जंग के बीच शांति की पहल

क्षेत्रीय स्थिरता और स्थायी शांति के लिए किसी भी तरह के समझौते में खाड़ी मुल्कों को उसका अहम हिस्सा होना जरूरी है. वे ही हैं जिनकी आर्थिकी और सुरक्षा को इस तरह की जंग ने पूरी तरह से उघाड़कर रख दिया है.

न्यूयॉर्क के जेएफके एयरपोर्ट पर 2 मार्च को खड़े कतर एअरवेज के पैसेंजर जेट

 

अमेरिका, इज्राएल और ईरान के बीच तनाव की जड़ें ईरान की 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद के हालात में खोजी जा सकती हैं, जिसने इस लंबे और विकसित होते टकराव के बीज बोए. समय के साथ यह झगड़ा मोटे तौर पर परोक्ष टकरावों और रणनीतिक दांवपेचों के जरिए सामने आया और धीरे-धीरे पश्चिम एशिया की भूराजनीतिक चाल-ढाल को गढ़ने वाली केंद्रीय ताकत की शक्ल में उभरा. शुरुआत में जो सीमा के भीतर नियंत्रित विवाद मालूम देता था, वह बढ़कर ऐसा पेचीदा संघर्ष बन गया जिसके क्षेत्रीय स्थिरता और व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहे हैं.

लंबे वक्त से चले आ रहे इस टकराव के सबसे अहम नतीजों में से एक यह रहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून का शासन धीरे-धीरे छिन्न-भिन्न होता गया और दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्थापित वैश्विक व्यवस्था कमजोर पड़ गई. बहुपक्षीय संस्थाओं में किसी देश के व्यवहार को नियंत्रित करने वाले ढांचों पर विश्वास लगातार कम होता गया. गजा, यूक्रेन, लेबनान, सीरिया, सूडान और ईरान समेत टकराव के कई सारे क्षेत्रों में एक बदलाव साफ दिखाई देता है जिसमें विवाद के समाधान के प्राथमिक औजार के तौर पर और अक्सर कूटनीति की कीमत पर सैन्य ताकत का इस्तेमाल किया जा रहा है.

स्कूलों और अस्पतालों समेत असैन्य बुनियादी ढांचे पर हमले एक सामान्य बात बन जाना और इसी के साथ नरसंहार तथा देशों की संप्रभुता के उल्लंघन की बढ़ती प्रवृत्ति क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता के लिए विनाशकारी खतरा पैदा कर रही है. इस रुझान से उस ज्यादा बड़े बदलाव की झलक मिलती है जिसमें सत्ता का गणित स्थापित कानूनी मानदंडों पर हावी हो जाता है और अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने का दायित्व निभाने वाली वैश्विक संस्थाओं के अधिकार और विश्वसनीयता को खोखला करता है.

इस युद्ध में सीधे शामिल न होते हुए भी खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देश अपनी भूराजनीतिक नजदीकी और रणनीतिक अहमियत की वजह से बहुत नाजुक स्थिति में रहे हैं. तेल, प्राकृतिक गैस और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के बड़े निर्यातक होने के नाते उनकी आर्थिक स्थिरता क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ गहराई से बंधी है. इन देशों ने लड़ाई बढ़ाने के खिलाफ लगातार आगाह किया. अपने भूभाग का सैन्य कार्रवाइयों के लिए इस्तेमाल होने देने से उनका इनकार तटस्थता की उनकी सोची-समझी नीति और लड़ाई कम करने की दोटूक प्राथमिकता को साफ दिखाता है.

संप्रभुता को प्राथमिकता
इस ज्यादा बड़े परिप्रेक्ष्य में कतर ने टकराव के समाधान के एकमात्र व्यावहारिक साधन के तौर पर संवाद और कूटनीतिक बातचीत की वकालत करने का रुख लगातार बनाए रखा है. शुरुआत से ही उसने संयम बरतने का आह्वान किया और इलाके को अस्थिर करने वाले कदमों के खिलाफ आगाह किया. मगर 9 सितंबर, 2025 को इज्राएल की ओर से किए गए हमलों और नागरिक तथा ऊर्जा के बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर किए जा रहे ईरान के मौजूदा हमलों ने मध्यस्थ के तौर पर उसकी काम करने की क्षमता को कुंद कर दिया.

