निजाम बदला फिक्र बरकरार

ढाका में सत्तानसीन हुई तारिक रहमान की नई सरकार के साथ भारत को आखिर किस तरह से आगे बढ़ना चाहिए.

तारिक रहमान (फाइल फोटो)
तारिक रहमान (फाइल फोटो)

बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेने के लिए तारिक रहमान ने रवायत को तोड़ दिया. राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास बंगभवन की जगह उन्होंने और उनकी कैबिनेट ने देश की संसद की इमारत जातीय संसद भवन में शपथ ली. यह कदम डेढ़ साल से ज्यादा समय तक चली अंतरिम सरकार के बाद संसदीय लोकतंत्र की वापसी का संकेत था. अंतरिम सरकार को बांग्लादेश में बहुत-से लोग मानवीय के बजाए तकनीकी सोच वाली, कम पारदर्शी और जवाबदेही से परे मानते थे.

रहमान काले सूट और सफेद शर्ट में कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे. उनके साथ उनकी पत्नी डॉ. जुबैदा और बेटी जईमा थीं. करीबी बताते हैं कि उनके चेहरे पर गजब की शांति दिख रही थी. यह ठहराव उन्होंने कई वर्षों में पाया है और अब यही उनकी पहचान बन चुका है.

उनके वालदैन, दिवंगत जनरल जियाउर रहमान और बेगम खालिदा जिया, दोनों ने अहम दौर में बांग्लादेश की राजनीति की दिशा तय की थी. इसी वजह से युवा तारिक को सत्ता के गलियारों को करीब से देखने और समझने का मौका मिला. खालिदा जिया के दूसरे कार्यकाल 2001 से 2006 के दौरान तारिक ने उनकी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की कमान संभालनी शुरू कर दी थी. लेकिन इसके तुरंत बाद 2007 में सेना समर्थित अंतरिम सरकार ने उन पर गंभीर आरोप लगाए.

2008 के चुनाव में शेख हसीना की अगुआई वाली अवामी लीग जीत गई और हालात ऐसे बने कि वे देश छोड़ लंदन में जाकर रहने के ‌लिए मजबूर हो गए. हालांकि वे देश से दूर थे लेकिन राजनीति से कभी दूर नहीं हुए. हसीना सरकार ने अलग-अलग मामलों में उन्हें दोषी ठहराया.

वे 2026 के आम चुनाव में बीएनपी का अभियान खुद संभालने के ‌लिए करीब 17 साल बाद बांग्लादेश लौटे. वापसी के कुछ ही समय बाद उनकी बीमार मां का इंतकाल हो गया. अब उन्होंने बीएनपी गठबंधन को जबरदस्त जीत दिलाई है. बांग्लादेश की संसद की 300 में से 212 सीटें उनके खाते में गई हैं. यह साफ दो-तिहाई बहुमत है.

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिलते हुए तारिक रहमान

रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद विदेशी मेहमानों में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी थे, जिन्हें भारत के प्रतिनिधित्व के लिए भेजा गया था. ऐसे वक्त में जब यूनुस की अगुआई वाली अंतरिम सरकार के दौरान भारत-बांग्लादेश रिश्ते रसातल में जा पहुंचे थे, बिरला का वहां होना खास मायने रखता था. यह इशारा भी था कि बीते मतभेद नई सरकार के साथ रिश्तों पर हावी नहीं होंगे.

एक जानकार ने साफ कहा, ''बड़ा संदेश यही था कि भारत उस सरकार के साथ बातचीत और काम करने को तैयार है, जिसे अब जनता का पूरा जनादेश मिला है.’’ रहमान के औपचारिक तौर पर प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें फोन कर 'शानदार जीत’ की बधाई दी. इसके बाद उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, ''दो करीबी पड़ोसी और गहरे ऐतिहासिक-सांस्कृतिक रिश्तों से जुड़े देशों के लोगों की शांति, तरक्की और खुशहाली के लिए मैं भारत की प्रतिबद्धता दोहराता हूं.’’

भारत के लिए हाल में हुए बांग्लादेश चुनाव के नतीजों में कई सकारात्मक बातें हैं. यह नतीजा एक स्थिर जनादेश दिखाता है, जिसे काफी हद तक बेहतर भविष्य और रोजगार की तलाश में जुटे युवाओं ने आगे बढ़ाया है. द डेली स्टार के संपादक और जाने-माने कॉलमिस्ट महफूज अनम कहते हैं, ''इस चुनाव ने बांग्लादेश को खतरनाक अनिश्चितताओं से बचा लिया है.

वह राजनैतिक हो, आर्थिक हो या वैचारिक.’’ वे यह भी कहते हैं, ''लोगों ने एक मध्यमार्गी बांग्लादेश के पक्ष में वोट दिया है, न कि कट्टर सोच वाले देश के लिए. धार्मिक वोट में बढ़ोतरी जरूर दिखी है, लेकिन संदेश साफ है. जनता चाहती है कि सरकार धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक कानूनों के तहत चले. 

पुराने तनाव

एक स्थिर बांग्लादेश भारत के लिए अच्छी खबर ही है, खासकर इसलिए क्योंकि चुनाव अभियान के दौरान न तो कोई भारत विरोधी हैशटैग चला और न ही भारत विरोधी बयानबाजी हुई. अगस्त 2024 में जेन ज़ी की अगुआई में हुए विद्रोह ने शेख हसीना के 15 साल से ज्यादा लंबे शासन का अंत कर दिया था.

