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केरल के मतदाताओं ने वाम मोर्चे के जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास को सजा दी और कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ को सौंपा भारी जनादेश.

mandate 2026: kerala
कांग्रेस नेता वी.डी. सतीशन 5 मई को कोच्चि के एरणाकुलम रेलवे स्टेशन पर

केरल में चुनाव प्रचार के दौरान मलयालियों के बीच एक मजाक खूब चल रहा था—राज्य में कहीं भी एक किलोमीटर चल लीजिए, आपको 'महान नेता’ यानी पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का विशाल कटआउट ऊपर से झांकता दिख जाएगा.

चुनाव नतीजे आने के बाद अब लगता है, शायद यह उस पार्टी के लिए कोई अच्छी रणनीति नहीं थी, जो खुद को सर्वहारा की पार्टी कहती है और दस साल की सत्ता विरोधी लहर का बोझ भी ढो रही थी.

जीत के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस ने मजाक में कहा कि माकपा के चुनावी नारे—'मट्टरुंड एलडीएफ अल्लाते’ (अगर लेफ्ट नहीं तो और कौन?)—और प्रचार में दिखे 'अहंकार’ ने मतदाताओं के मन में यह धारणा और मजबूत कर दी कि अब बदलाव जरूरी है.

नतीजे खुद पूरी कहानी बयान करते हैं—वाम मोर्चा सिमटकर सिर्फ 35 सीटों पर आ गया, जो पिछले चार दशकों में उसकी सबसे बड़ी पराजयों में से एक है. वहीं, कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) 140 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटों और 46.5 फीसद वोट शेयर के साथ शानदार जीत हासिल कर सत्ता के शिखर पर पहुंच गया. इस चुनाव में सबसे बड़ा बदलाव यह रहा कि अल्पसंख्यक समुदाय फिर से यूडीएफ और कांग्रेस की ओर लौट आए.

वोटों में 8.9 फीसद का यह झुकाव इतना बड़ा साबित हुआ कि वाम मोर्चा अपने मजबूत गढ़ों में भी हार गया. कांग्रेस ने कई वर्षों में अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन करते हुए 63 सीटें जीतीं. इसके बाद इंडियन यूनियन मु‌स्लिम लीग (आइयूएमएल) को 22 सीटें और केरल कांग्रेस (जोसफ गुट) को सात सीटें मिलीं. छोटे सहयोगियों और यूडीएफ समर्थित निर्दलीयों ने मिलकर 10 और सीटें जोड़ीं.

सेक्युलर दांव ने दिलाई जीत
अभी हाल तक विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे वी.डी. सतीशन ने इंडिया टुडे से कहा, ''पिछले पांच साल हमने 'टीम यूडीएफ’ की तरह काम किया. और आज उसका नतीजा मिल गया. जब मैंने कहा था कि हम 100 से ज्यादा सीटें जीतेंगे, तब मेरी पार्टी में भी बहुत-से लोगों को भरोसा नहीं था लेकिन मुझे पूरा विश्वास था.’’

सतीशन कहते हैं कि कांग्रेस ने चार मोर्चों पर खास फोकस किया—दूर हो चुके सहयोगियों को फिर साथ लाना, पिनाराई सरकार से नाराज तबकों को अपने पक्ष में करना, 2021 विधानसभा चुनाव की हार के बाद कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना और वाम मोर्चा सरकार की नाकामियों को उजागर करना.

दरअसल, 2021 में विधानसभा में विपक्ष का नेता बनने के बाद सतीशन लगातार सक्रिय रहे. कमजोर संगठन, चुनावी फंड की कमी और राज्य इकाई में गुटबाजी जैसी मुश्किलें थीं लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी मजबूत सेक्युलर छवि और किसी भी लड़ाई से पीछे न हटने का रवैया रहा, चाहे विधानसभा के भीतर वाम मोर्चे के खिलाफ हो या बाहर जाति और धर्म आधारित राजनीति करने वाले संगठनों के खिलाफ.

इसी सेक्युलर रुख ने उन्हें पिनाराई की कथित 'सॉफ्ट हिंदुत्व’ राजनीति पर हमला करने का मौका भी दिया, खासकर एझावा समुदाय के नेता वेल्लापल्ली नटेसन और नायर सर्विस सोसाइटी (एनएसएस) के प्रमुख जी. सुकुमारन नायर के साथ उनकी नजदीकियों को लेकर. कांग्रेस ने चुनाव में उतरे माकपा के छह बागियों का भी समर्थन किया, जिनमें से तीन ने बड़ी जीत दर्ज की.