इन घटनाक्रमों की वजह से रणनीतिक बदलाव जरूरी हो गया. इसमें राष्ट्रीय संप्रभुता और अपनी आबादी की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखते हुए युद्ध खत्म करने की कूटनीतिक पहलकदमियों को समर्थन देना जारी रखा गया. हालांकि ईरान के हमलों की वजह से गैस के उत्पादन और निर्यात को रोक देना पड़ा, फिर भी शांति के लिए मध्यस्थता की कतर की कूटनीतिक क्षमता का अंतरराष्ट्रीय मंच पर असर पूरी तरह कायम है.

इन चुनौतियों के बावजूद कतर ने घरेलू स्थिरता और सुरक्षा का ऊंचा स्तर बनाए रखा है. बड़े पैमाने पर हमलों को बीच में ही नाकाम कर दिया गया. इससे रोजमर्रा की जिंदगी और जरूरी सेवाओं का सिलसिला बना रहा. साथ ही देश ने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपनी संप्रभुता के उल्लंघन का जवाब देने के अधिकार को फिर से दोहराया. लेकिन ऐसे हमलों के नतीजे फौरी सुरक्षा चिंताओं से कहीं आगे जाते हैं क्योंकि ऊर्जा उत्पादन और निर्यात में आई रुकावटें वैश्विक बाजारों के लिए जोखिम और भरोसेमंद ऊर्जा सप्लायर के तौर पर कतर की भूमिका के लिए चुनौती पैदा करती हैं.

इतना ही नहीं, ऐसी रुकावटें देश के मानवीय और विकास सहायता कार्यक्रमों में खलल का खतरा भी पैदा करती हैं, खासकर जब यह कार्यक्रम सूडान, सीरिया, गजा और अफगानिस्तान समेत कई देशों में लड़ाई से प्रभावित आबादी को बेहद अहम सहायता मुहैया कराते हैं.

इस संघर्ष का सबसे चिंताजनक पहलू नागरिक बुनियादी ढांचे को जानबूझकर निशाना बनाया जाना है, जिनमें बिजली के संयंत्र, जल सुविधाएं और बेहद अहम ऊर्जा प्रतिष्ठान शामिल हैं. ऐसी कार्रवाइयां अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदों का उल्लंघन हैं और इनसे लंबे वक्त के आर्थिक और पर्यावरण से जुड़े नतीजे जोखिम में पड़ जाते हैं. एटमी संयंत्रों पर हमलों की संभावना इन जोखिमों को और कई गुना बढ़ा देती है, जिसके नतीजतन खाड़ी में रेडियोधर्मी विकिरण फैलने के अलावा पर्यावरण को खासा नुक्सान पहुंच सकता है.

ये खतरे अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन और सैन्य संयम बरतने की तत्काल जरूरत को रेखांकित करते हैं. इन उल्लंघनों के जवाब में कतर ने कूटनीति का सहारा लिया, जिनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शिकायत करना और संयुक्त राष्ट्र महासचिव के साथ सीधे बातचीत करना शामिल है. इन कदमों से अंतरराष्ट्रीय कानून और सांस्थानिक प्रक्रियाओं के प्रति प्रतिबद्धता की झलक मिलती है, एक ऐसे वक्त में भी जब ऐसे सिस्टम की प्रभावशीलता चुनौतियों से घिरी है. अमेरिका, इज्राएल और ईरान के बीच चल रहा टकराव अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का बेहद अहम इम्तिहान है.

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जलडमरूमध्य की सुरक्षा

अब इस समय दुनिया भर की चिंताओं के केंद्र में है होर्मुज जलडमरूमध्य, जो तमाम देशों के लिए रणनीतिक तौर पर अहम समुद्री अवरोध बिंदुओं में से एक और ऊर्जा तथा व्यापार का बेहद अहम समुद्री रास्ता है. आंकड़ों के मुताबिक, करीब 30,000 जहाज हर साल इस जलडमरूमध्य से गुजरते हैं, जो दुनिया के समुद्री रास्ते से आने वाले तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का करीब पांचवां हिस्सा ढोते हैं.

