सुपरस्टार की सनसनीखेज जीत

सभी उम्मीदों और आकलनों को धता बताते हुए  51 वर्षीय सुपरस्टार विजय की तमिलगा वेत्रि कलगम सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. इसने राज्य की दो दिग्गज द्रविड़ पार्टियों के दबदबे को ध्वस्त कर दिया.

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विजेता टीवीके प्रमुख और तिरुचिरापल्ली पूर्व से प्रत्याशी विजय 4 मई को अपनी जीत का प्रमाणपत्र दिखाते हुए 

अप्पड़ी पोड़ु पोड़ु (ऐसे ही करो)....4 मई को जब शुरुआती रुझान आए तब तमिलनाडु में हर किसी की जुबान पर विजय और त्रिशा कृष्णन अभिनीत 2004 की सुपरहिट फिल्म गिल्ली का जोशो-खरोश से भरा बस यही गाना था. दरअसल इस सुपरस्टार की दो साल पुरानी पार्टी तमिलगा वेत्रि कलगम (टीवीके) चुनाव नतीजों में बाजी मारती दिख रही थी.

दिन खत्म होते-होते विजय की टीवीके 234 सदस्यों की विधानसभा में बहुमत से सिर्फ 10 कम यानी 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन गई. इस जनादेश ने दोनों द्रविड़ पार्टियों द्रविड़ मुनेत्र कलगम (डीएमके) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कलगम (एआइएडीएमके) के पांच दशक पुराने दबदबे को तोड़ दिया.

इसके साथ ही विजय की तुलना 1970 के दशक के दिवंगत अभिनेता और मुख्यमंत्री रहे एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) से की जाने लगी. वैसे अभी शुरुआत है. इतना कहना काफी होगा कि 2026 के चुनाव ने दशकों बाद राज्य में सियासी बिसात को आमूलचूल बदलने वाले नतीजों में से एक दिया.

इस कड़ी में डीएमके 59 सीटों पर सिमट गई और एआइएडीएमके को 47 सीटें मिलीं. यह सियासी उलटफेर तो एक तरफ, मुख्य सवाल अब केवल यह नहीं कि विजय कैसे जीते, बल्कि यह भी कि उनकी नई-नवेली पार्टी ने चुनावी राजनीति में दाखिल होने के महज दो साल के भीतर जड़ें जमाए बैठी सियासी सत्ता को इस तरह कैसे उलट दिया. एक बड़ी वजह तो यह है कि युवा और पहली बार वोट डालने वाले लोग टीवीके के पीछे पूरी तरह लामबंद हो गए.

चुनाव प्रचार के दौरान कई रिपोर्टों ने जेन-जी वोटरों की गोलबंदी पर ध्यान दिलाया. उनमें कइयों को लगता था कि पारंपरिक द्रविड़ पार्टियां 'सियासी तौर पर थक गई’ हैं.

कई विश्लेषकों का मानना है कि विजय का प्रचार-प्रसार पारंपरिक अभियानों से अलग था. बड़े काडर नेटवर्क और पारंपरिक मीडिया की बजाय टीवीके का जोर डिजिटल लामबंदी, फैन क्लब और सोशल मीडिया पर रहा. सियासी विश्लेषक मुदलवन कहते हैं, ''जमीनी स्तर पर बोलने के लिए पार्टी के पास कोई ढांचा नहीं था. मगर सोशल मीडिया पर उसकी पहुंच बहुत व्यापक थी.’’

आगाज किस तरह
तमिल फलक पर बीते तीन से ज्यादा दशकों से विजय की अनोखी जगह रही है. पहले उस फिल्म सितारे की तरह जिसे मामूली बताकर खारिज कर दिया गया, फिर भारतीय सिनेमा के सबसे भरोसेमंद अदाकार के तौर पर, और अब तमिलनाडु के अगले मुख्यमंत्री के रूप में. जोसफ विजय चंद्रशेखर सिनेमा में विशेषाधिकार और दबाव दोनों के साथ आए. फिल्मकार एस.ए. चंद्रशेखर और पार्श्वगायिका शोभा चंद्रशेखर के बेटे विजय ने भाई-भतीजावाद के आरोप उस समय झेले जब चेन्नै के मनोरंजन जगत में यह शब्द प्रचलित नहीं हुआ था.

5 मई को हार के बाद कोलातुर पहुंचे डीएमके प्रमुख स्टालिन

रूप-रंग, संवाद अदायगी और रुपहले पर्दे पर जादुई दिखाई न देने के लिए उनका मखौल उड़ाया गया. आलोचकों ने कहा कि उनमें स्टार बनने के लिए जरूरी खूबियां नहीं हैं. मगर धीरे-धीरे धारणाएं बदलीं. 1990 के दशक के मध्य में पूवे उनक्कागा, लव टुडे और कदालुक्कु मरियादै सरीखी रोमांटिक ड्रामा फिल्मों ने इसमें मदद की. देखते-देखते विजय ने उस वक्त के अतिशय मर्दाना हीरो से अलग छवि बना ली.

