अनिश्चितता से निबटने की कवायद
तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से भारत के बजट का गणित गड़बड़ा जाता है लेकिन अगर कीमतों में मौजूदा सुधार जारी रहा तो भारत इस झटके को झेल सकने में सक्षम है

अमेरिका-ईरान युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है. ऐसे में अर्थव्यवस्था पर इसका कितना व्यापक असर होगा, भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए बड़ी चिंता यही है, चाहे वह वृद्धि की बात हो या फिर महंगाई या राजकोषीय घाटे की. भरोसेमंद आकलन तभी संभव होगा, जब होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल की आवक और ठीक-ठाक सप्लाइ चेन बहाल हो.
यह प्रक्रिया शुरू है पर अभी पूरी नहीं हुई है. 23 मार्च को डोनाल्ड ट्रंप के घोषित पांच दिन के विराम के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज सुधार हुआ और ये 108-110 डॉलर (करीब 10,250 रु.) के ऊंचे स्तर से करीब 95 डॉलर (8,900 रु.) प्रति बैरल पर आ गईं. मगर ईरान के प्रतिकूल संकेतों के बाद फिर अनिश्चितता बढ़ी और कीमतें वापस 100 डॉलर (9,400 रु.) के ऊपर पहुंच गईं.
भारत के लिए कीमतों में बदलाव बहुत बड़ा मसला है. भारत रोजाना करीब 48 से 50 लाख बैरल तेल आयात करता है, ऐसे में दाम 10 डॉलर (940 रु.) भी घटते हैं तो आयात बिल का सालाना बोझ लगभग 45,000 से 55,000 करोड़ रुपए कम हो जाता है. संशोधित आंकड़ों के हिसाब से अब आयात बिल में बढ़ोतरी घटकर करीब 69,000-75,000 करोड़ रुपए रह सकती है, पहले जिसके सालाना 1.2-1.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच जाने का अंदेशा था.
चालू खाते का घाटा भी 2.5 फीसद तक बढ़ने के बजाए जीडीपी के 2 से 2.2 फीसद के करीब रह सकता है. डॉलर के मुकाबले रुपए पर 93-95 प्रति डॉलर के स्तर पर दबाव है, वह भी अब 91-93 के दायरे में रह सकता है.
कच्चे तेल की कीमतें 10-12 डॉलर गिरने पर अमूमन मुख्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) में करीब 30-40 आधार अंक की कमी आती है, बशर्ते कि बढ़ी कीमतों का कुछ असर नीचे तक डाला गया हो. इससे महंगाई दर 6 फीसद के ऊपरी छोर के करीब पहुंच सकती है पर शायद घबराहट जैसी बात न हो.
अगर अंदरखाने रुकावटें बनी रहीं तो यह सुधार सिर्फ ऊपरी साबित हो सकता है. बीते कुछ हफ्तों में खाड़ी देशों के रूट पर माल ढुलाई की दरें पहले ही 30 से 50 फीसद तक बढ़ चुकी हैं. बीमा प्रीमियम भी उछले हैं, और माल डिलिवरी में भी देरी हो रही है. भले कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर से नीचे आ जाए, मगर इन रुकावटों की वजह से तेल की भारत पहुंचने की असल लागत ऊंची रह सकती है.
एक केंद्रीय मंत्री ने इंडिया टुडे को बताया, ''असली (आर्थिक) मुश्किलों का एहसास युद्ध खत्म होने के बाद होता है. खाड़ी सहयोग परिषद के देशों के साथ-साथ ईरान में भी तेल और गैस का बुनियादी ढांचा चरमरा गया है. तेल की कीमतें इतनी जल्दी युद्ध से पहले वाले स्तर पर नहीं आएंगी. दुनिया को अब एक नई सामान्य स्थिति के साथ रहना होगा. ''
मगर तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव वित्त वर्ष 27 के बजट अनुमानों को गड़बड़ा सकता है. 97 डॉलर पर भी कच्चा तेल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के 70-75 डॉलर के आधार स्तर के दावे से 20-25 डॉलर ऊपर बना हुआ है. यानी राजकोषीय और बाहरी मोर्चे पर हिसाब-किताब में 90,000 करोड़ रुपए से 1 लाख करोड़ रुपए का अंतर हो सकता है.
बजट के नॉमिनल जीडीपी, आयात, सब्सिडी और राजकोषीय घाटे के अनुमान इस पर आधारित थे कि रुपया प्रति डॉलर 82.5-83.5 के दायरे में रहेगा. अब जब रुपया 93-94 रुपए के स्तर पर है, तो आयात की प्रभावी लागत भी करीब 10-12 फीसद बढ़ गई जिससे आयात बिल में 60,000-80,000 करोड़ रुपए का अनुमानित इजाफा हो जाएगा.
क्या किया जा रहा
मगर अर्थशास्त्रियों के अनुमानों के बीच एक बारीक नीतिगत राहत भी निकल रही. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद और आरबीआइ की मौद्रिक नीति समिति की पूर्व सदस्य आशिमा गोयल बताती हैं, ''ओएमसी (तेल विपणन कंपनियां) और सरकार, दोनों के पास छह हफ्तों तक अस्थायी झटके झेलने की गुंजाइश है क्योंकि उन्होंने तेल की कम कीमतों का लाभ पहले पूरी तरह से ग्राहकों तक नहीं पहुंचाया था.'' उनके विचार में राजकोषीय ढांचे में भी लचीलापन है. ''राजकोषीय राह इस तरह है कि संकट के समय इसमें बढ़ोतरी हो सकती है.
इसमें मंदी-रोधी नीति की भी गुंजाइश है.'' यह सरकार के इस भरोसे के भी अनुरूप है कि सरकारी स्वामित्व वाली ओएमसी, खुदरा उपभोक्ताओं को बचाते हुए, झटके का कुछ हिस्सा खुद ही झेलें. वित्त वर्ष 26 में उनका सकल रिफाइनिंग मार्जिन 10-12 डॉलर प्रति बैरल था.
यह नजरिया पंजाब ऐंड सिंध बैंक के पूर्व चेयरमैन चरण सिंह के विचारों से मेल खाता है जिन्हें सितंबर तक हालात सामान्य होने की उम्मीद है. ''सरकार को लचीली मगर जिम्मेदार राजकोषीय नीति अपनानी चाहिए, जैसी कोविड के दौरान अपनाई थी.'' इन सब पर अप्रैल के पहले सप्ताह में आरबीआइ की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में विचार होगा.