साथ ही उर्वरकों के लिए यूरिया, औद्योगिक संसाधन के लिए सल्फर और सेमीकंडक्टरों के उत्पादन के लिए हीलियम सरीखी प्रमुख सामग्रियां भी पहुंचाते हैं. इस बेहद अहम गलियारे में रुकावट का दुनिया भर की सप्लाइ चेन पर गहरा असर पड़ा, जिसकी चपेट में कृषि और मैन्युफैक्चरिंग से लेकर उन्नत टेक्नोलॉजी तक आ गए.

इन जोखिमों को पहचानकर दुनिया भर के देशों ने होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आवाजाही की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक सुरक्षा ढांचों की जरूरत पर और ज्यादा जोर दिया है. हाल की अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं से इस बात को बल मिला है कि इसका सुरक्षित रहना ऊर्जा की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ी वैश्विक अनिवार्यता है. इसे हासिल करने के लिए सभी स्टेकहोल्डर्स और खासकर किसी भी रुकावट के फौरन नतीजे भुगतने वाले खाड़ी के देशों के बीच पूरे तालमेल और आम राय से कोशिश करने की जरूरत है.

दुनिया भर में फैली घबराहट और फिक्र के लंबे दौर के बाद हासिल संघर्षविराम एक दुर्लभ और बेहद निर्णायक मौका है. इसे कतई गंवाया नहीं जाना चाहिए. यह टिकाऊ शांति और होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थायी सुरक्षा की तरफ जाने का रास्ता सुझाता है. फिर भी इस संकट ने एक ज्यादा गहरी कमजोरी को उघाड़कर रख दिया है और वह है इस बेहद अहम समुद्री रास्ते में भविष्य में आने वाले व्यवधानों को रोकने के लिए मजबूत और अंतरराष्ट्रीय तालमेल के साथ काम करने वाले ढांचे का न होना.

इस नाजुक-से विराम को टिकाऊ स्थिरता में बदलने की किसी भी संजीदा कोशिश को तनाव कम करने के फौरी उपायों से आगे जाना होगा. इसके लिए व्यापक और बहुपक्षीय नजरिए की जरूरत है जो जलडमरूमध्य की रणनीतिक अहमियत और उसकी सुरक्षा की साझा जिम्मेदारी दोनों को पहचाने और स्वीकार करे. यह भी अहम है कि खाड़ी के वे देश, जिनका इस टकराव में दूर-दूर तक कोई हाथ न था, आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े नतीजे सबसे ज्यादा खतरे झेल रहे हैं. उन्हें इस बारे में होने वाले किसी भी समझौते का अभिन्न अंग होना चाहिए. उन्हें बाहर रखना न केवल ऐसे समझौतों की वैधता को खोखला कर देगा बल्कि उनके लंबे वक्त में कामयाब होने की संभावना को भी कमजोर करेगा.

ऐसे में टिकाऊ शांति दरअसल समावेशिता, दूरदर्शिता, और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर टिकी है. इसके बिना मौजूदा शांति अगले संकट से पहले महज छोटा-सा अंतराल बन जाने के जोखिम से घिरी है. कतर और उसके खाड़ी के साझेदारों के लिए आगे का रास्ता आर्थिक लचीलेपन और कूटनीतिक बातचीत के साथ सुरक्षा की अनिवार्यताओं का संतुलन बिठाने में निहित है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए बहुपक्षीय व्यवस्थाओं में विश्वास बहाल करना और टकराव को बढ़ने देने से रोकना सर्वोपरि होना चाहिए. इससे पहले कि नतीजे बेकाबू हो जाएं, टिकाऊ रास्ता कूटनीति के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता, अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन और वैश्विक स्थिरता पर निर्भर करता है. 

डॉ. खालिद मुबारक अल-शफी, (प्रधान संपादक, द पेनिनसुला अखबार और मास कम्युनिकेशन के प्रोफेसर)

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