खाड़ी में संग्राम बाजार में कोहराम

तेल की बढ़ती कीमतों, भू-राजनीति की लगातार अनिश्चित स्थिति और विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली से भारतीय शेयर बाजार औंधे मुंह गिरे

शेयर बाजारः बाजार में हाहाकार

कहते हैं कि बाजार युद्ध से नहीं, अनिश्चितता से नफरत करते हैं. लेकिन जब जंग छिड़ती है तो बाजार भी उसकी मार से अछूते नहीं रह पाते. भारतीय शेयर बाजार भी इससे जुदा नहीं रहे. 28 फरवरी को जब अमेरिका और इज्राएल ने ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ा और 23 मार्च को जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पांच दिन के लिए हमले रोकने की घोषणा की, तो इस अवधि में बीएसई सेंसेक्स 11.6 फीसदी लुढ़का.

इस दौरान तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआइ) की भारी निकासी के कारण भारत में निवेशकों के हाथ से 48 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा निकल गए. 19 मार्च को जब हमले थमने के कोई संकेत नहीं दिख रहे थे, बीएसई सेंसेक्स 2,497 अंक (3.26 फीसद) गिरकर 74,207 पर पहुंच गया.

इस भारी गिरावट की वजह दुनिया भर में शेयरों की बिकवाली, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी निवेशकों की निकासी थी, जिससे बाजार पूंजीकरण से 11.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम साफ हो गई.

तेईस मार्च को बाजार और ज्यादा लुढ़के क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट खोलने के लिए ईरान को ट्रंप का पहले दिया गया 48 घंटे का अल्टीमेटम खत्म हो रहा था. ईरान ने कहा कि वह इसका मुंहतोड़ जवाब देगा और जीसीसी (खाड़ी सहयोग परिषद) क्षेत्र में ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाएगा. इस तनाव ने सेंसेक्स को 1,836 अंक या 2.46 फीसदी और नीचे पहुंचा दिया जबकि निफ्टी 50 602 अंक या 2.6 फीसद लुढ़क गया.

बाद में उसी दिन ट्रंप ने अमेरिकी सेना को निर्देश दिया कि ईरानी ऊर्जा ढांचों पर पांच दिन तक कोई हमला न किया जाए. इससे 24 मार्च को बाजार का मूड 1,372 अंक सुधर गया. ट्रंप के ऐलान के बाद 23 मार्च को ब्रेंट क्रूड की कीमतें 6 फीसदी गिरकर 106 डॉलर प्रति बैरल हो गईं. हालात और सुधरने की उम्मीद है क्योंकि ईरान ने संयुक्त राष्ट्र को बताया है कि वह होर्मज जलडमरूमध्य से उन देशों के जहाजों को निकलने देगा जो दुश्मन देशों के नहीं हैं.

विमानन, बैंकिंग, ऊर्जा, मैन्युफैक्चरिंग और उपभोक्ता सामान, इन्फ्रास्ट्रक्चर और कैपिटल गुड्स जैसे सेक्टरों में बिकवाली का सबसे ज्यादा दबाव देखा गया. विमानन क्षेत्र पर एटीएफ (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) की ऊंची कीमतों और युद्ध के कारण पैदा हुए हालात दोनों का असर पड़ा. बीपीसीएल, एचपीसीएल और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन जैसी तेल मार्केटिंग कंपनियों ने भी मार झेली क्योंकि वे कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाल सकीं.

प्रीमियम पेट्रोल के दाम में 2 रुपए प्रति लीटर और औद्योगिक डीजल में 22 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी के अलावा, केंद्र ने खुदरा ईंधन की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया. पेंट, रसायन और सीमेंट जैसे आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर उद्योग भी इसकी चपेट में आए. लार्सन ऐंड टुब्रो जैसी कैपिटल गुड्स कंपनियों की बड़ी मैन्युफैक्चरिंग सुविधाओं को प्राकृतिक गैस की कमी के कारण चोट पहुंची. 

विश्लेषक शेयर बाजारों की उथल-पुथल की तुलना कोविड-19 के शुरुआती दिनों के हालात से कर रहे हैं, जब निवेशकों की लाखों करोड़ रु. की संपत्ति को वायरस लग गया था. कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी के प्रबंध निदेशक और सीईओ नीलेश शाह कहते हैं, ''भारत के लिए यह एक 'परफेक्ट स्टॉर्म' (कई मुश्किलों का एक साथ आना) है. पश्चिम एशिया में 90 लाख से ज्यादा भारतीय रहते हैं और निश्चित रूप से उनकी सुरक्षा चिंता का सबब है.

भारत को 'भुगतान संतुलन' बनाए रखने के लिए उनकी ओर से भेजे जाने वाले अरबों डॉलर की जरूरत होती है. पश्चिम एशिया में तेल की सप्लाइ और उसकी कीमतें भी बड़ी चुनौती रही हैं.'' इनपुट लागत बढ़ने और नेचुरल गैस की सप्लाइ में कमी से प्रभावित कंपनियों की कमाई पर इसका असर पड़ेगा. इस बीच, युद्ध के कारण महंगाई बढ़ने से ब्याज दरों पर दबाव पड़ेगा.

नोमुरा के एक रिसर्च नोट के मुताबिक, पिछले एक दशक में दो मौकों पर—2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान और 2022 में रूस-यूक्रेन जंग शुरू होने के समय—बाजार में इतनी तेज गिरावट दर्ज की गई थी. ''कीमत और आय (पी/ई) का अनुपात या बॉन्ड से कमाई के मुकाबले बाजार का मूल्यांकन पिछले चार सालों के औसत मूल्यांकन के निचले स्तर पर है.

आगे भी बाजार में 5 फीसद की और गिरावट (रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान जैसी) के आसार हैं, जिसमें 'स्मॉल-कैप' और 'मिड-कैप' शेयरों पर ज्यादा जोखिम रहेगा.'' नोमुरा ने कहा कि बाजार में आई यह तेज गिरावट लंबी अवधि के नजरिए से शेयर खरीदने का मौका मुहैया कराती है.

उतार-चढ़ाव के बीच
इस साल भारतीय शेयर बाजारों में अब तक काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. शाह कहते हैं, ''निवेशकों को इस तूफान के थमने का इंतजार करना होगा. हो सकता है इतना भी बुरा हाल न हो. हमारे पास 700 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है. हमने रणनीतिक तेल भंडार भी बनाए हैं. हमारी नाव तूफान में हिचकोले तो खाएगी लेकिन डूबेगी नहीं.''

उनका मानना है कि युद्ध खत्म होने से पहले ही बाजार सबसे निचले स्तर पर पहुंच जाएंगे. भारत पहले भी ऐसी स्थिति का सामना कर चुका है: करगिल और खाड़ी युद्धों के दौरान. होर्मुज का रास्ता खुलने से तेल के दाम स्थिर होने में मदद मिलेगी और फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार आना शुरू हो जाएगा. खुदरा निवेशकों के लिए सलाह है कि लार्ज-कैप और मिड-कैप शेयरों में निवेश बनाए रखें; ज्यादा आक्रामक दांव न लगाएं. 

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