स्थिरता पर भरोसा

विश्वव्यापी अनिश्चितता के दौर में राजनैतिक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में स्पष्ट जनादेश

26 जनवरी को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर पीएम नरेंद्र मोदी

लगता है आज की दुनिया जैसे अपनी धुरी से हिल गई है. आर्थिक बेचैनी और राजनैतिक उथल-पुथल महाद्वीपों में फैल रही है और हमारे पड़ोस तक इसका असर दिख रहा है. एक विदेश नीति विशेषज्ञ के शब्दों में, हर दिन एक नई वैश्विक और क्षेत्रीय उथल-पुथल और फिर उसके नए सिरे उभरते हैं. ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साफ तौर पर अलग नजर आते हैं. वे राजनैतिक और आर्थिक मजबूती की नायाब मिसाल पेश करते दिखते हैं. जब दुनिया एक संकट से दूसरे संकट की ओर डगमगा रही है, ऐसे में मोदी का नेतृत्व स्थिरता का प्रतीक बन गया है.

यही बड़ी वजह है कि ताजा छमाही इंडिया टुडे-सीवोटर देश का मिज़ाज सर्वे में प्रधानमंत्री को जबरदस्त समर्थन मिला है. यह उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता, सरकार के कामकाज और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संसदीय स्थिति, तीनों स्तरों पर दिखता है. 2024 के आम चुनाव में पार्टी के अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन के बाद जो वापसी हुई है, वह चौंकाने वाली है. 2024 में लोकसभा की 543 सीटों में से भाजपा को 240 सीटें मिली थीं.

यह अपने दम पर बहुमत के लिए जरूरी 272 सीटों से 32 कम थीं और 2019 में जीती गई 303 सीटों से काफी नीचे. 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद यह पहला मौका था, जब भाजपा को सरकार बनाने के लिए अपने सहयोगियों पर निर्भर होना पड़ा. उसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के तहत खासकर नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) और चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के सहारे बहुमत जुटाना पड़ा. एनडीए का कुल आंकड़ा 2019 के 353 से घटकर 293 पर आ गया था.

साल 2024 के झटके के दो साल भी पूरे नहीं हुए हैं और जनवरी 2026 का इंडिया टुडे का देश का मिज़ाज सर्वे दिखाता है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा ने अपनी खोई हुई रफ्तार फिर पकड़ ली है. अगर अभी लोकसभा चुनाव हो जाएं तो भाजपा अपने दम पर 287 सीटें जीत सकती है. यह साधारण बहुमत के लिए जरूरी 272 से 15 ज्यादा है. इतना ही नहीं, सत्तारूढ़ एनडीए का कुल आंकड़ा 293 से बढ़कर 352 सीटों तक पहुंच सकता है. यह 2019 के आम चुनाव में एनडीए को मिली 353 सीटों से बस एक कम है, जो पिछले तीन लोकसभा चुनावों में उसका सबसे ऊंचा आंकड़ा रहा है.

यह पहली बार नहीं है जब 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद किसी देश का मिज़ाज सर्वे में भाजपा बहुमत के पार जाती दिखी हो. फरवरी 2025 के देश का मिज़ाज में पार्टी को अपने दम पर 281 सीटें मिलती नजर आई थीं. इसकी बड़ी वजह यह रही कि पार्टी ने जल्दी खुद को संभाला और 2024 की सर्दियों में महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत दर्ज की. मगर अगस्त 2025 के देश का मिज़ाज सर्वे में भाजपा का आंकड़ा गिरकर 260 रह गया था. इसकी मुख्य वजह वह धारणा बनी कि डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारतीय निर्यात पर लगाए गए 50 फीसद टैरिफ से देश की अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा. लोगों को लगा कि इससे बेरोजगारी और महंगाई बढ़ सकती है. वहीं ऑपरेशन सिंदूर की सफलता भी प्रधानमंत्री की रेटिंग में वैसी बढ़त नहीं दिला पाई, जैसी उम्मीद की जा रही थी. ट्रंप बार-बार यह दावा करते रहे कि भारत और पाकिस्तान के बीच शांति समझौता उन्होंने करवाया, जिससे भारत का नैरेटिव कमजोर पड़ता दिखा.

