नीतीश कुमार : जाति राजनीति के महारथी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जातिगत सर्वेक्षण के नतीजों के रूप में  ऐसी गुगली फेंकी है, जिससे भाजपा बैकफुट आ गई और वे खुद एक बार फिर सियासत के केंद्रीय मंच पर सुर्खरू हुए

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

नीतीश कुमार जब घड़ी बांधते हैं तो उसका डायल कलाई में पीछे की तरफ रहता है. आप उनसे इसका कारण पूछें, तो हो सकता है कि वे इसे पुरानी आदत कहकर टरका दें. लेकिन यह घड़ी देखने का ऐसा तरीका है, जिसमें इस पर दूसरों की नजर न पड़े.

2 अक्तूबर गांधी जयंती के दिन, जनता दल (यूनाइटेड) प्रमुख तथा बिहार के मुख्यमंत्री ने दिखा दिया कि वे सियासी मौकों की नजाकत कितनी अच्छी तरह समझते हैं, जब उनकी सरकार ने इस साल के शुरू में कराई गई जनगणना से हासिल जातिगत आंकड़ों को जारी किया.

वैसे तो जातिगत जनगणना के आंकड़े तभी जारी हो सकते थे, जब 4 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उसको चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई रोक दी थी. लेकिन नीतीश ने आंकड़े जारी करके सियासी धमाका करने से पहले महिला आरक्षण बिल पर भाजपा के अपना कार्ड खेलने का इंतजार किया. शायद, उनकी इस चाल का ही नतीजा है कि बिहार में भगवा पार्टी की प्रतिक्रिया कुछ हद तक भ्रमित नजर आई है.

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने इसे जनता को भ्रमित करने का प्रयास करार दिया, पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने इस पूरी कवायद में बराबरी का श्रेय लेने की कोशिश की, जबकि बिहार भाजपा अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने आरोप लगाया कि नीतीश पर सहयोगी दल की तरफ से दबाव पड़ रहा है क्योंकि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के संरक्षक लालू प्रसाद यादव की जातिगत राजनीति तो जगजाहिर है. इससे साफ जाहिर है कि इस पर राजनैतिक प्रतिक्रिया देना भी भाजपा के लिए कितना भारी पड़ गया.

जातिगत सर्वेक्षण में पिछड़ों की भारी-भरकम तादाद (बिहार में 63.1 फीसद) की पुष्टि के साथ महिला आरक्षण के तहत कोटे में कोटा देने की नीतीश की मांग जोर पकड़ सकती है और इससे भाजपा का 'मास्टरस्ट्रोक’ बेअसर साबित हो सकता है. ये आंकड़े ऐसी संभावनाएं भी जगाते हैं कि ओबीसी और ईबीसी (अति पिछड़ी जातियां) भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों की तुलना में क्षेत्रीय दलों के पक्ष में लामबंद हो सकते हैं क्योंकि वे संसद में अधिक (आनुपातिक) प्रतिनिधित्व चाहेंगे.

जद (यू) के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, ''सर्वेक्षण कई प्रासंगिक सवाल उठाता है. मसलन, लोकसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसदों में सिर्फ 3.4 फीसद आबादी वाले अगड़ी जाति के राजपूतों की संख्या सबसे ज्यादा (कुल 40 में से 7) क्यों है? या राजपूतों की तुलना में चार गुना अधिक आबादी वाले यादवों के पास महज 5 सीटें क्यों हैं?

ऐसे ही सवाल राजनैतिक दलों को अपनी चुनावी रणनीतियों पर फिर से विचार करने पर बाध्य कर सकते हैं.’’ अगर आबादी में भागीदारी के लिहाज से हिस्सेदारी की मांग ने ज्यादा जोर पकड़ा तो जाहिर है कि पार्टियों को खुद को उसके अनुरूप ढालना होगा. इससे उनका सियासी खेल बन भी सकता है और बिगड़ भी सकता है.

जातिगत सर्वेक्षण में दो अलग-अलग घटक हैं. ओबीसी में सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का है, जो तेजस्वी यादव के राजद का जनाधार रहा है. वैसे तो इस जाति समूह को हमेशा से ही सबसे बड़ा माना जाता था लेकिन दस्तावेजी प्रमाणों (14.3 फीसद) से उनका दबदबा और ज्यादा बढ़ने की उम्मीद है. इससे राजद के वोट बैंक में तगड़ी सेंध लगाने का भाजपा का सपना धूमिल हो सकता है.