उन्हें भारत भागना पड़ा और देश अनिश्चितता की खाई में चला गया. इसके साथ ही हसीना के दौर में भारत और बांग्लादेश के बीच जो मजबूत रिश्ते बने थे, उनका भी अंत हो गया. अंतरिम सरकार में मुख्य सलाहकार की भूमिका संभालने वाले यूनुस ने, एक भारतीय बांग्लादेश विशेषज्ञ के मुताबिक, ''भारत को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ा.’’

भारत पर आरोप लगाया गया कि उसने हसीना के 'तानाशाही शासन’ को मदद दी और छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर हुई सख्त कार्रवाई को नजरअंदाज किया, जिसके बाद उन्हें सत्ता से हटना पड़ा. जब भारत ने बाद में हसीना को शरण दी, तो अंतरिम सरकार ने दिल्ली को उनके कथित अपराधों में साझेदार के तौर पर पेश किया (देखें बॉक्स: कूटनीतिक दुविधा).

खुद हसीना को कई मामलों में दोषी ठहराया गया और बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने उन्हें मौत की सजा सुनाई. लेकिन भारत ने बार-बार बांग्लादेश की उस मांग को ठुकरा दिया, जिसमें उनके प्रत्यर्पण की बात कही गई थी. भारत का कहना था कि पूर्व प्रधानमंत्री पर चलाया गया मुकदमा निष्पक्ष नहीं था और कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ. इससे अंतरिम सरकार और ज्यादा नाराज हो गई.

यूनुस ने सिर्फ अपने देश में ही भारत विरोधी माहौल को हवा नहीं दी, बल्कि कई बार ऐसे बयान भी दिए जिनसे भारत को सीधी चुभन हुई. मसलन, उन्होंने कहा कि भारत के सात पूर्वोत्तर राज्य 'लैंडलॉक्ड’ हैं और वैश्विक बाजारों से जुड़ने के लिए उन्हें बांग्लादेश ही रास्ता दे सकता है. भारत ने इसे ऐसे देखा कि यूनुस न सिर्फ क्षेत्र में भारत की रणनीतिक और आर्थिक भूमिका को कमतर बता रहे हैं, बल्कि यह भी संकेत दे रहे हैं कि यह इलाका चीन केंद्रित आर्थिक कॉरिडोर का हिस्सा बन सकता है, जिसकी ओर खुद बांग्लादेश झुकता दिख रहा था.

नतीजा यह हुआ कि दोनों देशों के बीच व्यापार में जैसे को तैसा वाली कार्रवाई शुरू हो गई. जमीनी रास्तों से आवाजाही सख्त कर दी गई, जिससे लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ गई. मसलन, बांग्लादेश ने लैंड कस्टम्स स्टेशनों के जरिए होने वाले व्यापार पर पाबंदियां लगा दीं.

कारोबारियों को मजबूरन समुद्री रास्ता अपनाना पड़ा और भीड़भाड़ वाले चटगांव बंदरगाह से माल भेजना पड़ा. इससे देरी भी हुई और खर्च भी बढ़ा. इसके जवाब में भारत ने करीब 4,096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा पर 11 लैंड कस्टम्स स्टेशनों से बांग्लादेशी सामान की आवाजाही सीमित कर दी. इन कदमों का असर सालाना 14 अरब डॉलर यानी करीब 1.27 लाख करोड़ रुपए के द्विपक्षीय व्यापार के लगभग 42 फीसद हिस्से पर पड़ा.

रिश्ते और बिगड़ गए जब यूनुस सरकार ने 2015 में तय किए गए इंडियन स्पेशल इकोनॉमिक जोन को रद्द कर दिया. साथ ही यह भी संकेत दिया कि उस जमीन का इस्तेमाल डिफेंस इंडस्ट्रियल पार्क के लिए किया जा सकता है. इसके जवाब में भारत ने बांग्लादेश को दी जाने वाली अपनी आर्थिक मदद आधी कर दी. पिछले साल जहां 120 करोड़ रुपए दिए गए थे, इस साल के बजट में इसे घटाकर 60 करोड़ रुपए कर दिया गया.

भारत इससे पहले बांग्लादेश को 8 अरब डॉलर (करीब 73,000 करोड़ रुपए) की लाइन ऑफ क्रेडिट दे चुका था, हालांकि इसका पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ. इसके बाद कई इन्फ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट अटक गए. सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए भारतीय तकनीकी विशेषज्ञ बांग्लादेश छोड़कर वापस आ गए. इसी बीच ढाका ने दूसरे अंतरराष्ट्रीय साझेदारों, खासकर चीन के साथ नए विकल्प तलाशने शुरू कर दिए.

हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर चिंता
जब यूनुस सरकार के शुरुआती दिनों में कानून-व्यवस्था की हालत बिगड़ने लगी, तो भारत ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं को निशाना बनाए जाने पर चिंता जताई. करीब 1.3 करोड़ हिंदू, जो 17.5 करोड़ की आबादी में लगभग 8 फीसद हैं, खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे. खबरों में कहा गया कि 2,000 से ज्यादा सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें मंदिरों में तोड़फोड़ भी शामिल थी. यूनुस सरकार ने इन आंकड़ों से इनकार किया.

