लोकसभा चुनाव 2024 : नतीजों में जनता ने दिया संतुलित सियासत का संदेश

देश के मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी को ऐतिहासिक तीसरा कार्यकाल तो दिया मगर बिना बहुमत के और इस साफ सबक के साथ कि सबकी सहमति से राजकाज चलाएं

भाजपा मुख्यालय में 4 जून को नरेंद्र मोदी का फूलों से स्वागत; (दाएं) 'यूपी के लड़के' राहुल और अखिलेश ने किया कमाल
भाजपा मुख्यालय में 4 जून को नरेंद्र मोदी का फूलों से स्वागत; (दाएं) 'यूपी के लड़के' राहुल और अखिलेश ने किया कमाल

नरेंद्र मोदी की ख्वाहिश देश के चुनावी इतिहास में जिस रूप में अपना नाम दर्ज कराने की थी, ऐन वैसा नहीं हो पाया. मोदी 9 जून को शपथ लेते ही वे छह दशकों में लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाले दूसरे नेता हैं. बेशक, यह अपने आप में ही एक असाधारण उपलब्धि है. लेकिन मोदी के लिए 2024 के चुनाव के नतीजे निजी झटके की तरह देखे जा रहे हैं.

2014 और 2019 के आम चुनावों में अपनी अगुआई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को लगातार दो बार बहुमत के बाद वे यही चाहते थे कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी की जाए. नेहरू ने 1952, 1957 और 1962 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी के लिए लोकसभा में बहुमत की हैट्रिक बनाई थी. लेकिन मोदी वैसा नहीं कर पाए और 2024 के चुनाव में बहुमत उनसे दूर छिटक गया.

लोकसभा चुनाव के नतीजे 4 जून को आए तो भाजपा की सीटें 2019 में 303 से 20 फीसद घटकर इस बार 240 पर आ गईं. पार्टी अपने दम पर 543 सदस्यों वाले सदन में 272 सीटों के साधारण बहुमत से 32 सीटें पीछे रह गई. उसे सरकार बनाने के लिए 53 सीटें जीतने वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगियों तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) और जनता दल (यूनाइटेड) यानी जदयू पर निर्भर होना पड़ा है.

विपक्ष में कांग्रेस के नेतृत्व वाले भारतीय राष्ट्रीय विकासात्माक समावेशी गठबंधन यानी इंडिया ने 234 सीटों के साथ आश्चर्यजनक प्रदर्शन किया. कांग्रेस का 99 सीटों का आंकड़ा 2009 में जीती 206 सीटों के मुकाबले मामूली लग सकता है. तब वह सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की अगुआ थी. लेकिन उसके बाद देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच गई.

वह 2014 और 2019 के चुनावों में क्रमश: 44 और 52 सीटें ही जीत पाई थी. इस बार पार्टी उस गर्त से ऊपर उठने में कामयाब हो गई है और उसने अपनी संख्या लगभग दोगुनी कर ली है. 'इंडिया' ब्लॉक के लिए सबसे अहम यह है कि मोदी का तीसरा कार्यकाल एक दशक के अंतराल के बाद देश में गठबंधन की राजनीति की वापसी का प्रतीक है.

ऐसा लगता है कि देश के मतदाताओं ने आपस में झगड़ती राजनैतिक ताकतों के बीच संतुलन कायम किया है और स्पष्ट तथा दो-टूक संदेश दिया है कि मोदी और उनकी टीम की निरंतरता और स्थिरता तो चाहिए मगर किसी एक पार्टी का पूरा दबदबा नहीं. इसलिए लोगों ने मजबूत विपक्ष के पक्ष में वोट दिया, जो सरकार को जवाबदेह ठहरा सके और बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई जैसे दुखते मुद्दों के समाधान के लिए आम सहमति बना सके.

मोदी भाजपा के अपने दम पर बहुमत न पाने से निराश थे, लेकिन नतीजों की घोषणा के बाद जब वे दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में दाखिल हुए तो उनका स्वागत फूल बरसा कर किया गया. उन्होंने अपने बेहद छोटे-से भाषण में साफ कर दिया कि वे फिर देश का नेतृत्व करेंगे और एनडीए के सहयोगियों के साथ मिलकर काम करेंगे. उन्होंने कहा, ''एनडीए के तीसरे कार्यकाल में देश में विकास का नया स्वर्णिम अध्याय दिखेगा...यह मोदी की गारंटी है. यह विकसित भारत के लिए हमारे संकल्प को भी मजबूत करता है.''

