निकोबार पर नया विवाद
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर 81,000 करोड़ रुपए की बंदरगाह और प्रतिरक्षा परियोजना को मंजूरी दी. पर्यावरणवादी मान रहे इसे वहां की अनूठी जैव-विविधता के विनाश का फरमान.

दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री कछुआ लेदरबैक (डर्मोचेलिस कोरियासी) दो मीटर तक लंबा हो सकता है और उसका वजन 600 किलो से ज्यादा होता है. उसे अपना नाम अपनी मांसल खोल के कारण मिला है, जो चमड़े जैसा लगता है. दूसरे समुद्री कछुओं के उलट, लेदरबैक कछुओं की चमड़ी सख्त नहीं होती. पूर्वोत्तर हिंद महासागर के निकोबार द्वीप समूह में इस लुप्तप्राय प्रजाति के लगभग 94 फीसद ठिकाने (1,000 से ज्यादा) हैं. रोशनी, शोर और समुद्री तटों की स्थिरता में हल्की-सी हलचल भी उनके अंडों से निकलने वाले शिशु कछुओं की जिंदगी के लिए जोखिम पैदा कर सकती है.
अंदेशा: पर्यावरणविद् बताते हैं कि गैलाथिया खाड़ी इन कछुओं का बड़ा ठिकाना है. इस इलाके का वर्गीकरण तटीय क्षेत्र नियमन (सीआरजेड)—1ए के तौर पर किया गया है, जिसका मतलब है कि यह पारिस्थितिकी के लिहाज से बेहद संवेदनशील इलाका है जहां निर्माण गतिविधियों पर पूरी तरह रोक है. वे चेतावनी देते हैं कि बंदरगाह बनाने की प्रस्तावित योजना के लिए लाखों टन रेत और गाद निकालने की जरूरत होगी, जिससे इन नाजुक इलाकों की स्थिति हमेशा के लिए बर्बाद हो सकती है और कछुओं की रिहाइश खत्म हो सकती है.
जवाब: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मुताबिक, जून 2023 में विशेषज्ञों के नेतृत्व में 'जमीनी सचाई’ जानने की कवायद की गई. उस समीक्षा में पाया गया कि परियोजना का कोई भी हिस्सा सीआरजेड-1ए जोन में नहीं आता है. मंत्रालय ने ग्रेट निकोबार आइलैंड के पश्चिमी तट पर पेमय्या के आसपास 13.75 वर्ग किमी इलाके में लेदरबैक कछुआ अभयारण्य और 500-मीटर का संरक्षित बफर जोन बनाने का भी प्रस्ताव किया है. गैलाथिया खाड़ी, पेमय्या खाड़ी, अलेक्जेंड्रिया खाड़ी, कैजुरीना खाड़ी और डोगमार के पश्चिमी किनारे समेत महत्वपूर्ण घोंसले वाले समुद्री तटों को सख्ती से नो-डेवलपमेंट जोन का दर्जा दिया गया है और कछुओं के ठिकानों की 'सुरक्षा’ आश्वस्त करने के लिए घोंसले बनाने और अंडे सेने के सीजन के दौरान उन पर निरंतर निगरानी रखी जाएगी.
दिन के समय गैलाथिया खाड़ी, जो ग्रेट निकोबार द्वीप के जंगली छोर पर अर्धचंद्राकार रेत की पट्टी है, हिंद महासागर के बदलते नीले और पन्ना-से रंगों में नहाई रहती है. उसके पीछे घना उष्णकटिबंधीय जंगल है, जिसमें ऐसी वनस्पतियां और जीव-जंतु हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलते. हरियाली को दोफाड़ करके बहते झरने और जलधाराएं. वे मैंग्रोव से घिरी खाड़ियों में जा मिलती हैं, जहां खारे पानी के मगरमच्छ शांत मुहानों पर धूप सेकते हैं.
फरवरी में यहां शुष्क मौसम होता है. हवा गर्म और उमस भरी रहती है. लेकिन रात होते ही यह समुद्र तट ठंडा, अंधेरा और शांत हो जाता है. चांदनी समुद्र पर चांदी-सी चमक बिखेर देती है. तभी पानी से एक विशाल आकृति उभरती है और धीरे-धीरे रेत पर चढ़ती है. करीब दो मीटर लंबा, 400 किलो से ज्यादा वजनी, धरती के सबसे बड़े समुद्री कछुओं में से एक. वह लेदरबैक कछुआ है.
इसे कुदरत का अजूबा ही कहा जाएगा. यह मादा कछुआ ऑस्ट्रेलिया के तट से 6,000 किलोमीटर से ज्यादा तैरकर आई है. छह महीने से भी लंबी यह यात्रा उसे उसी समुद्र तट पर वापस लाती है जहां उसका जन्म हुआ था. उसके दिमाग में दर्ज चुंबकीय दिशा उसे रास्ता दिखाती है. वह सही जगह तलाश कर अपने डैनों से रेत में गहरी खाई बनाती है और करीब सौ अंडे उस गड्ढे में रख देती है. यह आदिम अनुष्ठान गैलाथिया खाड़ी को दक्षिण-पूर्व एशिया में विशाल लेदरबैक कछुओं का सबसे बड़ा नेस्टिंग ग्राउंड बनाता है.