दिसंबर 2024 में त्रिपुरा के अगरतला में कुछ प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश के असिस्टेंट हाइ कमिशन में घुसने की कोशिश की. ढाका ने इसे 'वियना कन्वेंशन का उल्लंघन’ और 'अस्वीकार्य’ बताया. भारत ने इस घटना को 'बेहद अफसोसजनक’ कहा और भरोसा दिया कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होगी. बांग्लादेश लगातार भारत पर यह आरोप भी लगाता रहा कि वह लोगों को बांग्लादेशी बताकर मुसलमानों को परेशान कर रहा है. सीमा पर होने वाली हत्याएं रोकना भी बीएनपी के घोषणापत्र और चुनाव प्रचार का एक बड़ा वादा था.

हालांकि पिछले एक साल में सांप्रदायिक हिंसा काफी हद तक काबू में आ गई थी लेकिन दिसंबर 2025 में ढाका में तनाव फिर बढ़ गया, जब चॢचत छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी का कत्ल कर दिया गया. वे भारत विरोधी बयानों के लिए जाने जाते थे. 18 दिसंबर को उनकी मौत के बाद ढाका में भारतीय उच्चायोग के खिलाफ प्रदर्शन हुए.

उसी दिन मैमनसिंह में दीपूचंद्र दास नाम के एक गारमेंट फैक्ट्री कर्मचारी को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला. आरोप था कि उन्होंने इस्लाम के खिलाफ टिप्पणी की थी. एहतियात के तौर पर भारतीय उच्चायोग ने बांग्लादेशी नागरिकों को वीजा जारी करने पर सख्ती कर दी. सिर्फ इलाज के लिए आने वालों या वैध व्यापार से जुड़े लोगों को ही वीजा दिया जाने लगा.

तनाव जल्द ही खेल के मैदान तक पहुंच गया. इस साल जनवरी में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) ने कोलकाता नाइटराइडर्स से कहा कि वे बांग्लादेश के तेज गेंदबाज मुस्तफीजुर रहमान को इंडियन प्रीमियर लीग की टीम से रिलीज करें. खास बात यह थी कि टीम ने उन्हें हाल में नीलामी में खरीदा था. इसके बाद यूनुस सरकार ने अपने क्रिकेट बोर्ड से कहा कि वह राष्ट्रीय टीम को टी20 वर्ल्ड कप से बाहर कर ले, जिसकी मेजबानी इस वक्त भारत कर रहा है. बांग्लादेश ने कोलकाता के मशहूर अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में भी हिस्सा नहीं लिया. यह साफ दिखाता है कि भारत-बांग्लादेश रिश्तों को कितना नुक्सान पहुंच चुका था.

नया निजाम
इन हालात में चुनाव जीतने के बाद से रहमान का संतुलित रवैया और मोदी की पहल को इस कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है कि रिश्तों की गिरावट को रोका जाए, भले ही उसे तुरंत पलटना आसान न हो. अपने पहले टेलीविजन संबोधन में रहमान नेे कहा, ''मैं देश के लोगों को एक संदेश देना चाहता हूं. पार्टी, धर्म, जाति, आस्था कुछ भी हो, चाहे कोई पहाड़ों में रहता हो या मैदान में, यह देश हम सबका है, हम इसे हर नागरिक के लिए सुरक्षित बनाना चाहते हैं.’’

रहमान ने अपनी नीति को 'बांग्लादेश फर्स्ट’ का नाम दिया है. वे अवामी लीग की तरह खुलकर भारत समर्थक रुख अपनाने वाले नहीं दिखते. भारत की तरफ से भी इस फर्क को समझा जा रहा है. बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीणा सीकरी कहती हैं, ''रहमान का बांग्लादेश फर्स्ट, नरेंद्र मोदी के नेबरहुड फर्स्ट के साथ टकराव में नहीं है, बल्कि दोनों एक-दूसरे को पूरा कर सकते हैं. इससे दोनों देशों के बीच तालमेल और मजबूत होना चाहिए.’’

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत ने अपनी उम्मीदों को सोच-समझकर संतुलित रखा है. लेकिन कट्टरपंथी और अलगाववादी तत्व, जो बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए कर सकते हैं, अब भी चिंता का विषय हैं. 2001 से 2006 के बीच जब आखिरी बार बीएनपी की सरकार थी, चरमपंथी संगठनों की भारत विरोधी गतिविधियों में तेजी आई थी.

उस दौर में हथियारों का बड़ा जखीरा पकड़ा गया था. बाद में शेख हसीना ने उल्फा और एनएससीएन आइएम सरीखे पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों पर सख्ती की. जमात-ए-इस्लामी से जुड़े कट्टर इस्लामी नेटवर्क पर भी कार्रवाई की, जो सीमा क्षेत्रों में अस्थिरता फैलाने में लगे थे.

भारत का मानना है कि अब तारिक रहमान और बीएनपी 2.0 ने अतीत की काफी बातें पीछे छोड़ दी हैं और उन्हें भारत के साथ कामकाज आगे बढ़ाने में दिलचस्पी है. लेकिन भारत की नजर इस बात पर टिकी है कि बीएनपी जमात-ए-इस्लामी चरमपंथी संबंधों को कैसे काबू में रखती है.

