देश का मिज़ाज : क्या 2024 के चुनावों में मोदी तोड़ने जा रहे हैं नेहरू का रिकॉर्ड?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता का ग्राफ अब भी ऊंचा. उनकी अगुआई में भाजपा लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की राह पर. हालांकि रोजी-रोजगार की स्थिति चिंताजनक बनी हुई

प्रधानमंत्री मोदी नई दिल्ली के भारत मंडपम में 29 जनवरी को परीक्षा पे चर्चा कार्यक्रम के दौरान
प्रधानमंत्री मोदी नई दिल्ली के भारत मंडपम में 29 जनवरी को परीक्षा पे चर्चा कार्यक्रम के दौरान

पांच फरवरी को जब नरेंद्र मोदी लोकसभा में बोलने के लिए खड़े हुए तो प्रधानमंत्री के पोर-पोर से आत्मविश्वास और निश्चय की आभा झलक रही थी. उन्होंने विपक्ष में बैठे सदस्यों का मजाक तक उड़ाते हुए कहा कि वे दशकों तक विपक्ष में ही बैठेंगे. उन्होंने दावा किया कि आम चुनाव में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने दम पर 370 सीटें जीतेगी, यानी लोकसभा में बहुमत के लिए जरूरी 272 से 98 ज्यादा. उन्होंने भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को हैरतअंगेज 405 सीटें मिलने का अनुमान जाहिर किया. फिर गर्वोक्ति के साथ कहा, "अबकी बार..." और ज्यों ही वे कुछ क्षण ठहरे, सदन में मौजूद उनकी पार्टी के सदस्यों ने वाक्य पूरा कर दिया, "चार सौ पार."

ऐसी कामयाबी सिर्फ राजीव गांधी ने 1984 के आम चुनाव में हासिल की थी. तब वे अपनी मां और देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर पर सवार थे, जिसने 404 सीटों का विशालकाय बहुमत कांग्रेस की झोली में डाल दिया था. बाद में देश की इस सबसे पुरानी पार्टी ने असम और पंजाब में देर से हुए चुनावों में 10 सीटें जीतकर और उसमें जोड़ लीं. मोदी को यह भी पता है कि अगर वे स्पष्ट बहुमत के साथ लोकसभा के लगातार तीन चुनाव जीत लेते हैं, तो राजीव के नाना जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे. देश के पहले प्रधानमंत्री ने 1964 में अपनी मृत्यु से पहले कांग्रेस को 1952, 1957 और 1962 के लोकसभा चुनावों में लगातार जीत दिलाई थी.

ताजातरीन छमाही 'इंडिया टुडे-सीवोटर देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण' के नतीजे मोदी और भाजपा के आशावाद की पुरजोर तस्दीक करते हैं. सर्वेक्षण का अनुमान है कि वे निर्णायक हैट्रिक लगाने की तरफ बढ़ रहे हैं. अगर आज चुनाव होते हैं तो सर्वेक्षण भाजपा को 304 सीटें दे रहा है, जो सामान्य बहुमत के लिए जरूरी 272 से अच्छी-खासी 32 ज्यादा है और 2019 के आम चुनाव में पार्टी को मिली सीटों से एक ज्यादा. भाजपा की अगुआई वाले एनडीए को 335 सीटें मिलेंगी, जो उसकी 2019 की 353 सीटों से 18 कम हैं. ये आंकड़े हालांकि सर्वेक्षण के अगस्त 2023 के संस्करण से बेहतर हैं, जिसमें भाजपा को 287 सीटें और एनडीए को सिर्फ 306 सीटें मिलने का अनुमान था. गौरतलब यह है कि भाजपा की सीटें उसके दूसरे कार्यकाल के सबसे कम आंकड़े 269 से लगातार बढ़ती दिखाई दे रही हैं जो उसे अगस्त, 2021 के देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में कोविड महामारी के ऐन बीचोबीच मिला था.