बड़े सितारे के रूप में कायापलट 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में शुरू हुआ, जब तमिल सिनेमा ने राह बदलकर आदमकद हीरो, 'पैने’ डायलॉग और मुरीदों-दीवानों की सक्रिय भागीदार से चलने वाले तमाशों का रुख किया. तिरुमलै, गिल्ली, तिरुपाचि, पोक्किरी और शिवकाशी सरीखी फिल्मों ने विजय को जनप्रिय ऐक्शन हीरो के तौर नए सिरे से स्थापित कर दिया.

गिल्ली तो मील का पत्थर बन गई. तेज रफ्तार और भीड़ का दिल खुश कर देने वाले लम्हों से भरी इस फिल्म से विजय विभिन्न तबकों और भूभागों तक पहुंच गए. अचानक वे फेनॉमिना बनते जा रहे थे. इस दौर से विजय की सबसे बड़ी ताकत का भी खुलासा हुआ. वह थी वक्त और दर्शकों के हिसाब से ढलने की क्षमता. एक बंधी-बंधाई शख्सियत विकसित करने वाले सितारों के विपरीत विजय ने वह सब जज्ब किया जो अलग-अलग वक्त पर दर्शक चाहते थे.

वे अपने डांस में निखार लाए, कॉमिक टाइमिंग बेहतर बनाया और 'धमाकेदार जोशीली एंट्री’ का फॉर्मूला विकसित किया, जो व्यावसायिक तमिल सिनेमा का केंद्रीय हिस्सा बन गया. साथ ही ज्यादा से ज्यादा संख्या में उनके फैन क्लब बनाए जा रहे थे, जिससे स्वाभाविक ही सियासी अटकलें लगाई जाने लगीं. मुख्य फैन क्लब विजय मक्कल इयक्कम (वीएमआइ) ने टीवीके की कामयाबी में सचमुच बेहद अहम भूमिका निभाई. इस फैन क्लब के 1.5 करोड़ सदस्य बताए जाते हैं. पार्टी सूत्रों का कहना है कि टीवीके के 60 फीसद से ज्यादा उम्मीदवार या तो वीएमआइ के सदस्य थे या उनकी सिफारिश पर चुने गए.

विजय के कायापलट के दौर की एक झलक 2009 के इंडिया टुडे तमिल स्पेशल अंक में सामने आई. जब पूछा गया कि क्या जनकल्याण के उनके काम सियासी इरादे से प्रेरित हैं, विजय ने उसका यह कहकर प्रतिरोध किया, ''मैं जो कुछ करता हूं, वह बुनियादी इंसानियत के चलते करता हूं.’’ मगर बाद में उन्होंने माना, ''अच्छे काम करते रहने के लिए एक पड़ाव के बाद सत्ता जरूरी है.’’ उन्होंने राजनीति में आने के विचार को भी खारिज नहीं किया और कहा, ''फिलहाल मेरा पूरा ध्यान सिनेमा पर है. भविष्य में राजनीति में आ सकता हूं.’’

वक्त के साथ विजय की फिल्मों में सियासी कमेंट्री बढ़ती गई. 2013 में तलैवा को तमिलनाडु में रिलीज से पहले काफी अड़चनों का सामना करना पड़ा. समाधान के लिए विजय तब मुख्यमंत्री जे. जयललिता से खुद मिले. 2017 में मर्सल ने राष्ट्रीय बहस छेड़ दी जब जीएसटी प्रणाली और स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी नीतियों की आलोचना करने वाले संवादों पर भाजपा नेताओं ने ऐतराज जताया. उन दृश्यों को हटाने की मांग बढ़ने पर विजय ने 'बोलने की आजादी का समर्थन करने’ वाले नेताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का शुक्रिया अदा करते हुए बयान जारी किया.

ईंधन की कीमतें बढ़ने के विरोध के दौरान 2021 में वे साइकिल चलाते नजर आए, तो ऐसी भी बातें कहीं जिन्हें रेवड़ियां बांटने वाली राजनीति की आलोचना माना गया. तब उन्होंने इनकार किया मगर अब पीछे मुड़कर देखने पर वह सब सियासी छवि को पुख्ता करने की सधी-सधाई और नपी-तुली कोशिश नजर आता है. तमिलनाडु में सिनेमा और राजनीति की जज्बाती शब्दावली लंबे समय से साझा रही है. एमजीआर के बाद विजय ने इस डायलॉग को सबसे अधिक परवान चढ़ाया.

