प्यारे पॉल के लिए, रंगमंच पर उतरा ट्रैजिक अनुभव
भारतीय मूल के एक जुझारू अमेरिकी न्यूरो सर्जन डॉ. पॉल सुधीर कलानिधि की 37 वर्ष में फेफड़े के कैंसर से मौत की इस मंच कथा के साथ एक ऑर्थोपैडिक सर्जन डॉ. ब्रजेश्वर सिंह का नाटककार के रूप में जन्म हो रहा था.

पलादिन. या पैलडिन, जो भी कह लें. है ये अंग्रेजी का शब्द paladin, जिसका अर्थ होता है किसी मकसद के लिए लडऩे वाला शूरवीर. बरेली के थिएटर ग्रुप रंग विनायक रंगमंडल का सालाना थिएटर फेस्टिवल पिछले हफ्ते उसके इसी नाम के नाटक से शुरू हुआ.
वैसे तो थिएटर के कई चमकते चेहरे अपना उम्दा काम लेकर इसमें हाजिर हुए. फिल्म तुम्हारी सुलु में अशोक की भूमिका से चर्चा में आए मानव कौल, एअरलिफ्ट, सुल्तान, रुस्तम और टाइगर जिंदा है के अहम अभिनेता कुमुद मिश्र, रिजवान, थूक और मुक्तिधाम जैसी अलहदा किस्म की प्रस्तुतियों वाले बेंगलूरू के अभिषेक मजूमदार और दास्तानगोई के दानिश हुसैन वगैरह.
मजमून पुरुष-स्त्री, पिता-पुत्र के रिश्तों से लेकर फासीवाद तक. और अभिनय! बरेली के तमाम दर्शकों के लिए अप्रत्याशित. लेकिन अपने शहर के ही कलाकारों के नाटक पलादिन का गाढ़ा असर अंत तक हल्का न पड़ा. सामने खड़ी मौत से मुकाबिल एक डॉक्टर का डेढ़ घंटे का दुखांत, लगातार कचोटता हुआ.
करीब 200 दर्शकों में से हरेक के चेहरे पर घना दर्द साफ दिखता था. शहर में आर्मी हास्पिटल के सीनियर कैंसर सर्जन डॉ. संजय कपूर बोले भी, ''नाटक अरसे से देखता आया हूं पर ऐसे ट्रैजिक अनुभव से पहली दफा गुजरा."
असल में पलादिन की यह प्रस्तुति हिंदुस्तानी थिएटर में कई मायनों में एक खास लम्हा है. भारतीय मूल के एक जुझारू अमेरिकी न्यूरो सर्जन डॉ. पॉल सुधीर कलानिधि की 37 वर्ष में फेफड़े के कैंसर से मौत की इस मंच कथा के साथ एक ऑर्थोपैडिक सर्जन डॉ. ब्रजेश्वर सिंह का नाटककार के रूप में जन्म हो रहा था.
इसका भी पूरा एक दिलचस्प किस्सा है. दसेक साल पहले सालाना फेस्टिवल शुरू करवाकर, फिर विंडरमेयर सांस्कृतिक केंद्र और उसमें मॉडर्न ऑडिटोरियम बनवाकर कल्चरल एक्टिविस्ट की भूमिका में वे पहले ही आ चुके थे.
इलाज के दौरान मिले कुछ बेहद जुझारू मरीजों पर उन्होंने चार साल पहले इन ऐंड आउट ऑफ थिएटर्स नाम से रोचक किताब लिख डाली. पर एक रात लखनऊ मेल से बरेली लौटते वक्त एक अमेरिकी दोस्त ने पॉल के बारे में एक लिंक भेजा. लकवाग्रस्त हाथ-पैर वालों को भी रोबोट से गिलास उठाने में सक्षम बनाने पर शोध करने वाले पॉल के बारे में रात भर में ही पूरा पढ़कर सुबह उन्होंने फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी.
पॉल असल में ईसाई पिता और हिंदू मां की संतान थे. दोनों ही पक्षों को शादी नामंजूर होने की वजह से मां-बाप अमेरिका चले गए थे. साहित्य की पढ़ाई करके पॉल मेडिसिन में आए न्यूरोसर्जन बने. मार्च 2015 में फेफड़ों के कैंसर से मरने से दो साल पहले उन्हें अपनी बीमारी का पता चला. उस अनुभव पर लिखी उनकी किताब ह्वेन ब्रेथ बिकम्स एअर बाद में छपी और 50 हफ्ते से ज्यादा तक न्यूयॉर्क टाइम्स में बेस्ट सेलर बनी रही.
किताब से बेहद प्रभावित डॉ. सिंह ने मेडिकल कॉलेजों में ''चिकित्सा का मानवीय पहलू" थीम पर टॉक शुरू कर दी. कैंसर पर ही एमा थॉमसन की फिल्म विट के अलावा टॉम शैड्याक की पैच एडम्स और तपन सिन्हा की एक डॉक्टर की मौत ने इसमें उनकी मदद की. लेकिन पॉल फिर भी उन्हें कचोटते रहे. वे रात को अपने अस्पताल में बैठते और एक ऑपरेशन के बाद दूसरे मरीज की तैयारी के बीच के समय में लैप टॉप पर स्क्रिप्ट लिखने लगे.
उसी जगह पर अभी रात के दो बजे हैं. वे बताते हैं, ''आइवीएफ से बच्चा पैदा करने के लिए पॉल और पत्नी लूसी के 15 जोड़े स्पर्म/एग लिए जाने पर पॉल ने कहा कि एक जान के लिए 14 को मार डाला जाएगा!" इस हद तक संवेदनशील सर्जन का मरीज के जामे में ढलना, सिंह ने उस सफर की परतों को सलीके से खोला है. शुद्ध यथार्थ, कोई मेलोड्रामा नहीं. यहां तक कि अभिनय में भी. निर्देशक के रूप में जुड़े अश्वत्थ भट्ट ने दृश्यों को स्थापित करने के लिए मंच, प्रकाश और बैकड्रॉप का कल्पनाशील इस्तेमाल किया है.
सिंह की नई किताब देश के प्रेरक डॉक्टरों पर होगी. झुमके और सुरमे के लिए जाने गए बरेली को अब वे कला और साहित्य यानी सॉफ्ट पावर की नई धुरी के रूप में खड़ा कर रहे हैं.
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