कराह उठे कारखाने
जंग की वजह से गैस की कमी, महंगी ढुलाई और अटके निर्यात से देश के सूक्ष्म, छोटे और मझोले उद्योगों पर भारी मार पड़ रही

यह रुकावट दिल्ली के निर्यातक पंकज बंसल के लिए बहुत भारी पड़ी है. बंसल पश्चिम एशिया, अमेरिका और यूरोप में इंजीनियरिंग और खेती से जुड़े सामान भेजते हैं. उनके देखते-देखते युद्ध सरचार्ज की वजह से ढुलाई का खर्च कई गुना बढ़ गया है. एक कंटेनर दुबई भेजने का खर्च 150 डॉलर (14,000 रुपए) से बढ़कर 2,500 डॉलर (2.35 लाख रुपए) हो गया है. रेफ्रिजरेटेड कार्गो से सामान भेजने पर खर्च 900 डॉलर (84,000 रुपए) से बढ़कर पूरे 7,000 डॉलर (6.58 लाख रुपए) हो गया है. वे कहते हैं, ''ढुलाई खर्च बढ़ने से पश्चिम एशिया और अमेरिका तक के खरीदार ऑर्डर रद्द कर रहे हैं या बाद में भेजने को कह रहे हैं.''
बंसल की यह मुश्किल एक बड़े झटके का शुरुआती संकेत है. पश्चिम एशिया में जारी जंग से देश के मैन्युफैक्चरिंग तंत्र पर बड़ी मार पडऩे जा रही है. इसकी सबसे ज्यादा चपत सिरेमिक और फाउंड्री से लेकर प्लास्टिक और कपड़ों तक के छोटे कारोबार पर लग रही है. उनमें उत्पादन कटौती, सप्लाइ में अड़चन और कारोबार बंद होने के शुरुआती संकेत अभी से दिखाई देने लगे हैं.
करीब 53,000 करोड़ रुपए कारोबार वाला सिरेमिक टाइल्स उद्योग उत्पादन के लिए काफी हद तक प्रोपेन और प्राकृतिक गैस पर निर्भर है. मोरबी सिरेमिक एसोसिएशन (वॉल टाइल्स शाखा) के प्रेसिडेंट हरेश बोपालिया कहते हैं, ''अभी गुजरात के मोरबी में 750 एमएसएमई (कुटीर, लघु और मझोले उद्यम) कारखानों में एलपीजी से चलने वाली करीब 400 इकाइयां बंद हो गई हैं. मोरबी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टाइल क्लस्टर है.'' वे बताते हैं कि प्राकृतिक गैस पाइपलाइन से चलने वाली बाकी 350 इकाइयां चालू तो हैं लेकिन उन्होंने उत्पादन घटा दिया है. नतीजतन, ज्यादातर मैन्युफैक्चरर मौजूदा स्टॉक से ही माल बेच रहे हैं. माल ढुलाई की झंझटों और आपूर्ति शृंखला में रुकावटों की वजह से पश्चिम एशिया के निर्यात पर काफी बुरा असर पड़ा है. इस उद्योग की कुल कमाई में निर्यात का हिस्सा 40 फीसद है और उसमें 15 फीसद हिस्सा पश्चिम एशिया के निर्यात का है. यह निर्यात ज्यादातर मोरबी, राजकोट और थानगढ़ जैसे बड़े सिरेमिक क्लस्टरों से होता है.
क्रिसिल रेटिंग्स का अनुमान है कि निर्यात राजस्व में 6-7 फीसद (करीब 1,300 करोड़ रुपए) की कमी आ सकती है. एजेंसी के मुताबिक, घरेलू इस्तेमाल के सिरेमिक और टाइल सेक्टर इस वित्त वर्ष में अनुमानित बढ़ोतरी 7-8 फीसद के बजाए सिर्फ 4-5 फीसद की दर ही छू सकते हैं. क्रिसिल रेटिंग्स के डायरेक्टर नितिन कंसल कहते हैं, ''अगर हालात अगले 2-3 हफ्तों तक ऐसे ही बने रहते हैं तो लंबे समय तक बंदी और भारी नुक्सान संभव है जिससे इस वित्त वर्ष में कमाई 1-2 फीसद गिर सकती है.''
