घायल गल्फ
ईरान जंग में दो हफ्ते के नाजुक-से ठहराव के बीच समूचा खाड़ी क्षेत्र अब तक हो चुके नुक्सान का हिसाब और सुरक्षा संबंधी निर्भरताओं पर नए सिरे से विचार में जुटा है

अमेरिका-इज्राएल और ईरान जंग 39 दिन चलने के बाद 7 अप्रैल को प्रमुख पक्षों की ओर से दो हफ्ते की जंगबंदी का ऐलान हुआ. उसके बाद से मिसाइलों और ड्रोन की खौफनाक आवाजें कुछ थमती दिख रही हैं. यह रजामंदी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ''समूची सभ्यता'' को मिटा देने की धमकी की डेडलाइन खत्म होने के चंद घंटे पहले हुई.
बावजूद इसके, समूचे खाड़ी क्षेत्र में शायद कोई इस भुलावे में है कि यह तनाव भरा ठहराव टिकाऊ अमन में बदलेगा. पूरे इलाके में इतने बड़े पैमाने पर तबाही हाल की याददाश्त में लोगों ने कभी नहीं देखी थी. इससे खाड़ी देशों की कमजोरियां खुलकर सामने आ गईं, उसके आर्थिक इंजन के डैने टूटकर बिखर गए. करीने से बनाई गई स्थिरता की उसकी छवि ऐसी तार-तार हुई कि उसे दुरुस्त करने में वर्षों लग सकते हैं.
सऊदी अरब से लेकर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर से लेकर ओमान और समूचा बहरीन तथा कुवैत...खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के सभी छह देश एक जैसी अजब हकीकत से रू-ब-रू हुए कि जंग भले उनकी न हो मगर तबाही तो उनके जिम्मे है. एक विशेषज्ञ बेबाक कहते हैं कि जंग ने इन देशों में ''सुरक्षा और समृद्धि के वर्षों से करीने से किए गए निवेश को चौपट'' कर दिया. इसलिए यह जंगबंदी अंत नहीं, सिर्फ ठहराव है. इससे ऐसी खाड़ी का नजारा सामने आया है, जो जख्मी है, घबराई है और नए सिरे से सोच-विचार में जुटी है.
खाड़ी देशों को जंग की कीमत झेलनी पड़ रही है, तो उसकी वजह जख्मी ईरान की बेहद जोखिम भरी दोतरफा रणनीति है, जिसके जरिए उसने अमेरिका और इज्राएल की बड़ी पारंपरिक फौजी ताकत से लोहा लिया, अपनी हुकूमत को धराशाई होने से बचाया और अपनी एटमी तथा मिसाइल क्षमताओं को भी कायम रखा.
इस मामले में उसका पहला हथियार दुनिया की अर्थव्यवस्था की महाधमनी होर्मुज जलडमरूमध्य है, जिससे होकर दुनिया के कच्चे तेल का 25 फीसद और 20 फीसद तरल प्राकृतिक गैस के अलावा खाद, एल्युमिनियम और दूसरे अहम औद्योगिक कच्चे माल की खेप गुजरती है.
यह खासकर दक्षिणी और पूर्वी एशिया की ऊर्जा आवाजाही का बेहद अहम मार्ग है. सो, जंग के झटके फौरन दुनिया को दहलाने लगे: कच्चे तेल की कीमतें चढ़ीं, सप्लाइ चेन चरमराने लगी और बढ़ती आर्थिक परेशानियों से बड़ी ताकतें वॉशिंगटन से जंग खत्म करने की गुहार लगाने लगीं. ट्रंप ने जंग अंतरराष्ट्रीय समर्थन, यहां तक कि उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की भी सलाह लिए बिना शुरू किया था.
ईरान की दूसरी कामयाब रणनीति जंग में खाड़ी को खींच लाना था. उसने खाड़ी देशों पर आरोप लगाया कि उन्होंने अमेरिका की फौजी कार्रवाई के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल होने दिया. सही है कि अमेरिका कई दशक से जीसीसी देशों में अपनी पैठ बढ़ाता गया है. वहां उसके आठ बड़े फौजी ठिकाने, हवाई पट्टियां, नौसेना के बेड़े और लॉजिस्टिक कॉरिडोर के साथ 35,000 अमेरिकी फौजियों की तैनाती है.
