पश्चिम एशिया में कोहराम

ईरान के खिलाफ अमेरिका और इज्राएल के युद्ध में पूरा पश्चिम एशिया फंसा तो कई बड़े सवाल उभरे, क्या इससे ईरान में सत्ता परिवर्तन होगा? यह युद्ध कितना लंबा चलेगा? और भारत को क्यों होना चाहिए फिक्रमंद?

cover story: iran war
तेहरान में आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत का मातम मनाते ईरानी लोग

डोनाल्ड ट्रंप बड़े दांव लगाने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन पश्चिम एशिया में चल रहा यह टकराव शायद अमेरिकी राष्ट्रपति का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक जुआ साबित हो सकता है. 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका और इज्राएल के संयुक्त सैन्य हमलों ने ईरान के नेतृत्व को गहरा झटका दिया. लंबे समय से सर्वोच्च नेता रहे आयतुल्ला अली खामेनेई समेत कई शीर्ष नेताओं की मौत हो गई.

इन हमलों का मकसद ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमता को कमजोर करना और ईरान के साथ-साथ पूरे पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन बदलना था. लेकिन झुकने के बजाए ईरान ने जवाबी कार्रवाई की. उसने इज्राएल, खाड़ी में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और ऊर्जा ढांचे पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. इसका उद्देश्य संघर्ष के दायरे को और देशों तक फैलाना था.

हालात तब और बिगड़ गए जब ईरान ने होरमुज जलडमरूमध्य बंद कर दिया. दुनिया में तेल का लगभग पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. साथ ही कार्गो जहाजों को निशाना बनाया गया. इससे वैश्विक व्यापार मार्ग, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संतुलन ऐसे युद्ध के भंवर में फंस गए हैं, जिसके उद्देश्य और नतीजे अभी भी बेहद अनिश्चित हैं.

भारत के लिए यह खास चिंता का विषय है. देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस क्षेत्र पर काफी निर्भर है. साथ ही खाड़ी में काम कर रहे एक करोड़ भारतीयों से आने वाली रकम भारत को मिलने वाले कुल 135 अरब डॉलर (12.5 लाख करोड़ रु.) में करीब 38 फीसद है.

इस युद्ध की मानवीय कीमत भी लगातार बढ़ रही है. अब तक इस संघर्ष में 1,000 से ज्यादा ईरानी मारे जा चुके हैं. सबसे दर्दनाक मिनाब में 165 स्कूली लड़कियों और स्कूली स्टाफ की मौत है. इज्राएल ने 10 लोगों की मौत और अमेरिका ने छह फौजियों की मौत कबूली है.

यह युद्ध भारत तक भी पहुंचा. होरमुज जलडमरूमध्य में मिसाइल उनके जहाजों पर आ गिरी तो दो निजी टैंकरों पर सवार तीन भारतीय क्रू सदस्य मारे गए. 4 मार्च को एक अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत आइआरएस दीना को टॉरपीडो से निशाना बनाया. यह जंगी जहाज हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारतीय नौसेना के निमंत्रण पर बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में हिस्सा लेकर लौट रहा था. इस जहाज के डूबने से उसके 87 क्रूसदस्य भी समुद्र में समा गए.

आधुनिक पश्चिम एशिया में शायद ही कोई युद्ध इतनी अनिश्चितताओं के साथ शुरू हुआ हो. अमेरिका और इज्राएल के शुरुआती हमलों का उद्देश्य ईरान की रणनीतिक क्षमताओं को झटका देना और तेहरान में राजनैतिक व्यवस्था ध्वस्त करना था. लेकिन इसके उलट संघर्ष जटिल हो गया है.

वॉशिंगटन डीसी स्थित ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के सेंटर फॉर मिडिल ईस्ट पॉलिसी की वरिष्ठ फलो स्टेफेनी टी. विलियम्स कहती हैं कि भू-राजनीतिक 'बर्र के छत्ते’ को छेड़ दिया गया है. ईरान की मिसाइल और ड्रोन हमलों की लहरें जारी हैं और संघर्ष समूचे खाड़ी क्षेत्र में फैलता जा रहा है.

ईरान पर साझा हमला करने वाले इज्राएली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

स्टेफेनी चेताती हैं, ''हम अंधेरे में उड़ान भर रहे हैं और अनपेक्षित परिणामों में प्रवेश कर चुके हैं.’’ दुनिया भर के शेयर बाजार डगमगा रहे हैं और देश तेल की कीमतों में संभावित उछाल के लिए तैयारी कर रहे हैं. ऐसे में सबसे बड़े सवाल यही हैं: ईरान युद्ध कितना विनाशकारी होगा, अमेरिका और इज्राएल ने अभी हमला क्यों किया, और यह कितने दिन तक चलेगा.

'मिशन डिकैपिटेशन’
इज्राएली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप का ईरान पर हमला करने का फैसला लगता है कि किसी एक वजह से नहीं हुआ. यह राजनैतिक मौका, खुफिया संकेत और बदलती रणनीतिक गणनाओं के मेल का नतीजा है. तनाव की पृष्ठभूमि आठ महीने पहले ही बन चुकी थी. जून 2025 में इज्राएल ने ईरान पर अब तक का सबसे बड़ा हमला किया था.