दक्षिण के कोयंबत्तूर में, 2,50,000 से ज्यादा फाउंड्री, एल्युमिनियम, फैब्रिकेशन, पाउडर कोटिंग, लेजर कटिंग और पंप बनाने वाले एमएसएमई कारखानों में लगभग 30 फीसद नौ मार्च से एलपीजी न मिलने से बैठ गए हैं. कोयंबत्तूर जिला लघु उद्योग संघ के प्रेसिडेंट एम. कार्तिकेयन के मुताबिक, इससे उत्पादन में 40 फीसद की गिरावट आई है. कोयंबत्तूर पंप और मोटर बनाने का बड़ा केंद्र है और देश की 40 फीसद से ज्यादा जरूरतें पूरी करता है. उसकी कमाई में 30 फीसद तक कमी देखी जा रही है.
कच्चे तेल से जुड़े सेक्टर भी भारी परेशानी में हैं क्योंकि कच्चे तेल के उत्पाद कई बड़े सेक्टरों प्लास्टिक, सिंथेटिक फाइबर (नायलॉन, पॉलिएस्टर), रबर, पेंट, सॉल्वेंट और पैकेजिंग सामान वगैरह के लिए मुख्य इनपुट होते हैं. प्लास्टिक प्रोसेसिंग उद्योग पॉलिमर कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर है. कुल 2.4 करोड़ टन की सालाना खपत में 80-90 लाख टन आयात किया जाता है, जिसमें करीब 30 लाख टन खाड़ी क्षेत्र से आता है. फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस के क्षेत्रीय चेयरमैन (उत्तरी क्षेत्र) अरविंद गोयनका कहते हैं, ''खाड़ी क्षेत्र से आने वाला सारा आयात रुक गया है और चीन, अमेरिका, कोरिया तथा यूरोप के कुछ हिस्सों से होने वाली सप्लाइ भी समुद्री माल ढुलाई की बढ़ती लागत से प्रभावित हुई है; जिसके चलते मार्च महीने में ही कच्चे माल की कीमतों में कम से कम 45 फीसद की बढ़ोतरी हुई है.''
क्या किया जा रहा
सरकार जंग के हालात में मदद के लिए 57,300 करोड़ रुपए के इकोनॉमिक स्टेबलाइजेशन फंड पर काम कर रही है. उसने 497 करोड़ रुपए की 'रेजिलिएंस ऐंड लॉजिस्टिक्स इंटरवेंशन फॉर एक्सपोर्ट फैसिलिटेशन' योजना की भी घोषणा की है, जो पश्चिम एशिया में कारोबार करने वाले निर्यातकों को बीमा सुविधा मुहैया कराती है.
इसके अलावा, सभी वाजिब निर्यात उत्पादों के लिए ड्यूटी और टैक्स छूट (आरओडीटीईपी) योजना के तहत मिलने वाले लाभ 23 मार्च से फिर शुरू कर दिए गए हैं. पहले इनमें 50 फीसद कटौती की गई थी.
और क्या करने की जरूरत
सभी संबंधित उद्योगों ने निर्यातकों और आयातकों के लिए कर्ज भुगतान मोहलत की मांग की है क्योंकि शिपमेंट में देरी से भुगतान धीमा हो रहा है. ढुलाई खर्च में तेज बढ़ोतरी को कुछ हद तक घटाने और मार्जिन कम होने से बचाने के लिए शुल्क सब्सिडी की भी मांग की जा रही है.
उद्योग माल ढुलाई के मोर्चे पर और रियायत चाहता है. मसलन शिपिंग और ढुलाई वालों की मनमानी कीमतों पर रोक लगाना और ज्यादा तर्कसंगत शुल्क पक्का करना वगैरह. निर्यातक यह भी चाहते हैं कि इलाके में भारतीय व्यावसायिक दूतावास फंसे हुए शिपमेंट की मदद के लिए विशेष व्यवस्था करें. यूएई बंदरगाहों पर डेमरेज चार्ज में छूट के लिए बात करें, और कार्गो की सामान्य आवाजाही में मदद के लिए वैश्विक शिपिंग संस्थाओं से बात करें.