जरूरत अब एक नए सुरक्षा ढांचे की
हालात खासे अनिश्चितता भरे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इस अनिश्चितता को स्वीकार किया है लेकिन वे इसे एक 'मास्टर रणनीति' कहते हैं. मुझे यह 'अव्वल दर्जे की भूल' ज्यादा लगती है

प्र. ईरान जंग का कुवैत और खाड़ी क्षेत्र पर अब तक कितना गंभीर असर पड़ा है?
अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी. जंग करीब छह हफ्तों से जारी है और हम अभी-अभी दो हफ्तों के अस्थायी (और कोई कह सकता है कि नाजुक) जंगबंदी पर पहुंचे हैं. इसलिए पूरी तरह हालात का जायजा मुमकिन नहीं. लेकिन इसका असर सियासी, आर्थिक, सामाजिक और मनोबल जैसे कई मोर्चों पर साफ दिखाई दे रहा है.
सबसे साफ असर आर्थिक मोर्चे पर है, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने और सप्लाइ चेन टूटने से रुकावटें पैदा हुई हैं. इसके अलावा, अहम बुनियादी ढांचों पर सीधे हमले भी हुए हैं. उसकी चपेट में तेल-गैस रिफाइनरियां, बिजली संयंत्र, पानी साफ करने वाले डिसैलिनेशन प्लांट, कुवैत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और मंत्रालयों की सरकारी इमारतें और यहां तक कि रिहायशी इलाके भी आए हैं.
पुनर्निर्माण की जरूरतों का अनुमान लगाने के लिए पूरे नुक्सान का लेखा-जोखा जरूरी है. कई खाड़ी देशों को मिलाकर अरबों डॉलर के नुक्सान की बात हो रही है. अभी इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी. अच्छी बात यह है कि हमारे पास वित्तीय क्षमता और मजबूत संस्थागत आधार हैं. कुवैत ने 1990-91 में इराकी कब्जे के दौरान और उससे पहले ईरान-इराक युद्ध (1980-88) के दौरान इससे भी बदतर हालात देखे हैं, जब टैंकर जंग हुई. हम तब भी उससे उबर गए और हम फिर उबर जाएंगे.
• क्या इस जंग ने कुवैत की विकास योजनाओं को पटरी से उतार दिया है? जवाब में फौजी और आर्थिक दोनों मोर्चों पर कैसी प्रतिक्रिया दी गई है?
पहली प्राथमिकता अपनी जमीन की रक्षा करने की रही है, और इस मामले में कुवैत ने जबरदस्त काम किया है. इसका असर और भी भयावह हो सकता था लेकिन हमारी फौज ने काबिलियत और जुझारूपन दिखाया है. फौज ने पूरी हिम्मत के साथ कुवैत पर हुए 1,100 से ज्यादा अलग-अलग हमलों में से ज्यादातर को नाकाम कर दिया. हमले नाकाम करने की दर 90 फीसद से भी ज्यादा है. रोजमर्रा की जिंदगी अमूमन सामान्य रूप से ही चलती रही है. एहतियाती कदम समय रहते ही उठा लिए गए थे.
जैसे काम-धंधे और पढ़ाई-लिखाई को ज्यादातर ऑनलाइन कर दिया गया, कार्यस्थलों पर कर्मचारियों की मौजूदगी घटाई और आपात योजनाओं के बारे में साफ-साफ जानकारी दी गई. जहां तक विकास योजनाओं पर असर की बात है, तो अभी यह बताना जल्दबाजी होगी कि कितना नुक्सान झेलना पड़ेगा लेकिन कुछ नतीजे जरूर दिखेंगे. खासतौर पर रक्षा क्षेत्र को मजबूत करने और राष्ट्रीय हितों को बेहतर ढंग से पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय निवेश रणनीति के मामले में प्राथमिकताएं बदलेंगी. साथ ही, यह दौर रक्षा क्षेत्र में की गई हमारी पिछली साझेदारियों और निवेश के महत्व को भी साबित करता है.
खाड़ी देशों के लिए यह एक अहम मोड़ है. मौजूदा स्थिति न सिर्फ सुरक्षा, बल्कि आर्थिक प्राथमिकताओं और क्षेत्रीय संबंधों पर भी नए सिरे से सोचने पर मजबूर करती है. हमें ईरान, खाड़ी के बाकी देशों और बाहरी साझेदारों के साथ अपने रिश्तों पर नए सिरे से विचार करना है.
यह मौका हमें बड़ा सामूहिक क्षेत्रीय नजरिया अपनाने को भी प्रेरित करता है, जिसमें महाशक्तियों के साथ-साथ भारत और तुर्किए जैसी उभरती हुई मझोली शक्तियां भी शामिल हैं. मौजूदा स्थिति की अनिश्चितता को खासकर अमेरिका भी मानता है. राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इस अनिश्चितता को स्वीकार किया है, लेकिन वे इसे एक 'मास्टर रणनीति' कहते हैं. मुझे तो यह 'अव्वल दर्जे की भूल' ज्यादा लगती है.
• आप ट्रंप की रणनीति को अव्वल दर्जे की भूल क्यों कह रहे हैं?
क्योंकि इसका कोई साफ और सुनियोजित मकसद नहीं. अगर आप इज्राएल को देखें तो उसका मकसद साफ है. उसका मकसद समूचे क्षेत्र में ताकत का संतुलन बदलने के लिए सत्ता में उथल-पुथल या बदलाव लाना है. लेकिन अमेरिका का रुख बदलता रहा है. पहले, बात एटमी हथियारों की थी. फिर मिसाइलों की बात जुड़ गई. फिर नौसेना को तबाह करना, उसके बाद सत्ता बदलने की बात हुई. फिर उस रुख से पीछे हट गया. और फिर से न्यूक्लियर की बात होने लगी. जंग सिर्फ दांव-पेच नहीं होती है.