चेन्नै में चुनाव-प्रचार के दौरान एआइएडीएमके नेता पलानीस्वामी

करिश्माई अपील
असल में विजय का चुनावी अभियान संगठनात्मक मजबूती की बजाय सावधानीपूर्वक गढ़ी गई सियासी छवि पर आधारित था. इसमें उन्हें एक ऐसी बाहरी शख्सियत के रूप में पेश किया गया जो पहले से चली आ रही सियासी व्यवस्था को चुनौती दे रहा है. खुद को बदलाव के अगुआ के तौर पर पेश करते हुए उन्होंने अपने भाषणों में बार-बार भ्रष्टाचार, शासन की नाकामियों, बेरोजगारी और सत्ता के वंशवादी सियासी परिवारों के हाथों तक सिमटे रहने जैसे मुद्दों पर जोर दिया.

उन्होंने सीधे संवाद और भावनात्मक अपील का सहारा लिया, जिसे उनकी फिल्मी छवि के इर्द-गिर्द बुना गया था. उसमें तीखी संवाद अदायगी, नैतिक रूप से सही पायदान पर होने का दावा और व्यक्तिगत ईमानदारी की सावधानीपूर्वक गढ़ी गई शख्सियत शामिल थी.  

एम.के. स्टालिन सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर ने उनके संदेश के लिए अनुकूल जमीन तैयार की. पूरे अभियान के दौरान विजय ने बार-बार स्टालिन को निशाना बनाया और उन्हें कई बार 'अंकल’ कहकर संबोधित किया, और यह भी कहा कि उन्हें ऐसा कहने पर नाराजगी झेलनी पड़ती है. दिलचस्प बात यह कि उन्होंने भाजपा को अपना वैचारिक विरोधी बताया, लेकिन वे 'भगवा खेमे’ पर कम हमलावर रहे.

विजय के अभियान ने स्टार से पूर्णकालिक राजनेता बनने की सीमाओं को भी उजागर किया. उनके आलोचकों ने खासकर करूर हादसे का हवाला देते हुए सियासत में उनकी सक्रियता को अस्थिर और असंगत बताया. दरअसल, उस मसले पर प्रतिक्रिया देने में उन्होंने करीब 60 घंटे लगाए और देरी से पहुंचने तथा भीड़ के प्रबंधन में नाकामी को लेकर हो रही आलोचनाओं को स्वीकार करने की बजाय उन्होंने स्टालिन पर सियासी हमला बोला.

विजय ने पहले से तय कई चुनावी कार्यक्रमों में भी हिस्सा नहीं लिया और स्टालिन तथा ईपीएस की तुलना में कम भाषण दिए. उनकी अनुपस्थिति में उनके स्थानीय उम्मीदवार प्रचार के लिए उनके होलोग्राम, वीडियो, रिकॉर्ड किए गए संदेशों और उनकी सेलिब्रिटी छवि पर निर्भर रहे. मसलन, कुंभकोणम में टीवीके उम्मीदवार आर. विनोद विजय ने होलोग्राम का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया.

हालांकि वे फिर भी बहुत कम अंतर से चुनाव जीतने में कामयाब रहे. ऐसा लगता है कि ये सारी दिक्कतें विजय की लोकप्रियता को कम नहीं कर सकीं. राज्य में उनकी पार्टी के सिंबल 'सीटी’ की आवाज तेज और साफ तौर पर गूंजती रही.

साल 2026 के चुनाव का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि तमिलनाडु की सियासत एक ऐसे अनिश्चित दौर में दाखिल हो चुकी है, जहां करिश्माई प्रभाव, डिजिटल लामबंदी और पीढ़ीगत बदलाव पारंपरिक पार्टी ढांचों के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से चुनावी आचार-विचार को बदल रहे हैं. इस चुनाव में कुल 5.73 करोड़ योग्य मतदाता थे. उनमें से लगभग 1.22 करोड़ (करीब 21 फीसद) 18-29 आयु वर्ग के थे जिन्हें जेन-जी मतदाता कहा जाता है. यह भी अब बहस का विषय है कि क्या डिजिटल युग की यह पीढ़ी चुनावी नतीजों को कहीं ज्यादा प्रभावित कर रही है.

टीवीके उम्मीदवारों से भी इसकी कड़ियां जुड़ती हैं क्योंकि उनकी औसत आयु 40 साल से कम रही. इससे टीवीके की कहानी सहज ही जुड़ जाती है. इसकी बेहतरीन मिसाल चेन्नै दक्षिण के विरुगंबक्कम सीट से विजेता रहे 30 वर्षीय आर. सबरीनाथन हैं जो लंबे समय से विजय के ड्राइवर रहे राजेंद्रन के बेटे हैं.

