नारियल को प्रोत्साहन
नारियल और काजू जैसी नकदी फसलों पर नए सिरे से ध्यान देने से भारत की अनाज-केंद्रित खेती में बदलाव की उम्मीद.

बजट में कृषि के एक नए प्रयोग के तहत भारत के तटवर्ती इलाकों पर ध्यान दिया गया है. 'ऊंची कीमत और बागान फसलों’ यानी नारियल, काजू, कोको, चंदन और सुपारी जैसी 'नकद फसलों’ के लिए 350 करोड़ रुपए का पैकेज घोषित किया गया है. ये फसलें अधिकतर देश या विदेश में बेचने के लिए ही उगाई जाती हैं और नारियल तेल, कॉयर या कोको पीट जैसे लाभदायक उत्पादों में प्रोसेस की जाती हैं.
इस साल का आवंटन पूरे देश की कृषि के लिए रखे गए 1.63 लाख करोड़ रुपए के 0.3 प्रतिशत से भी कम है, लेकिन कार्रवाई का भौगोलिक क्षेत्र काफी कुछ बताता है. दक्षिणी तटवर्ती इलाकों में ये फसलें ज्यादा होती हैं, और वहां के लोग लंबे समय से अनाज-केंद्रित कृषि नीति के कारण खुद को उपेक्षित महसूस करते रहे हैं. अब नारियल और काजू पर खास ध्यान दिया गया है.
नारियल प्रमोशन स्कीम के लिए 150 करोड़ रुपए रखे गए हैं और इसका मकसद पाम के पुराने पेड़ों की जगह ज्यादा मजबूत किस्म वाले पेड़ लगाना, पैदावार बढ़ाना और प्रोसेस किए गए उत्पादों को बढ़ावा देना है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस रकम से 'डेमंस्ट्रेशन फार्म’ और किसानों की कुछ स्कीमों के लिए ही धन मिल पाएगा, लेकिन इससे इस सेक्टर को अपनी प्राथमिकताओं पर फिर से सोचने में मदद मिलेगी. भारत दुनिया के कुल नारियलों का एक-चौथाई उत्पादन करता है, लेकिन उसका सिर्फ पांचवां हिस्सा ही प्रोसेस करता है. प्रतिस्पर्धी देश इंडोनेशिया और फिलीपींस भारत से अधिक नारियल उगाते हैं और सालाना 60-70 प्रतिशत को प्रोसेस करते हैं.
नीति निर्माताओं ने सिफारिश की है कि प्रमुख उत्पादक राज्यों—केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में कोल्ड स्टोरेज और टेस्टिंग सुविधाओं के साथ आधुनिक प्रोसेसिंग इकाइयां लगाई जाएं. प्रतिकूल मौसम से खराब फसल के दौरान खोपरे (नारियल का सूखा सफेद पाउडर) के लिए न्यूनतम मूल्य और गारंटीड खरीद बहुत जरूरी है.
किसानों को दोबारा पेड़ लगाने और उपकरणों की खरीद के लिए आसान ऋण मिलने के साथ-साथ बेहतर सिंचाई और उनका बाजारों से जुड़ाव भी जरूरी है. नारियल पार्क भी बनाए जा सकते हैं, जहां खरीद से लेकर निर्यात तक की सभी गतिविधियां प्रबंधित की जाएं. नारियल विकास बोर्ड को अधिक ताकत देने और राज्य और केंद्र की नीतियों में तालमेल से चीजों को आसान बनाने में मदद मिल सकती है.
जहां तक काजू की बात है, उसके लिए बजट में 100 करोड़ रुपए रखे गए हैं. लेकिन इसकी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए सिर्फ सरकारी धन से काम नहीं चलेगा, खासकर जब इसकी प्रोसेसिंग सीमित हो और आयात से कमी पूरी की जाती हो. यही बात चाय, कॉफी, रबर और मसालों जैसी दूसरी नकद फसलों पर भी लागू होती है—बजट बड़े बदलावों के बजाए ब्रांडिंग और सर्टिफिकेशन अभियानों पर निर्भर करता है. इनके बिना, नकद फसल से जुड़े छोटे किसानों को उतार-चढ़ाव और परेशानी का सामना करते रहना पड़ेगा. हालांकि, इस बीच, वे बजट में प्रस्तावित भारत-विस्तार ऐप से फायदा उठा सकते हैं, जिससे उनको अपनी भाषा में मौसम और बाजार का अपडेट मिल सकता है.