डायनोसोर जितने पुराने ये जीव ग्रेट निकोबार की अनूठी जैव विविधता का सिर्फ एक हिस्सा हैं. यूनेस्को में सूचीबद्ध इस संरक्षित बायोस्फीयर में आपको निकोबार मेगापोड भी मिलेगा. मुर्गी के आकार का यह पक्षी अपने असामान्य बड़े पैरों के कारण जाना जाता है. यह जंगल की जमीन पर मिट्टी का टीला बनाकर घोंसला तैयार करता है और द्वीप की नाजुक पारिस्थितिकी के लिए अहम प्रजाति माना जाता है. यहां निकोबार मकाक, विशाल रॉबर क्रैब, दुर्लभ तितलियां और ऑर्किड भी मिलते हैं. समुद्र के भीतर कोरल रीफ और आसपास का पानी 53 वंशों और 15 परिवारों में फैली 245 से ज्यादा दुर्लभ जलीय प्रजातियों का घर माना जाता है.
द्वीप के घने भीतरी जंगलों में शोंपेन समुदाय रहता है. यह शिकारी-संग्रहकर्ता आदिवासी समाज है, जिसकी आबादी बमुश्किल 350 है. वे सदियों से इन जंगलों में रहते आए हैं और बाहरी दुनिया से संपर्क बेहद सीमित है. इसके अलावा करीब 450 निकोबारी भी हैं, जिन्हें 2004 की सूनामी में घर उजड़ने के बाद यहां बसाया गया था.
यह निर्मल पर्यावरण अब खतरे में पड़ सकता है. चिंता की वजह है 81,000 करोड़ रुपए का विवादित बंदरगाह और रक्षा परियोजना, जिसे 16 फरवरी को राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) की कोलकाता पीठ ने मंजूरी दे दी. इससे प्रोजेक्ट साकार होने की दिशा में बड़ा कदम उठ गया है. ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट का केंद्र बिंदु 44,000 करोड़ रुपए का अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट है, जो गैलाथिया खाड़ी में बनेगा. सरकार का दावा है कि इससे यह दूरस्थ द्वीप दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक पर रणनीतिक केंद्र बन जाएगा.
166 वर्ग किलोमीटर में फैले इस मेगा प्रोजेक्ट में एक नया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, 400 मेगावाट का ग्रीन पावर प्लांट और इको-टूरिज्म तथा रेजिडेंशियल टाउनशिप भी शामिल है, जहां 1.25 लाख लोगों के रहने की योजना है. हवाई अड्डे को नागरिक और सैन्य दोनों उपयोग के लिए बनाया जाएगा. लेकिन रक्षा परियोजना के विस्तृत ब्योरे, जिनमें संभावित नौसैनिक अड्डे की जानकारी भी शामिल है, सिर्फ एनजीटी पीठ को सीलबंद लिफाफे में दिए गए. राष्ट्रीय सुरक्षा के कारण उन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया.
विवादों के बीच मिली हरी झंडी
एनजीटी का 16 फरवरी का फैसला तीन साल चली कानूनी लड़ाई का अंत था. यह मामला शुरू हुआ था जब पर्यावरणविद् आशीष कोठारी ने प्रोजेक्ट को दी गई पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी. ट्रिब्यूनल ने मंजूरी को बरकरार रखा, लेकिन साफ कहा कि इसमें तय कड़े सुरक्षा उपायों का सख्ती से पालन जरूरी होगा. पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने एनजीटी के फैसले का स्वागत करते हुए इंडिया टुडे से कहा, ''यह प्रोजेक्ट रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है. इससे अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की मौजूदगी मजबूत होगी और एक बड़े ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल के साथ आर्थिक हब बनेगा. यह भारत की वैश्विक व्यापार में स्थिति को ताकत देने का बड़ा मौका है.’’ (देखें बातचीत)
लेकिन कानूनी और पर्यावरण विशेषज्ञ इस फैसले की तीखी आलोचना कर रहे हैं. पर्यावरण वकील ऋत्विक दत्ता कहते हैं, ''फैसले में ऐसा कुछ नहीं दिखता जिससे लगे कि तकनीकी ज्ञान या विशेषज्ञों की राय को गंभीरता से परखा गया. छह सदस्यीय पीठ में विशेषज्ञ शामिल थे लेकिन निर्णय में उनकी विशिष्ट तकनीकी समीक्षा का संकेत नहीं मिलता.’’ उनका कहना है, ''पूरा मामला ऐसे देखा गया जैसे यह सिर्फ प्रक्रिया की समीक्षा हो. यानी यह जांचना कि प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं, न कि पर्यावरणीय असर का गहराई से मूल्यांकन.’’