इन नतीजों को मोदी और भाजपा के लिए और भी सराहनीय बनाने वाली बात है लगातार कायम सत्ता-समर्थक रुझान, जिसकी झलक ताजातरीन देश का मिज़ाज सर्वेक्षण से भी मिलती है. इसमें जनवरी 2014 के सर्वेक्षण के नतीजों से सीधा विरोधाभास दिखाई देता है, जब कांग्रेस की अगुआई वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सत्ता में लगातार तीसरा कार्यकाल पाने के लिए प्रयासरत था. 2014 के आम चुनाव से महज कुछ महीने पहले किए गए सर्वेक्षण ने भविष्यवाणी की थी कि यूपीए की सीटें 150 सीटों की तीव्र गिरावट के साथ घटकर 100 पर आ जाएंगी. (2014 में वास्तविक सीटें 92 मिलीं). मोदी की अगुआई वाले एनडीए के बहुमत की तरफ बढ़ने का इशारा करते हुए सर्वे ने उसे केवल 212 सीटें दी थीं. वह उस निर्णायक जीत की भविष्यवाणी नहीं कर पाया जिसमें भाजपा को अपने दम पर 282 और एनडीए को 336 सीटें मिलीं. इसकी एक वजह तो यह थी कि आखिरी वक्त में बदलाव के लिए पड़े वोटों का रुख इतनी तेजी से बदला कि भाजपा और एनडीए की सीटों में उछाल आ गया.

इस बार देश का मिज़ाज सर्वेक्षण ने एनडीए को जितनी सीटें दी हैं, वे 400 से ज्यादा सीटों की उस भारी-भरकम जीत से कम हैं जो भाजपा और उसके गठबंधन को मिलने की उम्मीद मोदी कर रहे हैं. अब जब चुनाव होने में बमुश्किल दो महीने रह गए हैं, सीवोटर के संस्थापक-निदेशक यशवंत देशमुख कहते हैं, "400 से ज्यादा सीटों की संभावना फिलहाल तो नहीं दिखती, पर असंभव नहीं हैं." वे यह भी कहते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि इंडिया टुडे-सीवोटर सर्वे के मौजूदा अनुमान थोड़े परंपरागत हैं और चुनाव के आखिरी दो महीनों में मोदी तथा एनडीए दोनों और तेज रफ्तार पकड़ सकते हैं जिससे उन्हें अपना महत्वाकांक्षी लक्ष्य हासिल करने में मदद मिल सकती है.

400 की जंग

तो, वे कौन-से राज्य हैं जिनकी बदौलत भाजपा देश का मिज़ाज सर्वे के 304 सीटों के अनुमान तक पहुंच सकती है और 66 और सीटें जोड़कर अपनी सीटों की संख्या 370 तक ले जा सकती है? 2014 और 2019 की तरह संभावना यही है कि भाजपा 436 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और करीब 100 सीटें एनडीए के अपने सहयोगी दलों के लिए छोड़ देगी. पिछले दो आम चुनावों में भाजपा की सफलता दर औसतन 67 फीसद जितनी शानदार रही थी. 2024 में उसे इसे और आगे 84 फीसद की अविश्सवीय दर तक ले जाना होगा. संक्षेप में कहें तो 370 सीटों का लक्ष्य हासिल करने के लिए पार्टी को जबरदस्त लहर की जरूरत होगी.

यह मुश्किल काम जरूर है, पर नामुमकिन नहीं. 2019 में भाजपा ने अपनी 303 में से 224 सीटें 50 फीसद से ज्यादा वोटों के फासले से जीती थीं, जो उन सीटों पर उसे अपराजेय बना देता है. 72 सीटें ऐसी थीं जहां भाजपा 2,00,000 वोटों के राष्ट्रीय औसत से कम अंतर से हारी. 370 का निशान पार करने की अपनी जुगत में भाजपा इन्हीं सीटों पर ध्यान दे रही है. इसलिए वह पश्चिम बंगाल में, जहां उसने 2019 में राज्य की 42 में से 18 सीटें जीतकर जबरदस्त पैठ बनाई थी; उत्तर प्रदेश में, जहां उसने 80 में से 62 सीटें अपनी झोली में डाल ली थीं; ओडिशा में, जहां उसने 21 में से आठ सीटें जीती थीं; और तेलंगाना में, जहां उसने 17 में चार सीटों पर जीत हासिल की थी, अपनी सीटें बढ़ाने की उम्मीद कर रही है. भाजपा और एनडीए के उसके सहयोगी दलों को उन दूसरे बड़े राज्यों में भी खाता खोलना होगा, जहां उन्हें एक भी सीट नहीं मिली थी—तमिलनाडु, जहां 39 सीटें हैं;