नई दिल्ली में 5 जून को नरेंद्र मोदी का अभिवादन करते चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार

ब्रांड मोदी पड़ा फीका

भाजपा भले स्वीकार न करे लेकिन जानकारों के मुताबिक, नतीजों से मोदी की चुनावी अजेयता की छवि को गहरा झटका लगा है. वजह यह कि उन्होंने 2024 के चुनाव को राष्ट्रपति शैली का अभियान बना दिया. देश भर में उन्होंने 180 से ज्यादा रैलियां कीं और 'मोदी की गारंटी' का वादा खुलकर किया.

उन्होंने भाजपा के लिए 370 सीटों और एनडीए के लिए 400 पार का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था. कई लोगों के मुताबिक, यह लक्ष्य मोदी की 1984 में राजीव गांधी की अगुआई में कांग्रेस की 414 सीटों की बराबरी करने की ख्वाहिश का नतीजा था. इससे भाजपा की मौजूदा 240 सीटों की ठीक-ठाक संख्या बड़ी गिरावट की तरह लगती है. राजनैतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ब्रांड मोदी की प्रगति की तुलना प्रबंधन विशेषज्ञों के किसी उत्पाद के चार चरणों—शुरुआत, विकास, बुलंदी और गिरावट—से करते हैं. उनके मुताबिक चुनाव नतीजे दिखाते हैं कि मोदी बुलंदी के चरण को पार कर चुके हैं और अब गिरावट की ओर बढ़ रहे हैं.

तिवारी अपने तर्क के पक्ष में दिल्ली स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के लोकनीति कार्यक्रम के चुनाव-बाद विश्लेषण की मिसाल देते हैं. उसके मुताबिक, मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए मतदाताओं की पहली पसंद तो बने हुए हैं, लेकिन 2019 में ऐसे ही सर्वेक्षण में उनकी रेटिंग 47 फीसद से घटकर अब 41 फीसद पर आ गई है. यानी छह फीसद अंकों की गिरावट है.

लोकनीति-सीएसडीएस के राष्ट्रीय संयोजक संदीप शास्त्री कहते हैं, ''ब्रांड मोदी की लोकप्रियता में साफ-साफ ठहराव आ गया है.'' तिवारी मोदी की लोकप्रियता में गिरावट को ही भाजपा की संख्या में मौजूदा गिरावट की संभावित वजह मानते हैं क्योंकि पार्टी वोट पाने के लिए बड़े पैमाने पर 'मोदी प्रीमियम' पर निर्भर थी. दिलचस्प बात यह है कि इसी अध्ययन में मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बीच का अंतर 2019 में 24 फीसद अंकों से घटकर इस बार 14 फीसद पर आ गया है.

दूसरे अध्ययनों से पता चलता है कि मोदी के एकछत्र बहुमत के लिए आक्रामक अभियान का भाजपा के प्रदर्शन पर बुरा असर पड़ा हो सकता है. खासकर जब राहुल गांधी और 'इंडिया' ब्लॉक के दूसरे दलों ने आरोप लगाया कि भाजपा पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के आरक्षण को खत्म करने जैसे कई मामलों में फेरबदल के लिए बड़े संवैधानिक संशोधनों के खातिर प्रचंड बहुमत चाहती है.

इससे वोटरों में साफ-साफ डर का माहौल बना. लिहाजा, एससी के लिए आरक्षित 84 सीटों में भाजपा की संख्या 2019 में 46 से घटकर अब 30 रह गई है. उसका नुकसान कांग्रेस के लिए लाभ साबित हुआ क्योंकि पार्टी की एससी सीटें 2019 में छह से बढ़कर 2024 में 19 हो गईं, और गठबंधन की उसकी सहयोगी समाजवादी पार्टी ने 2019 में शून्य के मुकाबले इस बार सात सीटें हासिल कर लीं.