गौरतलब है कि दत्ता ने 2004 में भूपेंद्र यादव के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट ऑन फॉरेस्ट कन्जर्वेशन नामक किताब लिखी थी. यादव पर्यावरण मंत्री तो बहुत बाद में बनेे. आज दोनों की राय बिल्कुल अलग दिशा में खड़ी दिखती है. दत्ता कहते हैं, ''न्यायिक समीक्षा और गुण-दोष की समीक्षा में फर्क होता है. न्यायिक समीक्षा में अदालत यह देखती है कि प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं. लेकिन एनजीटी को गुण-दोष समीक्षा करनी चाहिए थी क्योंकि उसके पास तकनीकी पहलुओं को परखने के लिए विशेषज्ञ सदस्य होते हैं. एनजीटी का मूल उद्देश्य एहतियाती सिद्धांत को लागू करना है. यही पर्यावरण कानून की बुनियाद है. यानी संभावित पर्यावरणीय नुक्सान को पहले से भांपकर उसे रोकना.’’
कुछ अन्य कानूनी विशेषज्ञ एक और बड़ी चिंता की ओर इशारा करते हैं. उनका कहना है कि एनजीटी जिन प्रोजेक्ट को मंजूरी देता है, उनसे जुड़ी पर्यावरणीय शर्तों के पालन में अक्सर कमजोरी रहती है. वे यह भी बताते हैं कि खुद एनजीटी इस समय अपनी तय क्षमता के लगभग आधे सदस्यों के साथ काम कर रहा है. यह फैसला पर्यावरण कार्यकर्ताओं के लिए झटका जरूर है, लेकिन अब उनकी उम्मीदें कोलकाता हाइकोर्ट पर टिकी हैं. वहां इस प्रोजेक्ट के खिलाफ कई याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है, जिनमें आशीष कोठारी की याचिकाएं भी हैं.
यह प्रोजेक्ट राजनैतिक विवाद का केंद्र भी बन चुका है. पिछले साल सितंबर में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने कहा था कि इस योजना को ''संवेदनहीन तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है, जिससे कानूनी और विचार-विमर्श की प्रक्रियाओं का मजाक बन रहा है.’’ राहुल गांधी ने इससे पहले प्रोजेक्ट में कथित नियामकीय उल्लंघनों और जनजातीय समुदायों पर इसके असर को लेकर सवाल उठाए थे. लेकिन पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश सबसे ठोस और निरंतर आलोचना कर रहे हैं. उन्होंने इस प्रोजेक्ट को ''पर्यावरण और मानवता दोनों के लिए आपदा’’ बताया है.
अगस्त 2024 में इस मुद्दे पर उनका यादव के साथ लंबा सार्वजनिक संवाद भी हुआ था. हाल में आए एनजीटी के फैसले को रमेश ने बेहद निराशाजनक बताया. उन्होंने एक्स पर लिखा, ''इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि यह प्रोजेक्ट गंभीर पारिस्थितिक नुक्सान पहुंचाएगा. एनजीटी जिन शर्तों का हवाला दे रहा है, वे इन दीर्घकालिक प्रभावों से निबटने में बहुत कम मदद करेंगी. यह मामला अभी कोलकाता हाइकोर्ट में विचाराधीन है और फिलहाल वही उम्मीद की एक किरण है.’’
व्यावसायिक बढ़त की दलील
कई चिंताओं के बावजूद मोदी सरकार इस प्रोजेक्ट पर अडिग है. मंत्रालय के अधिकारियों का तर्क है कि व्यावसायिक नजरिए से गैलाथिया खाड़ी इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (आइसीटीटी) पूर्व-पश्चिम समुद्री मार्ग पर चलने वाले जहाजों के कारोबार को आकर्षित कर सकता है. इसकी खासियत है मलक्का जलडमरूमध्य के नजदीक होना. यह डीपवॉटर पोर्ट भविष्य में 1.6 करोड़ टीईयू (ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट यूनिट) क्षमता तक पहुंचने की योजना के साथ तैयार किया जा रहा है.
यहां बड़े अंतरमहाद्वीपीय जहाजों से कंटेनर उतारे जाएंगे और फिर उन्हें छोटे फीडर जहाजों के जरिए बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और अरब सागर के बंदरगाहों तक पहुंचाया जाएगा. पहले चरण में 20 मीटर प्राकृतिक गहराई वाली इस डीपवॉटर साइट पर काम होगा. इसकी अनुमानित लागत 18,000 करोड़ रुपए है और 2028 तक इसके चालू होने की उम्मीद है. भारत में यह दूसरी ऐसी सुविधा होगी. इससे पहले तिरुवनंतपुरम का विझिंजम इंटरनेशनल सीपोर्ट पिछले साल मई में शुरू हुआ.