फिर आते हैं ईबीसी वाले यानी अति पिछड़ी आबादी, जिसमें बिहार में एकदम हाशिये पर पड़े ओबीसी की 113 जातियां शामिल हैं. अगर चुनावी राजनीति के संदर्भ में देखें तो यह खुलासा बहुत ज्यादा मायने रखता है कि कुल जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी 36 फीसद है, क्योंकि इससे पहले इन जाति समूहों को इतने व्यापक रूप में नहीं देखा गया.

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद का सियासी करियर जब चरम पर था तब वे चुनाव नतीजों से पहले लगाए जाने वाले अनुमानों पर चुटकी लेते हुए कहते थे, ''बैलट बॉक्स से जिन्न निकलेगा’’, और जिन्न से उनका आशय होता था, ईबीसी का समर्थन. लंबे समय तक किसी खास दल के पक्ष में पूरी तरह लामबंद होने में विफल रहे ईबीसी नब्बे के दशक में चुनावों में लालू का समर्थन करते थे.

लेकिन नवंबर 2005 में नीतीश की पारी शुरू होने के बाद तस्वीर बदल गई. उन्होंने ईबीसी को मंडल ब्लॉक से बाहर निकाला और फिर पहले स्थानीय प्रशासन में हिस्सेदारी की पेशकश करके और फिर प्रशासनिक सेवाओं या व्यवसाय के इच्छुक मेधावी युवाओं को वित्तीय सहायता के साथ उनके सशक्तीकरण को एक अलग ही स्वरूप प्रदान कर दिया. सर्वेक्षण के नतीजे अब नीतीश के ईबीसी जनाधार को और व्यापक बनाकर उन्हें कुछ और समूहों का समर्थन दिला सकते हैं, खासकर जो पहली बार अपनी संख्यात्मक ताकत का दावा करने की स्थिति में हैं.

जातिगत सर्वेक्षण के नतीजों ने राजनैतिक परिदृश्य को एकदम उलट-पुलट कर रख दिया है. 2020 के विधानसभा चुनाव में जद (यू) के कमजोर प्रदर्शन के बाद तमाम लोगों को ऐसा लग रहा था कि सोशल इंजीनियरिंग के पुरोधा नीतीश के दिन अब लद गए हैं. लेकिन तीन साल के भीतर ही वे सामाजिक न्याय के एक महारथी के तौर पर सियासी मैदान में ताल ठोकते नजर आ रहे हैं.

जद (यू) के शीर्ष सूत्रों के मुताबिक, नीतीश की राय है कि आरक्षण पर 50 फीसद की सीमा राज्यों की तरफ से ओबीसी को समान अवसर मुहैया कराने में सबसे बड़ी बाधा है. नीतीश ने पूरे देश में जाति जनगणना की वकालत करते हुए इस पर बात की लेकिन उनके तर्क के पीछे राजनैतिक निहितार्थ भी छिपे हैं.

अगस्त 2022 में भाजपा का साथ छोड़ने के बाद अब उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन 'इंडिया’ को एकजुट करने का श्रेय दिया जाता है. भाजपा से मुकाबले के लिए विपक्षी गठबंधन सर्वेक्षण के निष्कर्षों को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा, जिसने हिंदू पहचान बनाम अन्य को अपनी चुनावी ताकत बना रखा है.

बिहार के जातिगत सर्वेक्षण से मची सियासी हलचल साफ नजर आ रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष पर हमलावर हैं और (बेशक सर्वेक्षण का जिक्र किए बिना) उस पर देश को जाति के आधार पर बांटने का आरोप लगा रहे हैं. दूसरी तरफ, विपक्षी खेमे में यह धारणा प्रबल है कि ईबीसी समुदायों के बीच पैठ बना चुकी भाजपा की हिंदुत्व वाली राजनीति का मुकाबला कोटा पिच से ही किया जा सकता है.

संभवत:, यही देशव्यापी जाति जनगणना कराने के प्रति भाजपा की अनिच्छा की वाजिब वजह हो सकती है, क्योंकि इससे भानुमती का पिटारा खुल सकता है. फिलहाल तो नीतीश ने बाजी मार ली है. हो सकता है कि उन्हें भाजपा के अभेद्य किले में सेंध लगाने का हथियार मिल जाए? आने वाले महीनों में यह मुद्दा तूल पकड़ता है और चुनावी पासा 'इंडिया’ के पक्ष में रहता है तो नीतीश कुमार नए राष्ट्रीय अवतार में दिखेंगे.

बहुतों को लग रहा था कि सामाजिक न्याय की राजनीति में अब नीतीश के दिन लद गए हैं, लेकिन उन्होंने जाति  सर्वेक्षण से भारी सियासी हलचल पैदा कर दी.

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