''सच्ची खुशी तो हमारे भीतर है’’

हमारा जन्म खुशी अनुभव करने के लिए हुआ है और हम इसे हासिल करने का संघर्ष करते हुए जिंदगी जीते हैं. त्रासदी यह है कि हममें से ज्यादातर इसका सचमुच अनुभव किए बिना मर जाते हैं.

माता अमृतानंदमयी
माता अमृतानंदमयी

खुशी की खोज : गुरुवाणी

माता अमृतानंदमयी

आपके जीवन के किसी भी दूसरे फैसले की तरह खुशी भी एक फैसला है. आपको खुद से कहना होता है कि जिंदगी में चाहे जो हो, आप खुश रहेंगे, मजबूत रहेंगे क्योंकि आप अकेले नहीं हैं; समूचा संसार, ईश्वर की शक्ति आपके साथ है. हम हंसें या रोएं, दिन तो गुजर ही जाएंगे.

खुशी हमारा सच्चा स्वभाव है. इसलिए आप हों या कोई और, खुशी ही सब कुछ है, यही जिंदगी का मकसद है. यह विशुद्ध व्यक्तिपरक है, पर इसका अनुभव तब होता है जब आप ऐसा मन विकसित करते हैं जो बाहरी दुनिया से अविचलित रहता है.

दुनिया में खुशी का अकेला स्रोत हम स्वयं हैं. अगर खुशी दुनियावी चीजों में होती तो कोई भी उसे हासिल कर लेता. हमें यह सच समझना पड़ता है—खुशी चीजों में नहीं है, हमारे भीतर है. खुशी का एक स्रोत हम हैं. यह समझ ही अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण हासिल करने में हमारी मदद कर सकती है. बदले में हम ज्यादा शांत होंगे और भीतरी आनंद अनुभव करेंगे.

हमारा जन्म खुशी अनुभव करने के लिए हुआ है और हम इसे हासिल करने का संघर्ष करते हुए जिंदगी जीते हैं. त्रासदी यह है कि हममें से ज्यादातर इसका सचमुच अनुभव किए बिना मर जाते हैं. हम दूसरों को भी वही दे सकते हैं जो हमारे पास है. अगर हमारे पास दुख है, तो हम दूसरों के साथ वही साझा कर पाएंगे. खुश होना सबसे जरूरी इसलिए है क्योंकि खुश लोग ही निजी और पेशेवर जिंदगी में सफल होते हैं.

खुश रहने के कुछ सूत्र ये हैं:
• अपने आप से संतुष्ट रहो: इसका यह मतलब नहीं कि अपनी महत्वाकांक्षा पर लगाम लगाओ या कमाना बंद कर दो, बल्कि तुम्हारे पास जो है उससे संतुष्ट रहो.

• निस्वार्थ रहो: केवल लेने वाला नहीं बल्कि देने वाला भी बनो. जितना चाहो उतना कमाओ, पर समाज को जितना लौटा सको, लौटाना सीखो. अपने परिवार से आगे दुनिया की तरफ देखो.

• धर्म का पालन करो: इसका मतलब है सचाई, दयालुता जैसे मूल्यों से परिपूर्ण जीवन और दूसरे के प्रति सम्मान का भाव.

• परिणाम-उन्मुख से ज्यादा कार्य-उन्मुख बनो: जब तुम किसी कार्य विशेष के परिणाम को लेकर चिंतातुर होते हो, यह तुम्हें न केवल अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने से रोकता है बल्कि उस कार्य के परिणाम को भी प्रभावित करता है. दूसरी ओर, जब तुम्हारा ध्यान पूर्णत: कार्य पर केंद्रित होता है, यह अपनी आंतरिक क्षमता के पूर्ण उपयोग में तुम्हारी मदद करता है और तुम्हारे भीतर का सर्वश्रेष्ठ बाहर लाता है.

• तर्क और आस्था को बराबर महत्व दो: दिल और दिमाग के बीच संतुलन साधो. इसका अर्थ है वस्तुपरकता की बाहरी दुनिया और व्यक्तिपरक वास्तविकता की भीतरी दुनिया, जीवन का रहस्यमय पहलू.

• ध्यान लगाओ और ईश्वर की दया, जिस समष्टि के तुम अंश मात्र हो उसकी सहायता और आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करो.

खुशी के सूत्र
''खुश रहना बहुत मायने रखता है. आप अगर खुश हैं तभी आप दूसरों को भी खुश रख सकते हैं’’.

(माता अमृतानंदमयी हिंदू आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं)

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