हॉट मौसम में देखें कूल-कूल फिल्में
जुनून और जज्बे से भरे थ्रिलर, ताजी हवा के झोंके-सा मनोरंजन और अरसे से उम्मीद जगा रही एक बायोपिक...बॉलीवुड ने गर्मियों के लिए अपना बेशकीमती खजाना खोला

गर्मियों में बॉलीवुड अपने बेहतरीन पत्ते खोलता है. हिंदी सिनेमा की सबसे होनहार युवा अदाकारा आलिया भट्ट राजी में अपने दम पर एक ड्रामे की अगुआई कर रही हैं. रणबीर कपूर संजू के साथ बायोपिक की विधा में हाथ आजमा रहे हैं.
करीना कपूर खान, सोनम कपूर और स्वरा भास्कर की मिली-जुली गर्ल पावर वीरे दी वेडिंग में ठेठ व्यावसायिक मनोरंजन के लिए साथ आई है. बहुत उम्मीदों से बनाई गई ये फिल्में अगर आपका दिल नहीं बहला पाती हैं, तो हमेशा की तरह भाई उर्फ सलमान तो हैं ही. वे वही कर रहे हैं जो सबसे अच्छा करते हैं—ऐक्शन थ्रिलर रेस 3 में खम ठोकना और एक खूबसूरत बाला के साथ इश्क फरमाना.
देशभक्त जासूस
मेघना गुलजार की राजी (12 मई को रिलीज हो रही) हरिसिक्का के उपन्यास कॉलिंग सहमत पर बनी है. इसमें आलिया भट्ट ने 19 बरस की एक कश्मीरी लड़की का किरदार अदा किया है जो एक फौजी अफसर (विकी कौशल) की बीवी के भेष में एक पाकिस्तानी घर में दाखिल हो जाती है.
उसका मिशन हिंदुस्तान की हुकूमत को राज की बातें पहुंचाना. मेघना मानकर चल रही थीं कि एक असल जासूस से प्रेरित सहमत के मन में एक खतरनाक काम हाथ में लेने से पहले कोई शक-शुबहा नहीं था.
उन्हीं के शब्दों में, ''इस किरदार की कई दोहरी परतें हैं और इसे निभाना आसान नहीं है.''
उनके तईं केवल एक ही अदाकारा यह काम कर सकती थी. वे भट्ट के बारे में कहती हैं, ''उसके बारे में बहुत जोरदार बातें कहने का मेरा कोई इरादा नहीं है.'' साथ ही, यह भी कहती हैं कि आलिया डायलॉग या सीन में बिल्कुल अलग ही मायने पैदा कर देतीं.
कहानी 1971 की है जब हिंदुस्तान-पाकिस्तान के रिश्ते सबसे ज्यादा तनावग्रस्त थे.
राजी राष्ट्रवाद का लोकप्रिय कार्ड भी खेलती है. मेघना ने यह भी तय किया कि वे 1970 के दशक के बड़ी-बड़ी मूंछें और कलमें और कॉलर या बेलबॉटम पहनने वाले सिनेमाई किरदारों से भी दूर रहेंगी.
वे कहती हैं, ''मैं चाहती थी कि मेरे अदाकार अच्छे दिखाई दें. केवल इसलिए कि यह पीरियड फिल्म है, इसका यह मतलब नहीं कि यह इकहरे या खलनायकी रंग में रंगी हो.
हालात अंधकार से भरे हों तब भी दुनिया चमकदार और खूबसूरत हो सकती है.''
डायरेक्टर अभिषेक शर्मा के जासूसी थ्रिलर परमाणुः द स्टोरी ऑफ पोकरण (25 मई) में भी बहादुरी और धोखा अहम मसाले हैं.
यह फिल्म दिखाती है कि 1998 में हिंदुस्तान ने अमेरिका और दूसरी महाशक्तियों को भुलावे में रखकर परमाणु परीक्षणों को अंजाम दिया था.
अभी तक केवल तेरे बिन लादेन सरीखी कॉमेडी फिल्मों में हाथ आजमाने वाले शर्मा कहते हैं, ''मुझे हैरानी होती है कि अभी तक हमने इस पर फिल्म क्यों नहीं बनाई.
यह हिंदुस्तान के इतिहास को बदल देने वाली घटना है. और यह विश्व शक्ति के तौर पर हमारे उभार की परिचायक थी.''
परमाणु...न केवल उस वक्त के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, वैज्ञानिक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और भौतिकविज्ञानी डॉ. आर. चिदंबरम की अहम भूमिका को स्वीकार करती है, बल्कि भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) और रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) की उन छिपी हुई शख्सियतों का भी जश्न मनाती है जिन्होंने इस गुप्त मिशन के लिए फौजी वर्दी धारण करके अथक काम किया था.
शर्मा कहते हैं, ''यह आपकी छाती पीटने वाली देशभक्ति नहीं है. पूरी फिल्म में झंडे का महज एक शॉट है. यह हिंदुस्तान के अपने पैरों पर खड़े होने को लेकर है, किसी को धूल चटाने को लेकर नहीं.''