हालांकि, इस भारी जीत के बाद कांग्रेस के भीतर नई खींचतान भी शुरू हो गई है. मुख्यमंत्री पद को लेकर फिलहाल तितरफा संघर्ष चल रहा है. पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के. सुधाकरन का गुट एआइसीसी महासचिव के.सी. वेणुगोपाल के समर्थन में जुटा है जबकि सतीशन समर्थक चाहते हैं कि उन्हें इनाम मिले. पूर्व नेता प्रतिपक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री रमेश चेन्नितला भी दावेदारी पेश कर चुके हैं. बताया जाता है कि उन्होंने अपनी मांगें कांग्रेस नेतृत्व के सामने रख दी हैं.

वेणुगोपाल गुट के नेताओं ने 5 मई को नई दिल्ली एयरपोर्ट पर फूल-मालाओं और ढोल-नगाड़ों के साथ उनका स्वागत किया. उनका दावा है कि वेणुगोपाल को 43 विधायकों के अलावा जीतकर आए माकपा बागियों का भी समर्थन हासिल है. दूसरी तरफ, सतीशन तिरुवनंतपुरम से एरणाकुलम साउथ रेलवे स्टेशन पर पहुंचे तो समर्थकों ने वहां उनके स्वागत के लिए बड़ा आयोजन किया. उधर, 22 विधायकों वाली आइयूएमएल उपमुख्यमंत्री पद की मांग कर रही है. केरल में सत्ता परिवर्तन की तैयारी के बीच कांग्रेस नेतृत्व के लिए सभी दावेदारों को संतुलित करना आसान न होगा.

माकपा की बढ़ती मुश्किलें
अभी तक केरल को भारत में वामपंथ का आखिरी मजबूत गढ़ माना जाता था और कन्नूर, जहां से विजयन आते हैं, उसका सबसे मजबूत किला था. माकपा नेतृत्व को लगातार तीसरी जीत का इतना भरोसा था कि किसी ने नहीं सोचा था कि यह किला भी ढह सकता है. आखिर, 2021 में पिनाराई ने ही तो कस्टम गोल्ड स्मगलिंग घोटाले के बावजूद, जिसकी आंच उनके दफ्तर और परिवार तक पहुंची थी, एलडीएफ को 99 सीटों तक पहुंचाकर उसकी ताकत बढ़ाई थी.

तिरुवनंतपुर में 4 मई को (बाएं से)कांग्रेस नेता शशि थरूर, रमेश चेन्नितला, के.सी. वेणुगोपाल, सतीशन और अन्य

लेकिन इस बार पिनाराई नतीजे नहीं दिला सके. चुनाव परिणामों ने माकपा को बुरी तरह झकझोर दिया. पार्टी सिर्फ 26 सीटों पर सिमट गई, जबकि पूरा वाम मोर्चा 35 सीटों तक ही पहुंच पाया. पिनाराई सरकार के 13 मंत्री चुनाव हार गए, जिनमें स्वास्थ्य मंत्री वीना जॉर्ज, उद्योग मंत्री पी. राजीव, उच्च शिक्षा मंत्री आर. बिंदु और परिवहन मंत्री के.बी. गणेश कुमार शामिल हैं. एलडीएफ की अहम सहयोगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) भी अंदरूनी असंतोष से जूझती रही. उसने 25 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ आठ सीटें जीत सकी.

खुद पिनाराई को भी कन्नूर के अपने गृह क्षेत्र धर्मडोम में कांग्रेस के अपेक्षाकृत कमजोर उम्मीदवार वी.पी. अब्दुल रशीद से कड़ी चुनौती मिली. मतगणना के शुरुआती सात राउंड में वे पीछे चल रहे थे और आखिरकार करीब 19,000 वोटों से जीत सके जबकि 2021 में उनकी जीत का अंतर 50,123 वोट था. यह साफ था कि माकपा समर्थकों का एक हिस्सा भी नेतृत्व से नाराज था. नाराजगी की वजहें नीतिगत फैसलों से लेकर भाई-भतीजावाद तक फैली थीं. खासकर कन्नूर के उन वरिष्ठ नेताओं की शिकायतों को नजरअंदाज करना, जिन्होंने यूडीएफ के समर्थन से निर्दलीय चुनाव लड़ा, पार्टी को अपने कई मजबूत गढ़ों में भारी पड़ा.

