दोहरा झटका
महंगे तेल-गैस आयात और खाड़ी देशों में रहकर काम कर रहे लाखों भारतीयों की तरफ से भेजे जाने वाले धन यानी रेमिटेंस में कमी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकती है.

पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष भारत के लिए दोहरा आर्थिक झटका बन सकता है. एक तरफ तेल और गैस की आपूर्पि में रुकावट से ऊर्जा की कीमतें बढ़ सकती हैं. दूसरी तरफ खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) देशों—यूएई, सऊदी अरब, ओमान, बहरीन, कतर और कुवैत—में काम कर रहे लाखों भारतीय प्रवासियों की आजीविका भी दबाव में आ सकती है. इससे उनकी तरफ से भेजे जाने वाले धन या रेमिटेंस पर भी असर पड़ सकता है.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, लेकिन यह अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 89 फीसद आयात करता है. भारत में तेल की खपत रोजाना 50 लाख बैरल है, चीन की खपत 1.52 करोड़ बैरल और अमेरिका की करीब दो करोड़ बैरल प्रति दिन है.
कुछ समय पहले तक तेल की कीमत 65 से 70 डॉलर प्रति बैरल के बीच थी. लेकिन ईरान पर अमेरिका-इज्राएल के हमलों के बाद कीमतें बढ़ रही हैं. 5 मार्च को ब्रेंट क्रूड 83.9 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. विश्लेषकों का मानना है कि अगर संघर्ष लंबा खिंचता है तो क्रूड की कीमत 90 डॉलर के पार जा सकती है.
इसकी एक वजह यह है कि ईरान के जवाबी हमलों में जीसीसी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों के साथ ऊर्जा ढांचे को भी निशाना बनाया गया. सबसे बड़ा एलएनजी उत्पादक कतर भी तनाव बढ़ने के बीच 3 मार्च से अपना उत्पादन पूरी तरह रोक चुका है.
कीमतें बढ़ने के बीच केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि सरकार देश में पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता और इसकी उचित कीमतें सुनिश्चित करेगी. लेकिन यह आसान नहीं होगा. भारत के पास इस समय पेट्रोलियम का भंडार करीब 74 दिनों के लिए ही है, जबकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आइईए) के मानकों के हिसाब से यह 90 दिनों की जरूरत के बराबर होना चाहिए. जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर बिस्वजीत धर कहते हैं, ''हम तैयारी में चूक गए. आइईए के मानकों तक हम क्यों नहीं पहुंच पाए? हमारी तैयारी में बड़ा गैप है.’’
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी भारत के आयात बिल को तेजी से बढ़ा सकती है. रेटिंग एजेंसी इक्रा में कॉर्पोरेट रेटिंग के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और को-ग्रुप हेड प्रशांत वशिष्ठ कहते हैं, ''कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल सालाना लगभग 14 अरब डॉलर (करीब 1.29 लाख करोड़ रुपए) बढ़ जाएगा.’’ पिछले साल भारत का कच्चे तेल का आयात बिल करीब 143 अरब डॉलर था. उस दौरान देश ने लगभग 24.5 करोड़ टन तेल आयात किया, जो रोजाना करीब 47 से 49 लाख बैरल के बराबर है.
एक और बड़ी चिंता है होरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर संभावित असर. फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा चोकपॉइंट्स में से एक है. दुनिया के करीब एक-चौथाई तेल शिपमेंट और लगभग एक-तिहाई एलएनजी व्यापार के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल होता है. ईरान की धमकियों के बाद समुद्री बीमा कंपनियों ने खाड़ी में चलने वाले जहाजों के लिए युद्ध जोखिम बीमा कवर वापस ले लिया है.