इंडिया टुडे माइ एक्सिस एग्जिट पोल के नतीजों से पता चला कि सामान्य और एससी आरक्षित दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में 'इंडिया' ब्लॉक के दलित वोटों में कुल मिलाकर 18 फीसद की बढ़ोतरी हुई और भाजपा तथा उसके सहयोगियों के मद में छह फीसद अंक की गिरावट आई. एसटी मतदाताओं के मामले में भी ऐसा ही हुआ. एग्जिट पोल ने 'इंडिया' के वोट शेयर में 12 फीसद उछाल और एनडीए के वोट शेयर में दो फीसद की गिरावट दर्ज की. सीटों के मामले में, एसटी के लिए आरक्षित 47 सीटों में भाजपा ने 26 जीतीं, जो 2019 से पांच कम हैं. कांग्रेस को 12 सीटें मिलीं, जो पहले की चार से आठ ज्यादा हैं.

ग्रामीण इलाकों में घटा दबदबा

इस चुनाव की दूसरी बड़ी बात यह है कि 'इंडिया' ब्लॉक ने दो प्रमुख मोर्चों बेरोजगारी और महंगाई पर मतदाताओं के असंतोष का भरपूर फायदा उठाया. सीएसडीएस के हाल के अध्ययन से पता चलता है कि न सिर्फ ये दो मुद्दे वोटरों की चिंताओं की सूची में सबसे ऊपर थे, बल्कि 50 फीसद से ज्यादा लोगों ने यह भी कहा कि पिछले साल उनकी आर्थिक हालत जस की तस रही या बदतर हुई.

ये निष्कर्ष फरवरी 2024 में इंडिया टुडे देश का मिजाज जनमत सर्वेक्षण के नतीजों से भी मिलते हैं. भाजपा के हिंदू महिलाओं से मंगलसूत्र छीनकर मुसलमानों में बांट देने का डर दिखाने वाले प्रचार के बावजूद अमीरों से गरीबों में धन के पुनर्वितरण की राहुल की अपील की गूंज सुनाई दी. इसी तरह शायद कांग्रेस के घोषणापत्र में कल्याणकारी गारंटियों का भी असर हुआ, जिसमें महिला न्याय के तहत हर गरीब परिवार की एक महिला को 1 लाख रुपए सालाना देने का वादा शामिल है.

इंडिया टुडे के एक आंतरिक अध्ययन से पता चलता है कि भाजपा ने 2019 में जीती गई 198 ग्रामीण सीटों में से 49 सीटें खो दीं, जबकि कांग्रेस ने पिछले चुनाव की 29 सीटों में 26 ग्रामीण सीटें और जोड़ लीं. अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भी भाजपा ने 2019 में जीती गई 70 सीटों में से 10 खो दीं, जबकि कांग्रेस ने 20 सीटें ज्यादा हासिल कीं, जिससे इन हलकों में उसकी संख्या 40 हो गई.

भाजपा राहत बस ओडिशा में अपनी अच्छी जीत से ही ले सकती है. वहां उसने लोकसभा की कुल 21 में से 20 सीटें जीत लीं और विधानसभा चुनाव में पहली बार साधारण बहुमत प्राप्त किया, जिसके चुनाव साथ-साथ हुए. आंध्र प्रदेश में भी उसकी सीटों में बढ़ोतरी हुई, जहां वह गठबंधन में टीडीपी की छोटी सहयोगी थी और साथ-साथ हो रहे विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की शानदार जीत का लाभ उठाया.

भाजपा ने गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपने गढ़ को बचाए रखा, जबकि तेलंगाना में मामूली बढ़त हासिल की और केरल में पहली बार एक सीट के साथ मनोवैज्ञानिक जीत दर्ज की. लेकिन यह बढ़त उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में उसे मिले झटके के आगे कुछ खास नहीं रही, जहां लोकसभा की कुल 210 सीटें हैं. इन चार राज्यों में भाजपा की सीटें पिछले चुनाव में जीती गई 120 सीटों से गिरकर 66 पर आ गईं, यानी 54 सीटों का नुकसान हुआ. पार्टी ने राजस्थान, हरियाणा, कर्नाटक और झारखंड में भी सीटें गंवाईं. 