आंध्र प्रदेश (25) और केरल (20). अपना 2019 का प्रदर्शन दोहराते हुए भाजपा को गुजरात (26), राजस्थान (25), हरियाणा (10), दिल्ली (7) और उत्तराखंड (5) की 73 सीटों में से सभी इस बार भी जीतनी होंगी. पार्टी को मध्य प्रदेश (जहां उसने 2019 में 29 में से 28 सीटें जीती थीं), झारखंड (14 में से 11), कर्नाटक (28 में से 25), असम (14 में से 9) और छत्तीसगढ़ (11 में से 9) की 98 सीटों पर भगवा झंडा लहराने का लक्ष्य साधना होगा. दो और प्रमुख राज्यों—महाराष्ट्र (जहां राज्य की 48 सीटों में से भाजपा ने 23 और एनडीए ने 41 सीटें जीती थीं) और बिहार (जहां 40 सीटों में से भाजपा ने 17 और एनडीए ने 39 सीटें जीती थीं)—में भाजपा और एनडीए की दूसरी पार्टियों को बड़ी जीत हासिल करनी होगी.

अलबत्ता, भाजपा के लिए लक्ष्य हासिल करने का अकेला तरीका यह है कि वह ज्यादा से ज्यादा राज्यों में 50 फीसद वोट हासिल करे. 1984 में जब राजीव ने कांग्रेस के लिए 404 सीटें जीती थीं तो पार्टी की कुल वोट हिस्सेदारी 49 फीसद थी. इसके विपरीत, 2019 में जब भाजपा ने 303 सीटें जीतकर अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन किया, उसकी वोट हिस्सेदारी महज 37.36 फीसद थी. ताजातरीन देश का मिज़ाज सर्वे उसके लिए दो फीसद अंक ज्यादा यानी 39.6 फीसद वोट हिस्सेदारी का अनुमान बता रहा है, पर अब भी यह कांग्रेस की 1984 की कामयाबी से 10 फीसद अंक कम है. एनडीए ने 2019 में 45 फीसद की वोट हिस्सेदारी हासिल की थी; इस बार देश का मिज़ाज सर्वे ने उसके लिए मामूली गिरावट के साथ 44.4 फीसद वोट हिस्सेदारी की भविष्यवाणी की है, जो अगस्त 2023 के आंकड़े से 1.8 फीसद अंक ज्यादा है. भाजपा और एनडीए को अपनी उम्मीद के मुताबिक 400 का जादुई आंकड़ा छूने की खातिर वोट हिस्सेदारी को 50 फीसद तक पहुंचाने के लिए पूरे आपसी तालमेल के साथ काम करना होगा.

अलबत्ता, अगर मोदी राजीव गांधी के रिकॉर्ड की बराबरी करने की कोशिश में कुछ पीछे रह जाते हैं, तो भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बनाए एक रिकॉर्ड से आगे निकल जाएंगे. उन्होंने कांग्रेस के लिए 1967 और 1971 के चुनाव पूर्ण बहुमत से जीतकर प्रधानमंत्री के रूप में तो तीन कार्यकाल काम किया था. लेकिन आपातकाल हटाने के फौरन बाद हुए 1977 के चुनाव में कांग्रेस की बदतरीन हार के चलते वे लगातार तीन बहुमत जीतने में नाकाम रही थीं. 1980 के आम चुनाव में वे धूमधाम से सत्ता में लौटीं, जब कांग्रेस ने 353 सीटें जीती थीं. इसलिए पिता की तरह इंदिरा ने भी कांग्रेस को तीन आम चुनावों में पूर्ण बहुमत के साथ जीत दिलाई, पर लगातार नहीं, जैसा कि उनके पिता ने किया था.

