मध्य प्रदेश में जीत से भाजपा को मिली नई बुलंदी
रणनीतिक कौशल, केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से संचालित अभियान और मतदाताओं की प्राथमिकता में बदलाव ने मध्य प्रदेश में भाजपा की प्रचंड जीत सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई और पार्टी को 18 साल की सत्ता विरोधी लहर से उबारने में मदद की.

भारतीय निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर मतगणना के बाद भगवा और नीले रंग में पार्टी-वार जीत को दर्शाने वाले हीट-मैप पर एक नजर डालें, आपको हर तरफ भगवा ही नजर आएगा. पश्चिम में राजस्थान सीमा पर स्थित जावरा से लेकर पूरब में उत्तर प्रदेश सीमा पर चितरंगी तक, कांग्रेस के कब्जे वाले किसी भी विधानसभा क्षेत्र से गुजरे बिना सड़क मार्ग से लगभग एक हजार किलोमीटर तक की यात्रा कोई भी कर सकता है.
इसी तरह, राजस्थान सीमा पर दिमनी से लेकर महाराष्ट्र सीमा पर मुल्ताई तक, देश के दूसरे सबसे बड़े राज्य में करीब 700 किलोमीटर की दूरी तक कांग्रेस कहीं नजर नहीं आती है. मध्य प्रदेश में पांचवीं बार भाजपा की शानदार जीत आयोग के नक्शे पर कुछ इसी तरह अंकित है. पार्टी ने 230 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस की 66 सीटों के मुकाबले 163 सीटों पर जीत हासिल की है.
कहा जा रहा था कि यह ऐसा चुनाव है, जिसमें भाजपा को 18 साल की सत्ता विरोधी लहर से लड़ना पड़ रहा है, और इसके पीछे 16 साल कुर्सी पर काबिज रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पृष्ठभूमि को भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा था. तो, पार्टी ने असंभव जीत को संभव बनाने के लिए क्या-कुछ यत्न किए? इसका श्रेय काफी हद तक राष्ट्रीय और राज्य नेतृत्व की चुनावी रणनीति को दिया जा सकता है. लेकिन इससे इनकार नहीं जा सकता कि कांग्रेस के लचर चुनाव प्रबंधन ने भाजपा की शानदार जीत में अहम भूमिका निभाई.
आम तौर पर अपने वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रयोगशाला कहलाने वाला मध्य प्रदेश भाजपा के लिए हमेशा बेहद खास रहा है. और, कर्नाटक में चुनावी हार के साथ ही पार्टी ने यहां अपने तीर-तरकश चमकाने शुरू कर दिए थे. सत्ता विरोधी लहर के खिलाफ कमजोर पड़ने से हार तय है, यह बात भाजपा ने 2018 में ही समझ ली थी, जब लगातार 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद उसे हार का मुंह देखना पड़ा था.
उस समय, इसने मुख्यमंत्री और राज्य इकाई को चुनावी रणनीति बनाने की पूरी छूट दी थी. इस बार, शुरुआत में ही स्पष्ट हो गया था कि चुनावी रणनीति का जिम्मा खुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संभालेंगे. यही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी ही इस पूरे चुनाव अभियान का चेहरा होंगे.
पार्टी कार्यकर्ताओं के शुरुआती फीडबैक और सर्वेक्षणों के आधार पर, जीत की संभावनाएं धूमिल दिख रही थीं. सत्ता विरोधी लहर को इसका मुख्य कारण माना जा रहा था. सबसे लंबे समय तक काबिज रहने वाले मुख्यमंत्री को अब पार्टी कार्यकर्ताओं और प्रमुख नेताओं का साथ भी नहीं मिलता दिख रहा था.
भाजपा का गेम प्लान
इन चुनौतियों से उबरने के लिए शाह ने नेतृत्व विकल्प को व्यापक आधार देने की रणनीति बनाई. यही वजह है कि तीन केंद्रीय मंत्रियों और एक राष्ट्रीय महासचिव समेत सात सांसदों को मैदान में उतारा गया. लक्ष्य यही था कि वे न केवल अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल करें बल्कि आसपास की सीटों को भी प्रभावित करें.
