अगली पीढ़ी का पोषण
ऐसे बांटी खुशी : कोटा में साल 2019 में शिशुओं की दुखद मौत के बाद सुपोषित मां अभियान शुरू हुआ, जिसमें कुपोषित गर्भवती माताओं को विशेष किट देकर नियमित चिकित्सा जांच की जाती है. साथ ही सुनिश्चित किया जाता है कि बच्चों को जीवन में स्वस्थ शुरुआत मिले.

खुशी की खोज
सुपोषित मां अभियान
स्थापना: 2020
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जब युवा माताओं और उनके नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य के बारे में पूछताछ करने के लिए अपने संसदीय क्षेत्र कोटा की एक झुग्गी-झोपड़ी बस्ती की संकरी गलियों से गुजरते हैं तो उनके चेहरे पर अभिभावक सरीखी मुस्कान तैर रही होती है. ठीक वैसे ही भाव होते हैं जो अमूमन सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करते वक्त उनमें नजर आते हैं. गरीबों को मुफ्त कपड़े से लेकर मोबाइल रसोई तक, बिरला को जन कार्यों को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है.
कोटा के जेके लोन हॉस्पिटल में दिसंबर 2019 में बड़ी संख्या नवजातों की मौत की घटना के बाद बिरला नए अभियान पर निकल पड़े हैं. वे कहते हैं, ''अक्सर, मां के खराब स्वास्थ्य की वजह से नवजात कमजोर पैदा होता है. यह गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त चिकित्सा सलाह की कमी के नतीजतन होता है.’’ बिरला की पत्नी अमिता स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं. अमिता से ही उन्हें यह समझने में मदद मिली कि भारत में मातृ और शिशु मृत्यु दर हमेशा स्वास्थ्य के खराब बुनियादी ढांचे या डॉक्टरों की लापरवाही से नहीं जुड़ी होती है.
बिरला ने लाभार्थियों की पहचान करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं और डॉक्टरों को इसमें शामिल किया. इन लाभार्थियों में अधिकतर झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली श्रमिक और घरेलू सहायिकाएं थीं. उसके बाद केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने 29 फरवरी, 2020 को इस अभियान के पहले चरण की शुरुआत की.
इसके तहत कवर की गईं 1,000 महिलाओं में सकारात्मक नतीजों को देखते हुए बिरला ने दूसरे चरण में 3,000 महिलाओं को कवर करने के लिए इस अभियान को मई 2022 में आगे बढ़ाया. बिरला कहते हैं, ''हम अक्सर भूख की बात करते हैं, लेकिन कुपोषण हमारी नई पीढ़ियों को प्रभावित करने वाला बड़ा मसला है. हमारा अभियान न केवल एक महिला बल्कि उसके नवजात के स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाने में मदद करता है.’’
इस प्रयास में जननी सोशल वर्क एवं हेल्थ संस्था बिरला की प्रमुख सहयोगी है. लाभार्थियों की पहचान करने के लिए स्वास्थ्य अधिकारियों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को शामिल करते हुए इसने 26 जगहों पर शिविर आयोजित किए. शारीरिक जांच से आसानी से कुपोषित महिलाओं की पहचान की जा सकती है.
इसके बाद पोषण विशेषज्ञ गुड़, दलिया, घी और मल्टीग्रेन आहार समेत भोजन की खुराक की सूची तैयार करते हैं. एक मासिक किट का वजन करीब 15 किलोग्राम होता है और इसकी कीमत करीब 1,000 रुपए होती है. गंभीर एनीमिया के मामलों में अतिरिक्त खुराक दी जाती है. अपने क्लिनिकों में मुफ्त परामर्श की सुविधा देकर कुछ प्राइवेट डॉक्टर भी इस अभियान में शामिल हो गए हैं.
बिरला अपने निर्वाचन क्षेत्र की मातृ और शिशु मृत्युदर को पूरे भारत में सबसे कम करना चाहते हैं. वे कहते हैं, ''मुझे यह बात उत्साहजनक लगी कि लगभग सभी प्रसव सामान्य हुए हैं और दो-तिहाई शिशुओं का वजन सामान्य से अधिक है. लेकिन मैं यह भी चाहता हूं कि इस पायलट प्रोजेक्ट का कड़ाई से मूल्यांकन करके इसे पूरे देश में लागू किया जाए. लोकसभा अध्यक्ष के नाते, मैं निर्वाचित प्रतिनिधियों से आग्रह करता हूं कि वे भी अपने क्षेत्रों में इसी तरह के कार्यक्रम चलाएं.’’ यह वाकई अनुकरणीय प्रयास है.
खुशी के सूत्र
''मुझे यह जानकर बहुत प्रसन्नता होती है कि मेरे प्रयासों से माताओं और बच्चों की सेहत बेहतर हो रही है’’
—ओम बिरला, लोकसभा अध्यक्ष, सुपोषित मां अभियान के संस्थापक