उसका दावा था कि तेहरान परमाणु हथियार बनाने से सिर्फ कुछ महीने दूर है. उसके बाद दोनों देशों के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों का सिलसिला चला. इसी बीच ट्रंप ने ऑपरेशन 'मिडनाइट हैमर’ को मंजूरी दी. अमेरिका ने ईरान की तीन अहम परमाणु संयंत्रों पर बंकर-बस्टर बम गिराए. अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि इन हमलों ने ईरान की परमाणु क्षमता को 'पूरी तरह खत्म’ कर दिया है.

उसके जवाब में ईरान ने कतर में अमेरिका के अल उदीद एयर बेस पर उतनी ही संख्या में मिसाइलें दागीं, जितनी अमेरिका ने उसके परमाणु ठिकानों पर इस्तेमाल की थीं. ट्रंप ने यह कहते हुए दोनों पक्षों पर दबाव डालकर युद्ध शुरू होने के 12 दिन बाद एक अस्थिर युद्धविराम करा दिया कि अमेरिका अपने उद्देश्य हासिल कर चुका है.

ईरान ने इस विराम का इस्तेमाल अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत करने में किया. उसने अपनी मिसाइल प्रणालियों को फिर से तैयार किया, जखीरा बढ़ाया और रिपोर्टों के मुताबिक, चीन की मदद से अपने रडार नेटवर्क को भी अपग्रेड किया. कोम स्थित अल-मुस्तफा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के शोधार्थी सैयद आकिफ जैदी कहते हैं, ''वह 12 दिन का युद्ध ईरान के लिए वरदान साबित हुआ.

उसे लंबे युद्ध के लिए अपनी सैन्य प्रणालियों, राजनैतिक ढांचे और सामाजिक संरचना की परीक्षा का मौका मिला.’’ हालांकि इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी. पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में चल रही ईरानी अर्थव्यवस्था इस छोटे युद्ध के बाद लगभग चरमरा गई. अक्तूबर तक यूरोपीय वोट से संयुक्त राष्ट्र की बंदिशें आफत की तरह टूटीं. महंगाई औसतन 40 फीसद तक पहुंच गई. ईरानी मुद्रा रियाल एक डॉलर के मुकाबले 5 लाख रियाल से तीन गुना गिरकर करीब 16 लाख रियाल तक पहुंच गई. 

तनख्वाहें और मजदूरी तेजी से घटने लगीं और ईंधन, ब्रेड तथा बिजली पर मिलने वाली सब्सिडी में कटौती हुई. उसके बाद ईरान में अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. जनवरी की शुरुआत तक ये प्रदर्शन पूरे देश में फैल गए और सरकार विरोधी आंदोलन का रूप ले लिया. सरकार ने जवाब में कड़ा दमन शुरू किया. इसमें इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर और उसकी आंतरिक सुरक्षा शाखा बसीज को लगाया गया.

करीब 7,000 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया. तब जाकर आंदोलन पर काबू पाया जा सका. इस घटनाक्रम ने शासन की कमजोरियों और अंदरूनी तनाव को उजागर कर दिया. ईरान अंदर और बाहर दोनों मोर्चों पर कमजोर दिखाई देने लगा. इज्राएल ने इसे दोबारा हमला करने का सही वक्त माना.

हमास के 7 अक्तूबर, 2023 को हमलों के बाद से ही इज्राएल ने क्षेत्र में ईरान के सहयोगी संगठनों को व्यवस्थित तरीके से निशाना बनाना शुरू कर दिया था. हमास के साथ युद्ध में गजा पट्टी को लगभग तबाह करने के बाद इज्राएल ने लेबनान में हिज्बुल्ला और यमन में हूती विद्रोहियों की ओर ध्यान दिया. तेल अवीव ने सीरिया में बशार अल-असद की सरकार को गिराने में भी अहम भूमिका निभाई.

जून 2025 में ईरान की परमाणु संरचना पर भारी हमलों के बावजूद इज्राएल को लगता था कि ईरान का बढ़ता मिसाइल भंडार ऐसे स्तर पर पहुंच रहा है जहां उसे रोकना मुश्किल और महंगा हो जाएगा. जनवरी के विद्रोहों के बाद इज्राएल को लगा कि यही सही समय है जिसे कुछ विशेषज्ञ 'सांप का सिर काटना’ कहते हैं. इसी रणनीति के तहत उसने अमेरिका को भी अपने साथ आने के लिए राजी किया.

ट्रंप का 'एपिक फ्यूरी’ हमला
यह विडंबना ही है कि डोनाल्ड ट्रंप ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी तब शुरू किया जब अमेरिका और इज्राएल ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर औपचारिक बातचीत में लगे हुए थे. बातचीत सकारात्मक दिशा में जाती दिख रही थी. ईरान मिसाइल क्षमता सीमित करने और समृद्ध यूरेनियम के भंडार को घटाने का संकेत दे रहा था.