इससे नई दिल्ली के सामने मुश्किल स्थिति बन गई है. भारत के करीब आधे कच्चे तेल का आयात और लगभग 55 फीसद एलएनजी आपूर्ति इसी रास्ते से आती है. हाल के महीनों में भारत ने रियायती रूसी तेल की खरीद कुछ कम करनी शुरू की थी, जो ऐसे संकट में एक तरह का सहारा हो सकता था. यह कदम अमेरिका के कूटनीतिक दबाव के बाद उठाया गया था.
फिर भी दिसंबर 2025 तक रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 31.5 फीसद थी. इसके बाद इराक 24 फीसद, सऊदी अरब 13.8 फीसद और यूएई 11.2 फीसद हिस्सेदारी के साथ आते हैं. लेकिन अब पश्चिम एशिया से आने वाली आपूर्ति की स्थिरता भी अनिश्चित दिख रही है. प्रशांत वशिष्ठ कहते हैं, ''अगर पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति लंबे समय तक बाधित होती है तो उसकी पूरी भरपाई करना लगभग असंभव होगा.’’
बिस्वजीत धर चेतावनी देते हैं, ''तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दोहरा झटका बनेंगी.’’ महंगा आयात घरेलू महंगाई को बढ़ा सकता है, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक के मुद्रास्फीति लक्ष्य पर असर पड़ेगा. इसके साथ ही देश का चालू खाता घाटा (सीएडी) भी बढ़ सकता है, क्योंकि भारत को कमाई से ज्यादा खर्च करना पड़ेगा. इसका असर कमजोर मुद्रा, ज्यादा महंगाई और बढ़ते विदेशी कर्ज के रूप में दिख सकता है. धर कहते हैं, ''जीसीसी देशों में काम कर रहे भारतीयों से आने वाली रेमिटेंस घटने से सीएडी पर और दबाव पड़ेगा.’’
खाड़ी सहयोग परिषद के छह देशों में करीब 93.7 लाख भारतीय रहते और काम करते हैं. वित्त वर्ष 2024-25 में विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने करीब 135.5 अरब डॉलर (लगभग 12.5 लाख करोड़ रुपए) भारत भेजे. इसमें से 38 फीसद यानी लगभग 51.5 अरब डॉलर (4.7 लाख करोड़ रुपए) जीसीसी देशों से आए. अकेले यूएई से कुल रेमिटेंस का लगभग पांचवां हिस्सा आता है. अगर खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है, तो यह पैसा तेजी से कम हो सकता है.
कूटनीतिक मोर्चे पर भी हालात संवेदनशील हो गए हैं. संघर्ष शुरू होने से कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इज्राएली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ द्विपक्षीय बैठक की थी. कई पर्यवेक्षकों ने इसे इस संकेत के रूप में देखा कि नई दिल्ली अमेरिका-इज्राएल रणनीतिक धुरी की ओर थोड़ा और झुक रही है. पिछले दशक में भारत ने इज्राएल के साथ रक्षा, तकनीक और खुफिया सहयोग को लगातार मजबूत किया है. लेकिन युद्ध के इतने करीब हुई इस मुलाकात के वन्न्त ने यह सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या पश्चिम एशिया में भारत का पारंपरिक संतुलन बनाए रखना अब और मुश्किल हो रहा है.
व्यावहारिक नजरिये से देखें तो भारत के सबसे अहम आर्थिक हित जीसीसी के देशों में हैं. ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और वहां रह रहे लाखों भारतीयों की भलाई सीधे तौर पर इन्हीं देशों से जुड़ी है. तनाव बढ़ने के साथ विश्लेषकों का कहना है कि इस मुलाकात के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या भारत पहले की तरह सभी पक्षों के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रख पाएगा, या फिर बदलते भू-राजनीतिक दबाव उसे क्षेत्र में किसी एक पक्ष के साथ अधिक स्पष्ट रूप से खड़ा होने पर मजबूर कर सकते हैं.
यह जंग सवाल पैदा करती है कि क्या भारत लगातार सभी पक्षों से संतुलन की अपनी कूटनीति जारी रखेगा या भू-राजनीति उसे किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने पर बाध्य करेगी.