भारत की विदेशी ट्रांसशिपमेंट जरूरत फिलहाल करीब 30 लाख टीईयू सालाना आंकी जाती है. यह लगभग 200 बड़े कंटेनर जहाजों के बराबर माल है. इस ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा कोलंबो और सिंगापुर के बंदरगाह संभालते हैं, जिस पर भारत को हर साल करीब 20 करोड़ डॉलर (1,800 करोड़ रुपए) खर्च करने पड़ते हैं. विझिंजम इंटरनेशनल सीपोर्ट फिलहाल करीब 10 लाख टीईयू ट्रांसशिपमेंट कार्गो संभाल सकता है. इसके मुकाबले ग्रेट निकोबार का प्रस्तावित आइसीटीटी पहले चरण में 2028 तक 40 लाख टीईयू संभालने का लक्ष्य रखता है.
आगे 25 साल में इसे बढ़ाकर 1.6 करोड़ टीईयू तक ले जाने की योजना है. मलक्का जलडमरूमध्य से महज 40 नॉटिकल मील की दूरी पर स्थित यह पोर्ट सिर्फ भारत से जुड़े ट्रांसशिपमेंट ट्रैफिक को नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कार्गो को भी आकर्षित करने का लक्ष्य रखता है, जो अभी कोलंबो और सिंगापुर के जरिए जाता है. शर्त यही है कि यह लागत के लिहाज से प्रतिस्पर्धी साबित हो. केंद्रीय जहाजरानी, बंदरगाह और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इंडिया टुडे को बताया, ''आइसीटीटी हमें एक अग्रणी समुद्री राष्ट्र बनाएगा. हमें ऐसी सुविधाएं विकसित करनी होंगी कि शिपलाइनर यहां आकर लगें. यहां जहाज लगने का मतलब है हमारी आमदनी बढ़ रही है. मैं रोजगार के अवसर पैदा कर रहा हूं.’’
प्रोजेक्ट फाइनेंसर तथा वकील ए. बालसुब्रह्मण्यम को इसकी आर्थिक तर्कसंगतता मजबूत लगती है. उनका कहना है, ''भारत का व्यापार बढ़ रहा है. ऐसे आउटलेट की जरूरत है. ट्रांसशिपमेंट में विशेषज्ञता चाहिए. प्रोजेक्ट की लागत बहुत ज्यादा है और रिटर्न जल्दी नहीं आते, लेकिन इसका मल्टीप्लायर इफेक्ट होगा.’’ वे यह भी कहते हैं कि अगर प्रोजेक्ट छोड़ दिया गया तो भारत बड़ी मात्रा में ट्रैफिक खो देगा. ''हमारे बंदरगाहों का दबाव कम करने की योजना अधूरी रह जाएगी.
बंदरगाह के साथ पूरा इकोसिस्टम बनता है—बैंकिंग, बीमा, शिप ब्रोकिंग, कस्टम, अन्य सेवाएं.’’ लेकिन संदेह करने वाले पूछते हैं कि क्या अनुमानित कार्गो वॉल्यूम इतनी बड़ी लागत और पर्यावरणीय नुक्सान को सही ठहराते हैं. समुद्री नीति विशेषज्ञ तथा पूर्व नौसैनिक अधिकारी अभिजित सिंह का मानना है कि ग्रेट निकोबार में आइसीटीटी की लोकेशन का तर्क कमजोर है. कोलंबो के विपरीत, यहां न तो बड़ा शहरी केंद्र है, न औद्योगिक क्षेत्र और न ही मजबूत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, जो पोर्ट को सहारा दे सके.
एक लेख में उन्होंने लिखा कि भौगोलिक स्थिति किफायती फीडर नेटवर्क खड़ा करने में इसकी सबसे बड़ी बाधा बन सकती है. वे कहते हैं, ''ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट निस्संदेह महत्वाकांक्षी है. लेकिन आर्थिक और लॉजिस्टिक हकीकतों से अलग महत्वाकांक्षा सफलता की गारंटी नहीं होती. विश्वस्तरीय बंदरगाह अगर ग्राहकों के बिना खड़ा रह जाए, तो वह न प्रभाव पैदा करेगा और न विकास. वह गलत दिशा में लगी महत्वाकांक्षा का सबक बन सकता है.’’
रणनीतिक अनिवार्यता
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह की रणनीतिक अहमियत को कम करके नहीं आंका जा सकता. हिंद महासागर की अहम समुद्री लाइनों के बीच स्थित यह द्वीपसमूह निगरानी और जरूरत पड़ने पर चीनी समुद्री गतिविधियों का जवाब देने के लिए स्वाभाविक चौकी की तरह है. भारत के पास पहले से ही पोर्ट ब्लेयर में एकीकृत अंडमान और निकोबार कमान (एएनसी) है. यह पूर्वी हिंद महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य में नौसैनिक गतिविधियों पर नजर रखने वाला प्रमुख समुद्री निगरानी केंद्र है. यह दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर अग्रिम अड्डे की तरह भी काम करता है और क्षेत्र में चीनी नौसैनिक तैनाती पर नजर रखता है. ग्रेट निकोबार की कैंपबेल खाड़ीे में भारत आइएनएस बाज नामक नौसैनिक एयर स्टेशन भी है. यह समुद्री गश्त, निगरानी मिशन और सीमित फाइटर तैनाती में मदद करता है.