इस चुनाव में 68 सीटें जीतकर और 31.76 फीसद वोट हासिल कर जमात एक बड़ी ताकत बनकर उभरी है. इससे पहले उसे अधिकतम 18 सीटें मिली थीं. इस बार इस इस्लामिक पार्टी ने भारत से सटे जिलों में अच्छी संख्या में सीटें जीती हैं, जो भारत के लिहाज से अच्छे संकेत नहीं हैं.

बांग्लादेश की राजनैतिक रिसर्च संस्था जी9 के महासचिव शखावत हुसैन सायंता कहते हैं, ''कट्टर ताकतों का बढ़ना किसी के लिए अच्छा नहीं, न बांग्लादेश के लिए और न भारत के लिए.’’ हालांकि 17 फरवरी को ढाका में भारत के उच्चायुक्त प्रणय कुमार वर्मा ने जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख और विपक्ष के नेता डॉ. शफीकुर रहमान से मुलाकात भी की.

एक और चिंता ढाका की इस्लामाबाद और बीजिंग के साथ बढ़ती नजदीकी को लेकर है. जब यूनुस सरकार ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते दोबारा बहाल किए और कनेक्टिविटी तथा व्यापार बढ़ाने की बात की तो भारत ने खुलकर चिंता जताई थी. चीन तो पहले से ही बांग्लादेश में गहरी पैठ बना चुका है.

बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) के तहत वह करीब 40 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट्स का वादा कर चुका है. शेख हसीना ने भी बीजिंग से करीबी बढ़ाई थी. उन्होंने बांग्लादेश नौसेना के प्रशिक्षण के नाम पर एक बड़ा नौसैनिक अड्डा बनाने में चीन की मदद ली. भारत को लगा कि इससे चीनी पनडुब्बियों को ठहरने की सु‌‌विधा मिल सकती है.

चौदह फरवरी को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बांग्लादेश-चीन रिश्तों के भविष्य पर रहमान ने कहा कि अगर कोई चीज 'बांग्लादेश के हित में नहीं होगी’, तो उनकी सरकार उसका समर्थन नहीं करेगी. बीआरआइ प्रोजेक्ट्स पर उन्होंने कहा कि उनकी सरकार पहले यह देखेगी कि क्या वे सच में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद हैं या नहीं, उसके बाद ही फैसला किया जाएगा. भारत अब इस बात पर नजर रखेगा कि इन मोर्चों पर रहमान आगे कैसे बढ़ते हैं.

पानी पर टकराव
नई सरकार के साथ भारत के रिश्तों की पहली बड़ी परीक्षा इस गर्मी में हो सकती है, जब दोनों देशों के बीच पानी बंटवारे को लेकर विवाद फिर भड़क सकता है. बीएनपी के घोषणापत्र में यह बात साफ लिखी गई थी: ''पद्मा, तीस्ता और बांग्लादेश की सभी साझा नदियों का पानी बराबरी के आधार पर सुनिश्चित किया जाएगा.’’ यह सिर्फ चुनावी वादा नहीं था. फरवरी 2025 में बीएनपी ने उत्तरी बांग्लादेश में तीस्ता के पानी में न्यायसंगत हिस्सेदारी और तीस्ता रिवर मास्टर प्लान को तुरंत लागू करने की मांग को लेकर बड़े प्रदर्शन किए थे.

भारत के लिए तीस्ता का मुद्दा हमेशा से पेचीदा रहा है. 1983 में एक अस्थायी समझौते के तहत नदी के पानी का 39 फीसद हिस्सा भारत को और 36 फीसद बांग्लादेश को देने की बात तय हुई थी. बाकी पानी का बंटवारा तय नहीं हुआ था. लेकिन यह व्यवस्था कभी स्थायी संधि का रूप नहीं ले सकी. दशकों तक बातचीत चलती रही.

2011 में एक मसौदा समझौता सामने आया, जिसमें सूखे मौसम के दौरान तीस्ता के 37.5 फीसद पानी को बांग्लादेश को देने का प्रस्ताव था. लेकिन आखिरी वक्त में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध पर यह समझौता टूट गया. उनका कहना था कि खुद पश्चिम बंगाल में पानी की भारी कमी है और इस प्रस्तावित बंटवारे को लागू करना संभव नहीं.

तब से तीस्ता का मसला दोनों देशों की आपसी निराशा का प्रतीक बन चुका है. हसीना के दौर में चीन ने तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट ऐंड रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट के लिए फंड देने पर सहमति जताई थी. इससे भारत की चिंता और बढ़ गई थी. तीस्ता के उलट गंगाजल संधि को ज्यादा व्यावहारिक शुरुआती बिंदु माना जा रहा है.

बांग्लादेश में जिसे पद्मा कहा जाता है, उस गंगा को लेकर 1996 में एक संधि हुई थी, जो इस साल नवीनीकरण के लिए तैयार है. 2024 में हसीना की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों की तकनीकी टीमों को इस संधि के नवीनीकरण पर बातचीत शुरू करने की जिम्मेदारी दी गई थी. लेकिन हसीना के सत्ता से हटने के बाद यह बातचीत रुक गई. भारतीय राजनयिकों का कहना है कि इस संधि में एक प्रावधान है, जिसके तहत दोनों पक्ष आपसी सहमति से इसे पांच साल के लिए आगे बढ़ा सकते हैं.