विश्लेषकों के मुताबिक, केरल में पिनाराई की शिकस्त के पीछे चार बड़े कारण रहे: पार्टी आयोजनों पर माकपा का जरूरत से ज्यादा खर्च; विरोध प्रदर्शनों के प्रति असंवेदनशील रवैया, खासकर वेतन वृद्धि की मांग कर रहे आशा कार्यकर्ताओं के आंदोलन के मामले में; सबरीमला सोना चोरी मामला और सत्ता विरोधी माहौल को समझने में विफलता.

भाकपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सी. ‌दिवाकरन कहते हैं, ''कोई सरकार काम करने में नाकाम हो सकती है, लेकिन उसमें इतनी उदारता होनी चाहिए कि वह अपनी गलतियां माने और उनकी वजह बताए.’’ वे यह भी कहते हैं, ''पिनाराई लोगों से कट गए थे. वे जनता का मूड समझने में नाकाम रहे.’’

चुनाव से ठीक पहले पार्टी के भीतर बड़े बागियों का उभरना भी माकपा के लिए बड़ा झटका साबित हुआ. माकपा के कन्नूर जिला सचिवालय के पूर्व सदस्य टी.के. गोविंदन ने तालिपरंबा सीट से पार्टी की ओर से राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन की पत्नी पी.के. श्यामला को उम्मीदवार बनाए जाने के विरोध में पार्टी छोड़ दी. कांग्रेस के समर्थन से चुनाव लड़कर गोविंदन ने यहां 12,000 से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की.

इसी तरह पय्यन्नूर में माकपा जिला सचिवालय सदस्य वी. कुन्हीकृष्णन ने शहीद फंड के कथित दुरुपयोग की जांच की मांग की, जिसमें पार्टी विधायक एम.आइ. मधुसूदनन का नाम जुड़ा था, और फिर पार्टी छोड़ दी. कुन्हीकृष्णन ने पय्यन्नूर सीट पर मधुसूदनन को 7 हजार वोटों से हरा दिया. अलप्पुझा के पास अंबालाप्पुझा में माकपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री जी. सुधाकरन ने भी पार्टी छोड़कर यूडीएफ के समर्थन से चुनाव लड़ा और 13,807 वोटों से जीत हासिल की. पय्यन्नूर और तालिपरंबा जैसे इलाकों को 'पार्टी के गांव’ माना जाता है. वहां माकपा बागियों की जीत और हजारों कैडर वोटों का खिसकना पार्टी के लिए बेहद कड़वा झटका साबित हुआ.

कन्नूर जिले की आठ सीटों पर जहां माकपा ने चुनाव लड़ा, वहां पार्टी को 2021 के मुकाबले करीब 84,000 वोटों का नुक्सान हुआ जबकि यूडीएफ को 2026 में 1,44,703 अतिरिक्त वोट मिले. कांग्रेस ने जिले की 11 में से पांच सीटें जीत लीं. गोविंदन कहते हैं, ''मैंने पार्टी मशीनरी के कामकाज को लेकर कई बार चेतावनी दी थी. लेकिन पार्टी नेतृत्व सुधार के लिए कदम उठाने को तैयार नहीं था.’’

दरअसल, पार्टी नेतृत्व के खिलाफ कैडर स्तर तक फैला यह असंतोष इतना गहरा था कि उसने एलडीएफ की उपलब्धियों—बेहतर प्रशासन, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर और वित्तीय संकट के बावजूद बड़े प्रोजेक्ट पूरे करने—को भी पीछे छोड़ दिया. मतदाता बदलाव के मूड में दिखे और एलडीएफ के विकास कार्यों की उपलब्धियां गिनाने का भी खास असर नहीं हुआ.

राजनैतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार संजीव रामचंद्रन कहते हैं, ''पिछले 10 साल में एलडीएफ सरकार ने केरल के लिए सबसे अच्छा काम किया. लेकिन लोगों ने सरकार का मूल्यांकन कुछ ऐसी नाकामियों के आधार पर किया, जिन्हें मीडिया ने जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया.’’