इन द्वीपों पर सैन्य ढांचे का लगातार विस्तार हो रहा है. इसमें हवाई पट्टियों और जेटियों का आधुनिकीकरण, लॉजिस्टिक्स और भंडारण सुविधाओं को मजबूत करना और निगरानी प्रणाली को उन्नत करना शामिल है. भारतीय तटरक्षक के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक विजय दिगंबर चाफेकर का मानना है कि भारत ने अब तक इन द्वीपों की रणनीतिक स्थिति का पूरा उपयोग नहीं किया है. एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकताएं हैं, तो दूसरी तरफ पर्यटन और व्यापार की संभावनाएं. वे कहते हैं, ''भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल की जरूरतों को देखते हुए यहां बुनियादी ढांचे के विकास की रफ्तार तेज करनी होगी.’’
कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि ग्रेट निकोबार में प्रस्तावित रक्षा ढांचा मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित है. यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री चोकपॉइंट में से एक है. यहां मौजूदगी भारत को अहम समुद्री मार्गों पर लॉजिस्टिक गहराई देगी और जरूरत पड़ने पर चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए तेज तैनाती संभव करेगी. साथ ही यह क्वाड साझेदारों के लिए भी एक बड़ा लॉजिस्टिक नोड बन सकता है.
पूर्व नौसेना प्रमुख तथा एकीकृत अंडमान-निकोबार कमान के पहले कमांडर-इन-चीफ एडमिरल अरुण प्रकाश कहते हैं, ''अंडमान-निकोबार की रणनीतिक अहमियत इस बात में है कि द्वीप आधारित बल बंगाल की खाड़ी में व्यापार और ऊर्जा मार्गों की निगरानी कर सकते हैं और जरूरत पड़े तो उन्हें बाधित भी कर सकते हैं. यही चीन की कमजोरी है. शंघाई से लाल सागर और फारस की खाड़ी तक जाने वाले समुद्री मार्ग 11,000 किलोमीटर से ज्यादा लंबे हैं, जिनमें लगभग 2,000 किलोमीटर हिस्सा बंगाल की खाड़ी से होकर गुजरता है.’’
लेकिन संशय रखने वाले, जिनमें अभिजीत सिंह भी शामिल हैं, पूछते हैं कि सैन्य मिशन के समर्थन के लिए एक व्यावसायिक बंदरगाह क्यों जरूरी है. उनका कहना है कि आइएनएस बाज पहले से निगरानी अभियानों में मदद करता है और अभी तक चीनी नौसेना ने इस क्षेत्र में भारतीय हितों को सीधे चुनौती नहीं दी है.
पारिस्थितिक चिंताएं
पर्यावरण विशेषज्ञों ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर तीन बड़ी चिंताएं उठाई हैं. उनका कहना है कि इससे द्वीप की पारिस्थितिकी को गहरा नुक्सान हो सकता है. सरकार ने एनजीटी के सामने जो दस्तावेज दिए, उनके मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के लिए 130.75 वर्ग किलोमीटर घने उष्णकटिबंधीय जंगल की कटाई करनी होगी. इसका मतलब करीब 7,11,000 पेड़ों को गिराना होगा. इंडिया टुडे से बातचीत में भूपेंद्र यादव का कहना है कि जमीन साफ होने के बाद भी ग्रेट निकोबार का 82 फीसद हिस्सा जंगलों से घिरा रहेगा. उनका तर्क है कि यह राष्ट्रीय वन नीति 1988 के अनुरूप है, जिसमें पहाड़ी और पर्वतीय इलाकों में कम से कम दो-तिहाई क्षेत्र जंगल होना चाहिए.
पर्यावरणविद इस दावे को भ्रामक बताते हैं. उनका कहना है कि प्रोजेक्ट से ग्रेट निकोबार के कुल जंगल क्षेत्र का करीब 15 फीसद हिस्सा प्रभावित हो सकता है. यादव हरियाणा और मध्य प्रदेश में प्रस्तावित क्षतिपूरक वनीकरण का भी हवाला देते हैं, जो खाली की गई जमीन से 'दोगुना’ बताया जा रहा है. लेकिन विशेषज्ञ पूछते हैं कि क्या प्राचीन द्वीपीय वर्षावनों की भरपाई किसी दूसरे भौगोलिक और पारिस्थितिक तंत्र में लगाए गए पौधों से की जा सकती है. उनका कहना है कि दोनों पारिस्थितिकीय तंत्र पूरी तरह अलग हैं और इस तुलना का कोई आधार नहीं.
दूसरी बड़ी चिंता द्वीप की दुर्लभ और स्थानिक जैव विविधता को लेकर है. ग्रेट निकोबार के समुद्र तट, जिनमें गैलाथिया खाड़ी भी शामिल है, संकटग्रस्त लेदरबैक कछुओं के करीब 650 नेस्टिंग साइट के ठिकाने हैं. बढ़ती पोर्ट गतिविधि से अंडों से निकलने वाले कछुओं के जीवित रहने पर खतरा मंडरा सकता है. पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि उसने वन्यजीव संरक्षण के लिए कई रिजर्व घोषित किए हैं. लिटिल निकोबार में 13.75 वर्ग किलोमीटर का लेदरबैक टर्टल रिजर्व, मेंचल द्वीप पर 1.29 वर्ग किलोमीटर का मेगापोड अभयारण्य और मेरोए द्वीप पर 2.73 वर्ग किलोमीटर का कोरल सैंक्चुअरी.