लेकिन ट्रंप ने अचानक बातचीत तोड़ दी. बाद में उन्होंने कहा, ''हम पागलों के साथ बातचीत कर रहे थे और मुझे लगा कि वे पहले हमला करने वाले थे.’’ बताया जाता है कि इज्राएल ने अमेरिका को ऐसी खुफिया जानकारी दी थी कि ईरान के सर्वोच्च नेता और अन्य वरिष्ठ नेता एक तय समय पर एक जगह जुटने वाले हैं. हालांकि सिर्फ समय की जानकारी ही वॉशिंगटन के हमले के फैसले की वजह होना जाहिर नहीं करता.

दरअसल, ट्रंप प्रशासन के घोषित उद्देश्य भी तेजी से बदलते गए. शुरुआत में हमलों को एहतियाती कार्रवाई बताया गया, जिसका मकसद ईरान की मिसाइल क्षमता को पंगु बनाना और संभावित सुरक्षा खतरे को खत्म करना था. लेकिन जल्द ही बयानबाजी का दायरा राजनैतिक बदलाव तक पहुंच गया.

एक टीवी संबोधन में ट्रंप ने इस अभियान को मानवाधिकार मिशन बताया और कहा कि इसका उद्देश्य ईरान को उसके ''हत्यारे शासकों’’ से मुक्त कराना है. उन्होंने ईरान की जनता से खुलकर अपील की, ''उठ खड़े हों और अपनी सरकार अपने हाथ में लें... यह आपकी होगी.’’ ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट में उन्होंने लिखा, ''खामेनेई, जो इतिहास के सबसे बुरे लोगों में एक था, अब मर चुका है.’’

सत्ता परिवर्तन की दिशा में बढ़ता यह रुख संघर्ष को और गंभीर स्तर पर ले गया. लेकिन ईरान ने जब अपेक्षा से ज्यादा मजबूती दिखाई और शासन के गिरने के कोई संकेत नहीं मिले, तो ट्रंप प्रशासन ने फिर अपना रुख बदला. उसके बाद व्हाइट हाउस की प्रेस टीम ने चार मुख्य उद्देश्यों की रूपरेखा बताई. पहला, ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता को नष्ट करना.

दूसरा, भविष्य में उसके परमाणु हथियार कार्यक्रम को रोकना. तीसरा, पूरे क्षेत्र में असर फैलाने की उसकी क्षमता को कमजोर करना. और चौथा, ईरान की जनता को ताकत देना ताकि वह मजहबी शासन को खत्म कर सके. फिर भी कई विश्लेषकों को नहीं लगता कि यह युद्ध किसी स्पष्ट और सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है.

अंतरिम हुक्मरान खामेनेई की मौत के बाद किसी अनजान जगह पर ईरान की न्यायपालिका के प्रमुख गुलाम-हुसैन मोहसेनी-अजर्ई, राष्ट्रपति मसूद

उनका कहना है कि यह फैसला दीर्घकालिक ठोस योजना से ज्यादा अल्पकालिक राजनैतिक गणनाओं का नतीजा हो सकता है. पश्चिम एशिया पर लंबे समय से काम कर चुके एक विशेषज्ञ कहते हैं, ''संभव है कि हम जिन फैसलों को बड़ी रणनीति मान रहे हैं, वे दरअसल दिन-प्रति दिन बदलते हालात के साथ लिए जा रहे निर्णय हों.’’

सत्ता परिवर्तन का दांव
अगर अमेरिका और इज्राएल को उम्मीद थी कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने से उसकी मजहबी सत्ता तेजी से ढह जाएगी, तो उन्हें जल्द ही निराशा हाथ लगी. ईरान न तो वेनेजुएला है और न ही गजा जैसा छोटा और कमजोर इलाका जिसे आसानी से कुचला जा सके. यह 9.2 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला बड़ा देश है, जहां सुरक्षा तंत्र बेहद मजबूत और गहराई तक फैला हुआ है.

भौगोलिक रूप से भी ईरान दुनिया में 17वां बड़ा देश है, जिसके चारों ओर ऊंची पर्वत शृंखलाएं और विशाल रेगिस्तान हैं, जो ऐतिहासिक रूप से बाहरी आक्रमणकारियों के लिए बड़ी बाधा रहे हैं. उसकी आबादी के मद्देनजर उस पर जल्दी काबू पाना बेहद कठिन है.

ईरान की लगभग 90 फीसद आबादी शिया मुस्लिम की है. वहां मजहबी संस्कृति में शहादत की अवधारणा बेहद गहरे भावनात्मक और प्रतीकात्मक महत्व रखती है. मारे गए सर्वोच्च नेता खामेनेई के आलोचक जरूर रहे होंगे, और उनके कुछ सहयोगी उनके जिद्दी स्वभाव से परेशान भी रहे होंगे, लेकिन मौत के बाद उन्हें शहीद के रूप में देखा जा रहा है और उन्हें इमाम या आध्यात्मिक शख्सियत के रूप में देख रहे हैं, इस कदर कि जो उनके जिंदा रहते नहीं था.