कांग्रेस को हानि, भाजपा को लाभ
नरेंद्र मोदी ने वैश्विक और क्षेत्रीय अनिश्चितताओं के बावजूद, सिर्फ छह महीने में जोरदार वापसी की है. जनवरी 2026 के इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वे के मुताबिक, भाजपा एक बार फिर बहुमत के पार जाती दिख रही है. इस अवधि में एनडीए को जो 28 अतिरिक्त सीटें मिलती नजर आ रही हैं, उनमें से 27 अकेले भाजपा के खाते में दिख रही हैं. इसका एक बड़ा कारण बिहार और दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत है. बिहार में जद (यू) के साथ गठबंधन में और राष्ट्रीय राजधानी में अपने दम पर भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया. भले एनडीए का कुल वोट शेयर 46.7 फीसद से मामूली बढ़कर 47.4 फीसद हुआ हो और भाजपा का वोट शेयर 40.6 से 40.9 फीसद तक ही पहुंचा, मगर धारणा यह बनी कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला इंडिया ब्लॉक लगातार जनाधार खो रहा है. विधानसभा चुनावों में लगातार झटकों के बाद मुख्य विपक्षी दलों का वोट शेयर करीब दो फीसद गिरा है. इसका सीधा लाभ भाजपा और एनडीए को मिला है.

देश का मिज़ाज सर्वे में मोदी और एनडीए के मजबूत प्रदर्शन की वजह केवल विधानसभा चुनावों की जीत नहीं है. बीते छह महीनों में देश ने जिन संकटों का सामना किया, उन्हें संभालने की मोदी की क्षमता पर मतदाताओं का भरोसा साफ दिखता है. सर्वे में 57 फीसद लोगों ने प्रधानमंत्री के तौर पर उनके कामकाज को 'बहुत अच्छा' या 'अच्छा' बताया है. अपने 11वें साल में यह आंकड़ा मोदी के लिए बड़ी तसल्ली देने वाला है. एनडीए सरकार के कुल प्रदर्शन को भी अच्छे अंक मिले हैं. 52 फीसद लोग सरकार से 'संतुष्ट' या 'बहुत संतुष्ट' हैं. 'असंतुष्ट' रहने वालों का फीसद 24 से कम है, जो बताता है कि सत्ता विरोधी लहर अभी बेहद सीमित है.

विपक्ष से मोदी के नेतृत्व को कोई ठोस चुनौती भी नजर नहीं आती. जब पूछा गया कि भारत का अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त कौन है, तो 54.7 फीसद ने मोदी का नाम लिया. यह अगस्त के सर्वे से तीन फीसद ज्यादा है. उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी 26.6 फीसद के साथ काफी पीछे दूसरे नंबर पर हैं, भले उनकी रेटिंग में दो फीसद की वृद्धि हुई हो. तीसरे स्थान पर ममता बनर्जी हैं, जिन्हें सिर्फ 1.7 फीसद समर्थन मिला है.

सर्वे यह भी दोहराता है कि विपक्षी खेमे में इंडिया ब्लॉक का नेतृत्व करने के लिए राहुल गांधी ही सबसे उपयुक्त चेहरा माने जाते हैं. नेता प्रतिपक्ष के तौर पर उनके प्रदर्शन को 44 फीसदी लोगों ने 'अच्छा' या 'बहुत अच्छा' कहा है, हालांकि यह अगस्त 2025 के 50.3 फीसद से कम है. उनका 'वोट चोरी' अभियान कुछ हद तक असर दिखा रहा है. 40 फीसद लोग इसे चिंता का विषय मानते हैं. लेकिन कांग्रेस को असली विपक्ष के तौर पर देखने की धारणा कमजोर पड़ रही है. सर्वे में 60 फीसद से ज्यादा लोग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को इंडिया ब्लॉक की सबसे कमजोर कड़ी मानते हैं.

