फुरसतः जिंदगी का विश्वनाथन दांव
सभी खेलों में एक मोड़ पर भावनाएं निर्णायक हो जाती हैं. हमें सिर्फ शतरंज के दांव नहीं बल्कि यह भी सीखना होता है कि दबाव में कैसे शांत रहें और जो जानते हैं, उसका ठीक से इस्तेमाल कर सकें.

शैल देसाई
अपनी नई किताब माइंड मास्टर के जरिए विश्वनाथन आनंद हमें जीवन में जीत और हार से निबटना सीखने के गुर बताते हैं. उनसे बातचीत के कुछ खास अंश:
इस किताब को लिखने का सबसे मुश्किल पहलू कौन-सा था?
होता यह है कि आत्मकथा लिखते वक्त आप जिंदगी के मुश्किल लम्हों में लौटते हैं और आपको सोचना पड़ता है कि उन लम्हों का आपके लिए मायना क्या था. मेरे लिए सबसे मुश्किल 2015 का वह लम्हा था जब मां का निधन हुआ और उसके ठीक बाद मुझे एक टूर्नामेंट में जाना था.
पिछले महीने टाटा स्टील चेस इंडिया रैपिड ऐंड ब्लिट्ज में निराशा हाथ लगी. वापसी कैसे करते हैं?
जब आप हताश-निराश हों तो उस सोच से बाहर आने का रास्ता निकालना चाहिए. मष्तिस्क अकेला अंग है जिसे आराम करने से नहीं बल्कि परिवेश बदलने से राहत मिलती है. बेटे की छुट्टित्तियां आ रही हैं, उसके साथ थोड़ा वक्त बिताने की कोशिश करूंगा. यही मेरा बदलाव होगा.
शतरंज में भावनाओं की क्या भूमिका होती है?
सभी खेलों में एक मोड़ पर भावनाएं निर्णायक हो जाती हैं. हमें सिर्फ शतरंज के दांव नहीं बल्कि यह भी सीखना होता है कि दबाव में कैसे शांत रहें और जो जानते हैं, उसका ठीक से इस्तेमाल कर सकें.
आपकी पत्नी भरतनाट्यम की शौकीन हैं, बेटे अखिल को भी नाचना पसंद है. कभी साथ नाचे?
बेटा अभी नाचना सीख रहा है, और मैं साथ में यूं ही कूदफांद करता हूं. हम उसकी पसंद यानी स्पैनिश रेगी म्युजिक खूब सुनते हैं. मुझे अस्सी के पुराने अंग्रेजी और तमिल हिट पसंद हैं. उसे मेरा संगीत भले न पसंद हो पर मुझे उसका संगीत रास आ रहा है.
आपकी किताब की शुरुआत फ्रैंक सिनात्रा के माइ वे से क्यों होती है?
उस गीत के बारे में मैं बहुत कुछ कह सकता हूं, किस्से गढ़ सकता हूं. यह सब मैंने किया है और फिर उससे बाहर निकला हूं. पर मुद्दे की बात यही है कि यह गाना मुझे पसंद है.
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