राम क्षेत्र

सबसे तगड़ा झटका भाजपा के गढ़ उत्तर प्रदेश में लगा, जहां से उसे 2019 में कुल 80 में से 62 सीटें मिल गई थीं, और दो अन्य सीटें सहयोगी अपना दल (एस) के खाते में आ गई थीं. अब भाजपा के लिए यह आंकड़ा सिर्फ 33 है, जो पिछली बार से 29 कम है, और एनडीए के मद में 36 है, जो राज्य की कुल सीटों के आधे से भी कम है. ये हालात तब हैं जब प्रदेश में एक और मजबूत नेता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राज है, जो 2022 के विधानसभा चुनावों में शानदार बहुमत से फिर से चुने गए हैं.

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के इर्द-गिर्द लहर की भाजपा की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं. दरअसल, सीएसडीएस के शास्त्री का मानना है कि 2019 के बाद से ही राज्य में हिंदुत्व के मुद्दों से मिलने वाले लाभ में ''ठहराव'' आने लगा था. यही नहीं, लगता है कि मौजूदा चुनावों में दूसरे चरण के मतदान के बाद मोदी की 'मंगलसूत्र, मुजरा और मुसलमानों' जैसे बयानों से ध्रुवीकरण की कोशिशों से सिर्फ पार्टी के मूल जनाधार में ही गोलबंदी हो सकी. उसकी अपील सीमित लगती है क्योंकि धर्म का मुद्दा खाली पेटों को नहीं खिला सकता और युवा नौकरी चाहते हैं, खैरात नहीं.

इसी तरह, महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) में बड़ी टूट करवाकर सरकार बना ली थी. वहां भाजपा का खराब प्रदर्शन इस बात का सबूत है कि न सिर्फ बनावटी बहुमत काम नहीं आया, बल्कि उससे भाजपा की अलग तरह की पार्टी की छवि को भी गहरा झटका लगा है. मोदी की चुनौतियां अब पार्टी के भीतर से भी आ सकती हैं. पार्टी के अंदर फैसलों में अति-केंद्रीकरण को समाप्त करने की मांग उठ सकती है, जिसे तिवारी 'माई वे या हाईवे या मेरी मानो या रास्ता नापो' वाला रवैया कहते हैं, जो मोदी की अगुआई में भाजपा की पहचान बन गया है.

भाजपा के लिए मुश्किल स्थिति यह भी है कि उसके साथ सीधे मुकाबले में कांग्रेस का स्ट्राइक रेट 2019 में 8 फीसद से बढ़कर अब 30 फीसद हो गया है. इसे भाजपा के बहुमत खोने की एक बड़ी वजह माना जा रहा है. 2024 के चुनाव में क्षेत्रीय ताकतों और नेताओं में भी नई जान आ गई है, जिसमें उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में एमके स्टालिन, महाराष्ट्र में शरद पवार तथा उद्धव ठाकरे और बिहार में तेजस्वी यादव शामिल हैं.

इन सबने हिंदुत्व एजेंडे के इर्द-गिर्द बनी भारी बहुमत वाली दबंग राष्ट्रीय पार्टी बनने की भाजपा की कोशिशों को लगातार नाकाम किया है. अब मतदाताओं ने भाजपा के केंद्रीकृत एजेंडे को खारिज करने में उनका हाथ मजबूत किया है और देश की संघीय राजनीति में भरोसे को मजबूत किया है. यह देश के विविध समुदायों, संस्कृतियों और सत्ता संरचनाओं की कई आकांक्षाओं के अनुकूल है. मोदी को अब बने रहने के लिए नीतीश और नायडू जैसे क्षेत्रीय नेताओं के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ रहा है, यह देश की राजनीति के केंद्र में क्षेत्रवाद की वापसी का संकेत है.

गठबंधन के विरोधाभास

पिछले दो कार्यकाल में बिना किसी राजनैतिक हस्तक्षेप के बेरोकटोक कामकाज करने वाले मोदी को अब गठबंधन सरकार के विरोधाभासों और मजबूरियों को संभालना होगा. उन्हें अगर बहुत जरूरी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाना है तो अब पार्टियों के बीच आम सहमति बनाने की दिशा में काम करना होगा. यह मोदी के लिए मुश्किल काम हो सकता है, क्योंकि जानकारों के मुताबिक, उन्हें गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने का कोई अनुभव नहीं है, चाहे गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में या बतौर प्रधानमंत्री, उनकी कार्यशैली दबंग नेता की रही है.