स्थिरता के नाम पर वोट
दरअसल, एक अहम आंकड़ा है, जो सत्तारूढ़ गठबंधन की चुनावी मजबूती को समझाता है. पहली बार 'राजनैतिक स्थिरता' मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने आई है. इसने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण और अनुच्छेद 370 हटाने जैसे मुद्दों को पीछे छोड़ दिया, जो पिछले सर्वे में टॉप पर रहे थे. इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार भी मोदी सरकार की टॉप पांच उपलब्धियों में हैं. सियासी स्थिरता को सबसे ऊपर रखने की एक बड़ी वजह विपक्ष की बिखरी हालत मानी जा रही, जिस पर लोगों का भरोसा कम दिखता है.

लोग मानते हैं कि मोदी के नेतृत्व में आई राजनैतिक स्थिरता ने 2025 में भारत को विदेश नीति के मुश्किल तीन मामलों से निबटने में मदद की. एक आक्रामक डोनाल्ड ट्रंप, दूसरी ओर पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ तनाव, और तीसरी ओर कभी नरम, कभी सख्त रुख अपनाता चीन. इन हालात में ज्यादातर लोगों का मानना है कि एनडीए की विदेश नीति ने दुनिया में भारत की स्थिति मजबूत की है. बहुमत यह भी मानता है कि ट्रंप की वापसी के बाद भारत-अमेरिका रिश्ते बिगड़े हैं. फिर भी लोग साफ कहते हैं कि प्रधानमंत्री को अमेरिकी राष्ट्रपति को उन्हीं की भाषा में जवाब देना चाहिए.

45 फीसद से ज्यादा चाहते हैं कि भारत भी जवाबी टैरिफ लगाए. वहीं 33.6 फीसद का मानना है कि भारतीय उद्योग पर पड़ने वाले असर को कम करने के उपाय किए जाने चाहिए. पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों पर राय बंटी हुई है. 50.7 फीसद लोगों को लगता है कि हालात बेहतर हुए हैं, मगर 46 फीसद इससे सहमत नहीं हैं. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत-पाकिस्तान के बीच शांति कराने के ट्रंप के दावे को भारत ने कितने असरदार तरीके से चुनौती दी, इस पर भी लोग बराबर बंटे हुए हैं. चीन को लेकर सर्वे एक दोहरी रणनीति के पक्ष में है. सीमा सुरक्षा को मजबूत किया जाए, व्यापारिक रिश्ते भी आगे बढ़ें और कूटनीतिक बातचीत का रास्ता खुला रखा जाए.

लोकसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने के बाद 5 जून 2024 को एनडीए के सहयोगियों के साथ प्रधानमंत्री

कम नाकामी का एहसास
एनडीए सरकार की नाकामियों की बात करें तो महंगाई और बेरोजगारी अब भी सूची में सबसे ऊपर हैं मगर पहले जैसी तीव्रता के साथ नहीं. महंगाई अभी भी नंबर एक नाकामी मानी जा रही है, लेकिन इसका आंकड़ा पिछले देश का मिज़ाज सर्वे में 21.2 फीसद से घटकर अब 19.5 फीसद रह गया है. करीब दो फीसद की यह गिरावट इसलिए भी हो सकती है क्योंकि बीते एक साल में मोदी सरकार महंगाई की रफ्तार को काफी हद तक काबू में लाने में सफल रही है. इसमें मॉल एवं सेवा कर (जीएसटी) को सरल बनाने का भी असर दिखता है. कई घरेलू सामान और सेवाओं पर टैक्स दरें घटाई गईं, जिससे कीमतों में राहत मिली. वैसे सिर्फ 22.6 फीसद लोग ही कहते हैं कि जीएसटी बदलाव के बाद वे पहले से ज्यादा खरीदारी कर रहे हैं. इससे संकेत मिलता है कि सरकार को इसके अमल में और आक्रामक होने की जरूरत है.