लेकिन पर्यावरणविद इन उपायों को पर्याप्त नहीं मानते. उनका कहना है कि प्रस्तावित रोकथाम उपाय जमीन पर कितने प्रभावी होंगे, यह बड़ा सवाल है.
वास स्थानों के नुक्सान से आगे बढ़कर संरक्षण विशेषज्ञ एक और खतरे की ओर इशारा करते हैं. उनका कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर आबादी बढ़ने से पारिस्थितिकी पर शृंखलाबद्ध असर पड़ेगा. आज द्वीप की आबादी करीब 8,500 है. 2050 तक यह 6.5 लाख तक पहुंच सकती है. तुलना करें तो पूरे अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह की मौजूदा आबादी 4.5 लाख से भी कम है. चिंताओं में कचरा और प्रदूषण बढ़ना, मीठे पानी की कमी, बाहरी प्रजातियों का फैलाव और बचे हुए जंगलों का टुकड़ों में बंटना शामिल है.
मामला सिर्फ ग्रेट निकोबार तक सीमित नहीं. यहां की कोरल रीफ, जो पहले ही बढ़ते समुद्री तापमान से जूझ रही हैं, अंडमान सागर और बंगाल की खाड़ी की व्यापक समुद्री जैव विविधता के लिए बेहद अहम हैं. अगर इनका क्षरण होता है तो मछली पालन और पूरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर दूरगामी असर पड़ सकता है. ताजा आदेश में एनजीटी ने जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जेडएसआइ) के इस तर्क को माना कि प्रोजेक्ट के सीधे इलाके में कोरल नहीं हैं, लेकिन गैलाथिया खाड़ी के प्रायद्वीपीय हिस्से में 309 प्रजातियों के कोरल मौजूद हैं. कुल 20,668 कोरल कॉलोनियों की पहचान की गई है.
जेडएसआइ ने इनमें 16,150 कॉलोनियों को, जो 15 मीटर तक की गहराई में हैं, स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया है. इसके अलावा 4,518 कॉलोनियां, जो 15 से 30 मीटर की गहराई में हैं, उन्हें भी शिफ्ट करने की योजना है. ट्रिब्यूनल ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया है, लेकिन कहा है कि किसी भी स्थानांतरण से पहले विस्तृत अध्ययन जरूरी होगा. जेडएसआइ ने पहले के अनुभवों का हवाला दिया है. जैसे कच्छ की खाड़ी में कोरल स्थानांतरण, जहां जीवित रहने की दर करीब 90 फीसद बताई गई थी.
आदिवासी विस्थापन
सबसे बड़ी तीसरी चिंता ग्रेट निकोबार के दो मूल आदिवासियों—शोंपेन और निकोबारी—और उनकी जीवनशैली पर पड़ने वाले असर को लेकर है. प्रोजेक्ट क्षेत्र में 84.1 वर्ग किलोमीटर, यानी करीब 11 फीसद, ट्राइबल रिजर्व की जमीन आती है. सरकार का दावा है कि उसने इन जनजातियों की सहमति ली है. लेकिन 22 जनवरी, 2026 को ग्रेट निकोबार की ट्राइबल काउंसिल के प्रमुखों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके आरोप लगाया कि उनसे ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए, जिनसे वे 2004 की सूनामी से पहले की अपनी पुश्तैनी जमीन पर दावा छोड़ रहे थे. ट्राइबल काउंसिल के प्रमुख बरनाबास मंजू ने मीडिया से कहा कि जब उन्हें पता चला कि कितनी बड़ी जमीन ली जा रही है, तो उन्होंने प्रशासन को पत्र लिखकर अपनी सहमति वापस ले ली.
यादव ने साफ कहा है कि राजीव नगर और न्यू चिंगेन में शोंपेन और निकोबारी बस्तियों को नहीं हटाया जाएगा. मंत्रालय का यह भी दावा है कि दूसरी जगहों पर जमीन को दोबारा अधिसूचित कर ट्राइबल रिजर्व में 3.91 वर्ग किलोमीटर की शुद्ध बढ़ोतरी होगी. लेकिन सामाजिक पारिस्थितिकी विशेषज्ञ मनीष चांदी, जिन्होंने दो दशकों से ज्यादा समय तक द्वीपों के आदिवासियों का अध्ययन किया है, चेतावनी देते हैं, ''दुनिया भर का अनुभव बताता है कि जब भी शिकारी-संग्रहकर्ता जीवन जीने वाले समुदाय को आधुनिक बुनियादी ढांचा परियोजना के संपर्क में लाया गया है, परिणाम बेहद प्रतिकूल रहे हैं. उन्होंने यह जीवन खुद चुना है. उन पर कोई दूसरा जीवन थोपा नहीं जा सकता.’’