हालांकि, एक पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह कहते हैं, ''इतने लंबे समय तक प्रधानमंत्री बने रहने से एक राजनैतिक रसूख पैदा होता है जिससे लोगों को समझाने-बुझाने में मदद मिलती है. मोदी के लिए गियर बदलना और मौजूदा जरूरतों के मुताबिक अपने रवैए में सुधार लाना आसान होगा.''

1998 से 2004 के बीच गठबंधन सरकार चलाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी के प्रमुख सहयोगी सुधींद्र कुलकर्णी को नीतीश और नायडू जैसे सहयोगियों पर आश्रित मोदी के तीसरे कार्यकाल को लेकर आशंकाएं हैं, जो पहले भी उन्हें  झटका दे चुके हैं. कुलकर्णी कहते हैं, ''चुनाव के बाद मोदी की ताकत काफी कम हो गई है, और उनका इकबाल घट गया है. वे एक राष्ट्र, एक चुनाव जैसे अपनी पसंद के संवैधानिक संशोधनों को आगे नहीं बढ़ा पाएंगे. यह मोदी युग के अंत की शुरुआत है.''

ऐसे कई जटिल मुद्दे हैं जिन पर मोदी को गठबंधन सहयोगियों के साथ मुश्किल पेश आ सकती है. मसलन, नीतीश अग्निवीर योजना की समीक्षा और देशव्यापी जाति जनगणना की आवाज उठा रहे हैं. ये दोनों ही मसले भाजपा के लिए सहज नहीं हैं. नीतीश बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा भी चाहते हैं ताकि राज्य को अधिक केंद्रीय फंड और कुछ मंत्री पद मिलें.

नायडू अपने खिलाफ कई आपराधिक मामलों को खत्म करने के अलावा अपने राज्य के लिए भी विशेष दर्जा चाहते हैं. टीडीपी के कद्दावर नेता अपने राज्य में सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए चार फीसद आरक्षण के अपने वादे पर भी आगे बढ़ सकते हैं. धार्मिक आधार पर यह आरक्षण मोदी को नहीं सुहा सकता है. केंद्र का रवैया विशेष राज्य का दर्जा देने के खिलाफ है, खासकर 14वें वित्त आयोग ने इसके खिलाफ सलाह दी है. ये और अन्य मुद्दे गतिरोध पैदा कर सकते हैं और रिश्तों में दरार ला सकते हैं.

दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास पर 5 जून को मोदी के साथ नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू, राजनाथ सिंह, जे.पी. नड्डा, पवन क

बहुमत की जोड़तोड़

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक शेषाद्रि चारी को इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी न सिर्फ दोनों सहयोगी दलों के साथ मिलजुल कर सरकार चला सकेंगे बल्कि अन्य दलों के साथ भी रिश्तों को बखूबी निभा पाएंगे. वे कहते हैं, ''उन्हें और सहयोगियों दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है जो उन्हें एकजुट रखने में मददगार होगी. इस रिश्ते में भाजपा की स्थिति हर हाल में फायदे वाली है. दूसरे तरीके से कहें तो यह दो परमाणु हथियार संपन्न शक्तियों की तरह है जो जानते हैं कि अगर किसी ने भी कोई गलत कदम उठाया तो दोनों का नुकसान होना तय है.''

वाजपेयी के साथ काम कर चुके शेषाद्रि चारी का मानना है कि दिवंगत प्रधानमंत्री की तरह मोदी भी आगे बढ़कर अगुआई करते रहे हैं, और यही कौशल उन्हें न केवल पार्टी के भीतर बल्कि बाहर से मिलने वाली चुनौतियों से निबटने में सक्षम बनाता है. नाम न छापने की शर्त पर एक और अंदरूनी राजनैतिक सूत्र ने कहा कि मोदी में कामयाब होने का संकल्प और दृढ़ होगा. उनके मुताबिक, ''जो लोग यह सोचते हैं कि मोदी के पर कतर जाएंगे, वे पूरी तरह गलत हैं. वे न केवल दूसरों से बहुत आगे निकलने की कोशिश करेंगे बल्कि अपने विरोधियों पर कड़े हमले भी जारी रखेंगे.'' मोदी चुनावी नतीजों के बाद अपने पहले संबोधन में भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जारी रखने की बात कहकर अपने राजनैतिक विरोधियों को पहले ही स्पष्ट चेतावनी दे चुके हैं.