मौजूदा देश का मिज़ाज सर्वे के अन्य निष्कर्ष भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि मोदी और भाजपा चुनावी शोहरत हासिल करने की राह पर बढ़ रहे हैं. एक पैमाना यह है कि लोग सत्ता में 10वें साल प्रधानमंत्री के रूप में उनके कामकाज को कैसे आंकते हैं. 60.5 फीसद लोग उसे अच्छा या शानदार मानते हैं, जबकि महज 23.6 फीसद ने उसे खराब या बेहद खराब बताया. अगस्त 2023 के देश का मिज़ाज सर्वे के मुकाबले 2.2 फीसद की गिरावट के बावजूद 60 से ऊपर की रेटिंग सराहनीय है, खासकर इस बात को देखते हुए कि अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी को कई बड़े संकटों से जूझना पड़ा, जिनमें सदी में एक बार आने वाली वह महामारी भी है जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था चौपट हो गई और विश्व आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया. यूक्रेन और गजा में छिड़े दो बड़े युद्धों ने महंगाई की आग में घी का काम किया. इसके विपरीत, जनवरी 2014 के देश का मिज़ाज सर्वे में प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के 10वें साल में केवल 26 फीसद लोगों ने उनके कामकाज को अच्छा आंका था और 67 फीसद जितनी भारी-भरकम तादाद ने उन्हें औसत से खराब रेटिंग दी थी. मौजूदा देश का मिज़ाज सर्वे में एनडीए सरकार की रेटिंग भी 55.9 फीसद जितनी प्रभावशाली है, बावजूद इसके कि यह जनवरी 2023 की 67.1 फीसद के मुकाबले 12.8 फीसद कम है.

मोदी-मोदी...

मौजूदा देश का मिज़ाज सर्वे से इस बात की साफ झलक मिलती है कि टीआईएनए (देयर इज नो ऑल्टरनेटिव यानी कोई विकल्प नहीं) या टीना फैक्टर काम कर रहा है. दरअसल पहले अक्षरों से मिलकर बना यह शब्द टीना अब टीमो या 'देयर इस ओनली मोदी' यानी 'केवल मोदी ही है' में बदल गया है. सर्वे के केवल एक सवाल के जवाब से इसकी थाह ली जा सकती है—अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए कौन सबसे ज्यादा उपयुक्त है? मोदी की रेटिंग 2019 में उनके दूसरे कार्यकाल की शुरुआत की 66 फीसद की ऊंचाई से गिरकर कोविड की लहर के दौरान अगस्त 2021 के देश का मिज़ाज सर्वे में सीधे 24 फीसद पर आ गई थी. उसके बाद यह एक के बाद एक पांच सर्वेक्षणों में लगातार बढ़ती गई और 50 फीसद के ऊपर बनी रही. ताजातरीन सर्वे में उनकी रेटिंग 54.9 फीसद पर है, जो अगस्त 2023 के देश का मिज़ाज सर्वे के मुकाबले 2.6 फीसद ज्यादा है. इतना ही अहम यह कि मोदी और उनके प्रमुख चैलेंजर राहुल गांधी के बीच फासला, जो अगस्त 2021 में घटकर महज 14 फीसद अंकों पर आ गया था, 41.1 फीसद अंकों की विशाल खाई जितना चौड़ा हो गया है.

मौजूदा देश का मिज़ाज सर्वे में मोदी के प्रबल प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी के लिए खुश होने को ज्यादा कुछ नहीं है, हालांकि 21.3 फीसद के साथ वे तार-तार होते इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव एलायंस या 'इंडिया' की अगुआई करने के लिए सबसे उपयुक्त विपक्षी नेताओं की फेहरिस्त में शीर्ष पर हैं. वे अरविंद केजरीवाल (17.4 फीसद) और ममता बनर्जी (16.5 फीसद) से आगे थे. मगर जनवरी 2023 में खत्म अपनी पहली 'भारत जोड़ो यात्रा' से राहुल को जो ताकत मिली थी, वह घटती दिखती है. अगस्त, 2023 में करीब 52 फीसद लोगों ने विपक्षी नेता के तौर पर उनके काम को शानदार या अच्छा आंका था. यह अब घटकर 39 फीसद पर आ गया है. कांग्रेस के वोट शेयर में 1.4 फीसद अंकों की गिरावट आई है और अब उसे 18.9 फीसद वोटों के साथ महज 71 सीटों मिलने का अनुमान है.

कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाना

बिखरता 'इंडिया'

मोदी संसद में राहुल और कांग्रेस पर तंज कसने से खुद को नहीं रोक सके. वे बोले, "नेता बदल गए हैं, लेकिन एक पार्टी है जो पुराने टेप रिकॉर्डर को उसी पुरानी धुन और ताल पर बजाए जा रही है, कोई ताजा सुर नहीं है. यह चुनावी वर्ष है; आप थोड़ी और मेहनत कर सकते थे, जनता को संदेश देने के लिए कुछ नया ला सकते थे, लेकिन आप उसमें भी असफल रहे. क्या मैं सिखाऊं कि कैसे करना है?" विपक्ष के लिए हाल में और भी बुरी खबर नीतीश कुमार के 'इंडिया' छोड़कर फिर भाजपा के पाले में जा बैठने से आई. करीब 46 फीसद लोगों की राय में उनके पाला बदलने से गठबंधन की सत्तारूढ़ एनडीए को हराने की संभावनाओं को गहरा झटका लगा है. 'इंडिया' का वोट शेयर अगस्त 2023 सर्वेक्षण मं' 41 फीसद से तीन फीसद अंक कम होकर अब 38.3 फीसद हो गया है. सीटों के मामले में गठबंधन छह महीने पहले के 193 से घटकर अब 166 सीटों पर आ गया है.

दरअसल, 'इंडिया' को झटका देने का सबसे ज्यादा श्रेय भाजपा के ताकतवर शख्स तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को दिया जाता है, जो विपक्षी घटकों को तोड़कर अपने पाले में लाने में जुटे हुए हैं. शाह भाजपा को अजेय ताकत बनाने के सूत्रधार और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के वास्तुकार रहे हैं. वे मौजूदा सर्वेक्षण में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी के उत्तराधिकारी के नाते 28.8 फीसद के साथ सबसे पसंदीदा नेता बनकर उभरे हैं. इस तरह वे इस मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से 4.1 फीसद अंक आगे हैं, जिन्हें 24.7 फीसद वोट मिले. केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी 16.1 फीसद के साथ तीसरे स्थान पर हैं.

दिलचस्प यह है कि वोट फीसद के विश्लेषण में सी-वोटर ने पाया कि एनडीए को वोट महिलाओं से अधिक पुरुषों ने दिया; यह स्थिति 'इंडिया' के मामले में उलट थी. यूं तो एनडीए को सभी आयु वर्गों का वोट मिला, लेकिन आय-स्तर में उसे सबसे अधिक समर्थन उच्च आय वर्ग और कुछ हद तक मध्यम आय वर्ग में मिला. दोनों प्रतिद्वंद्वी गठबंधनों में निम्न आय वर्ग का समर्थन हासिल करने के लिए कड़ी टक्कर रही है. 'इंडिया' को अल्पसंख्यकों का स्पष्ट समर्थन हासिल है, लेकिन एनडीए भी 20 फीसद मुसलमानों का समर्थन जुटा सकता है. अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और ऊंची जातियों में एनडीए को बढ़त हासिल है, लेकिन अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग में दोनों के बीच करीबी मामला है. ताजा सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, एनडीए की पकड़ शहरी वोटरों में मजबूत लगती है, लेकिन ग्रामीण वोटरों में उसे 'इंडिया' कड़ी टक्कर दे रहा है.
 