बीएनपी के लिए यह एक शुरुआती कूटनीतिक जीत का मौका हो सकता है. गंगाजल संधि का नवीनीकरण रहमान सरकार को संसद के सामने ठोस नतीजे दिखाने का मौका देगा. संसद में आगे भी सवाल और दबाव बने रहने की संभावना है. ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के जिंदल स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स में प्रोफेसर श्रीराधा दत्ता कहती हैं, ''गंगा संधि के नवीनीकरण में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए और भारत को तीस्ता प्रबंधन प्रोजेक्ट पर भी सहमत होना चाहिए. ऊपरी धारा वाला देश होने के नाते भारत अपनी जिक्वमेदारियों और दूसरी तरफ की चिंताओं, दोनों को समझता है.’’

रहमान की दोहरी चुनौती
इन मसलों के अलावा रहमान के सामने दो और बड़ी चुनौतियां हैं, जिन पर उनका पूरा ध्यान रहेगा. पहली, बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को मौजूदा संकट से बाहर निकालना. दूसरी, 84 सूत्री सुधार पैकेज पर हुए जनमत संग्रह को लागू करना, जो आम चुनाव के साथ ही कराया गया था. इस सुधार पैकेज में राजनैतिक ढांचे में बड़े बदलाव शामिल हैं. खासकर प्रधानमंत्री की शक्तियों पर ज्यादा नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था, ताकि हसीना के दौर जैसी अति दोबारा न हो.

जनमत संग्रह को 68 फीसद समर्थन मिला, लेकिन बीएनपी ने अभी तक संवैधानिक सुधार परिषद को शपथ नहीं दिलाई है, जिसे इन सुधारों को लागू करना था. पार्टी का कहना है कि पहले इसे संसद से पारित कराना जरूरी है. वे कुछ समय तक सुधार परिषद की प्रक्रिया को टाल सकते हैं, लेकिन देश की आर्थिक आपात स्थिति से मुंह नहीं मोड़ सकते.

यूनुस ने दावा किया था कि उन्होंने हसीना के छोड़े आर्थिक संकट को संभाल लिया है, लेकिन महंगाई अब भी करीब 9 फीसद पर अटकी है. सरकारी कर्ज चिंताजनक स्तर तक बढ़ चुका है. निजी निवेश घटा है. शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2024-25 में जीडीपी ग्रोथ गिरकर करीब 3.69 फीसद रह गई. यह उस 6 फीसद से ज्यादा की रक्रतार से काफी कम है, जिसे बांग्लादेश ने पिछले एक दशक में बरकरार रखा था.

युवा बेरोजगारी और बढ़ती महंगाई रहमान के लिए सबसे ज्यादा राजनैतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे हैं. आधिकारिक बेरोजगारी दर भले कम दिखती हो, लेकिन पढ़े-लिखे युवाओं में आधा-अधूरा रोजगार बड़ी समस्या बना हुआ है. स्थायी और योग्यता के आधार पर मिलने वाली नौकरियों तक पहुंच न होने से नाराजगी है. यही असंतोष डेढ़ साल पहले छात्र आंदोलन की बड़ी वजह बना था. जरूरी सामान, खासकर खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने से लोगों की क्रय शक्ति घटी है. इससे असमानता और भर्ती तथा कारोबार में पक्षपात की धारणा और मजबूत हुई है.

इस तरह रहमान के सामने अर्थव्यवस्था पर दोहरी परीक्षा है. एक तरफ उन्हें तेजी से कीमतों को काबू में लाकर घर-परिवारों को राहत देनी होगी. दूसरी तरफ भरोसेमंद तरीके से बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा करनी होंगी. इन दोनों मोर्चों पर उनका प्रदर्शन तय करेगा कि बांग्लादेश की जनता ने उन पर जो भरोसा जताया है, वह कितना सही साबित होता है. भारत यहां बड़ी भूमिका निभा सकता है.

वह द्विपक्षीय व्यापार को फिर से पटरी पर ला सकता है. जैसे उसने श्रीलंका में किया था, वैसे ही बांग्लादेश की आर्थिक रिकवरी में मदद के लिए बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को फंड कर सकता है. रहमान का चुनाव दोनों देशों के लिए नई शुरुआत का मौका है. अगर समझदारी से कदम बढ़े, तो भारत-बांग्लादेश रिश्ते हाल के खराब दौर से निकलकर आने वाले समय में नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं.

रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में ओम बिरला की मौजूदगी ने साफ संकेत दिया कि भारत बीते विवादों को नई सरकार के साथ रिश्तों पर हावी नहीं होने देगा.

यूनुस के भारत विरोधी बयानों को भारत ने कुछ इस तरह देखा कि वे क्षेत्र में उसकी रणनीतिक और आर्थिक भूमिका को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और ढाका को चीन के बीआरआइ की तरफ धकेल रहे हैं, जिसकी ओर बांग्लादेश धीरे-धीरे बढ़ रहा था.

ढाका ने जब भारतीय स्पेशल इकोनॉमिक जोन रद्द किए, तो जवाब में दिल्ली ने बांग्लादेश को दी जाने वाली आर्थिक मदद 120 करोड़ रुपए से घटाकर इस साल के बजट में 60 करोड़ रुपए कर दी.