यूडीएफ ने शानदार प्रदर्शन करते हुए वायनाड, मलप्पुरम, एरणाकुलम, कोट्टयम और इडुक्की जिलों की सभी 47 सीटें जीत लीं. एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ नौकरशाह कहते हैं, ''मतदाताओं में वाम सरकार के खिलाफ नाराजगी थी. 'अगर लेफ्ट नहीं तो और कौन?’’ जैसा नारा नेतृत्व के अहंकार, जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास और मतदाताओं के प्रति उपेक्षा को दिखाता था.’’
माकपा की हार का असर राज्यसभा में उसकी ताकत पर भी पड़ेगा. पार्टी के तीन सदस्यों में से वी. शिवदासन और जॉन ब्रिटास अप्रैल 2027 में रिटायर होंगे, जबकि ए.ए. रहीम अप्रैल 2028 में रिटायर होंगे.

भाजपा को भी मिली कुछ बढ़त
भाजपा का वोट शेयर 2021 के 11.3 फीसद से बढ़कर 2026 में सिर्फ 11.4 फीसद हुआ, लेकिन पार्टी अपनी तीन सीटों की जीत से बेहद उत्साहित है—अब तक का उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन. राज्य भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने नेमोम सीट माकपा से वापस छीन ली जबकि पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री वी. मुरलीधरन और बी.बी. गोपकुमार ने क्रमश: कझकूट्टम और चतन्नूर जैसे वामपंथी गढ़ों में जीत दर्ज की.

मंजेश्वर सीट से हारे पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के. सुरेंद्रन कहते हैं, ''भाजपा केरल में एक बड़ी राजनैतिक ताकत बनने जा रही है. हम इस मंच का इस्तेमाल जनता के मुद्दे उठाने के लिए करेंगे.’’ हालांकि पार्टी नेतृत्व के सामने अभी काफी चुनौतियां हैं, लेकिन भाजपा ने अट्टिंगल, तिरुवल्ला, पलक्कड, मलमपुझा, मंजेश्वर और कासरगोड समेत छह सीटों पर दूसरे स्थान पर रहते हुए अपने वोट शेयर में मामूली बढ़त दर्ज की.

नई यूडीएफ सरकार के सामने कई प्रशासनिक चुनौतियां होंगी, खाली खजाना और चुनावी वादों को पूरा करना उनमें सबसे अहम है. घोषणापत्र में कॉलेज की छात्राओं के लिए हर महीने 1,000 रुपए स्टाइपेंड, परिवारों के लिए 25 लाख रुपए का हेल्थ कवर और 3,000 रुपए  मासिक सामाजिक पेंशन जैसे वादे किए गए हैं. इन्हें पूरा करने के लिए सरकार को वित्तीय प्रबंधन बेहद सावधानी से करना होगा.

एलडीएफ की हार से सबक लेते हुए नए मुख्यमंत्री को सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण और व्यक्तिपूजा की राजनीति से भी बचना होगा. साथ ही पार्टी के सभी नेताओं को जिम्मेदारी और कार्यकर्ताओं को उद्देश्य देना होगा. सबसे अहम बात, इतने बड़े जनादेश के बाद कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन के लिए जमीनी स्तर से मजबूत जुड़ाव बनाए रखना अनिवार्य होगा.

कांग्रेस ने चार बातों पर खास फोकस किया: दूर हो चुके सहयोगियों को फिर साथ लाना, एलडीएफ सरकार से नाराज तबकों को अपने पक्ष में करना, कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना और सरकार की नाकामियों को उजागर करना.

माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ की हार के मुख्य कारण रहे: पार्टी के आयोजनों में बढ़ती भव्यता, विरोध प्रदर्शनों के प्रति संवेदनहीन रवैया-खासकर आशा कार्यकर्ताओं के आंदोलन के मामले में, सबरीमला सोना चोरी मामला और व्यापक सत्ता विरोधी माहौल को समझने में उसकी नाकामी.

भाजपा के वोट शेयर में हालांकि मामूली-सी वृद्धि हुई. 2021 के 11.3 फीसदी के मुकाबले 2026 में उसे 11.4 फीसदी वोट मिले. लेकिन तीन सीटों—नेमोम, कझकूट्टम और चतन्नूर—पर मिली जीत उसे खासी सुकून देने वाली रही.

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