जंग तेज हुई तो ईरान ने हमले का दायरा अमेरिका से जुड़ी संपत्तियों के अलावा तेल के इन्फ्रास्ट्रक्चर और उससे भी आगे बढ़कर खाड़ी में आम लोगों के ठिकानों पर भी निशाना साधा. इससे समूचा क्षेत्र बेहद जोखिम भरे बड़े मोर्चे में बदल गया.
जंग की कीमत
आर्थिक तबाही तो बेहिसाब है. खाड़ी का नुक्सान तो भारी-भरकम 200 अरब डॉलर (18.5 लाख करोड़ रुपए) तक हो सकता है. इसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर की तबाही, तेल-गैस की कमाई की बर्बादी, व्यापार ठप होने के अलावा रुका हुआ निवेश शामिल है. समूचे जीसीसी देशों की अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि दर का अनुमान जंग के पहले के 4.4 फीसद से घटाकर 3.1 फीसद कर दिया गया है. लेकिन बड़ी कीमत इन आंकड़ों से कहीं ज्यादा है.
पूरा क्षेत्र ऐतिहासिक उथल-पुथल के बीच से गुजर रहा था. सऊदी अरब, यूएई, कतर और ओमान की कोशिश अपनी निर्भरता हाइड्रोकॉर्बन या पेट्रोलियम उत्पादों से घटाकर खुद को विमानन, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स और सेवा क्षेत्र का हब बनाने की ओर थी. जंग ने उस अर्थव्यवस्था की बुनियाद ही हिला कर रख दी. लिहाजा, निवेशकों को स्थिरता के उनके मूल वादे की जमीन ही खिसक गई है.
खाड़ी देशों में जंग से मनोबल टूटने का सबसे ज्यादा असर यूएई में देखने को मिलता है. यूएई दशकों से खुद को ऐसी जन्नत की तरह पेश करने में लगा रहा है, जहां अपेक्षाकृत उदार माहौल में पूंजी, ऊर्जा, प्रतिभा और महत्वाकांक्षाओं का संगम है और समृद्घि बहती है. जंग के दौरान यूएई ने ही करीब 550 मिसाइलों और 2,200 से ज्यादा ड्रोन को इंटरसेप्ट किया. मिसाइलों के मलबे, अवरुद्ध उड़ानें, सैलानियों की घटती संख्या और टूटे निवेशकों के भरोसे से उसकी ''सुरक्षित जन्नत'' की छवि पर सवाल खड़े हो गए हैं.
जंग के इस नजारे में चुपचाप एक संकट आकार ले रहा है. मसलन, शिपिंग रूट ठप होने से नौकरी गंवा बैठे दुबई में रहने वाले एक भारतीय आप्रवासी ने बताया, ''आप यह जिंदगी छोड़कर भाग तो नहीं सकते. लेकिन आप यह भी नहीं जानते कि अगले ही पल क्या होने वाला है.'' यह खाड़ी की इंसानी त्रासदी है, लाखों आप्रवासी स्थिरता और अनिश्चितता के बीच झूल रहे हैं.
वाकई, भारत के लिए खाड़ी की स्थिरता के दांव काफी ऊंचे हैं, और जंग के झटके बेहद तगड़े. उसके लिए खाड़ी सिर्फ ऊर्जा का ही बड़ा स्रोत नहीं, बल्कि जीवन-रेखा की तरह है. होर्मुज के रास्ते से भारत 30 फीसद कच्चे तेल का आयात करता है लेकिन करीब एक करोड़ भारतीय आप्रवासी भी खाड़ी में रहते और कामकाज करते हैं. उनसे सालाना 51.5 अरब डॉलर (4.7 लाख करोड़ रुपए) की विदेशी मुद्रा आती है, जो देश में आप्रवासियों से आने वाली कुल रकम 135.5 अरब डॉलर (12.5 लाख करोड़ रुपए) का एक-तिहाई है. वायु मार्ग बंद है, शिपिंग आवाजाही धीमी है, बीमा की रकम बढ़ रही है. ऐसे में भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव है. ऊर्जा की कीमतें, ढुलाई का खर्च, जहाजों के रूट, वित्तीय बाजार और रुपए की कीमत सब उसके लिए मुश्किल का सबब है.