भारत का मानना है कि रहमान और बीएनपी 2.0 अतीत को पीछे छोड़ भारत के साथ कामकाज आगे बढ़ाना चाहते हैं. लेकिन असली चुनौती 68 सीटें जीतने वाली जमात-ए-इस्लामी को काबू में रखने की होगी.

बांग्लादेश-चीन रिश्तों के भविष्य को लेकर सवाल पूछे जाने पर रहमान का साफ कहना था कि वे ऐसी किसी भी चीज का समर्थन नहीं करेंगे जो कि बांग्लादेश के हित में न हो.


तीस्ता के मुद्दे पर भारतीय सूत्रों की मानें तो माहौल इस तरह का है कि हिस्सेदारी की सीधे-सीधे अपने पक्ष में खींचतान के बजाए मिलकर संरक्षण और प्रबंधन किया जाए.

भारत-बांग्लादेश संबंध: तनातनी वाले मुद्दे

ढाका में नई सरकार के आने से भारत के पास अपने इस पड़ोसी के साथ पुराने विवाद सुलझाने का नया अवसर

अवैध प्रवासी 

अवैध तरीके से सीमा पार करने की समस्या बांग्लादेश बनने से पहले से चली आ रही है लेकिन केंद्र की मौजूदा फिक्र इस संकट को बढ़ाते रोहिंग्या शरणार्थी हैं. दशकों से सीमापार से आने वालों के कारण असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में जनसांख्यिकीय बदलाव हैं जिनके कारण जातीय तनाव पैदा हुआ. सीमा पर बीएसएफ की कार्रवाई की वजह से हुई मानवीय क्षति के कारण भारत विरोधी भावनाएं भड़क रही हैं. मई 2025 के बाद से भारत ने 2000 से ज्यादा बांग्लाभाषी प्रवासियों को वापस भेजा, जिस पर तीखी कानूनी और राजनैतिक प्रतिक्रिया हुई.

घुसपैठ

भारत की बीएनपी सरकार से यही अपेक्षा होगी कि वह अतीत की गलतियां नहीं दोहराएगी और पूर्वोत्तर के उल्फा (असम) और एनएससीएन (नगालैंड) जैसे अलगाववादी संगठनों का दोबारा समर्थन नहीं करेगी. अवामी लीग सरकार ने वर्ष 2009 के बाद से सख्त कार्रवाई की और उल्फा नेताओं को गिरफ्तार कर डिपोर्ट कर दिया. वार्ता के विरोधी उल्फा धड़े का नेता परेश बरुआ अब भी वहां म्यांमार बांग्लादेश सीमा पर ठिकाना बनाए हुए है.

नदी जल बंटवारा

सीमा  पर 54 जगहों पर छोटी-बड़ी जलधाराओं की आवाजाही में से दो नदियों गंगा और तीस्ता पर वर्षों से दोनों देशों के बीच तकरार चल रही है. तीस्ता को लेकर 1983 का जल-बंटवारा समझौता कभी आगे नहीं बढ़ा. पिछले महीने जब चीनी राजदूत याओ वेन ने एक अरब डॉलर की तीस्ता रिवर कॉम्प्रीहेंसिव मैनेजमेंट ऐंड रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट का जायजा लेने संवेदनशील सिलिगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक रंगपुर का दौरा किया, तो यह भारत के लिए परेशान करने वाली बात थी. गंगा जल बंटवारे पर समझौते का दिसंबर 2026 (30 साल बाद) में नवीकरण होगा लेकिन फरक्का बराज को लेकर वार्ता जटिल और आरोप-प्रत्यारोप भरी होने के आसार हैं.

पाकिस्तान से नजदीकी

सन‍् 2024 में शेख हसीना के हटने के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच रिश्तों में आ रही गरमाहट नई दिल्ली के लिए बेचैनी का सबब है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और बांग्लादेश के नेता मोहम्मद यूनुस के बीच मुलाकात समेत उच्चस्तरीय बैठकें हुईं, वह भी तब जब मई में पाकिस्तान के साथ भारत का तनाव चरम पर था.

एक और दुखदायी नुक्ता बांग्लादेश में और खासकर पश्चिम बंगाल के नजदीक पड़ने वाले जिलों में इस्लामी धड़े जमात-ए-इस्लामी का चुनावों में मजबूत होकर उभरना है. 1971 के बांग्लादेश युद्ध में यह पार्टी पाकिस्तान के साथ खड़ी थी, लेकिन अब सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है. भारत उम्मीद करेगा कि नई सरकार धनस्रोतों की जांच-पड़ताल के जरिए कट्टरपंथी गोलबंदी पर लगाम कसे और इस पार्टी को सुरक्षा नीतियों से दूर रखे.

चीन फैक्टर
भारत नजर रखे है कि ढाका चीन के पैसे से बनने वाले बुनियादी ढांचे और जल परियोजनाओं का कैसे प्रबंधन करता है, खासकर वे जो सिलिगुड़ी कॉरिडोर सरीखे संवेदनशील इलाकों के करीब हैं. पारदर्शी कूटनीति के जरिए टकरावों को रोका जा सकता है और बांग्लादेश अपनी भागीदारियों को आगे बढ़ा सकता है. एक और चिंता की बात रक्षा और खासकर पनडुब्बियों और अहम बंदरगाहों को संभालने के मामले में बांग्लादेश की चीन पर बढ़ती निर्भरता है.