संवेदनशील जानकारियों और किस्से-कहानी के बीच जिम्मेदारी से संतुलन बिठाने के लिए निर्माता जॉन अब्राहम, जिन्होंने मुख्य किरदार भी अदा किया है, सलाहकार के तौर पर कर्नल बृजमोहन शर्मा को लेकर आए जिन्होंने टीम के सदस्यों को प्रशिक्षण भी दिया और लेखकों की सहायता भी की.
हीरो और सुपरहीरो
परमाणु...के उलट राजकुमार हीरानी की संजू (29 जून) खामियों से भरा हीरो पेश करती है. संजय दत्त हीरानी की मुन्नाभाई फिल्मों के सितारे रहे हैं. उन्हीं की इस बायोपिक में रणबीर कपूर ने दत्त के नशे के लती नौजवान से येरवडा जेल तक छह अलग-अलग दौर को परदे पर उतारा है. हीरानी कहते हैं, ''फिल्म को बनाने की कोई मजबूरी या दबाव नहीं था. संजय तो इतने बहादुर थे कि उन्होंने कहा, ''जो बोलना हो बोल दो यानी जैसा दिखाना चाहो, दिखाओ.''
हीरानी और उनके भरोसेमंद लेखक अभिजात जोशी ने दत्त के साथ दो महीने से ज्यादा बातें कीं और आखिरकार उसे 725 पन्नों में लिखा गया. जोशी कहते हैं कि उन्हें इसमें 'सबसे चौंका देने वाली कहानी मिली.'
वे कहते हैं, ''यह ऐसा था मानो आप दोस्तोयेवस्की का कोई बेहद स्याह और गहरा उपन्यास पढ़ रहे हैं जिसमें अचानक पी.जी. वुडहाउस का एक अध्याय सामने चला आता है.''
साथ मिलकर अपनी पहली बायोपिक लिखना और कुछ भी हो, आसान नहीं था. हीरानी बताते हैं, ''इस पर आपका कोई नियंत्रण नहीं रहता, जैसा मौलिक पटकथा पर रहता है. आपको उसी के प्रति खरा रहना होता है जो जिंदगी में घटा है.''
इस लेखक जोड़ी ने दत्त की जिंदगी के किस्सों से एक अफसाना बुना जो बाप-बेटे के रिश्ते, दोस्ताने की कहानी बयान करते हुए रोमांस की तरफ भी इशारा करता है.
कपूर के लिए, इसका कुल नतीजा 'जन्नत से भेजा गया एक स्क्रीनप्ले' था. वे कहते हैं, ''मैं 35 साल का हूं; वे (दत्त) जब 18 के थे, वे उससे पांच गुना जिंदगी जी चुके थे जो मैं ताउम्र नहीं जी सकूंगा.''
भावेश जोशी सुपरहीरो (25 मई) जिस जुर्म का कसूरवार है, वह आदर्शवाद है. फिल्मकार विक्रमादित्य मोटवाणे ने एक आम नौजवान का किरदार (हर्षवर्धन कपूर) खड़ा किया है जो मुंबई में बदलाव लाने के लिए नकाब पहनकर स्वयंभू इंसाफ करने वाला बन जाता है. वे कहते हैं, ''यह फिल्म इसलिए शुरू हुई क्योंकि मैं लोगों को ट्रैफिक सिग्नल लांघते देखकर आजिज आ गया था.''
मोटवाणे ने फिल्म का पहला मसौदा 2011 में अण्णा हजारे का आंदोलन शुरू होने से एक साल पहले लिखा था. वे कहते हैं, ''उस वक्त कहीं ज्यादा गुस्सा था. पर अब पटकथा कहीं ज्यादा कथानक आधारित, मजेदार और मनोरंजक बन गई है.''
किस्से कुड़ियों के
वीरे दी वेडिंग (1 जून) में करीना, सोनम, शिखा तल्सानिया और स्वरा भास्कर हर चीज अपने ढंग से करना चाहती हैं. निधि मेहरा और मेहुल सूरी की लिखी इस फिल्म की गाली-गलौज, स्टाइलिश कपड़े और विदेश में छुट्टियों की कहानी मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को रिझाने के लिए बनी मालूम देती है.
पर डायरेक्टर शशांक घोष कहते हैं, ''हो सकता है, अंदाजे-बयां शहरी हो, पर मुद्दे सभी जगहों के हैं.'' घोष ने पटकथा का साफ-सुथरा संस्करण पेश किया था, पर निर्माता रिया कपूर और एकता कपूर ने उसे तवज्जो नहीं दी. वे कहते हैं, ''रिया ने कहा, इसमें हकीकत कहां है?'' तो हकीकत से जुड़ी और परीकथा जैसे तजुर्बों से पगी फिल्में आपके नजदीकी सिनेमाघरों में जल्द आ रही है. रोमांस से लेकर मुट्ठियां लहराने वाले ऐक्शन तक, मेन्यू में सब मौजूद है.
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