रणनीति सफल रही और इनमें से केवल दो सांसद—मंडला में फग्गन सिंह कुलस्ते और सतना में गणेश सिंह—ही चुनाव हारे. वहीं, नरेंद्र सिंह तोमर, राव उदय प्रताप सिंह, कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद पटेल, रीति पाठक और राकेश सिंह ने न केवल अपनी सीटें जीतीं बल्कि आसपास की सीटें जीतने में भी मदद की. वैसे, भाजपा ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का इस्तेमाल भी अपने फायदे के लिए किया.
2018 में कांग्रेस ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की 34 में से 26 सीटों पर जीती थीं, जहां सिंधिया का वर्चस्व है. मार्च 2020 में सिंधिया के अपने वफादार 19 विधायकों (कुल 22) के साथ पार्टी छोड़ते ही कमलनाथ सरकार गिर गई, अब क्षेत्र में कांग्रेस की सीटें घटकर 16 रह गईं, भाजपा ने 18 पर जीत हासिल की.
भाजपा ने साथ ही वी.डी. शर्मा की अध्यक्षता वाली राज्य इकाई से कार्यकर्ताओं को चुनावी जंग के लिए तैयार करने को कहा. करीब सभी 65,000 बूथों पर पार्टी की मजबूती के प्रयासों में कोई कसर नहीं छोड़ी गई. भोपाल स्थित भाजपा मुख्यालय में एक फीडबैक प्रणाली स्थापित की गई जिसके जरिये न केवल बूथ प्रभारियों और पन्ना प्रमुखों से बात की जा सकती थी बल्कि उनके काम की समीक्षा भी की जा सकती थी.
बूथ प्रभारियों को मतदाताओं को सरकारी योजनाओं का लाभ बताने और आवेदन का तरीका आदि समझाने का जिम्मा सौंपा गया. इससे अंतिम छोर तक संपर्क साधना और योजनाओं का लाभ पहुंचना सुनिश्चित हुआ. कांग्रेस ने भी इसी तरह बूथ-स्तरीय कवायद शुरू की. लेकिन उसने इस विशेष प्रयोजन के लिए प्रभारियों की नियुक्ति का पूरा जिम्मा विधायकों और जिला प्रभारियों पर छोड़ दिया. साथ ही जिम्मेदारी पार्टी के प्रति निष्ठा से बदलकर नेताओं के प्रति निष्ठा पर आ गई और आखिरकार, उम्मीदवारों को मतदान के दिन बूथ प्रबंधन के लिए नए लोगों पर निर्भर होना पड़ा.
उम्मीदवारों की घोषणा भी भाजपा ने काफी समय रहते शुरू कर दी थी—अगस्त मध्य तक वह 230 विधानसभा क्षेत्रों में से 39 में टिकट घोषित कर चुकी थी. यह सब निर्वाचन क्षेत्रों को कमजोर, ज्यादा कमजोर और सबसे कमजोर के तौर पर वर्गीकृत करने के बाद किया गया, और आखिर वाली सीटें वे थीं जिस पर भाजपा ने पिछले दो या उससे ज्यादा चुनावों में जीत दर्ज नहीं की थी.
यह पहला मौका था जब पार्टी ने इतने पहले उम्मीदवार घोषित किए. वैसे तो राजनैतिक आकलन यही कहता है कि आंतरिक कलह से निबटने के लिए टिकट बंटवारे में देरी करना ही फायदे का सौदा होता है. लेकिन भाजपा ने इसके खिलाफ जाने का फैसला किया और उसे उन 39 सीटों में से 24 पर जीत का तोहफा भी मिला, जिन पर उसने पहले ही प्रत्याशी घोषित कर दिए थे.
