाषा और साहित्य के प्रश्न पर विचार करना है. हंटर कमिशन के बाद उर्दू और हिंदी को भाषाई दायरे से आगे ले जाकर सांप्रदायिक वैमनस्य का साधन बना दिया गया. यह सिलसिला 19वीं सदी को लांघकर बीसवीं सदी तक आया और आज भी पूरी तरह थमा नहीं है. लेकिन सच यह भी है कि बीसवीं सदी की शुरुआत के साथ प्रेमचंद, गणेश शंकर विद्यार्थी और महादेव सेठ (संचालक-संपादक मतवाला) जैसी कुछेक विभूतियां आगे आईं और उन्होंने भाषा-साहित्य के क्षेत्र में प्रभावी हस्तक्षेप किया.

1936 में प्रेमचंद की अगुआई में प्रगतिशील लेखक संघ का सम्मेलन हुआ और 'हमारी ही हिंदी, हमारी ही उर्दू' की सांझी विरासत फिर से सरसब्ज होनी शुरू हुई. इस अभियान में रामनरेश त्रिपाठी, अयोध्या प्रसाद गोयलीय, रामनाथ सुमन, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, शमशेर, प्रकाश पंडित, सरस्वती सरन कैफ का महती योगदान है. हमारे अपने समय में इस सिलसिले को जारी रखने और लगभग समर्पित भावना से आगे ले जाने वालों में डॉ. जानकी प्रसाद शर्मा की शख्सियत को अलग से पहचाना जाता है.

शर्मा हिंदी लेखक हैं. उन्होंने उर्दू साहित्य की दर्जनों महत्वपूर्ण पुस्तकों का लिप्यंतरण-अनुवाद करने के साथ-साथ प्रचुर आलोचनात्मक लेखन किया है, अब भी कर रहे हैं. उर्दू साहित्य की परंपरा तथा राम विलास शर्मा और उर्दू के बाद उनकी तीसरी आलोचना-पुस्तक उर्दू अदब के सरोकार हाल में ही आई है. इस पुस्तक की बुनावट में व्यक्तिकेंद्रित निबंध और विषयकेंद्रित विमर्श साथ-साथ गुंथे हुए हैं. एक ओर अगर कबीर, कुली कुतुबशाह, वली आदि पूर्वजों की उपस्थिति गौर की जाएगी; फैज, शमशेर, अली सरदार जाफरी, कैफी आजमी, मजरूह, निदा फाजली, जुबैर रिजवी आदि आधुनिक शायरों के साथ मंटो, कृश्नचंदर, इस्मत चुगताई जैसे पायेदार अफसानानिगार नजर आएंगे, तो दूसरी तरफ उर्दू है जिसका नाम, धर्मनिरपेक्षता और उर्दू शायरी, समकालीन उर्दू शायरी: नए सवालों का संदर्भ, उर्दू के अपने कौन हैं, उर्दू शायरी में व्यंग्य-विनोद, दक्खिनी हिंदी काव्य जैसे कई, भाषा और साहित्य के विविध पक्षों पर विचार करते विमर्शात्मक निबंध भी दृष्टिसंपन्न और जिज्ञासु पाठकों का ध्यानाकर्षण करेंगे. उर्दू के पहले नाटक इंदर सभा और गालिब की फारसी मस्नवी चिरागे-दैर शीर्षक निबंधों से गुजरते हुए हमें नाट्य और काव्य पक्ष की विविध खूबियों के साथ-साथ, नजीर के रंग वाला सांस्कृतिक सामरस्य भी विरमाएगा, हमारा अनुरंजन करेगा.

पुस्तक के पन्ने पलटते हुए सबसे पहले हमारा ध्यान जाता है उर्दू है जिसका नाम शीर्षक निबंध पर. विभाजन और उर्दू, उर्दू की लिपि, पाठ्यक्रमों में उर्दू-हिंदी साहित्य के बीच भेदभाव जैसे प्रश्न प्राय: उठते रहते हैं. लिपि का सवाल तो खासा पुराना है. गणेशशंकर विद्यार्थी पर काम करते हुए मेरी द्विवेदी युगीन हिंदी लेखक सैयद मीरअली मीर के एक पत्र पर नजर पड़ी, जिसमें उर्दू-हिंदी संबंधी कुछ भाषागत प्रश्न विद्यार्थी के सामने पेश किए गए थे. उनके जवाब देते हुए विद्यार्थी ने कहा था—''मुझे उर्दू और हिंदी में कोई अंतर नहीं मालूम पड़ता. दोनों का व्याकरण एक-सा है और साधारण शब्दावली में भी कोई विशेष अंतर नहीं...फिर उस समय लिपि-भेद के सिवा बतलाइए और अंतर ही क्या रहता है? मेरी दृष्टि में लिपि-भेद होना बुरा नहीं.''

लिपि-भेद का सवाल पिछले दशकों में भी कई लेखकों और मंचों से उछला और फारसी की जगह नागरी लिपि का विकल्प उर्दू के लिए पेश किया गया, जो इस पंक्तिकार की दृष्टि में किसी भाषा के कपड़े उतार लेने जैसा है. पीछे उल्लिखित निबंध में जानकी प्रसाद शर्मा भी भाषा और साहित्य संबंधी कई सवालों से दो-चार हुए हैं. वे कहते हैं, ''पाकिस्तान अगर उर्दू ने बनाया है तो आज वहां उर्दू का देशव्यापी व्यवहार होना चाहिए था, जबकि सूरतेहाल कुछ और है...उर्दू पाठ्यक्रमों में कबीर-जायसी या अन्य सूफी कवियों को पढ़ाने की जरूरत महसूस नहीं की गई.'' लिपि के सवाल पर लेखक का मानना है कि ''लिपि संस्कृति का अंग है, भाषा का नहीं. इसके बावजूद उर्दू लेखकों के सर्जनात्मक चित्त में फारसी लिपि रची-बसी है. इसलिए उनसे इस लिपि को तिलांजलि देने का आग्रह करना उचित नहीं लगता.'' हिंदी कवियों के गालिब निबंध भी विषय और प्रस्तुति में अलग से ध्यान खींचता है.

कह सकते हैं कि प्रस्तुत पुस्तक 'हमारी ही हिंदी, हमारी ही उर्दू' भावना की एक उल्लेखनीय हार्दिक और रचनात्मक अभिव्यक्ति है.

उर्दू अदब के सरोकार

लेखक: जानकी प्रसाद शर्मा

प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ, लोदी रोड, नई दिल्ली

कीमत: 450 रु.

—सुरेश सलिल

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