हरियाणा की सफलता बीजेपी को कैसे दिखा रही महाराष्ट्र और झारखंड में जीत का रास्ता?
हरियाणा में अवाक् करने वाली जीत से बीजेपी कार्यकर्ताओं की उदासी टूटी और उनमें जोशोखरोश लौटा, पार्टी को महाराष्ट्र और झारखंड के अगले विधानसभा चुनावों के लिए नई रणनीति का मॉडल मिला

नतीजों के दिन आठ अक्तूबर की देर शाम हरियाणा में मिली बेहद चौंकाने वाली जीत का जश्न अभी ठंडा नहीं पड़ा था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय राजधानी के बीजेपी मुख्यालय में आकर उत्साही पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया. वे हर खास चुनावी जीत के बाद ऐसा ही करते हैं.
जून में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी के बहुमत के आंकड़े से चूक जाने के बाद माहौल में उदासी-सी छा गई थी और पार्टी नए सिरे से सोच-विचार करने पर मजबूर हुई थी. लेकिन अब हरियाणा में चमत्कारिक 'विधानसभा जीत की हैट्रिक' और जम्मू-कश्मीर में अपेक्षाकृत अच्छे प्रदर्शन से बीजेपी कार्यकर्ताओं में जोश वापस आ गया है.
कहने की जरूरत नहीं कि चुनाव नतीजों ने हर जगह पार्टी काडर को फिर से तरोताजा कर दिया है. नतीजे खास तौर पर इसलिए भी सुकून देने वाले थे क्योंकि हरियाणा उन राज्यों में है, जहां लोकसभा चुनाव में पार्टी की सीटें 2019 में 10 से आधी घटकर पांच हो गईं. नतीजों ने इस कयास पर भी विराम लगा दिया कि 'मोदी मैजिक' राष्ट्रीय चुनाव में ही बेहतर काम करता है, राज्यों के चुनावों में नहीं. हरियाणा में बीजेपी ने चुनाव लड़ने का जो मॉडल अपनाया, वह अगले विधानसभा चुनावों में भी काम आ सकता है.
अगला मुकाम महाराष्ट्र है और वहां भी हरियाणा की तरह ही बीजेपी को लोकसभा चुनाव में कोई खास कामयाबी नहीं मिली थी. बीजेपी और उसके सहयोगियों को राज्य की कुल 48 संसदीय सीटों में सिर्फ 17 पर ही जीत हासिल हो पाई. वहां माहौल मराठा समुदाय की नाराजगी, गुटबाजी और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ बढ़ते गुस्से से सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के खिलाफ था. झारखंड में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन था, जहां एनडीए ने राज्य की कुल 14 लोकसभा सीटों में से नौ पर जीत हासिल की थी, लेकिन वहां भी बीजेपी को आदिवासी समुदायों की नाराजगी पर मरहम लगाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी और बड़े पैमाने पर गुटबाजी पर लगाम लगानी होगी.
हरियाणा की जीत ने यह भी दिखाया कि पार्टी नेतृत्व अपने तौर-तरीकों में फेरबदल से मुंह नहीं मोड़ता. सबसे बढ़कर चुनाव नतीजों ने साबित किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का काडर फिर सक्रिय हो गया है, जिसने पांसा पलटने में अहम भूमिका निभाई. हरियाणा में, बीजेपी पर एक दशक की ऐंटी-इन्कंबेंसी, थके हुए कार्यकर्ता और नौसिखिया राज्य नेतृत्व का भारी बोझ था.
उसका मुकाबला दो बार मुख्यमंत्री रहे भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस से था. फिर, कांग्रेस के हक में जाट-दलित-मुस्लिम का कमोबेश मजबूत-सा समीकरण था, और नाराज 'किसान-जवान-पहलवान' का मारक अस्त्र था. इन हालात को पलटना आसान कतई नहीं था. लेकिन बीजेपी ने उसमें कामयाबी हासिल की और कुल 90 में से 48 सीटें जीतकर राज्य में स्पष्ट बहुमत हासिल किया.