दूसरी तरफ, कांग्रेस ने जल्द टिकट वितरण का वादा तो किया था लेकिन अपनी पहली सूची के लिए 15 अक्टूबर तक इंतजार कराया. बाद की सूचियों में आंतरिक कलह और संशोधन की साफ झलक दिखी. टिकट बंटवारे को लेकर विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ को नाराज पार्टी कार्यकर्ताओं को सार्वजनिक तौर पर वरिष्ठ सहयोगी दिग्विजय सिंह के कपड़े फाड़ने की बात कहते देखा गया.
कांग्रेस के बुरी तरह हारने की सबसे बड़ी वजह यही रही कि पार्टी नेतृत्व बगावत से निबटने में नाकाम रहा. निवर्तमान विधानसभा के 98 कांग्रेस विधायकों में से केवल 13 का टिकट काटा गया था. चुनाव में उतरे 85 विधायकों में से 60 हार गए. जिन 13 सीटों पर नए प्रत्याशी उतारे गए थे, उनमें से सात पर कांग्रेस हारी. दूसरी तरफ, भाजपा ने अपने 126 विधायकों में से 34 को टिकट नहीं दिया. मैदान में उतरे 97 में से केवल 27 हारे, जिससे पता चलता है कि सत्ता विरोधी लहर का असर सत्ताधारी दल भाजपा की तुलना में विपक्ष पर अधिक पड़ा.
मई में कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद भाजपा बेहद उत्सुकता से इंतजार कर रही थी कि मध्य प्रदेश के चुनावी अभियान में कमलनाथ के पिटारे से क्या निकलने वाला है. जून में कांग्रेस नेता ने चार प्रमुख घोषणाएं कीं; 100 यूनिट तक बिजली मुफ्त और 200 यूनिट पर 50 फीसद की छूट, कृषि ऋण माफी, सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना और 500 रुपए में रसोई गैस सिलेंडर.
चौहान मार्च में ही कह चुके थे कि उन्हें लगता है कि लाडली बहना योजना चुनाव में 'गेम चेंजर’ साबित होगी. योजना के तहत करीब 1.3 करोड़ लाभार्थी महिलाओं को प्रति माह 1,000 रुपए का भुगतान 10 जून को शुरू हो गया. इस तरह कांग्रेस के अपने वादों को कागज पर उतारने से पहले ही भाजपा लाभार्थियों के हाथों में पैसे रखना शुरू कर चुकी थी.
अपने हर भाषण में चौहान यह याद दिलाना भी नहीं भूलते कि 2019 में मुख्यमंत्री पद पर रहते कमलनाथ ने उनकी संबल योजना बंद कर दी थी और अगर सत्ता में आए तो लाडली बहना के साथ भी ऐसा ही करेंगे. इसके बाद कांग्रेस को भी लाडली बहना की तर्ज पर महिला सम्मान योजना की घोषणा करने पर बाध्य होना पड़ा, जिसमें प्रति माह 1,500 रुपए के भुगतान का वादा किया गया था.
यहां तक कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के जरिये लाभार्थियों के फॉर्म भी भरवाए गए, ताकि लोगों को यह भरोसा हो सके कि पार्टी अपने वादे के प्रति कितनी गंभीर है. लेकिन कमजोर संगठनात्मक ढांचे की वजह से पार्टी लाडली बहना के जरिये चौहान की मजबूत पकड़ पर सेंध लगाने में नाकाम रही. उन्होंने न केवल बेहद चतुराई से योजना लागू करने के लिए सरकारी तंत्र, खासकर पंचायत सचिवों का इस्तेमाल किया, बल्कि बाद में भुगतान को संशोधित कर 1,250 रुपए प्रति माह कर दिया और अंतत: 3,000 रुपए तक ले जाने का वादा किया.
मध्य प्रदेश के नतीजों का सटीक आकलन करने वाले इंडिया टुडे-एक्सिस माइ इंडिया एग्जिट पोल से पता चलता है कि भाजपा की जीत मुख्यत: महिला मतदाताओं का झुकाव उसके पक्ष में होने के कारण हुई. सर्वेक्षण के मुताबिक, 46 फीसद पुरुष मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया, वहीं, महिला मतदाताओं के मामले में यह आंकड़ा 52 फीसद रहा. कांग्रेस को 41 फीसद पुरुषों और सिर्फ 39 फीसद महिलाओं का वोट मिला. सर्वेक्षण के मुताबिक, महिलाओं के वोट शेयर में 13 फीसद के अंतर ने ही भाजपा का प्रदर्शन इस तरह एकदम बदल दिया.