सबसे बड़ी गिरावट बेरोजगारी को लेकर चिंता में दिखती है. यह अब नाकामियों की सूची में दूसरे नंबर पर है. अगस्त 2025 में जहां 27.1 फीसद लोग इसे सरकार की सबसे बड़ी विफलता मान रहे थे, अब यह आंकड़ा घटकर 16.6 फीसद रह गया है. इसकी पुष्टि सर्वे के एक और निष्कर्ष से होती है. बेरोजगारी को 'गंभीर' या 'बहुत गंभीर' मानने वालों की संख्या 71.5 फीसद से घटकर अब 64.8 फीसद रह गई है. करीब 53 फीसद लोगों का मानना है कि मोदी सरकार की पहलकदमियों से रोजगार के मौके बने हैं, वैसे 41.1 फीसद इससे सहमत नहीं हैं. दिलचस्प बात यह है कि सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देने वालों का आंकड़ा इस बार 48.5 फीसद से घटकर 42.2 फीसद हो गया है. वहीं खुद का कारोबार शुरू करने की इच्छा रखने वालों की संख्या 34.7 फीसद से बढ़कर 40.2 फीसद हो गई है. यह शायद गिग इकोनॉमी में बढ़ते अवसरों की तरफ इशारा करता है. मगर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. बहुमत अब भी मानता है कि देश में कारोबार शुरू करना आसान नहीं. यानी उद्यमिता की चाह तो बढ़ रही मगर कारोबार में सहजता के मामले में सरकार को अभी और काम करना होगा.

सीवोटर के संस्थापक यशवंत देशमुख इस सर्वे में बेरोजगारी को लेकर चिंता घटने की दो संभावित वजहें बताते हैं. उनके शब्दों में, ''पहला एक एक्स फैक्टर (विशेष कारण) है. केंद्र और राज्यों से महिलाओं को बड़े पैमाने पर सीधे पैसे मिल रहे हैं. इससे नौकरी खोजने का दबाव कुछ कम हुआ है. दूसरा यह कि पिछले कुछ महीनों में महंगाई काफी घटी है, तो बेहतर सैलरी वाली नौकरी में अपग्रेड करने की मजबूरी भी कम हुई होगी.'' इस प्रक्रिया में 2025 के बजट में पर्सनल इनकम टैक्स की छूट सीमा 7 लाख से बढ़ाकर 12 लाख रुपए करना भी मददगार साबित हुआ हो सकता है. फिर भी, कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे अब भी नाकामियों की सूची पर हावी हैं और 45 फीसद हिस्सेदारी इन्हीं की है.

इस सर्वे के दूसरे नतीजे भी साफ संकेत देते हैं कि अच्छे चुनावी आंकड़ों के बावजूद अर्थव्यवस्था मोदी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए. रोजगार की कमी, महंगाई, गरीबी, कृषि संकट और बुनियादी ढांचे की कमी आज भी मतदाताओं के लिए सबसे अहम मुद्दे हैं. सरकार के लिए राहत की बात यह है कि 48.8 फीसद लोग अर्थव्यवस्था को संभालने में उसके काम को 'बहुत अच्छा' या 'अच्छा' मानते हैं.

मगर आने वाले छह महीनों में अर्थव्यवस्था के और सुधरने को लेकर उत्साह सीमित है. सिर्फ 35.8 फीसद लोग मानते हैं कि हालात बेहतर होंगे. आर्थिक विकास कितना समावेशी रहा, इस पर भी तस्वीर जटिल है. बहुमत का मानना है कि इसका लाभ अमीरों को और कुछ हद तक मिडिल क्लास को मिला. यही धारणा सरकार की आर्थिक नीतियों के बारे में भी है. ज्यादातर मानते हैं कि नीतियां बड़े कारोबार के पक्ष में हैं और माइक्रो एवं छोटे उद्यमियों को नुकसान पहुंचा रही हैं. सबसे चिंताजनक संकेत यह है कि 63 फीसद से ज्यादा लोगों को लगता है कि रोजमर्रा के घरेलू खर्च संभालना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. यानी आंकड़ों में राहत दिख सकती है, मगर घर के बजट पर दबाव अब भी लोगों की सबसे बड़ी चिंता है.