आरएसएस का हाथ
विधानसभा चुनावों के मौजूदा दौर के लिए बीजेपी ने जून में सभी मामलों की देखरेख के लिए मजबूत टीम बनाई थी. हरियाणा के लिए केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (साथ में त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब देब), झारखंड के लिए शिवराज सिंह चौहान (साथ में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा) और महाराष्ट्र के लिए भूपेंद्र यादव (साथ में कैबिनेट सहयोगी अश्विनी वैष्णव) को नियुक्त किया गया.
पार्टी नेतृत्व को यह भी लगा कि कोर वोटर और समर्थक लोकसभा चुनाव के नतीजों से मोहभंग के शिकार हैं, जिससे प्रधानमंत्री मोदी की हालत कमजोर हो गई है. इसकी एक बड़ी वजह यह कि कई बीजेपी नेता आरएसएस से दूर हो गए थे. उन्होंने यह मान लिया था कि पार्टी का संगठन आरएसएस से बड़ा हो गया है. शीर्ष नेताओं को गलती का एहसास हुआ और लोगों में भरोसा जगाने के लिए आरएसएस की मदद मांगी.
इस तरह आरएसएस के सह-सरकार्यवाह अरुण कुमार और प्रधान को हरियाणा में चुपचाप लक्षित अभियान चलाने के लिए कार्यकर्ताओं को संगठित करने का काम सौंपा गया. अरुण कुमार के आरएसएस सहयोगियों अतुल लिमये और आलोक कुमार को क्रमश: महाराष्ट्र और झारखंड में ऐसा ही करने के लिए कहा गया.
हरियाणा में हर निर्वाचन क्षेत्र के लिए आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठनों के 150 स्वयंसेवकों का ग्रुप बनाया गया, जो गांव-गांव में घूमकर हर हफ्ते करीब 100 बैठकें करते थे. उनमें वे राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और नए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नीतिगत सुधारों के अलावा पिछली कांग्रेस सरकारों के दौरान 'खर्ची-पर्ची' (नौकरी घोटाला) और 'दामाद-दलाल' (भूमि घोटाले) की बातें बढ़ा-चढ़ाकर बताते थे.
उधर, एक दूसरे मोर्चे पर बीजेपी 'किसान-जवान-पहलवान' के कांग्रेसी नैरेटिव की भी काट कर रही थी. यह नैरेटिव जींद जिले की जाट-बहुल जुलाना सीट से ओलंपियन पहलवान विनेश फोगाट की उम्मीदवारी से मजबूत हुआ था. विनेश के थोड़े अंतर से जीत की वजह यह थी कि बीजेपी ने उनकी उम्मीदवारी को महिला-युवा नैरेटिव में तब्दील नहीं होने दिया.
इसके बजाए, बीजेपी इसे अपने वोटरों के खिलाफ जाटों में गुस्सा भड़काने की हुड्डा की चाल के रूप में पेश करने में कामयाब रही. शंभू बॉर्डर खोलने और पंजाब के आंदोलनरत किसान यूनियनों को दिल्ली जाने देने के पूर्व मुख्यमंत्री के वादे के मामले में भी यही हुआ. कांग्रेस ने हुड्डा को अपना मुख्यममंत्री पद उम्मीदवार घोषित नहीं किया था, लेकिन वह इस तथ्य को छिपा भी नहीं पाई कि वे ही सारे फैसले कर रहे थे, जिससे बीजेपी को फिर से जाट विरोधी ध्रुवीकरण करने में मदद मिली.
हुड्डा को उम्मीद थी कि नाराज जाट, मुस्लिम और दलित जातियों का इंद्रधनुषी गठजोड़ अजेय होगा. इसका मुकाबला करने के लिए बीजेपी ने ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-जाट ओबीसी को साधा. ये समुदाय उससे खिसक गए थे. लिहाजा, 2019 के लोकसभा चुनावों में उसका वोट शेयर 77 फीसद से घटकर इस जून में 46 फीसद पर आ गया. उनका दिल वापस जीतने के लिए बीजेपी ने ओबीसी चेहरे, नायब सिंह सैनी को मार्च में मुख्यमंत्री बनाया और अग्निवीर जैसी प्रमुख नीतियों में सुधार किए, साथ ही साथ कई रियायतों का एलान किया और अधिक फसलों पर एमएसपी देने का वादा किया.
कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह जाट-बहुल बांगड़ और देसवाल बेल्ट में एकतरफा जीत हासिल कर लेगी, खासकर इसलिए कि चौटाला परिवार से जुड़ी दोनों पार्टियां इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) और जननायक जनता पार्टी (जजपा) वजूद की लड़ाई लड़ रही थीं. लेकिन इसके बजाए बीजेपी ने यहां 40 में से 16 सीटें जीत लीं. सात सीटें तो पहली बार जीतीं.
नाराजगी की साज-संभाल
हरियाणा के चुनाव की तैयारी करते वक्त बीजेपी को दोहरी चुनौती से निबटना पड़ा—एक तरफ पार्टी नेताओं में पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के खिलाफ गुस्सा था, तो दूसरी तरफ तब की गठबंधन सहयोगी दुष्यंत चौटाला की जजपा के खिलाफ शहरी इलाकों में गुस्सा था. उसके असर को कम करने के लिए आरएसएस और बीजेपी ने मिलकर काम किया.
शहरी इलाकों में पार्टी के उम्मीदवारों ने कमियां स्वीकार कीं, उनका दोष जजपा के मत्थे मढ़ा, और उससे रिश्ता तोड़ने के पीछे भी यही वजह बताई. जजपा 1 फीसद से भी कम लोकप्रिय वोटों तक सिमटकर रह गई और एक भी सीट पर दूसरे नंबर पर नहीं आ पाई. पूर्व उपमुख्यमंत्री दुष्यंत उचाना कलां सीट पर जमानत गंवा बैठे.
उधर, पार्टी ने यह पक्का किया कि सैनी ग्रामीण मतदाताओं के बीच ज्यादा दिखाई दें और खट्टर के मुद्दे को सुलझाने के लिए उन्हें पार्टी के असंतुष्ट नेताओं के घर भेजा. स्थानीय लोगों के गुस्से पर मरहम लगाने के लिए बीजेपी ने इस बार 60 नए चेहरों को मैदान में उतारा. यह रंग लाया, क्योंकि पार्टी ने 22 सीटें पहली बार जीतीं.
इसी तरह पार्टी ने टिकट बांटने में जनाधार वाले नेताओं को तरजीह देने का फैसला किया. लिहाजा केंद्रीय मंत्री कृष्ण पाल गुर्जर ने पांच वफादारों को टिकट दिलाया, तो राव इंद्रजीत सिंह भी अपनी बेटी आरती सिंह राव और नौ अन्य वफादारों को टिकट दिला सके.
हरियाणा में खट्टर के निजाम के दौरान जाटों की तरह ही गूजर, अहीर और अन्य ओबीसी नेता भी उपेक्षित महसूस कर रहे थे. बीजेपी ने ओबीसी को रणनीतिक ढंग से कांग्रेस की 20 के मुकाबले 22 सीटें दीं और चुनाव अभियान भी उन्हीं के क्षत्रपों को चलाने दिया.
कांग्रेस का यमुनानगर, हथीन, फिरोजपुर झिरका, पुनहाना और नूंह की पांच सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने का फैसला स्थानीय तौर पर भले कारगर रहा हो, पर उससे अहीरवाल पट्टी के दूसरे इलाकों में बीजेपी को 'उलट ध्रुवीकरण' करने में मदद मिली. कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में 2023 के दंगों के आरोपी मम्मन खान की मौजूदगी ने भाजपा के नैरेटिव को मदद पहुंचाई. पार्टी ने इस इलाके की 23 में से 17 सीटें जीतीं, जिनमें आरती सिंह राव की बहुत कम अंतर से जीती गई अटेली सीट भी है. इलाके में ज्यादातर सीटें बुहार लेने की बदौलत ही राव इंद्रजीत भी मुख्यमंत्री पद के लिए दावा ठोक रहे हैं.