हिंदुओं और अल्पसंक्चयकों का उत्पीड़न

भारत ने यूनुस सरकार के दौर में बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और राजनैतिक प्रतिनिधित्व न मिलने को लेकर लगातार ऐतराज जताए. हाल में एक मामला मैमनसिंह की कपड़ा फैक्ट्री के कामगार दीपूचंद्र दास की हत्या को लेकर आया उबाल था. उम्मीद है कि रहमान के राज में हालात में सुधार आएगा, जिसके संकेत उनके बार-बार समावेशन पर जोर देने और सांस्कृतिक मामलों के मंत्री पद पर सम्मानित बड़े नेता निताई रॉय चौधरी की नियुक्ति से मिलता है.

तारिक रहमान: प्रधानमंत्री की कुर्सी तक का लंबा सफर

फेसबुक पर 18 फरवरी को पोस्ट की गई एक तस्वीर में शांत लेकिन दिल को छू लेने वाला पल कैद था. तारिक रहमान के एक पुराने दोस्त की तरफ से शेयर की गई इस तस्वीर के साथ कैप्शन बांग्ला में लिखा था, जिसका मोटा-मोटा अर्थ  था 'आंखों का सुकून’. तस्वीर में रहमान एकदम सफेद शर्ट पहने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठे हैं. कई समर्थकों के लिए यह तस्वीर लंबे और अनिश्चित भविष्य के बाद उनके आगमन का प्रतीक थी.

रहमान ने एक दिन पहले देश के 11वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी. 60 साल की उम्र में उन्होंने उस शख्सियत के तौर पर दफ्तर में कदम रखा जिसे विरासत ने भी उतना ही गढ़ा है जितना व्यवधानों ने. ढाका में 20 नवंबर, 1965 को जन्मे रहमान 1981 में कत्ल कर दिए गए फौजी-राष्ट्रपति जियाउर रहमान और उथलपुथल से भरे दो कार्यकालों के दौरान मुल्क की सियासत पर हावी रहीं खालिदा जिया के बड़े बेटे हैं. सियासत कभी दूरदराज की चीज नहीं थी, वह जल्द उनकी जिंदगी में आ गई और खासे खून-खराबे के साथ, फिर कभी वापस नहीं गई. फिर भी गौर करने लायक बात यह कि रहमान ने खुद पहली बार चुनाव 2026 में लड़ा.

रहमान जून 2025 में मोहम्मद यूनुस के साथ

ढाका के कुछ सबसे कुलीन संस्थानों में पढ़े-लिखे रहमान ने कानून पढ़ने कुछ समय के लिए ढाका विश्वविद्यालय में दाखिला लिया. दाखिला तो कानून की पढ़ाई के लिए लिया था लेकिन फिर विषय बदलकर अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पढ़ाई की. उन्होंने डिग्री पूरी नहीं की. इसके बजाए बीसेक की उम्र के शुरुआती सालों में कारोबार में आ गए और कपड़ा तथा जहाजरानी के उद्यम शुरू किए. समर्थकों ने इस दौर को व्यावहारिक प्रबंधन के सबूत के तौर पर पेश किया, तो आलोचकों ने इसे पर्दे के पीछ गोटियां चलने वाले शख्स की शुरुआत के तौर पर देखा.

खालिदा जिया के दूसरे कार्यकाल (2001-06) के दौरान बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के भीतर रहमान का कोई सानी न था. उन्होंने छात्र नेताओं को तैयार किया, ठेठ जमीनी नेटवर्क मजबूत किया और निर्णय क्षमता के लिए प्रतिष्ठा और पहचान बनाई. समर्थकों ने आधुनिक राजनैतिक संगठनकर्ता की जय-जयकार की तो निंदकों ने सत्ता को अपने हाथों में समेटने की फितरत को लेकर आगाह किया.

जब बीएनपी सत्ता से हाथ धो बैठी और फौजी समर्थन पर टिकी कामचलाऊ सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान छेड़ा, तो रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग से जुड़े कई मामले लाद दिए गए. उन्होंने लगातार हिरासत में जुल्म ढाए जाने का आरोप लगाया और दावा किया कि उन्हें खत्म करने की कोशिश की गई थी. 2008 में वे इलाज के लिए बांग्लादेश छोड़कर चले गए और 17 साल बाहर ही रहे.

लंदन पनाहगाह और कमान सेंटर दोनों बन गया. वहां से वे अपनी डॉक्टर पत्नी जुबैदा और उनकी बेटी जईमा (जो अब बैरिस्टर हैं) के साथ पार्टी के मामलों से करीब से जुड़े रहे. उन्होंने रिकॉर्ड किए गए संदेशों के जरिए पार्टी की काउंसिलों को संबोधित किया. इनमें 2009 में बीएनपी की नेशनल काउंसिल भी थी, जिसमें उन्हें सीनियर वाइस प्रेसिडेंट चुना गया.

उनके पनपने पर नजर रखने वाले पर्यवेक्षकों का कहना है कि 2000 के दशक के शुरुआती सालों की लड़ाकू शख्सियत के बजाए अब उनका सार्वजनिक लहजा नरम था, वे काम सौंपने को ज्यादा तैयार थे और उनमें गठबंधन बनाने की कहीं ज्यादा तेज समझ थी.