ईरान में ट्रंप और उनके साथियों को हिकारत से 'एपस्टीन गैंग’ कहा जा रहा है. जैदी कहते हैं, ''यह गैंग अब यज़ीद या नाइंसाफी के गिरोह की तरह देखा जा रहा है, जबकि इमाम खामेनेई को हमारे समय के हुसैन के रूप में देखा जा रहा है, यानी शहादत का प्रतीक.’’

किसी नेता को हटाने से, चाहे वह देश में अलोकप्रिय ही क्यों न हो, यह जरूरी नहीं कि उसके नीचे खड़ी पूरी व्यवस्था भी ढह जाए. खामेनेई ने अपनी हत्या की आशंका पहले ही भांप ली थी. इसलिए उन्होंने सिर्फ अपने पद के लिए ही नहीं, बल्कि मजहबी नेतृत्व, फौज और आइआरजीसी के अहम पदों के लिए भी कई स्तर की उत्तराधिकार व्यवस्था तैयार कर रखी थी.

उनकी मौत के फौरन बाद ईरान ने अपने संविधान के अनुच्छेद 111 को लागू किया और एक तीन सदस्यीय अंतरिम नेतृत्व परिषद बनाई, जो तब तक शासन संभालेगी जब तक नया सर्वोच्च नेता नियुक्त नहीं हो जाता. इस परिषद में राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन, मुख्य न्यायाधीश गुलाम हुसैन मोहसेनी-अजेई और गार्जियन काउंसिल के सदस्य तथा ईरान के मदरसों के प्रमुख आयतुल्ला अलीरेजा अराफी शामिल हैं.

ईरान के मिनाब में लड़कियों के स्कूल पर हवाई हमले के बाद अंतिम संस्कार, 2 मार्च

ईरान में भारत के पूर्व राजदूत गद्दम धर्मेंद्र कहते हैं, ''यह मत भूलिए कि यह 47 साल पुरानी विचारधारात्मक शासन-व्यवस्था है जो समाज में गहराई तक जड़ें जमा चुकी है. आज सत्ता में बैठे कई लोग उसी विचारधारा में पले-बढ़े हैं. यह जरूर है कि अलग-अलग गुटों में टकराव होगा. लेकिन शासन को बचाए रखने और उसके ढांचे को टूटने से रोकने के सवाल पर वे पूरी तरह एकजुट हैं.

इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए.’’ इस बीच अटकलें लगाई जा रही हैं कि खामेनेई के दूसरे बेटे मोज्तबा खामेनेई अगले सर्वोच्च नेता हो सकते हैं. बहरीन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज में मिडिल ईस्ट नीति के वरिष्ठ फेलो डॉ. हसन अलहसन कहते हैं, ''अगर ऐसा होता है तो वे अपने वा‌‌‌लिद की ही तरह सोच रखने वाले होंगे और नए नेतृत्व में ईरान की नीति में बड़े बदलाव की संभावना कम है.’’ वे तंज करते हैं, ''विडंबना यह है कि शायद ट्रंप ने अनजाने में ईरान में सत्ता परिवर्तन की शुरुआत कर दी है, जिससे यह व्यवस्था एक तरह की वंशानुगत राजशाही जैसी बन सकती है.’’

ईरान की रणनीति
बकौल अलहसन, जंग का वक्त आखिरकार विचारधारा या बयानबाजी से नहीं, बल्कि ठोस सामरिक समीकरणों से तय होगा. उनके मुताबिक, रणनीतिक और सामरिक चतुराई के दो फैक्टरों से ही नतीजे तय हो सकते हैं. वे यह भी बताते हैं कि सामरिक चतुराई के मामले में ईरान के इज्राएल-अमेरिकी निशानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले उसके हथियार भंडार की गहराई और उसके सामरिक इन्फ्रास्ट्रक्चर की मजबूती पर निर्भर करेंगे.

इसी तरह अमेरिका और उसके क्षेत्रीय साझेदारों की ईरान के जवाबी हमलों को इंटरसेप्ट करने की क्षमता भी अहम है. मिसाइल डिफेंस सिस्टम हमलों को नाकाम कर सकते हैं, लेकिन वे असीमित नहीं हैं. इंटरसेप्टर महंगे हैं, भंडार सीमित है और रोजाना होने वाले हमलों का दबाव जल्दी बढ़ सकता है. अगर ईरान के हथियार भंडार उम्मीद से ज्यादा साबित होते हैं, या अगर डिफेंस कमजोर होने लगता है, तो जंग की रफ्तार में बड़ा बदलाव आ सकता है.

