तकनीकी बदलाव के दौर में चिकित्सा
तेजी से बदलती दुनिया में एआइ की बदौलत चिकित्सा अस्पताल के दायरे से बाहर निकलेगी. ऐसे में नौजवान चिकित्सकों के लिए कई नए अवसर हैं. उनकी शिक्षा को स्तरीय बनाए रखने की जरूरत है

- डॉ. अनुराग अग्रवाल
तकनीकी प्रगति, जनसांख्यिकी में बदलाव, डिजिटल दुनिया में सूचनाओं की सहज उपलब्धता और बेहतर देखभाल की जरूरत के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र तेजी से बदल रहा है. वैसे तो, मरीजों की देखभाल का मुख्य आधार डॉक्टर होते हैं लेकिन अब यह माना जाने लगा है कि भविष्य में बेहतर स्वास्थ्य सेवा प्रणाली बनाने के लिए सिर्फ डॉक्टरों पर ही निर्भर नहीं रहा जा सकता.
नई वैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक शक्तियां स्वास्थ्य और स्वास्थ्य प्रणालियों के भविष्य को आकार दे रही हैं. इसके साथ चिकित्सा शिक्षा और शोध में भी बदलाव आएंगे, जिससे कुछ क्षेत्रों का उभार, पतन और नए सिरे से रेखांकन होगा.
मैं यहां पर चिकित्सा क्षेत्र को बदलकर रख देने की क्षमता वाले हालिया तकनीकी रुझानों पर ध्यान केंद्रित करते हुए यह अनुमान लगाने की कोशिश रहा हूं कि चिकित्सा शिक्षा और शोध के लिए इसका क्या मायने हो सकते हैं.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) और डिजिटल स्वास्थ्य का नया युग: चिकित्सा पद्धति आज भी तकरीबन वैसी ही है, जैसी बीसवीं सदी के अंत में थी. लेकिन अगले 25 साल में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है. यह बदलाव डिजिटल स्वास्थ्य के रूप में सामने होगा, जिसमें डिजिटल कनेक्टिविटी, पहनने वाली डिवाइस, डिजिटल ट्विन (किसी भौतिक वस्तु की हू-ब-हू वर्चुअल मौजूदगी) और एआइ साथ मिलकर काम करेंगे.
पिछले दो साल अभूतपूर्व प्रगति वाले रहे हैं, जिसमें जेनरेटिव एआइ क्षेत्र में खासी प्रगति हुई है. किसी भी प्रासंगिक सूचना से जुड़े मुश्किल से मुश्किल सवालों के जवाब देना हो या फिर मरीजों से बातचीत करके जानकारी हासिल करना हो, लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) ने दिखा दिया है कि एआइ किस हद तक उपयोगी हो सकती है. इमेज क्लासिफिकेशन पहले ही एक ऐसा क्षेत्र बन चुका है, जिसमें एआइ मनुष्यों से बेहतर है और अब तो लार्ज मल्टीमॉडल मॉडल (एलएमएम) भी आ गए हैं जो कई तरह के डेटा को अच्छी तरह प्रबंधित कर सकते हैं.
हालांकि, एआइ के गलत परिणामों से बचने और नैतिक कारणों से इंसानों को अभी एआइ प्रोसीजर में एक कड़ी के तौर पर शामिल रखना जरूरी है. लेकिन एआइ का प्रभाव आम धारणा के विपरीत सिर्फ रेडियोलॉजी जैसे इमेजिंग-आधारित क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहेगा.
भारत जैसे देश में जहां स्वास्थ्य सेवा संबंधी जरूरतें काफी विविध और बड़ी हैं, इन तकनीकी प्रगति का फायदा उठाकर स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और परिणामों में सुधार लाया जा सकता है. लेकिन यह सुधार स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बेहद सावधानी के साथ करना होगा. हमें दो तरह के डिजिटल स्वास्थ्य में एक साथ निवेश करने की जरूरत होगी. पहला, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों, खासकर वंचित तबके तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा पहुंच सके. दूसरा, स्वास्थ्य सेवा में नई संभावनाएं खोलना. इन दोनों के लिए शिक्षा में व्यापक निवेश की जरूरत पड़ेगी. आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) जितना व्यापक है, उसे देखते हुए चिकित्सा शिक्षा में डिजिटल स्वास्थ्य के बारे में शिक्षा अब बेहद जरूरी हो गई है.