ग्रेट निकोबार की भूगर्भीय कमजोरियां भी चिंता बढ़ाती हैं. मुंबई में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर डिजास्टर ऐंड डेवलपमेंट की प्रोफेसर जानकी अंधारिया के मुताबिक, यह द्वीप जोन 5 में आता है, जो भूकंपीय जोखिम का सबसे उच्च स्तर है. अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 2010 से 2020 के बीच द्वीप के 150 किलोमीटर दायरे में 4.0 से 6.6 तीव्रता के 442 भूकंप दर्ज हुए यानी हर साल औसतन 44 भूकंप. अंधारिया 2004 की सूनामी का उदाहरण देती हैं. वे कहती हैं कि उस तबाही ने दिखा दिया था कि भूकंपीय गतिविधि किस हद तक प्रभावित कर सकती है. यहां बड़ी आबादी बसती है तो जोखिम कई गुना बढ़ जाएगा. पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि 2004 जैसे 'बड़े भूकंप’ का अंदेशा कम है. वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसे बड़े झटके 420 से 750 साल के चक्र में आते हैं.
पर्यावरण मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने सामान्य प्रक्रिया से आगे बढ़कर तीन उच्चस्तरीय समितियां बनाई हैं. एक प्रदूषण पर नजर रखेगी, दूसरी जैव विविधता पर और तीसरी आदिवासी कल्याण से जुड़े मुद्दों पर. इनका मकसद पर्यावरण प्रबंधन योजना के पालन को आश्वस्त करना है. इस बीच कानूनी लड़ाई कोलकाता हाइकोर्ट में पहुंच गई है, जहां पर्यावरणविदों की याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है. कई मायनों में ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट एक बड़े राष्ट्रीय द्वंद्व का प्रतीक है. सवाल यह है कि आर्थिक महत्वाकांक्षा और रणनीतिक जरूरतों को पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों के साथ कैसे संतुलित किया जाए. और क्या यह संतुलन देश की आखिरी बड़े वन धरोहरों में से एक को स्थायी नुक्सान पहुंचाए बिना संभव है?
खतरे में देशज आदिवासी
उस ग्रेट निकोबार द्वीप में दो स्थानीय आदिवासी समुदाय शोंपेन और निकोबारी रहते हैं. शोंपेन की तादाद करीब 300 है, जो बहुत अंदरूनी भूभाग में रहते हैं, बाहर की दुनिया से उनका कोई संपर्क नहीं. वे घूम-घूमकर शिकार करते हैं. निकोबारी की तादाद करीब 450 है, जो पूर्वी तट पर लगभग अर्द्ध-खानाबदोश जिंदगी बसर करते हैं. 2004 में हिंद महासागर में आई सूनामी के बाद इन्हें द्वीप के पश्चिमी तट से यहां लाकर बसाया गया था.
अंदेशा: पर्यावरण विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि परियोजना की वजह से बड़ी तादाद में बाहरी लोग ग्रेट निकोबार में आ सकते हैं, जिससे देशज आदिवासियों और खासकर शोंपेन की जिंदगी में खलल पड़ सकता है.
निकोबारियों का आरोप है कि उनसे द्वीप के पश्चिमी तट पर अपने पुरखों की जमीन छोड़ने के लिए कहा गया था, और सूनामी के बाद उसे लौटाने का वादा किया गया था. ट्राइबल काउंसिल के चेयरमैन बरनाबास मंजू का कहना है कि यह पता चलने के बाद कि कितनी अधिक पुश्तैनी जमीन ली जा रही है, उन्होंने परियोजना को दी गई अपनी मंजूरी वापस ले ली, लेकिन केंद्र से अब तक कोई जवाब नहीं मिला. वन अधिकार कानून के तहत जरूरी मंजूरियों को कलकत्ता हाइकोर्ट में चुनौती दी गई है.
जवाब: केंद्रीय आदिवासी मामलों के मंत्रालय का कहना है कि द्वीप के 751 वर्ग किमी हिस्से पर आदिवासी आरक्षित क्षेत्र बनाया जाना है. मगर प्रस्तावित परियोजना क्षेत्र का 84.1 वर्ग किमी हिस्सा आरक्षित क्षेत्र में पड़ता है, आरक्षित क्षेत्र को कहीं और जमीन मिलने के बाद भी. पर्यावरण मंजूरियों के लिए 50 साल की आदिवासी कल्याण योजना अनिवार्य शर्त है.