जहां चमक फीकी है

मौजूदा सर्वेक्षण में मोदी और भाजपा दोनों के सितारे मोटे तौर पर चमक रहे हैं, लेकिन खासकर आर्थिक मोर्चे पर चेतावनी भी बड़ी है जिन पर ध्यान देने की दरकार है. एनडीए सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियां क्या हैं? इस सवाल पर देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में जनवरी, 2022 से लगातार पांचवीं बार कोविड-19 महामारी से निबटना अभी भी शीर्ष पर है. अयोध्या में राम मंदिर का भव्य उद्घाटन और उसके पहले काशी विश्वनाथ मंदिर गलियारे के निर्माण के बावजूद ये मुद्दे दूसरे नंबर पर हैं. अलबत्ता, इस बारे में राय अगस्त 2023 से छह फीसद अंक बढ़ी है. भ्रष्टाचार मुक्त शासन और अनुच्छेद 370 का हटाना क्रमश: तीसरे और चौथे स्थान पर हैं. दिलचस्प यह है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर और समाज कल्याण कार्यक्रम के मामले में सरकार की कामयाबी को लोग अधिक महत्व नहीं देते.

दरअसल, सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए सरकार की सबसे बड़ी नाकामियों के सवाल पर लोगों की राय चिंता का सबब है. इस मामले में कीमतों में इजाफा एक नंबर पर और दूसरे नंबर पर बेरोजगारी है. विडंबना यह है कि सरकार की नाकामियों में कोविड-19 के दौरान कामकाज तीसरे स्थान पर है, जबकि आर्थिक विकास में मंदी चौथे स्थान पर है. तीन मुद्दों-महंगाई, रोजगार और आर्थिक विकास—को जोड़ दें तो 54 फीसद लोग सरकार की सभी नाकामियों में आर्थिक मुद्दों पर प्रदर्शन बदतर मानते हैं. यह सत्तारूढ़ भाजपा के लिए चिंताजनक है. आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर ठोस सवालों के जवाबों का विश्लेषण करें तो मौजूदा सर्वेक्षण में भी कुछ विरोधाभासी तस्वीर उभरती है. मसलन, क्या मोदी सरकार के तहत देश में भ्रष्टाचार कम हुआ है? इस पर 46.2 फीसद लोग हां कहते हैं, लेकिन उतने ही तकरीबन 46.9 फीसद लोग इसके उलट राय रखते हैं.

फिर, करीब 50 फीसद लोगों ने एनडीए सरकार की अर्थव्यवस्था की सार-संभाल की सराहना की, लेकिन सिर्फ एक-तिहाई का ही कहना था कि 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है; 63 फीसद लोगों का मानना है कि अर्थव्यवस्था जस की तस बनी हुई है या बदतर हो गई है. यह आंकड़ा मोदी के दूसरे कार्यकाल में लगातार छठे देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में 60 फीसद से ऊपर रहा है. रोजमर्रा के खर्च की स्थिति पिछले वर्ष के मुकाबले कैसी है? इस पर 61 फीसद का कहना है कि मौजूदा खर्च बरदाश्त के बाहर हैं. यह आंकड़ा भी लगातार पांच सर्वेक्षणों में ऊपर ही रहा है. 66 फीसद लोगों का यह भी मानना है कि उनकी आमदनी जस की तस रहेगी या घटेगी. 70 फीसद से ज्यादा लोग देश में बेरोजगारी की स्थिति को गंभीर मानते हैं. यह धारणा भी लगातार छह सर्वेक्षणों में बनी हुई है. बहुसंख्यक लोग मानते हैं कि मोदी की आर्थिक नीतियां बड़े कारोबारी घरानों के हक में हैं और दूसरे तबकों को नुकसान पहुंचा रही हैं.