अर्थव्यवस्था के अलावा लोकतंत्र की स्थिति को लेकर भी चिंताएं हैं. 44.7 फीसद लोगों का मानना है कि लोकतंत्र खतरे में है. यह आंकड़ा लगभग उतना ही है, जितने लोग मानते हैं कि ऐसा नहीं है. यानी देश की लोकतांत्रिक सेहत को लेकर राय साफ तौर पर बंटी हुई है. चुनाव आयोग की ओर से कराई गई वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया को 50.3 फीसद लोग निष्पक्ष मानते हैं, मगर 37.8 फीसद इसे राजनैतिक तौर पर पक्षपाती अभ्यास मानते हैं. ज्यादातर लोग यह भी मानते हैं कि चुनावों में मुफ्त योजनाओं या तोहफों के वादों और बंटवारे पर रोक लगाने का काम चुनाव आयोग को करना चाहिए, न कि सुप्रीम कोर्ट को. यह धारणा भी बनी हुई है कि भाजपा सरकार, ठीक अपने पूर्ववर्तियों की तरह, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) और इनकम टैक्स महकमे जैसी एजेंसियों का सियासी इस्तेमाल करती है. इस सोच में कोई खास कमी नहीं आई है.

इन नकारात्मक पहलुओं के बावजूद, सर्वे के नतीजे प्रधानमंत्री के लिए बड़ी ताकत साबित हो सकते हैं. यह उन्हें 2025 में शुरू की गई अपनी 'रिफॉर्म एक्सप्रेस' पर तेज रफ्तार से आगे बढ़ने का मौका देते हैं. 2026 की शुरुआत मोदी सरकार ने बड़े धमाके के साथ की है. भारत ने यूरोपियन यूनियन के साथ अब तक का सबसे बड़ा ट्रेड डील साइन किया है. अब सरकार को अमेरिका के साथ भी ऐसा व्यापार समझौता करने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि टैरिफ को लेकर बना दबाव कम हो सके.

घरेलू मोर्चे पर भी काम बाकी है. एनडीए ने देश में विधानसभा वाले 31 में से 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में डबल इंजन सरकारें बनाई हैं. अगर सत्तारूढ़ दल अपनी मौजूदा बढ़त बनाए रखना चाहता है, तो इन सरकारों को ज्यादा कुशलता से काम करना होगा.

विपक्ष शासित राज्यों के साथ भी केंद्र को ज्यादा संतुलित रवैया दिखना होगा. कल्याणकारी योजनाओं की लंबी शृंखला ने जरूरतमंदों पर आय का दबाव जरूर कम किया और सत्तारूढ़ दल की सियासी स्थिति को स्थिर किया है. मगर आकांक्षी भारत सिर्फ सहारे पर नहीं रुकना चाहता. वह बेहतर सैलरी वाली नौकरियां और आसान जिंदगी चाहता है, विकसित भारत के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए. यही वजह है कि इस बार देश का मिज़ाज सर्वे में बहुमत ने उस सियासी स्थिरता को अपनी मंजूरी दी है, जिसका चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने हुए हैं.