चिकित्सा पाठ्यक्रम और विशेषज्ञता में बदलाव: दुर्भाग्य से मौजूदा चिकित्सा शिक्षा प्रणाली ऊपर वर्णित बदलावों के लिए तैयार नहीं है. डिजिटल स्वास्थ्य के मामले में डॉक्टरों को मौजूदा प्रणाली के भीतर दक्षता बढ़ाने के लिए तकनीक का उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित करने और उन्हें भविष्य की प्रणालियों की कल्पना करने और बनाने के लिए प्रशिक्षित करने के बीच एक बड़ा अंतर है. यही वजह है कि हमें एमबीबीएस के दौरान नए विषयों को शामिल करने और उसके बाद नई विशेषज्ञता विकसित करने की जरूरत होगी. मसलन, मेडिकल जीनोमिक्स बाल रोग में विशेषज्ञता हासिल करने के बाद एक सुपर-स्पेशलाइजेशन है. यह उस समय की अवधारणा पर आधारित है जब मेडिकल जेनेटिक्स का मतलब केवल वंशानुगत बीमारियां होता था. लेकिन जब जीनोमिक्स हर जगह होगा तो इस तरह की अवधारणा का कोई मतलब नहीं रह जाता.
व्यावहारिक स्तर पर कुछ आपत्तियों के बावजूद मैं कुछ ऐसे इंजीनियरिंग या साइंस स्कूलों की सफलता की कामना करता हूं जो अपने अस्पताल और नई चिकित्सा शिक्षा प्रणाली तैयार कर रहे हैं. यह एक ऐसा दृष्टिकोण है जिसे बाद में प्रमुख मेडिकल स्कूल भी अपनाएंगे, जो तकनीक आधारित नए क्षेत्र बनाएंगे. तरीका चाहे जो भी हो, मेडिकल शिक्षा में बदलाव आना जरूरी है. ऐसा समय आ रहा है जब एमबीबीएस करने वाले छात्र स्पेशलाइजेशन के तौर पर डेटा साइंस, एआइ, या जीनोमिक्स पर गंभीरता से विचार करेंगे.
एक ही संस्थान या दो संस्थानों के बीच एमबीबीएस/पीएचडी कार्यक्रम आगे बढ़ेंगे. मेरे ख्याल से जो युवा डॉक्टर नए कौशल सीखने के लिए उत्साहित होंगे, वे जल्द ही बड़े अवसरों का लाभ उठा पाएंगे. मेरा मानना है कि मेडिकल छात्रों का अभी इस दिशा में आगे न बढ़ने की एक वजह यह भी है कि उन्हें मेडिकल साइंस की अत्याधुनिक तकनीकों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है.
सूचना असमानता का अंत और मरीजों का सशक्तिकरण: सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल सामग्री और एआइ में प्रगति के कारण चिकित्सा अस्पतालों तक सीमित नहीं रह गई है. इसका एक असर यह होगा कि स्वास्थ्य विज्ञान मेडिकल स्कूलों से आगे बढ़ेगा. अस्पतालों में बीमारियों का इलाज करने के बदले घर पर निरंतर स्वास्थ्य देखभाल का चलन बढ़ेगा. ऐसी देखभाल व्यक्तिगत होगी, जो पहनने वाले उपकरणों, एआइ और जटिल एल्गोरिद्म पर केंद्रित होगी. मुख्यत: उपभोक्ता-संचालित होने के कारण, सामाजिक विज्ञान और अर्थशास्त्र 'स्वास्थ्य विज्ञान' का एक अभिन्न अंग बन जाएंगे. ऐसी शिक्षा कहां होगी और छात्र कौन होंगे?
विभिन्न विषयों और पाठ्यक्रमों को पढ़ाने वाले विश्वविद्यालय पारंपरिक चिकित्सा से परे नए स्वास्थ्य अवसरों की ओर निर्देशित अनुकूलित अंत:विषय शिक्षा के लिए सबसे उपयुक्त होंगे. जब मैं 1989 में एम्स दिल्ली में पहली वर्ष का एमबीबीएस छात्र था, तो मेरे सहपाठी 'मानव जीव विज्ञान' का अध्ययन कर रहे थे. मैंने सोचा कि यह एक बहुत अच्छा विचार है—उन लोगों को प्रशिक्षित करना जो दवाएं नहीं लिखेंगे या सर्जरी नहीं करेंगे लेकिन मानव शरीर के कामकाज और स्वास्थ्य अनुसंधान के बारे में अच्छी जानकारी रखेंगे.
अच्छी बात यह है कि गैर-चिकित्सा प्रशिक्षण अनिश्चितता और सोचने-समझने का मूल्य ज्यादा बेहतर ढंग से सिखा सकता है. यह पाठ्यक्रम अब मौजूद नहीं है लेकिन शायद चिकित्सा कॉलेजों के बाहर विविध संकाय के साथ पढ़ाया जाने वाला 'स्वास्थ्य विज्ञान' बदलते परिदृश्य के लिए अधिक उपयुक्त है.
आखिर में, मै यही कहूंगा कि तेजी से बदलती दुनिया में युवा डॉक्टरों के लिए कई नए अवसर हैं. उनकी शिक्षा को इस बदलाव के साथ तालमेल बैठाने की जरूरत है.
(लेखक अशोका यूनिवर्सिटी के त्रिवेदी स्कूल ऑफ बायोसाइंसेज में बायोसाइंसेज ऐंड हेल्थ रिसर्च के डीन हैं.)