मोदी और भाजपा आने वाले कुछ महीनों में जो काम करेंगे, उनमें एक तो अपने बहुमत को मजबूत करने की कवायद ही होगी, ताकि मौजूदा सहयोगियों पर निर्भरता घटाई जा सके. इसका एक तरीका यह हो सकता है कि अन्य दलों के कुछ सांसदों को इस्तीफा दिलाकर नए सिरे से चुनाव लड़ाया जाए. लेकिन तिवारी का मानना है कि इस चुनाव ने भाजपा की जीत की संभावनाओं को काफी कम कर दिया है, ऐसे में कई लोग इस्तीफा देकर भाजपा के साथ आने का रास्ता अपनाने से परहेज कर सकते हैं.

दूसरा विकल्प यह है कि अन्य दलों, खासकर छोटी पार्टियों का भाजपा में विलय करा लिया जाए या फिर उन्हें शिवसेना और राकांपा की तरह दो-फाड़ करके एक घटक के बतौर सहयोगी बना लिया जाए. लेकिन इससे भाजपा के प्रति नकारात्मक धारणा बनने का जोखिम है, महाराष्ट्र के मौजूदा नतीजे इसका ही एक उदाहरण हैं.

वहीं, अन्य विरोधाभास भी हैं. मोदी परिवारवाद या वंशवादी राजनीति के मुखर विरोधी रहे हैं लेकिन आंध्र में चंद्रबाबू नायडू इसके जीवंत प्रतीक हैं क्योंकि वे टीडीपी संस्थापक और दिवंगत नेता एन.टी. रामराव के दामाद हैं. और अब कुछ करीबी रिश्तेदार भी उनकी पार्टी में हैं. भाजपा को दूसरी पार्टियों के नेताओं के लिए ''वाशिंग मशीन'' होने के आरोपों से भी उबरना होगा, क्योंकि जिन नेताओं के खिलाफ मामले हैं, पाला बदलकर भाजपा में आते ही वे मामले अचानक गायब हो जाते हैं, जैसा महाराष्ट्र में हुआ. मोदी ने राज्य में चुनावी भाषणों के दौरान शायद ही कभी भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया हो.

वर्ष के अंत में प्रस्तावित महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा होंगे; विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भाजपा और उसके सहयोगी हारते हैं तो यह एनडीए गठबंधन के अंत की शुरुआत होगी. मोदी को यह आश्वस्त करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी कि मोदी 3.0 कहीं थ्री पॉइंट जीरो ही न रह जाए.

मोदी 3.0 का एजेंडा

मोदी सरकार की असली परीक्षा यह होगी कि वह अर्थव्यवस्था को कैसे संभालती है, जिसमें बेरोजगारी और गैर-बराबरी वाले आर्थिक विकास जैसी प्रमुख चुनौतियां शामिल हैं. प्रधानमंत्री को बढ़त हासिल है जिससे उन्हें अपने लक्ष्यों को साधने का आत्मविश्वास मिल सकता है. अपने दूसरे कार्यकाल के आखिरी कुछ महीनों के दौरान उन्होंने अपने मंत्रालयों को बदलाव के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह की योजनाओं पर काम करने को कहा था.

सरकारी थिंक-टैंक नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रह्मण्यम का मानना है कि जनसंख्या के लिहाज से भारत बेहतर स्थिति में है, जहां 39 वर्ष औसत आयु वाले अमेरिका और चीन जैसे देशों की तुलना में औसत आयु 29 वर्ष ही है. इससे भारत और अफ्रीका ही ऐसे क्षेत्रों में शुमार हैं, जहां एक बड़ी युवा कामकाजी आबादी है. उनके लिए जरूरी है कि उनकी अर्थव्यवस्थाएं तेजी से बढ़ें.

जैसा सुब्रह्मण्यम आगाह करते हैं, ''चीन बूढ़ी होती आबादी की चुनौती से जूझ रहा है और अभी तक समृद्ध नहीं हो पाया है. भारत अगर चीन जैसी वृद्धि हासिल नहीं कर पाए तो हम एक बुजुर्ग आबादी वाले गरीब राष्ट्र बन जाएंगे.'' मौजूदा भू-राजनीति भी भारत के पक्ष में नजर आती है क्योंकि प्रमुख शक्तियां नई दिल्ली को आकृष्ट करने में जुटी हैं.