लड़ाई के मोर्चे के अलावा, खाड़ी में बड़ा रणनीतिक मुकाबला भी जारी है. लगता है कि ईरान की रणनीति में दोहरे लक्ष्य जुड़े हुए हैं. एक, अमेरिका के क्षेत्रीय साझेदारों पर दबाव डालना, या उनके बंदरगाहों, ऊर्जा संयंत्रों, हवाई अड्डे और जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमला करना या उन्हें चेतावनी देना, ताकि वे ट्रंप पर लड़ाई खत्म करने का दबाव बनाएं. दूसरे, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खासकर होरमुज जलडमरूमध्य के जरिए दबाव बढ़ाना या खर्च बढ़ाकर जंग को अंतरराष्ट्रीय रूप दे देना.

हालांकि इस रणनीति के जोखिम भी हैं. ईरान के हमलों ने अपने खिलाफ गठजोड़ को तोड़ने के बजाए कुछ मामलों में खाड़ी देशों को अमेरिका के करीब ला दिया है, जबकि यूरोपीय ताकतों को संकट में खींच लिया है. जोखिम बाहर की ओर भी फैल रहा है. हाल ही में ईरान में काम कर चुके अंतरराष्ट्रीय राजनयिक राजा कार्तिकेय एक अजीब संभावना की ओर इशारा करते हैं. उनके मुताबिक, ''तेल बाजार या वैश्विक व्यापार में रुकावटों की वजह से बड़ा आर्थिक झटका बड़ी ताकतों और बुरी तरह प्रभावित देशों को यह मांग करने पर मजबूर कर सकता है कि अमेरिका यह जंग खत्म करे.’’

होरमुज जलडमरूमध्य के पास बंदर अब्बास के किनारे एक जहाज से उठते धुंए की सैटेलाइट इमेज, 2 मार्च

जानकारों के मुताबिक, सबसे अच्छी संभावना यह होगी कि ईरान में शांति से मजहबी तानाशाही से किसी तरह की प्रतिनिधित्व वाली सरकार कायम हो. हालांकि वे यह भी कहते हैं कि इसकी उम्मीद बेहद कम है. दूसरी संभावना गृह युद्ध की है, जिससे ईरान कुछ हद तक बंट सकता है, जैसा इराक में हुआ था. ये भी खबरें हैं कि अमेरिकी और इज्राएली ईरान में बागी गुटों को शह दे रहे हैं, ताकि उसकी सीमा सुरक्षा और प्रतिरक्षा इन्फ्रास्ट्रक्चर को तोड़ा जा सके.

कहा जाता है कि वे अजेरी और कुर्द गुटों को शह दे रहे हैं, और उन्हें केंद्रीय सरकार का कंट्रोल, खासकर उसके इलाकाई रुतबे को कमजोर करने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं. ईरान की आबादी में अजेरी समुदाय 15 फीसद और कुर्द 10 फीसद हैं. ईरान पहले ही इराक में ऐसे कुछ बागी गुटों के ठिकानों पर हमला कर चुका है. जनवरी में प्रदर्शनकारियों पर हुई सख्त कार्रवाई से भी कई गुट अंदरूनी बगावत के बारे में सोच सकते हैं.

बदतर संभावना तो यह है कि पूरे क्षेत्र में जंग भड़क उठे, जिससे लाखों लोग वहां से निकलें और खाड़ी देश दशकों पीछे पहुंच जाएं. लेकिन भारत के संयुक्त राष्ट्र में पूर्व स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ऐसे फैक्टरों की ओर इशारा करते हैं जो लड़ाई को बढ़ने से रोक सकते हैं. वे खासकर खाड़ी देशों के हितों का हवाला देते हैं, जिनके लिए क्षेत्र की स्थिरता आर्थिक और राजनैतिक लिहाज से जरूरी है इसलिए वे इस लड़ाई को बढ़ने देना नहीं चाहेंगे.

वे कहते हैं कि लंबी जंग से कारोबार के लिए सुरक्षित ठिकाने के तौर पर खाड़ी की साख को भारी नुक्सान होगा, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी. अकबरुद्दीन यह भी बताते हैं कि हवाई हमलों से सरकार बदलने की गुंजाइश बेहद थोड़ी है. वे कहते हैं, ''आप सिर्फ अहम ठिकानों पर बमबारी या कुछ लोगों को मार कर यह नहीं कर सकते. जमीन पर फौज उतारनी होगी, और ईरान में घुसकर तख्तापलट कराना होगा.’’

जमीनी जंग
यह कहकर ट्रंप ने अपने मागा जनाधार के कई हलकों में दहशत फैला दी कि वे ईरान में जारी जंग में फौज ''जमीन पर उतारने’’ के विकल्प से इनकार नहीं करेंगे. उनके इस बयान ने बिजनेस बिरादरी के माथे पर भी शिकन ला दी कि जंग चार हफ्ते से ज्यादा खिंच जा सकती है. यह सब ट्रंप के अजीब यू-टर्न जैसा लग रहा है, जो ''कभी खत्म न होने वाली लड़ाइयों’’ को खत्म करने, भविष्य में किसी जंग में अमेरिका के शिरकत न करने और अपने सैनिकों को खतरे से दूर रखने का वादा करके सत्ता में आए थे.