खाड़ी सहयोग परिषद यानी जीसीसी की इकाई
इस जंग की सबसे मार्के की बात है खाड़ी देशों की अपनी प्रतिक्रिया. निशाना झेलने के बावजूद इन सभी ने मोटे तौर पर जवाबी हमले से संयम बरता. मसलन, सऊदी अरब ने अपने आर्थिक इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बार-बार मिसाइल और ड्रोन हमले झेले. लेकिन जवाबी हमले के बदले उसने कामकाज जारी रखने, तेल का प्रवाह बनाए रखने पर फोकस किया.
उसके बाजार स्थिर बने रहे और जंग के हालात में इजाफे पर अंकुश बनाए रखा. दशकों पहले बने उसके ईस्ट-वेस्ट पेट्रोलाइन के रास्ते होर्मुज से परे निर्यात जारी रखा. उसने दूरदर्शिता और संयम दिखाया. यूएई में भी सरकार की कोशिश नकदी मदद, कारोबारी राहत और लोगों तक पहुंच बनाकर स्थिरता कायम रखने की थी.
जंग से खाड़ी की कमजोर कड़ियां खुल गईं, लेकिन नए सोच-विचार भी शुरू हो गए. ओमान ने चुपचाप और गंभीरता से एक वैकल्पिक भविष्य की ओर इशारा किया. उसकी पेशकश कुछ ज्यादा ही सीधी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर दुनिया की निर्भरता घटाई जाए. दुक्म और सलालाह जैसे ओमानी बंदरगाह होर्मुज के बाहर हैं और सीधे हिंद महासागर में खुलते हैं, इसलिए ये दोनों ऊर्जा और व्यापार का वैकल्पिक रास्ता हो सकते हैं.
पाइपलाइन, रेलवे और लॉजिस्टिक कॉरिडोर के जरिए खाड़ी के उत्पादक इन बंदरगाहों तक पहुंच सकते हैं और संकरे रास्ते से बच सकते हैं. लेकिन यह सिर्फ क्षेत्रीय प्रोजेक्ट नहीं है. इसमें वैश्विक भागीदारी और भारी-भरकम रकम की दरकार है. भारत, चीन और जापान जैसे देशों की अर्थव्यवस्था खाड़ी की ऊर्जा पर बहुत ज्यादा निर्भर है, इसलिए उन्हें ऐसे इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश और उसका समर्थन करना होगा.
यह लंबे समय का समाधान है. लेकिन जंग ने एक बात तो साफ कर दी है कि पुराना मॉडल बेमानी हो चुका है. सभी छह खाड़ी देशों में एक रणनीतिक मकसद पर काफी फोकस है कि ईरान पर काबू पाया जाना चाहिए. हुकूमत बदलने की बजाए ऐसा कुछ किया जाए जिससे वह मिलिशिया, मिसाइल या एटमी क्षमता केजरिए पड़ोसियों का नुक्सान करने के काबिल न रहे. यही नहीं, वह ऊर्जा इन्फ्रास्ट्रक्चर या अहम जहाजरानी मार्गों में रुकावट भी न डाल पाए.
हालांकि यह मकसद कैसे सधे, इस पर कई तरह की पेचीदगियां हैं. जैसा कि उस इलाके के सात विशेषज्ञों के आकलन से जाहिर होता है, जिनके स्तंभ अगले पन्नों पर हैं. कूटनीति ही सबसे पसंदीदा रास्ता है. ओमान से लेकर पाकिस्तान और चीन तक की मध्यस्थता की पहल तनाव में इजाफे को घटाने के लिए सामूहिक कोशिशें हैं. उनका मानना है कि बल प्रयोग आखिरी रास्ता होना चाहिए, न कि पहला, जैसा कि ट्रंप ने किया.
फिर भी, इस पसंदीदा पहल के पीछे एक कठोर हकीकत है. ईरान आम पारंपरिक देश नहीं है. कट्टर विचाराधारा वाले उसके फ्रेमवर्क और शहादत देने की मजहबी रवायत पारंपरिक प्रतिरोधात्मक उपायों के इस्तेमाल को पेचीदा बना देते हैं. यह एहसास भी घना होता जा रहा है कि कमजोर और बदले की आग में झुलसता ईरान स्थिर और सामान्य परिस्थितियों वाले ईरान से ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है.