लोकसभा चुनाव में विपक्ष के इस नैरेटिव ने भी बीजेपी की संभावनाओं में पलीता लगाया था कि 'चार सौ पार' के लक्ष्य के पीछे इरादा संविधान को बदलकर पिछड़े समुदायों और खासकर दलितों के आरक्षण को खत्म करने का था. 17 आरक्षित सीटों के साथ दलित वोटों में जरा भी हेरफेर होने पर विधानसभा की 90 में से 49 सीटों पर नतीजा बदल सकता था.
हरियाणा में दलित मतदाता 20.2 फीसद हैं, पर उनके किसी पार्टी विशेष को वोट देने का खास पैटर्न कभी नहीं देखा गया. दलित नेता कुमारी शैलजा और जाट नेता हुड्डा के बीच कांग्रेस की अंतर्कलह ने मदद की. बीजेपी ने आठ सीटें—नीलोखेड़ी, पटौदी, खरखौदा, होडल, बावल, नरवाना, इसराना और भवानी खेड़ा—जीतीं, तो कांग्रेस ने बाकी नौ आरक्षित सीटें जीतीं.
लड़ाई का मॉडल
हरियाणा ने चुनावी जीत के अलावा बीजेपी को लड़ाई का मॉडल भी दिया है, जो उसके कार्यकर्ताओं के लिए मददगार हो सकता है. जम्मू-कश्मीर में लगे झटके भी, जहां इंडिया ब्लॉक ने घाटी की ज्यादातर सीटें अपनी झोली में डाल लीं, इस बात का इशारा हो सकते हैं कि मुस्लिम समुदाय के साथ बीजेपी को पींग बढ़ाना चाहिए. महाराष्ट्र हरियाणा से कहीं ज्यादा बड़ा और पेचीदा राज्य है. बीजेपी नेताओं का कहना है कि हरियाणा की जीत ने यह किया कि पार्टी को आक्रामक सहयोगी दलों से निबटने की बेहतर स्थिति में ला दिया. मुख्यमंत्री की अगुआई वाली शिवसेना और अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, दोनों ही लोकसभा चुनाव के नतीजों से बीजेपी को कमजोर हुआ मानकर ज्यादा सीटों पर नजरें गड़ाए थे.
महाराष्ट्र और झारखंड में आरएसएस ने अपने स्वयंसेवकों को पहले ही लामबंद कर लिया है. बीजेपी और आरएसएस के नेताओं की संभाग स्तरीय बैठक हो रही हैं. महाराष्ट्र में उसने विभिन्न धड़ों और पंकजा मुंडे, विनोद तावड़े, सुधीर मुगंटीवार और चंद्रकांत पाटील सरीखे नेताओं को शामिल करके कई समूह बनाए हैं. यहां तक कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को भी जाहिरा तौर पर विधानसभा चुनाव की योजनाओं की जानकारी दी जा रही है.
लोकसभा चुनाव में आरक्षण के मुद्दे ने खासकर मराठवाड़ा सरीखे इलाकों में दलितों, आदिवासियों और मराठों को गोलबंद कर दिया था और बीजेपी को इसका नुक्सान उठाना पड़ा था. पार्टी नेताओं का कहना है कि हिंदू दलितों का कम से कम एक हिस्सा पार्टी के पाले में लौट आएगा, क्योंकि 'चार सौ पार' का नैरेटिव अब प्रासंगिक नहीं रह गया है.
हरियाणा में किए गए प्रयोग की तरह, जहां उसे गैर-जाट तबकों का समर्थन मिला, बीजेपी ने अपने 'माधव फॉर्मूले' (माली, धनगर और वंजारी) को फिर जिंदा कर लिया है. ये वे ताकतवर तबके हैं जिनके बीच पार्टी अपना आधार बनाती रही है ताकि दबदबा रखने वाले मराठों के राजनैतिक आधिपत्य को चुनौती दी जा सके. हरियाणा की हार ने महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के भीतर कांग्रेस की स्थिति को कमजोर किया है, और इसका फायदा भगवा खेमे को मिलना चाहिए.