वैसे, इस माहौल में विजय की पार्टी ने खुद को बेहद सतर्क तरीके से पेश किया. विजय ने खुद को पारंपरिक वैचारिक अभियान चलाने वाले नेता के रूप में दिखाने से परहेज किया है. टीवीके के 40 सूत्री घोषणापत्र में रोजगार सृजन, महिला कल्याण, एमएसएमई के पुनरुद्धार और शासन में पारदर्शिता पर जोर दिया गया था.

द्रविड़ दिग्गज धराशायी
अ रसे से मुख्यमंत्री स्टालिन की सीट कोलातुर और चेन्नै 2026 में डीएमके के पराभव के सबसे बड़े प्रतीक हैं. कभी उनके सहयोगी रहे टीवीके उम्मीदवार वी.एस. बाबू के हाथों स्टालिन को मिली हार के बड़े सियासी मायने हैं. ग्रेटर चेन्नै क्षेत्र में डीएमके सिर्फ दो सीटों तक सिमट गई. यह अप्रत्याशित उलटफेर था क्योंकि उसे लंबे वक्त से पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है.
एआइएडीएमके के लिए भी ये नतीजे चिंता का सबब हैं.

यह उसके दीर्घकालिक पराभव का संकेत है. ऐसा माना जा रहा कि जैसा भावनात्मक जुड़ाव और करिश्माई नेतृत्व जे. जयललिता और एमजीआर ने उसे प्रदान किया था, वह पार्टी अब हासिल नहीं कर पाएगी. टीवीके का उभार उसका पतन तेज कर सकता है क्योंकि कभी एआइएडीएमके को स्वाभाविक विकल्प मानने वाले डीएमके-विरोधी युवा अब विजय की ओर रुख कर सकते हैं. 

वहीं, सिर्फ एक सीट पर सिमट गई भाजपा के पास भले ही राज्य में चुनावी रूप से बहुत कुछ नहीं हो मगर उसे सियासी बिखराव का परोक्ष लाभ मिल सकता है. यदि राज्य में लंबे वक्त तक खंडित जनादेश रहा, तो वह मोलभाव करने वाली अहम ताकत बन सकती है.

इस बीच विजय की पार्टी के लोगों की अनुभवहीनता अभी ही नजर आने लगी है. कम से कम दो टीवीके विधायकों ने अपनी जीत के तुरंत बाद पत्रकारों से हिंदी में बात की जिसकी सोशल मीडिया पर आलोचना हुई. एक विश्लेषक कहते हैं, ''यह ऐसे राज्य में गलत संदेश देता है जहां भाषाई पहचान अभी भी सियासी रूप में संवेदनशील मसला है. तमिलनाडु परंपरागत रूप से ऐसा राज्य रहा है, जहां प्रधानमंत्री भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में अंग्रेजी में संबोधन करते हैं.’’

असल में, इस चुनाव ने तमिलनाडु की सियासी शब्दावली को कई मायनों में बदल दिया है. मतदाताओं ने महज एक नई पार्टी को वोट नहीं दिया, बल्कि इससे स्थापित सियासी ढांचों के प्रति उनकी अधीरता का संकेत मिलता है. इसने एक अधिक गतिशील सियासी दौर का रास्ता खोल दिया है. अब यह समय ही बताएगा कि यह बदलाव अस्थायी है या स्थायी.

कई विश्लेषकों का मानना है कि विजय का प्रचार-प्रसार पारंपरिक अभियानों से अलग था. बड़े कॉडर नेटवर्क और पारंपरिक मीडिया की बजाय टीवीके का जोर डिजिटल लामबंदी, फैन क्लब और सोशल मीडिया पर रहा.

कई विश्लेषकों का मानना है कि विजय का प्रचार-प्रसार पारंपरिक अभियानों से अलग था. बड़े कॉडर नेटवर्क और पारंपरिक मीडिया की बजाय टीवीके का जोर डिजिटल लामबंदी, फैन क्लब और सोशल मीडिया पर रहा.

असल में, 2000 के दशक में विजय की सबसे बड़ी ताकत का भी खुलासा हुआ. वह थी वक्त और दर्शकों के हिसाब से ढलने की उनकी क्षमता. एक बंधी-बंधाई शख्सियत विकसित करने वाले सितारों के विपरीत विजय ने वह सब जज्ब किया जो अलग-अलग वक्त पर दर्शक चाहते थे.

ग्रेटर चेन्नै इलाके में डीएमके केवल दो सीटों तक सिमटकर रह गई. यह बहुत चौंकाने वाला उलटफेर था क्योंकि उस इलाके को लंबे समय से पार्टी का काफी मजबूत गढ़ माना जाता रहा है.

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