स्टेफेनी ईरान में अमेरिकी फौज उतारने की ट्रंप के सुझाव पर भड़क उठीं. वे बताती हैं कि ईरान वॉशिंगटन के लिए एक तरह का ब्लैक बॉक्स है, क्योंकि करीब 50 वर्षों से उस देश में अमेरिका का कोई राजनयिक प्रतिनिधित्व नहीं है. उनके मुताबिक, अमेरिका को इराक में 1,50,000 जवान उतारने पड़े थे, तो ईरान के काफी बड़े क्षेत्रफल के हिसाब से चार गुना ज्यादा फौजी उतारने पड़ेंगे. वे कहती हैं, ''हम इराक और लीबिया में अपने अनुभव को देखें, तो ईरान में हालात भयावह होंगे. वह इराक से दस गुना ज्यादा पेचीदा है. यह कोई अच्छा विकल्प नहीं है.’’

ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिकी कार्रवाइयां यह भांपने में नाकाम रहीं कि ईरान में कथित तानाशाही, दमनकारी सरकार की पैठ देश और समाज की लगभग हर संस्था में किस हद तक गहरी है. किसी सरकार, उसके समूह और उसके असर को अचानक उखाड़ फेंका जाए, तो अमूमन अराजकता फैल जाती है.

कोई हमलावर फौज शायद ही वहां की संस्थाएं चलाने या आम लोगों को बुनियादी सेवाएं मुहैया कराने की काबिलियत रखती है. मसलन, ईरान की फौज में 20 लाख जवान हैं. क्या अमेरिका उन सभी को बम से उड़ा पाएगा? इराक में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन की फौज को तोड़ दिया था. बाद में उनमें से कई आइएसआइएस में शामिल हो गए.

पीछे मुड़कर देखें तो, कई जानकार ट्रंप के इतनी बड़ी जंग छेड़ने के फैसले को बेवकूफी मानते हैं, जबकि उनके पास सही राजनयिक विकल्प मौजूद थे. ईरान में भारत के पूर्व राजदूत के.सी. सिंह कहते हैं, ''इस जंग के जरिए घरेलू समस्याओं से ध्यान भटकाने की मंशा है, इसलिए गलत गुणा-भाग किया जा रहा है. नेतन्याहू इसलिए क्योंकि उन्हें इस साल के आखिर में चुनाव का सामना करना है, और ट्रंप इसलिए क्योंकि नवंबर में कांग्रेस के चुनाव यह तय करेंगे कि उनका राजनैतिक दबदबा बना रहेगा या नहीं.’’

नया पश्चिम एशिया
हथियार भंडार खाली होते जाने से ही जंग नहीं रुकती. जंग तब खत्म होती है जब किसी एक पक्ष में यह एहसास हो उठता है कि जंग का खर्च उसे रोकने के खर्च से ज्यादा है. अकबरुद्दीन कहते हैं, ''अगर ईरान में तख्तापलट जल्दी होता नहीं दिखा तो अमेरिका की दिलचस्पी खत्म हो सकती है.

ईरान के एटमी संयंत्र और मिसाइल जखीरे पर बमबारी करने के बाद ट्रंप को शायद अब ज्यादा परवाह न हो. वे कह सकते हैं, 'मैंने पूरी कोशिश की, अब तुम लोग जो चाहो करो’.’’ न ही इस जंग के शिया-सुन्नी सांप्रदायिक टकराव में बदलने की संभावना है. खाड़ी देश जानते हैं कि उन्हें लंबी जंग की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, जो उनकी खुशहाली पर बट्टा लगा देगी. वे तनाव कम करना ही पसंद करेंगे.

नतीजा चाहे जो भी हो, इस जंग से एक नया पश्चिम एशिया उभरेगा. यह संभावना नहीं है कि खाड़ी के देश इज्राएल के करीब जाएंगे. ट्रंप के पहले कार्यकाल में कई खाड़ी देशों ने अब्राहम समझौते पर दस्तखत किए थे, जिसका मुख्य मकसद अमन-चैन स्थापित करके आर्थिक फायदा उठाना था. लेकिन, यूएई और बहरीन को छोड़कर, इस क्षेत्र में ज्यादातर इज्राएल को दबंग और सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं.

मसलन, फिलस्तीन को मदद करने और वेस्ट बैंक के कुछ हिस्सों पर इज्राएली कब्जे को लेकर सऊदी अरब और इज्राएल के बीच तनाव बढ़ रहा है. शायद इसी वजह से सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ रणनीतिक सुरक्षा रिश्ते और गहरे किए, कुछ हद तक एटमी हथियारों से लैस इज्राएल के खतरे से बचने के लिए.
अगर ईरान के साथ जंग के बाद इज्राएल का दबदबा ज्यादा बढ़ जाता है, तो जवाबी ताकत के तौर पर इस क्षेत्र के देश बड़ा गठबंधन बना सकते हैं.