उसके लिए ऐसी पक्की रणनीति चाहिए, जिसका तय मकसद हो. भले ही अमेरिका न्यूक्लियर ठिकानों को नुकसान पहुंचाने में कामयाबी का दावा कर रहा हो फिर भी कुछ सवाल बने रहते हैं, जैसे कि संवर्धित यूरेनियम कहां है. इस बीच, ईरान थोड़े वक्त की जंगबंदी नहीं, पूरी तरह से लड़ाई खत्म करने की मांग कर रहा है. इसके लिए इस इलाके और दुनिया दोनों के अहम किरदारों के बीच गंभीर बातचीत की जरूरत है. यह सोच बिल्कुल सही है. यानी हमेशा के लिए हल ढूंढ़ना जरूरी है. हम लगातार लड़ाइयों के सिलसिले को जारी नहीं रख सकते.
• कुवैत के लिए इस जंग का स्वीकार्य हल क्या होगा?
कुवैत में कठिन पड़ोसियों से घिरे छोटा देश होने का एहसास है. हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत हमेशा से तनाव कम करना, शांति और स्थिरता रहा है. हमने बार-बार जंग का अनुभव किया है, हम उसकी कीमत जानते हैं. इसीलिए किसी भी हल में समस्याओं की जड़ तक पहुंचना जरूरी है, सिर्फ कुछ समय के लिए जंगबंदी काफी नहीं. हमें 360-डिग्री नजरिए की जरूरत है.
यह समझना जरूरी है कि ईरान दुनिया को कैसे देखता है और साथ ही यह भी तय करना है कि ईरान हमारे नजरिए को समझे. सिर्फ इसी आपसी समझ के जरिए ही असली समझौते हो सकते हैं.
कुछ अहम मुद्दे हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है. उनमें एक है प्रॉक्सी या मिलिशिया के जरिए पड़ोसी देशों के अंदरूनी मामलों में ईरान का दखल देना. फिर, यह तय करने की जरूरत है कि पूरे क्षेत्र में एटमी कार्यक्रमों का स्वरूप असैन्य मकसदों के लिए बना रहे. इज्राएल समेत सभी एटमी हथियार वाले देशों का रवैया भी पारदर्शी होना चाहिए. और हमें जहाजरानी की आजादी आश्वस्त करनी होगी, जिस पर इस जंग के दौरान खतरा मंडराया है.
ये कोई छोटे-मोटे मुद्दे नहीं हैं, ये मसले क्षेत्रीय स्थिरता के मूल में हैं. हमें एक नई सुरक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा. यह रातोरात नहीं होगा लेकिन इसकी शुरुआत समस्याओं की ईमानदारी से पहचान करने से होनी चाहिए, भले ही अलग-अलग देश उन्हें अलग-अलग तरह से परिभाषित करते हों. तभी कोई प्रगति हो सकती है.
• आप जिस 'नई सुरक्षा व्यवस्था' की बात कर रहे हैं, वह कैसी हो सकती है?
हम मौजूदा साझेदारियों को रातोरात खत्म करने की कोशिश नहीं कर रहे. खाड़ी देश इस तरह से काम नहीं करते हैं. अमेरिका महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है, लेकिन रक्षा साझेदारियों और सुरक्षा गारंटियों के बीच फर्क है. समय के साथ सुरक्षा गारंटियां कम भरोसेमंद होती गई हैं. राष्ट्रपति ओबामा के समय के 'ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन' (जेसीपीओए) से लेकर हाल की घटनाओं तक, सुरक्षा गारंटियों में खामियों की धारणा बनी है.
इसका मतलब दो बातें हैं: पहली, हमें अपनी साझेदारियों में विविधता लानी होगी. उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि हमें अपनी खुद की रक्षा क्षमताओं को विकसित करना होगा. इस क्षेत्र में इसकी मजबूत मिसालें मौजूद हैं. मसलन, तुर्किए, ईरान, भारत, पाकिस्तान—ये सभी अपने देश में ही रक्षा उद्योग विकसित कर रहे हैं. जंग का तरीका भी बदल रहा है, और हमें भी उसके मुताबिक ढलना होगा.
हम देख रहे हैं कि पहले से ही इस दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं, खासकर यूएई और सऊदी अरब जैसे देश स्थानीय रक्षा उत्पादन में भारी निवेश कर रहे हैं. खाड़ी क्षेत्र के पास काफी वित्तीय संसाधन हैं, जिनमें दुनिया के कुछ सबसे बड़े 'सॉवरेन वेल्थ फंड' भी शामिल हैं. इन संसाधनों को उन्नत तकनीकों—जैसे एआइ, रक्षा प्रणालियों और नवाचार—की ओर लगाया जाए तो कोई वजह नहीं कि हमारी क्षमताओं का बड़ा हिस्सा स्थानीय स्तर पर ही विकसित न किया जा सके. आखिरकार, आत्मनिर्भरता ही सुरक्षा का सबसे भरोसेमंद रूप है.
बदर मूसा अल-सैफ (कुवैत यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर तथा चैथम हाउस (ब्रिटेन) के अलावा अरब गल्फ स्टेट्स इंस्टीट्यूट (अमेरिका) के फेलो और कुवैत के एक पूर्व प्रधानमंत्री के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ रह चुके.)