कथित चुनावी हेरफेर के खिलाफ 18 सितंबर, 2025 को बीकानेर में प्रदर्शन करते युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता

62 फीसद 55 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोग प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज को 'बहुत अच्छा' या 'अच्छा' मानते हैं, जबकि 18-24 वर्ष के लोगों 
में ऐसा मामने वाले 52 फीसद हैं

26 फीसद मुसलमान मोदी को अब तक का सबसे अच्छा प्रधानमंत्री मानते हैं, जबकि इंदिरा गांधी के बारे में 24 फीसद मुसलमान ऐसा मानते हैं

सर्वेक्षण का तरीका

इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वेक्षण सामाजिक-आर्थिक शोध के क्षेत्र में विश्व स्तर पर ख्यात संस्था सी-वोटर की ओर से 8 दिसंबर, 2025 से 21 जनवरी, 2026 के बीच किया गया. इसमें सभी राज्यों के सभी लोकसभा क्षेत्रों के 36,265 लोगों की राय शामिल की गई. सटीक अनुमान लगाने के लिए इन नमूनों के अलावा बीते 24 हफ्तों के दौरान सी-वोटर की तरफ से जुटाए गए 89,714 अतिरिक्त लोगों की राय को भी इसमें शामिल किया गया. इस तरह, यह पूरी रिपोर्ट कुल 1,25,979 लोगों की राय के आधार पर तैयार की गई. सर्वे के नतीजों में 95 फीसद भरोसे के साथ राष्ट्रीय स्तर पर 3 फीसद और क्षेत्रीय स्तर पर 5 फीसद तक की त्रुटि की गुंजाइश हो सकती है.

मई 2009 से सीवोटर ट्रैकर का संचालन हर सप्ताह एक कैलेंडर वर्ष में 52 चरणों में, 11 राष्ट्रीय भाषाओं में भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में किया जा रहा है. इसमें हर तिमाही में 60,000 नमूनों का लक्ष्य रखा गया है जिसमें औसतन 55 फीसद लोग अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हैं. 1 जनवरी, 2019 से सीवोटर ट्रैकर दैनिक आधार पर संचालित हो रहा है, जिसमें ट्रैकर विश्लेषण के लिए सात दिनों के रोलओवर नमूने का उपयोग किया जाता है.

ये सर्वेक्षण वैश्विक स्तर पर मानकीकृत रैंडम प्रोबेबिलिटी सैंपल पद्धति पर आधारित हैं, जिन्हें प्रशिक्षित शोधकर्ताओं की तरफ से सभी भौगोलिक और विविध जनसांक्चियकी वाले क्षेत्रों में किया गया है. सर्वेक्षण सभी क्षेत्रों के वयस्क उत्तरदाताओं के कंप्यूटर-सहायता प्राप्त टेलीफोन साक्षात्कार (सीएटीआइ) पर आधारित है. इसमें रैंडम नंबर डायल करने वाली तकनीक (आरडीडी) का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि देश के सभी दूरसंचार सर्कल में सभी टेलीकॉम ऑपरेटरों के नंबर इसमें शामिल किए जा सकें.

सीवोटर नवीनतम जनगणना आंकड़ों के मुताबिक, सभी क्षेत्रों की आबादी का समुचित प्रतिनिधित्व पक्का करने के लिए डेटा का सांख्यिकीय विश्लेषण करता है. सर्वे सटीक हो, इसके लिए विश्लेषण के दौरान ज्ञात जनगणना प्रोफाइल यानी लिंग, आयु, शिक्षा, आय, धर्म, जाति, शहरी/ग्रामीण के साथ-साथ पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में डाले गए वोट संबंधी डेटा के साथ मिलान किया जाता है. विश्लेषण के लिए सीवोटर अपने खास एल्गोरिद्म का इस्तेमाल करता है ताकि स्प्लिट-वोटर यानी अलग-अलग चुनावों में अलग पार्टियों को वोट देने वाले मतदाताओं के प्रभाव को ध्यान में रखकर क्षेत्रीय वोट शेयर की गणना की जा सके.

सीवोटर वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ पब्लिक ओपिनियन रिसर्च के बनाए पेशेवर नैतिकता के नियमों और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से ओपिनियन पोल के लिए जारी दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन करता है.

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