नाश्ता कराने वाली मां

ऐसे बांटी खुशी : केरल के एक आदिवासी स्कूल में एक प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका यह सुनिश्चित करने के प्रयास कर रही हैं कि उनके बच्चे कक्षा में भूखे पेट न बैठे हों.

लिंसी जॉर्ज
लिंसी जॉर्ज

खुशी की खोज

लिंसी जॉर्ज, 42 वर्ष, टीचर
इडुक्की, केरल.

करीब तीन महीने पहले, केरल के पहाड़ी जिले इडुक्की में मुरीकट्टुकुडी के सरकारी जनजातीय स्कूल में चौथी कक्षा के दो छात्र सुबह क्लास में बेहोश हो गए. पता चला कि बच्चे घर से बिना नाश्ता किए ही स्कूल आए थे. आश्चर्यजनक रूप से, जब स्कूल ने यह पता किया कि आखिर कितने बच्चे ऐसे हैं जो कक्षा में भूखे पेट बैठे हैं, तो संकोच के साथ लगभग 120 छात्रों ने माना कि उन्होंने सुबह से कुछ नहीं खाया है और वे भूखे थे. 

स्कूल की तरफ से यह जानकारी जुटाने वाली टीम का नेतृत्व आंशिक रूप से आंखों की रोशनी खो चुकीं प्राथमिक विद्यालय की शिक्षका लिंसी जॉर्ज कर रही थीं. जब उनकी क्लास के 12 बच्चों ने स्वीकार किया कि वे रोज खाली पेट स्कूल आते हैं तो वे घबरा गईं.

कई छात्रों के माता-पिता पास के बागानों में काम करते थे और काम के लिए घर से जल्दी निकल जाते थे. लिंसी कहती हैं, ''मैंने अपनी चिंताओं को अन्य शिक्षकों और प्रधानाध्यापक से साझा किया. फिर हमने सर्वेक्षण किया. यह पता चला कि स्कूल के 407 छात्रों में से 120 भूखे पेट ही स्कूल चले आए थे. एक मां और एक शिक्षका के नाते यह जानकर मुझे बहुत कष्ट हुआ.’’ 

उन्होंने अपने पति सेबस्टियन जॉर्ज से इस मुद्दे पर चर्चा की. सेबेस्टियन एक स्थानीय स्कूल में लिपिक हैं. दोनों ने फैसला किया कि वे भूखे छात्रों के लिए नाश्ते की व्यवस्था करेंगे. लिंसी ने अपनी बचत, सहयोगियों और पीटीए अधिकारियों से धन जुटाया और दो महीने पहले ब्रेकफास्ट प्रोजेक्ट शुरू किया. इस प्रयास को आर्थिक सहयोग प्रदान करने के लिए कई लोग अब आगे आए हैं.

केरल में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पहले से गरीब बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन योजना चल रही है, लेकिन लिंसी का कहना है, ''अब तक कोई भी स्कूल छात्रों के लिए नाश्ता उपलब्ध नहीं करा रहा था.’’ कार्यक्रम को जबरदस्त सफलता मिली है; छात्र अब अधिक खुश हैं और कक्षा की गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से भाग लेते हैं. लिंसी के प्रयास यहीं नहीं रुके. उन्होंने ऐसे छह विद्यार्थियों के लिए घर बनाने में भी मदद की है जिनके पास रहने के लिए घर नहीं थे और जो अस्थाई छप्पर के नीचे रह रहे थे.

खुशी के सूत्र
'' अपने विद्यार्थियों के साथ होने पर मुझे बहुत खुशी मिलती है, इसलिए यह मेरा दायित्व है कि उनकी जिंदगी कुछ बेहतर करूं    हर छोटी चीज मायने रखती है...लगता है जैसे बड़े परिवार को खाना खिलाना हो’’
—लिंसी जॉर्ज, टीचर

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