दुविधा की इतनी गहरी खाई
यही खाड़ी की केंद्रीय दुविधा है: ईरान पर काबू पाया जाए लेकिन उसे बेकाबू होने की हद तक अस्थिर न किया जाए. इस समीकरण को दूसरी समानांतर बेचैनी काफी पेचीदा बना देती है, जिसके बारे में खुलकर बात नहीं की जाती मगर गहरे महसूस किया जाता है. वह है बेकाबू इज्राएल, जो अपने हाल के फौजी अभियानों और गजा में बर्बर बलप्रयोग से क्षेत्रीय ताकत की तरह उभर रहा है.
गजा में तबाही की तस्वीरों से समूचे अरब जगत में लोगों के गुस्से का पारा चढ़ गया है, जिससे उनकी सरकारों की परेशानी बढ़ गई है. इसलिए वे अमेरिका से रणनीतिक रिश्ते भले संजोए रखें और इज्राएल से गुपचुप सुरक्षा समझदारी भी बना लें लेकिन वे अपने लोगों को नाराज करने वाली कार्रवाइयों में मिलीभगत करते नहीं दिख सकते.
ऐसी तलवार की धार पर चलने के लिए बेहद बारीक हुनर की दरकार है. खाड़ी के देश शायद बहुस्तरीय कूटनीति अपनाएं. मसलन, अपने हितों को ध्यान में रखकर ईरान से रिश्ते कायम करें, जबकि अमेरिका से जुड़े रहें, ताकि क्षेत्रीय सुरक्षा का ढांचा पूरी तरह इज्राएल के पक्ष में न झुक जाए. साथ ही वे शायद चीन, रूस, यूरोप और भारत जैसी बड़ी और मझोली ताकतों से भी व्यापक समझौतों के जरिए संतुलन बनाने की कोशिश करें, ताकि किसी एक धुरी पर निर्भर न रहना पड़े और हर खेमे के साथ रिश्ते सहज रहें.
तनाव में इजाफे को घटाने पर भी लगातार जोर बढ़ रहा है. बैकचैनल बातचीत, आपात हॉटलाइन और भरोसा बहाली उपायों का दौर जारी है, ताकि खींचतान और तनाव को बड़े टकराव में तब्दील होने से रोका जा सके और पिछले छह हफ्ते के हमलों के खतरनाक होड़ से बचा जा सके. सबसे अहम यह है कि खाड़ी देश आपसी आर्थिक निर्भरता और क्षेत्रीय एकजुटता पर फोकस जारी रखेंगे. इसके लिए वे व्यापार, ऊर्जा सहयोग और इन्फ्रास्ट्रक्चर जुड़ाव को स्थिरता के मानक की तरह इस्तेमाल करेंगे. हमारे विशेषज्ञों की राय का कोई एक निष्कर्ष है तो यही कि खाड़ी इस टकराव से बिना बदलाव के ज्यों की त्यों नहीं बनी रहेगी.
फिलहाल फौरी अनिश्चितताएं अनसुलझी बनी रहेंगी. मसलन, क्या होर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहेगा? क्या ईरान को वैश्विक ऊर्जा प्रवाह में बढ़त हासिल हो जाएगी? या टकराव का हल लंबे समय तक बनी रहने वाली रुकावटों के रूप में निकलेगा? एक विशेषज्ञ इसे एकदम साफगोई से रखते हैं: इस जंग का कोई विजेता नहीं, सिर्फ नुक्सान के अलग-अलग दायरे हैं. फिलहाल ड्रोन थम गए हैं मगर खाड़ी जख्मी है. इस ठहराव से अमन की राह खुलेगी या यह अगली जंग की महज पृष्ठभूमि साबित होगा, इसी से इस क्षेत्र का ही नहीं, दुनिया का भविष्य तय होगा.
जीसीसी है क्या?
खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) पश्चिम एशिया के छह देशों सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन का सियासी-आर्थिक गठजोड़ है. गठन 1981 में हुआ और साझा मकसद तथा अरब-इस्लामी संस्कृति के आधार पर सहयोग का मंच है. इन देशों के पास दुनिया में कुल भंडार का 32.6% कच्चा तेल है. इसके अलावा, 22% वैश्विक तेल आपूर्ति में जीसीसी की हिस्सेदारी है.