तब पश्चिम एशिया में साझेदारियों और गठबंधनों में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. हालांकि, फिलहाल कोई भी पक्ष ऐसा हिसाब लगाने के करीब नहीं लगता है. जंग अभी भी दीर्घकालिक भू-राजनीतिक लक्ष्यों के बजाए फौरी फौजी मकसदों को लेकर है. और इसी वजह से यह बेहद खतरनाक है और अंदाजा लगाना मुश्किल है कि जंग कितने दिन चलेगी. 

अपनी हत्या की आशंका के मद्देनजर खामेनेई ने उत्तराधिकार के कई स्तर तैयार कर लिए थे, सिर्फ अपने पद का ही नहीं, बल्कि दूसरे अहम पदों की नियुक्तियां भी कर ली थीं.

कई विश्लेषक जंग की कोई बड़ी रणनीति नहीं देख पाते. एक कहते हैं, ''संभव है कि हम जिन फैसलों को बड़ी रणनीति मान रहे हैं, वे दिन-प्रति दिन बदलते हालात के साथ लिए जा रहे निर्णय हों.’’

ईरान में ट्रंप और उनके साथियों को हिकारत से 'एपस्टीन गैंग’  कहा जा रहा है, जो नाइंसाफी का गिरोह है, जबकि खामेनेई को आदर से हुसैन यानी शहादत का प्रतीक बताया जा रहा है.

पूर्व राजनयिक एस. अकबरुद्दीन कहते हैं कि आप सिर्फ अहम ठिकानों पर बमबारी या कुछ लोगों को मार कर यह नहीं कर सकते. जमीन पर फौज उतारनी होगी, और ईरान में घुसकर तख्तापलट कराना होगा.

विशेषज्ञों की राय: कब तक जारी रहेगी जंग?

ईरान और अमेरिका-इज्राएल के बीच जंग कब तक खिंचेगी और इसे कैसे रोका जा सकता है, इस पर विदेश नीति के विश्लेषकों ने अपनी राय साझा की है. संघर्ष के पूरे परिदृश्य और उसके संभावित नतीजों को लेकर उनकी राय काफी जुदा दिखी, पेश हैं बातचीत के कुछ अंश...

‘‘हम अभी अंधेरे में तीर चला रहे हैं’’

स्टेफेनी टी. विलियम्सछ सीनियर फेलो, सेंटर फॉर मिडिल ईस्ट पॉलिसी, ब्रूकिंग्स, वाशिंगटन डी.सी.

इसका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है कि जंग कब तक चलेगी, क्योंकि हमने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है. अमेरिका ऐसी स्थिति में है जहां नतीजों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है. हम अंधेरे में तीर चला रहे हैं, पूरी सोच अनुमानों के इर्द-गिर्द केंद्रित है. हमने सोच-समझकर एक धर्मतांत्रिक तानाशाही के खिलाफ गैर-कानूनी जंग शुरू की.

अमेरिकी सेना ने उसके नेता को भी मार डाला है. भले ही उसकी मौत पर आंसू बहाने वाले कम हों लेकिन उसकी जगह कोई और आ सकता है जो शायद उससे ज्यादा खतरनाक हो. ईरान 9.2 करोड़ लोगों का देश है, जहां दशकों से भ्रष्ट लोगों का गिरोह हथियारों के दम के पर शासन करता रहा है. आगे क्या होगा...ट्रंप प्रशासन को न तो इसका अंदाजा है और न ही उसकी कोई योजना है. अमेरिका को ईरान के बिखरने और उसके बाद फैलने वाली अराजकता के लिए तैयार रहना चाहिए, जो इराक और लीबिया में हमारी गलतियों जैसी स्थिति होगी.

‘‘अमेरिका अब अनपेक्षित नतीजों के नियम वाले दायरे में पहुंच गया है’’

‘‘ईरान संघर्ष को अंतरराष्ट्ररीय बनाना चाहता है’’
डॉ. हसन अलहसन: सीनियर फेलो, मिडिल ईस्ट पॉलिसी, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटजिक स्टडीज, मनामा, बहरीन

युद्ध कब तक चलेगा, यह बहुत हद तक सामरिक कारकों पर निर्भर करेगा—जैसे ईरान के पास मिसाइलों का कितना बड़ा भंडार है और अमेरिका व उसके साथी कितनी कुशलता से उन्हें इंटरसेप्ट कर पाते हैं. लेकिन कुछ रणनीतिक और राजनैतिक पहलू भी अहम हैं.

ईरान दोहरी रणनीति अपना रहा है. एक, वह खाड़ी देशों में ट्रंप के क्षेत्रीय सहयोगियों के महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमला कर उन पर दबाव बना रहा है ताकि वे अमेरिकी राष्ट्रपति को युद्ध जल्दी खत्म करने के लिए बाध्य करें. हालांकि, व्यावहारिक तौर पर इसने खाड़ी देशों को अमेरिका के और करीब ला दिया है.

दूसरी, ईरान होरमुज जल संधि से होने वाले व्यापार रोककर वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुक्सान पहुंचाना चाहता है, ताकि जंग को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाया जा सके. लेकिन यह दांव उल्टा पड़ सकता है, क्योंकि ब्रिटेन और फ्रांस ने इस क्षेत्र में सेनाएं तैनात करनी शुरू कर दी हैं. अंतत:, बात इस पर टिकती है कि कौन-सा पक्ष युद्ध के नतीजे झेलने की ज्यादा राजनैतिक इच्छाशक्ति रखता है.