इस बदलाव ने नौजवानों की अगुआई में हुए 2024 के विद्रोह के बाद ज्यादा ठोस शक्ल अख्तियार कर ली. वे इस विद्रोह के विचार प्रवर्तक थे, जिसने शेख हसीना की लंबी हुकूमत को उखाड़ फेंका और बागडोर अंतरिम प्रशासन के हाथ में सौंप दी.

दिसंबर 2025 में जब तारिक रहमान ढाका वापस आए तो यह प्रतिशोधी से ज्यादा एक पीड़ित के तौर पर उनकी वापसी थी. उसके बाद हुए चुनाव ने निर्णायक जनादेश दिया. उनका निजी कायापलट क्या मुल्क की बेहतरी में परिणत हो सकता है? यही वह सवाल है जिसका सामना बांग्लादेश को अब करना होगा.

शेख हसीना: भारत की कूटनीतिक  दुविधा

एक समय शेख हसीना ने अपनी तकरीबन अजेय सत्ता के साथ बांग्लादेश के राजनैतिक परिदृश्य अपना दबदबा स्थापित कर रखा था. आज वे नई दिल्ली में राजनैतिक निर्वासन में रह रही हैं. उनकी यहां मौजूदगी तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार के तहत दोनों पड़ोसी देशों के बीच संबंधों को फिर से पटरी पर लाने में सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है.

2009 में बतौर प्रधानमंत्री सत्ता में वापसी के बाद से हसीना ने खुद को स्थिरता और धर्मनिरपेक्षता के संरक्षक के रूप में पेश किया. आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, क्षेत्रीय सहयोग और बांग्लादेश की धरती से चलने वाले भारत-विरोधी विद्रोही गुटों को खत्म करने के लिए नई दिल्ली के साथ मिलकर काम किया. लेकिन यह समीकरण 2024 में छात्रों के नेतृत्व वाले विद्रोह के बाद बिगड़ गया. शेख हसीना को सत्ता से बाहर कर दिया गया और इस तरह वे भारत की एक मजबूत साथी से उसके लिए मुसीबत का सबब बन गईं.

बांग्लादेश में हसीना निरंकुशता, विरोधियों को जबरन गायब करने, संस्थाओं के राजनीतिकरण के लिए जिम्मेदार एक ऐसी सत्ता का प्रतीक बन गईं, जिसके बारे में कई नागरिकों का मानना था कि उसने उनकी बात सुनना बंद कर दिया. मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही को तेजी से आगे बढ़ाया.

बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने उन्हें दोषी करार दिया और मौत की सजा सुना दी. अभी भारत के संरक्षण में रह रहीं शेख हसीना बांग्लादेशी सरकार की नजरों में औपचारिक तौर पर भगोड़ा हैं. यही विरोधाभास दोनों देशों के बीच कूटनीतिक पहेली बना हुआ है.

शेख हसीना जून 2024 में नरेंद्र मोदी के साथ

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की नई सरकार के लिए भारत में उनकी मौजूदगी असहज है लेकिन समाधान निकाला जा सकता है. उनका लगातार सक्रिय रहना राजनैतिक तौर पर विस्फोटक साबित हुआ है. हसीना ने भारतीय धरती से सोशल मीडिया के जरिए समर्थकों को संबोधित किया, घरेलू और वैश्विक मीडिया से बात की और एक बिगड़ी राजनैतिक व्यवस्था में खुद को वैध नेता के तौर पर पेश किया. बांग्लादेश में इसे लेकर तमाम लोगों में यह धारणा बनी कि भारत जानबूझकर या अनजाने में ही राजनैतिक हस्तक्षेप को बढ़ावा दे रहा है.

ऐसे में नई दिल्ली की दुविधा असाधारण रूप से गंभीर है. उनका प्रत्यर्पण ऐसी नजीर स्थापित करेगा जिससे भारत हमेशा बचता रहा है, विशेष रूप से मृत्युदंड जैसे मामलों में. दूसरी तरफ, बेरोकटोक राजनैतिक गतिविधियों की अनुमति दिए जाने से बांग्लादेश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के साथ संबंध खराब होने का जोखिम है. और फिर बांग्लादेश की राजनीति में भारत के पक्षपातपूर्ण रवैये की पुरानी धारणा को बल मिलेगा.

सबसे व्यावहारिक रास्ता यही है कि नाटकीयता भरे कदमों के बजाए संयमित व्यवहार अपनाया जाए. भारतीय अधिकारियों ने पहले ही संकेत दे दिया है कि शेख हसीना को खुले तौर पर राजनैतिक गतिविधियों के लिए भारतीय क्षेत्र का इस्तेमाल करने की अनुमति दिए जाने की संभावना नहीं है. मीडिया की पहुंच सीमित करना, सार्वजनिक बयानबाजी हतोत्साहित करना और उनके प्रवास को पूरी तरह मानवीय आधार पर बताना नई दिल्ली को पूरी जोर-शोर से यह दलील देने में समर्थ बना सकता है कि बांग्लादेश के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जा रहा.

बीएनपी नेतृत्व के लिए फिलहाल यही पर्याप्त हो सकता है. जैसा कि पार्टी महासचिव और वरिष्ठ मंत्री मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने सुझाव भी दिया है कि प्रत्यर्पण बातचीत के लिए पहली शर्त नहीं होनी चाहिए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हसीना को द्विपक्षीय संबंधों में बाधक न बनने दिया जाए.

—अर्कमय दत्ता मजूमदार

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