कलाः मेरे पास मेरी कला है!
फ्रांस के कलाकार ईव क्लें ने अपने नीले रंग को पेटेंट करवा लिया था. पटोदिया सुझाव देती हैं, ''एक 'अकबर रेड' होना चाहिए.'' एम.एफ. हुसैन, एफ.एन. सूजा, तैयब मेहता और एस.एच. रजा सभी को रंगों में महारत हासिल थी, लेकिन भूरा रंग अकबर को अलहदा बनाता था.

शेख अयाज
जनवरी की छह तारीख को आर्ट गैलरी संचालिका प्रियाश्री पटोदिया अकबर पद्मसी की एक प्रदर्शनी की तैयारियों में जुटी थीं कि उन्हें पद्मसी के निधन की खबर मिली. वे कहती हैं, ''मुझे नहीं पता इससे किस किस्म की कमी खलने वाली है.'' भारतीय आधुनिक कला के शीर्ष हस्ताक्षरों में से एक 91 वर्षीय पद्मसी कुछ वर्षों से बीमार थे. पेरिस में रहने वाली उनकी बेटी रईसा ब्रेगेट कहती हैं, ''उनके लिए कला हर चीज से पहले थी. यह जुनून उनकी जिंदगी को मायने देता था. हाल में मैंने उनसे पूछा कि क्या वे खुश हैं, उन्होंने जवाब दिया कि मेरे पास मेरी कला है.''
अगर आप पद्मसी की गूढ़ कृतियों को न भी समझें, तब भी उनके चमकदार रंगों के साथ तालमेल बिठाना आसान था. वे अपने ध्यानमग्न 'मेटास्कैप्स' को अक्सर 'कलाकार के मानस पटल' की यात्रा कहते थे. उनके भतीजे कौसर ठाकोर-पद्मसी सरीखे कई लोगों को 'मेटास्कैप्स' 'गूढ़' लगे थे. कौसर की नजर पद्मसी के उन चेहरों की ओर गई, जो उनकी पहचान थे. आलोचकों ने इन्हें विषाद से भरे और गहन चेहरे कहा था, पर पद्मसी ने उनके आकर्षण को समझाते हुए कहा था, ''निराशा में गरिमा है. अगर कैनवस पर कोई हंस रहा है, तो यह भयंकर दिखाई देगा.'' कौसर कहते हैं, ''नाट्य निर्देशक के तौर पर चेहरा और आंखें सबसे अहम चीजें हैं. मेरे लिए अकबर के चेहरे क्लोज-अप हैं और उनकी ताकत उनके अनगढ़पन में है. वे खूबसूरत नहीं हैं, न ही उनकी तरफ देखना आसान है. वे कुरूप हैं पर गरिमा से भरे हैं.''
अपनी अथक जिज्ञासा के बल पर पद्मसी ने पॉल क्ली के रंग सिद्धांत में महारत पा ली और अपनी पेंटिंग में गणित की अवधारणाओं को लागू किया. वे बच्चों सरीखे कुतूहल के साथ अपनी खोजों के बारे में बताते थे. वे कहते, ''मान लो मैं तुम्हें लाल दिखाऊं और कुछ वक्त बाद तुम्हारी नजरें सफेद दीवार की तरफ कर दूं, तो कौन-सा रंग आप देखेंगे?'' वे यह भी कहते, ''हरा! हरा वहां है ही नहीं. फिर आपने देखा कैसे? क्योंकि आंख विपरीत रंग से पिछले रंग को मिटा देती है. यह कला का नियम नहीं, प्रकृति का नियम है.''
फ्रांस के कलाकार ईव क्लें ने अपने नीले रंग को पेटेंट करवा लिया था. पटोदिया सुझाव देती हैं, ''एक 'अकबर रेड' होना चाहिए.'' एम.एफ. हुसैन, एफ.एन. सूजा, तैयब मेहता और एस.एच. रजा सभी को रंगों में महारत हासिल थी, लेकिन भूरा रंग अकबर को अलहदा बनाता था.
वे एकरंगी कैनवस की ओर भी आकर्षित थे. एक बार उन्होंने कहा था, ''भूरे के कोई पूर्वाग्रह नहीं हैं.'' उनके शुरुआती 'भूरे' दौर की एक उत्कृष्ट पेंटिंग 'ग्रीक लैंडस्कैप' 2016 में 19.19 करोड़ रु. में नीलाम में हुई थी.
आज पद्मसी की कलाकृतियां देश-विदेश के प्रमुख संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं. जहांगीर निकलसन आर्ट फाउंडेशन की क्यूरेटर कामिनी साहनी बताती हैं कि पद्मसी ने विविध शैलियों में काम किया और बड़ी तादाद में कलाकृतियां रचीं.
वे बताती हैं, ''उनकी कलात्मक खोज और प्रयोग उन्हें अग्रणी बनाते हैं. वे मूर्तिकार और फोटोग्राफर भी थे. उन्होंने कंप्यूटर ग्राफिक्स में भी हाथ आजमाया. 1960-70 के दशक में उन्होंने विजन एक्सचेंज वर्कशॉप की स्थापना की, जो युवा कलाकारों के लिए प्रयोगशाला थी.''
दक्षिण मुंबई के मुस्लिम व्यापारी परिवार में जन्मे पद्मसी तेजतर्रार कारोबारी भी थे. उन्होंने आजादी के आसपास अपना करियर शुरू किया और बॉक्वबे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप से जुड़ गए.
यूरोपीय आधुनिकतावाद से प्रेरित इसके सदस्य स्वतंत्र विचारों के हिमायती थे और वे पेंटिंग की जड़ तथा पुरानी भारतीय शैली में नई जान फूंकना चाहते थे.
1951 में वे महज 23 साल की उम्र में रजा के साथ पानी के जहाज से सफर करके पेरिस गए.
पॉल सिजाने से लेकर विंसेंट वान गॉग तक का प्रभाव लेकर वे भारत लौटे और उन्होंने जो कुछ सीखा, उसे चुपचाप कैनवस पर उतारने लगे.
इसी महीने कम-से-कम तीन प्रदर्शनियां पद्मसी पर केंद्रित हैं. 10 जनवरी को प्रियाश्री आर्ट गैलरी में 'जजमेंट इन द ट्रायल ऑफ अकबर पद्मसी' का उद्घाटन हुआ, जो अश्लीलता के आरोप में उन पर चलाए गए 1954 के ऐतिहासिक मुकदमे की नए सिरे से पड़ताल करता है. इस गैलरी ने बहुत मेहनत से नई कतरनों, डायरी के नोट, पुलिस के पत्राचार और अदालत के फैसले के जरिए सेंसरशिप के साथ पद्मसी की लड़ाई को एक बार फिर रचा है. पटोदिया कहती हैं, ''अकबर को यह बहुत अच्छा लगता.''
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