उधर झारखंड में उत्साह से लबालब बीजेपी के राज्य अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने पहले ही एलान कर दिया, "क्यों पड़े हो चक्कर में, झारखंड में कोई नहीं है टक्कर में." यह राज्य बीजेपी का गढ़ रहा है, पर हाल के वर्षों में उसे एक बड़ी चुनौती से जूझना पड़ा और वह थी—अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए आरक्षित सीटें जीतना. यह वह कमजोरी है जिसकी भारी कीमत उसे 2019 के विधानसभा चुनाव में चुकानी पड़ी, जब उसने 28 में से महज दो सीटें जीती थीं. मई में हुए लोकसभा चुनाव में भी पार्टी पांचों एसटी-आरक्षित सीटें हार गई, जबकि राज्य की बाकी नौ सीटों पर उसने कब्जा कर लिया.
इस कमजोरी को पहचानकर बीजेपी ने मेलजोल की कोशिशें बढ़ा दी हैं. राज्य में 2 अक्तूबर को प्रधानमंत्री मोदी की पिछली यात्रा के दौरान 79,000 करोड़ रुपए का राष्ट्रीय 'धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान' लॉन्च किया गया, जो देश भर के पांच करोड़ से ज्यादा आदिवासियों के हक में है.
झारखंड में बीजेपी का मुख्य रणक्षेत्र संथाल परगना का इलाका होगा, जो परंपरागत तौर पर झामुमो का गढ़ रहा है और जहां एसटी के लिए आरक्षित 28 में से 18 सीटें हैं. पार्टी 'बांग्लादेशी घुसपैठियों' के नैरेटिव के जरिए सेंध लगाने की कोशिश कर रही है. इस नैरेटिव में दावा किया जा रहा है कि बाहरी लोग आदिवासी महिलाओं से शादी करके स्थानीय नौकरियां और जमीन हड़प रहे हैं.
झारखंड में बीजेपी को अपने बीच चार पूर्व मुख्यमंत्रियों—बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा और चंपाई सोरेन—की आकांक्षाओं से भी निबटना होगा. इसमें आरएसएस से मदद मिल सकती है. हरियाणा के अनुभव ने बीजेपी को सिखाया है कि आरएसएस न केवल नेताओं बल्कि समुदायों के भीतर भी संतुलन बनाने में मददगार है. वह उम्मीद करेगी कि यह काम आने वाले चुनावों में भी इसी तरह होता रहे.
—साथ में, धवल एस. कुलकर्णी और अमिताभ श्रीवास्तव
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नायब सिंह सैनी : परदे के पीछे से सुर्खियों में आगे
कभी पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के मामूली-से शिष्य मानकर खारिज कर दिए गए नायब सिंह सैनी हैरतअंगेज चुनावी नतीजे में हरियाणा के अप्रत्याशित विजेता बनकर उभरे. विधानसभा में 48 सीटों और 39.94 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ बीजेपी के अब तक के सबसे अच्छे प्रदर्शन की अगुआई करते हुए सैनी ने न केवल दशक भर की संभावित सत्ता विरोधी लहर को बेअसर कर दिया, बल्कि अपना नाम राज्य में जनादेश का कामयाब बचाव करने वाले इने-गिने मुख्यमंत्रियों में दर्ज करवा लिया. उन्हें विरासत में जो लोगों की नाराजगी मिल थी, उस पर भी मरहम लगाने में कामयाब रहे.