यही नहीं, एआई सहित तेजी से विकसित होते तकनीकी नवाचारों ने भारत जैसे महत्वाकांक्षी देशों को खुला मैदान मुहैया करा दिया है. इस बीच, जलवायु परिवर्तन भी विभिन्न देशों को कार्बन आधारित अर्थव्यवस्था से बाहर निकलने को बाध्य कर रहा है, और ऐसे में भारत के पास कोयला खपत के बजाय हरित प्रौद्योगिकी में वैश्विक नेता बनकर उभरने का मौका है.

पिछले दो कार्यकाल के दौरान मोदी ने पानी और स्वच्छता जैसी बुनियादी नागरिक सुविधाओं और सड़कों जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर के मद में अच्छा काम किया है. अब उनके पास पूरा मौका है कि उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करें जिससे आर्थिक विकास तेजी से बढ़े और व्यापक स्तर पर गुणवत्तापूर्ण रोजगार के अवसर उत्पन्न हों.

मतगणना से ऐन पहले कन्याकुमारी में ध्यान खत्म होने के बाद मोदी ने लिखा, ''हमें अपने देश को विकसित भारत बनाने के लिए उत्कृष्टता को अपना मूल सिद्धांत बनाना चाहिए. हमें चौतरफा विकास में तेजी लाने के लिए चार बातों पर ध्यान केंद्रित करना होगा: स्पीड, स्केल, स्कोप और स्टैंडर्ड.''

एक अन्य क्षेत्र जिस पर मोदी का पूरा फोकस रहना संभव है, वह है गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल विकास में विशाल क्षमता निर्माण. अधिक रोजगार सृजन के लिए वे बुनियादी ढांचे पर भारी-भरकम खर्च जारी रखने के साथ ही पर्यटन और कपड़ा जैसे श्रम-सघन क्षेत्रों को भी बढ़ावा दे सकते हैं. और खासकर लघु उद्योग क्षेत्र में उत्पादन के अलावा कृषि सुधारों पर नए सिरे से ध्यान दिए जाने की उम्मीद है.

सुब्रह्मण्यम का मानना है, ''प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाकर भारतीय कंपनियों को वैश्विक आकार का बनाने के लिए आर्थिक सुधारों की जरूरत पड़ेगी और उम्मीद है कि नई सरकार वित्तीय क्षेत्र में सुधार पर व्यापक ध्यान देगी.'' मोदी शहरी नवीनीकरण से जुड़ी योजनाएं आगे बढ़ाने पर भी फोकस कर सकते हैं ताकि शहरी जीवन की गुणवत्ता में व्यापक सुधार हो. निजी उद्यमों को उदारता के साथ निधि मुहैया कराकर देश में अनुसंधान तथा विकास को बढ़ावा देना भी विचाराधीन है. विदेश नीति की बात करें तो भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को एक प्रमुख ध्रुव के तौर पर स्थापित करने की कोशिश के अलावा निर्यात बढ़ाने के उद्देश्य से अधिक व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर को भी तरजीह दे सकता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि भूमि और श्रम सुधार के अलावा सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश और 2026 में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन वगैरह ऐसे कदम हैं जिन पर मोदी को गठबंधन सहयोगियों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि, पीवी नरसिंह राव और वाजपेयी की गठबंधन सरकारें दर्शा चुकी हैं कि दूरगामी और व्यापक सुधारों को कैसे आगे बढ़ाना संभव है. फिर भी मोदी के लिए यह बहुत आसान काम नहीं होगा.

वैसे, अतीत में वे आपदा को अवसर में बदलने की अपनी काबिलियत दिखा चुके हैं. यह इसी तरह का एक मौका है. देश ने उन्हें और भाजपा तथा सहयोगी दलों को तीसरी बार सरकार बनाने का जनादेश तो दे दिया, लेकिन बेहद सधे ढंग से विपक्ष को मजबूत करने के लिए भी वोट किया ताकि देश को महान लोकतंत्र बनाने वाले सिद्धांत और संस्थाएं सुरक्षित रहें. हाल में 66 करोड़ भारतीयों का अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना इसी परंपरा का शानदार उदाहरण है.

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