विरोधाभास क्यों

आर्थिक मोर्चे पर ऐसे निराशाजनक प्रदर्शन पर किसी दूसरी सरकार के चुनावी आंकड़ों में गिरावट देखी गई होगी. लेकिन मोदी और एनडीए के मामले में ऐसा नहीं है. चुनावी आंकड़ों के मामले में तो सत्ता-विरोधी लहर का साफ संकेत भी नहीं दिख रहा है. तो फिर, खासकर आर्थिक मामलों में लोगों की राय में इस विरोधाभास के क्या मायने हैं? दरअसल यह मोदी पर वोटरों का जबरदस्त भरोसा है. प्रधानमंत्री को न सिर्फ निर्णायक नेता के रूप में देखा जाता है, बल्कि ऐसे शख्स के रूप में भी, जो लोगों की भलाई में लगातार जुटा रहता है और जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप नहीं है. न ही वोटर अपने आर्थिक संकटों का दोष मोदी पर मढ़ते हैं, बल्कि इस वजह से सराहना करते हैं कि वे विनाशकारी वैश्विक महामारी के बावजूद अर्थव्यवस्था को उच्च विकास दर की पटरी पर वापस लाने के काबिल हैं. लोग जी20 शिखर सम्मेलन के सफल संचालन के लिए भी मोदी की वाहवाही करते हैं, जिस दौरान भारत विश्व-मित्र बनकर उभरा. दरअसल, सर्वेक्षण से दूसरी सबसे अहम बात यह निकलकर आती है कि मोदी को दुनिया में देश का कद बढ़ाने के लिए याद किया जाएगा. उनका पहला योगदान राम मंदिर निर्माण है, और तीसरा अनुच्छेद 370 का हटाना. भगवा एजेंडे की इन दो उपलब्धियों से भाजपा न सिर्फ अपने मूल मतदाता आधार को बरकरार रखने में कामयाब है, बल्कि किनारे खड़े हिंदुओं में भी पैठ बना रही है.

देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में पता चलता है कि कांग्रेस लगातार तीसरे आम चुनाव में अपमानजनक हार की ओर बढ़ रही है. ऐसे में पार्टी को गंभीर सोच-विचार करना चाहिए. 'इंडिया' के सहयोगी दलों की शुभेच्छा गंवाने के अलावा उसने मोदी और भाजपा के खिलाफ मजबूत विपक्ष की तरह खड़े होने का सुनहरा मौका भी खो दिया. हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में जीत के बाद आदर्श स्थिति तो यह होती कि कांग्रेस अपने तमाम संसाधन जुटाकर तीन हिंदी प्रदेशों- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान-में से कम से कम एक में जीत दर्ज करके वह सिलसिला कायम रखती, जहां नवंबर 2023 में चुनाव हुए, जैसा उसने तेलंगाना में किया. भाजपा के खिलाफ महंगाई और बेरोजगारी जैसे घातक चुनावी औजार मौजूद थे. फिर भी विपक्षी पार्टियां, खासकर कांग्रेस मतभेदों को सुलझाकर मोदी और भाजपा को चुनौती देने के लिए धारदार नैरेटिव तैयार करने में नाकाम रहीं.

दूसरी तरफ, मोदी-शाह की जोड़ी ने थोड़ी भी ढील नहीं दिखाई और चुनाव जीतने तथा हर जगह अपने विरोधियों को कमजोर करने में जुटी रही. उनकी इन कोशिशों में महाराष्ट्र और बिहार जैसे प्रदेशों में मजबूत चुनौती पेश करने वाले विपक्षी गठजोड़ को तोड़ना भी हो सकता है और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों पर प्रतिद्वंद्वी विपक्षी नेताओं के पीछे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को लगाने का सरंजाम भी. आश्चर्य नहीं कि सर्वेक्षण में करीब 46 फीसद लोगों का मानना है कि मौजूदा भाजपा सरकार ने पहले की किसी भी सरकार के मुकाबले ईडी, सीबीआइ और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों का सबसे अधिक दुरुपयोग किया है.

लेकिन एक चीज जो बाकी सब बातों पर भारी है, वह है ब्रांड मोदी. प्रधानमंत्री ने बड़ी कुशलता के साथ 2024 के लोकसभा चुनावों को अपने नेतृत्व और कामकाज पर रायशुमारी में तब्दील कर दिया है. अगर देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के अनुमान के मुताबिक, मोदी लगातार तीसरा कार्यकाल जीत जाते हैं तो वे अपनी कतार में अकेले खड़े दिखेंगे और उनके पास नए भारतीय गणतंत्र को आकार देने का भारी जनादेश होगा.

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