‘‘यह इस बात पर निर्भर करेगा कि किस पक्ष के पास युद्ध का असर झेलने की राजनैतिक इच्छाशक्ति है’’

‘‘इसके लंबे समय की थकाऊ जंग बन जाने का जोखिम’’
गद्दाम धर्मेंद्र: ईरान में भारत के पूर्व राजदूत

संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है और इसके एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील होने का खतरा मंडरा रहा है. ईरान ने खाड़ी सहयोग परिषद के देशों को अमेरिकी सैन्य अड्डों की मेजबानी न करने की चेतावनी दी है. साथ ही यह भी कहा है कि इन ठिकानों से होने वाले हमलों से वे खुद को अलग रखें. ईरान कोई वेनेजुएला नहीं है; उसके शीर्ष नेतृत्व को खत्म करके सत्ता गिरा देने का अमेरिका का मंसूबा एक बड़ी गलतफहमी साबित हुआ है.

यह बात भी काफी हैरान करने वाली है कि अमेरिका-इज्राएल में युद्ध के उद्देश्यों और अंतिम लक्ष्य को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है. राष्ट्रपति ट्रंप का यह दावा कि संघर्ष 'कुछ हफ्तों’ तक ही चलेगा जो कि ईरान की जंग झेलने और पलटवार करने की क्षमता को बहुत कम करके आंकने का संकेत देता, जिसने अमेरिका को पिछले कुछ दशकों के सबसे बड़े संकट में उलझा दिया है.

‘‘ईरान कोई वेनेजुएला नहीं है; उसके शीर्ष नेतृत्व को खत्म करके सत्ता गिरा देने का अमेरिका का मंसूबा एक बड़ी गलतफहमी साबित हुआ है.’’

‘‘अमेरिका की करारी हार से इसकी समाप्ति होगी’’

सैयद आकिफ जैदीछ रिसर्च स्कॉलर, अल-मुस्तफा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, कोम, ईरान

ईरान की तरफ से लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों की बौछार, हर गुजरते दिन के साथ यह स्पष्ट करती जा रही है कि जंग का अंत अमेरिका की करारी हार और उसके सैन्य वर्चस्व के पतन के साथ होगा. अमेरिका महज एक सामान्य देश बनकर रह जाएगा—जो अपने दूतावास चलाएगा और व्यापार करेगा—लेकिन अब वह इस क्षेत्र में अपनी मर्जी नहीं थोप पाएगा, न ही अपना दबदबा या सैन्य ठिकाने बनाए रख पाएगा.

इस जंग का दूसरा नतीजा इज्राएल का पतन और फिलस्तीन का उदय होगा. मैं पूरे यकीन के साथ नहीं कह सकता कि यह सब इसी जंग से तय होगा लेकिन इतना जरूर है कि इस्राएल में सत्ता परिवर्तन जरूर होगा. वह समय दो दिनों में आ सकता है; और एक हफ्ता या उससे अधिक समय भी लग सकता है. इसके बाद एक नई व्यवस्था आएगी जो फिलस्तीन के निर्माण को स्वीकारने की अपनी इच्छा जाहिर करेगी.

‘‘इस जंग का दूसरा नतीजा इज्राएल का पतन और फिलस्तीन का उदय होगा’’
राजा कार्तिकेय: ईरान में तैनात रह चुके पूर्व अंतरराष्ट्रीय सिविल सर्वेंट

‘‘चार संभावित परिस्थितियां इस युद्ध को खत्म कर सकती हैं’’
इस जंग का खत्म होना चार संभावित परिदृश्यों पर निर्भर करता है. पहला-सैन्य स्थिति, जब ईरान के पास मिसाइलें खत्म हो जाएं या फिर उसकी कमान-नियंत्रण प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो जाए और इसकी वजह से आंतरिक राजनीतिक परिवर्तन हो.

हालांकि, अभी ईरान की सरकार अपनी स्थिति मजबूत बनाए हुए है. दूसरा, खाड़ी देशों के पास ईरानी मिसाइल हमलों को रोकने वाले इंटरसेप्टर खत्म हो जाएं और वे खुलकर अमेरिका और इज्राएल के साथ आकर जंग में शामिल होने का फैसला कर लें, जिससे युद्ध और भी गंभीर हो जाएगा.

तीसरा कारण राजनीतिक है, जिसमें बढ़ते आर्थिक नुक्सान का सामना करते हुए खाड़ी देश अमेरिका पर युद्ध रोकने का दबाव डालें. चौथा परिदृश्य अप्रत्याशित स्थिति से जुड़ा हो सकता है, जब जंग के कारण क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट के मद्देनजर भारत जैसे बड़े प्रवासी आबादी वाले देशों सहित प्रभावित देश अमेरिका पर जंग रोकने का दबाव बढ़ाएं.

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