यह पहला मौका नहीं जब अपनी नैया पार लगाने के लिए चौहान महिलाओं के भरोसे पर निर्भर थे. राज्य में पिछले 18 साल के भाजपा शासन के दौरान महिलाओं पर केंद्रित 18 योजनाएं शुरू की गई हैं. चौहान ने इंडिया टुडे को बताया, "मैं लगातार कहता रहा हूं कि मध्य प्रदेश में कोई कांटे की टक्कर नहीं हैं. हम भारी जनादेश के साथ जीतेंगे, और यही हुआ भी.
लाडली बहना योजना राज्य की महिलाओं के लिए एकमात्र पहल नहीं है; महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने की योजनाओं के अलावा हमने पंचायत, शहरी निकायों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण भी दिया है. इस तरह की प्रचंड जीत केवल महिलाओं के समर्थन के कारण ही नहीं हुई है. बल्कि समाज के सभी वर्गों ने हमें वोट दिया है क्योंकि उनका पूर्व की कांग्रेस सरकार से मोहभंग हो गया था."
भाजपा को ब्राह्मणों और ठाकुरों का सबसे ज्यादा समर्थन मिलने की एक वजह यह भी मानी जा रही है कि उसने एक ब्राह्मण शर्मा को राज्य प्रमुख नियुक्त करने और ठाकुर चेहरा रहे तोमर को संभावित सीएम के तौर पर चुनाव मैदान में उतारा. चौहान की घटती लोकप्रियता से वाकिफ पार्टी के रणनीतिकारों ने उनकी भूमिका सीमित कर दी और उन्हें राज्य के एकमात्र नेतृत्व विकल्प के बजाय विभिन्न उपलब्ध नेतृत्व विकल्पों में से एक की तरह पेश किया.
भाजपा ने अपनी चुनाव रणनीति भी बहुत सावधानीपूर्वक तैयार की और इस मुकाबले को चौहान बनाम कमलनाथ के बजाए मोदी बनाम कमलनाथ में बदल दिया. पार्टी जब चुनाव अभियान मोड में आई, तो सारी चुनाव सामग्री में मोदी के चेहरे को प्रमुखता से दर्शाया गया जबकि राज्य के अन्य भाजपा नेताओं की तस्वीरें बहुत छोटी रखी गईं. इसके विपरीत, कांग्रेस की चुनाव प्रचार सामग्री में केवल कमलनाथ ही दिखते थे. उनके साथ कभी-कभार प्रियंका और राहुल गांधी की तस्वीरें भी नजर आ जाती थीं.
कांग्रेस कई मुद्दों से जूझ रही थी. जहां भाजपा में कमान की एक पूरी चेन बनी हुई थी, वहीं कमलनाथ पार्टी नेता होने के कारण केंद्रीय नेतृत्व या कहीं और से किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं चाहते थे. इसका एक उदाहरण जाने-माने चुनावी रणनीतिकार और कर्नाटक की जीत वास्तुकार सुनील कनुगोलू के लिए मध्य प्रदेश में काम करने में आई परेशानियों में देखा जा सकता है. पार्टी मध्य प्रदेश में कर्नाटक की तरह चुनाव अभियान को सहजता से नहीं चला सकी.
इस बार चुनाव में भाजपा के कुछ दिग्गज भी हार गए. चौहान कैबिनेट के 33 मंत्रियों में से 12 मंत्री हारे, जिनमें बेहद मुखर गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा भी शामिल हैं जो अपनी सीट बचाने में असफल रहे. लेकिन अन्य सीटों पर पार्टी की शानदार जीत ने इन नुकसानों की भरपाई कर दी.