खतरे में कोरल
कोरल या मूंगा जिंदिल और एक साथ बस्ती बनाकर रहने वाले अकशेरुकी (बिना रीढ़ वाले) जीव होते हैं जो पानी के नीचे रीफ कॉलोनी या प्रवाल भित्तियां बनाते हैं. ये जेलीफिश और सी एनिमोन या समुद्री जलपर्णी के करीबी रिश्तेदार होते हैं, जिनमें एक बात साझा होती है: मुंह के चारों ओर टेंटैकल या लतातंतु. भारतीय प्राणी विज्ञान सर्वेक्षण (जेडएसआइ) का कहना है कि प्रस्तावित परियोजना क्षेत्र में और उसके इर्द-गिर्द 309 कोरल प्रजातियां दर्ज की गई हैं.
अंदेशा: पर्यावरणविद आगाह करते हैं कि ग्रेट निकोबार द्वीपसमूह के दक्षिणी हिस्से में गैलाथिया खाड़ी में, जहां बंदरगाह का निर्माण होना है, कोरल की भरपूर आबादी है. कोरल अंडमान सागर और बंगाल की खाड़ी के व्यापक समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में अहम भूमिका अदा करते हैं. उनकी बदहाली से मछलियों और समुद्र पर दूरगामी नतीजे हो सकते हैं.
जवाब: जेडएसआइ के आंकड़ों का हवाला देते हुए केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का कहना है कि गैलाथिया खाड़ी के परियोजना क्षेत्र में कोरल आबादी नहीं रहती. फिर भी नजदीक के समुद्र में पहचानी गई 20,668 कोरल कॉलोनियों में से परियोजना के नजदीक और 15 मीटर की गहराई में आने वाली 16,150 कॉलोनियों को दूसरी जगह बसाया जाएगा. हरेक कॉलोनी की जीपीएस से निगरानी होगी, और उनकी पारिस्थितिकी बहाली पर नजर रखेगा. इसके अलावा 2.37 वर्ग किमी में फैले मेरोई द्वीप को कोरल अभयारण्य बनाया गया है.
खतरे में जंगल
उष्णकटिबंधीय सदाबहार जंगल ग्रेट निकोबार में 1,03,870 हेन्न्टेयर हैं, भूभागीय और समुद्री दोनों, जिनमें 650 पौध प्रजातियां हैं, जिनमें 13 फीसद केवल इसी द्वीप पर पाई जाती हैं, जबकि 32.5 फीसद भारत के मुख्य भूभाग में नहीं पाई जातीं. यहां के पेड़-पौधे अंडमान द्वीपसमूह से भी अलग हैं. यह इस भूभाग के एकांत द्वीपीय स्वरूप की वजह है, जिसमें द्वीप भी एक दूसरे से अलग है.
अंदेशा: पर्यावरणविद परियोजना के लिए 130.75 वर्ग किमी वन भूमि के उपयोग परिवर्तन को लेकर चिंतित हैं. इसके तहत 7,11,000 से ज्यादा पेड़ काटे जा सकते हैं. वे हरियाणा और मध्य प्रदेश में भरपाई के लिए वनारोपण को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं.
जवाब: मंत्रालय का कहना है कि उपयोग-परिवर्तित वन भूमि अंदमान और निकोबार द्वीप समूह के कुल क्षेत्र की महज 1.8 फीसद है और ग्रेट निकोबार का 82 फीसद हिस्सा जंगल से आच्छादित रहेगा. परियोजना क्षेत्र का करीब 66 वर्ग किमी हिस्सा भी हरित क्षेत्र बनाया जाएगा. अंडमान और निकोबार प्रशासन ने ग्रेट निकोबार के लिए जंगल संरक्षण योजना भी तैयार की है.
खतरे में मेगापोड
यह मुख्यत: इसी भूभाग में रहने वाला पक्षी है, जिनका आकार मुर्गी के बराबर होता है. इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आइयूसीएन) ने इन्हें 'लुप्तप्राय’ की श्रेणी में रखा है. ये अपने अनूठे निवास और प्रजनन व्यवहार के लिए जाने जाते हैं: ये मिट्टी के टीलों और पेड़-पौधों के सड़े पत्तों वगैरह में घोंसले बनाते हैं और अपने अंडों को सेने के लिए उसकी गर्मी पर निर्भर करते हैं.
अंदेशा: निकोबार मेगापोड रहने के लिए आम तौर पर समुद्र तट के नजदीक घोंसला बनाते हैं और अपने अंडे सेने के टीले निचले तटीय इलाकों में बनाते हैं. बड़े पैमाने पर कोई भी तटीय निर्माण उनके प्रजनन स्थलों को गंभीर रूप से नुक्सान पहुंचा सकता है और इसका नतीजा उनके संभावित रूप से विलुप्त होने में हो सकता है.
जवाब: मंत्रालय ने लंबे वक्त का वैज्ञानिक हस्तक्षेप शुरू किया है और घोंसले के करीब 102 सक्रिय टीलों का नक्शा बनाया है. इनमें से परियोजना प्रभावित इलाके में पड़ने वाले टीलों का जियोरेफरेंस या भू-संदर्भन और रक्षा की जाएगी. इसके अलावा 1.29 वर्ग किमी में फैले मेंचल द्वीप को मेगापोड अभयारण्य बनाया गया है.
—साथ में प्रदीप आर. सागर और एम.जी. अरुण