अस्सी के दशक के आखिरी वर्षों में तब आरएसएस के प्रचारक खट्टर ने सैनी को सीधे और नेक स्वयंसेवक के रूप में चुना था. 1994 में वे खट्टर के साथ ही बीजेपी में आ गए थे. पार्टी की जमात में वे तभी से धीरे-धीरे और अचीन्हे ढंग से बढ़ते रहे, बिल्कुल लो-प्रोफाइल रहकर. वे ऐसे सुर्खियों और चमक-दमक से गायब थे कि जब पिछले साल अक्तूबर में उन्हें बीजेपी की हरियाणा इकाई का प्रमुख बनाया गया, पार्टी की अंदरूनी कोटरी के बाहर मुश्किल से ही किसी ने उनके बारे में ज्यादा कुछ सुना था, बावजूद इसके कि वे कुरुक्षेत्र से सांसद थे.
महज छह महीने बाद जब पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने खट्टर को राज्य से हटाकर राष्ट्रीय राजनीति में ले जाने का फैसला किया, तो राज्य की कमान उनके पटुशिष्य को सौंप दी गई. तब कुछ ही हफ्तों के भीतर लोकसभा के और फिर साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने थे और ऐसे में पार्टी को उम्मीद थी कि खुद ओबीसी से आने वाले सैनी भूपिंदर सिंह हुड्डा की अगुआई में कांग्रेस की जाट गोलबंदी के खिलाफ ग्रामीण गैर-जाट समुदायों को लामबंद कर पाएंगे. मगर पार्टी के भीतर कई लोगों ने सौम्य स्वभाव के सैनी को, जो अपने समुदाय के नेता भी बमुश्किल ही थे, चुनाव में प्रत्याशित हार के लिए चढ़ाए जाने वाले बलि के बकरे के तौर पर देखा.
मगर महज दशक भर पहले विधानसभा में दाखिल हुए 54 वर्षीय नेता ने राज्य भर के मतदाताओं के मन को छू लेने वाले चुनाव अभियान का संचालन और अगुआई करके आलोचकों को हक्का-बक्का कर दिया. दो-टूक विचारों, कई मौकों पर बड़बोले और नौकरशाही वाले तौर-तरीकों के लिए जाने जाने वाले अपने गुरु खट्टर के विपरीत सैनी ने अपनी सुनने और जुड़ने की तत्परता, हंसी-मजाक करने और हंसमुख हाव-भाव बनाए रखने की क्षमता से पार्टी के भीतर और बाहर अनेक समर्थक हासिल किए.
अपने को बदलाव के एजेंट के रूप में पेश करके सैनी ने 90 रैलियों को संबोधित किया और तमाम सामाजिक धड़ों तथा जातियों के दिलों के तार छुए, जिसकी बदौलत बीजेपी ने 22 ऐसी सीटें जीतीं, जो उसने पहले कभी नहीं जीती थीं. ज्यादा अहम यह बात है कि उन्होंने पार्टी संगठन का काम स्थानीय आरएसएस और बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व को अपने हाथों में लेने दिया और आश्चर्य नहीं कि इसी तालमेल की बदौलत पार्टी सत्ता विरोधी भावनाओं पर फतह हासिल कर सकी.
अब जब वे दूसरी बार शपथ लेने की तैयारी कर रहे हैं, उनके आगे मुश्किल कामों का अंबार लगा है. हरियाणा राजस्व की कमी से जूझ रहा है, खजाना लगभग खाली है और वित्त वर्ष 2024-25 में घाटा 17,817 करोड़ रुपए (जीएसडीपी का 1.5 फीसद) रहने का अनुमान है. कम कीमत में रसोई गैस, महिलाओं को वित्तीय सहायता और युवाओं को सरकारी नौकरियां देने के सैनी के वादों से राज्य के खजाने पर और बोझ पड़ेगा.
इसका इंतजाम करना आसान तो कतई नहीं रहने वाला है. यही नहीं, सैनी को राज्य के पेचीदा सामाजिक ताने-बाने की विभिन्न दायरों के बीच रास्ता बनाना होगा, और जाटों के उस अलगाव के बीच भी, जिससे निबटने में उनके पूर्ववर्ती नाकाम रहे थे. सैनी की राजनैतिक सूझबूझ का इम्तिहान तो अब होगा जब वे खट्टर की छाया से बाहर आ रहे हैं.
— अनिलेश एस. महाजन