दिल में कला

ऐसे बांटी खुशी: कनि शॉल जैसी पारंपरिक हस्तकलाओं में नई डिजाइन और पैटर्न लाकर जान फूंकी, अपने पुरखों की दस्तकारी सीखने के लिए युवा पीढ़ी को प्रेरित किया और कला के जरिए कश्मीर से जुड़ी घिसी-पिटी बातें दूर कीं.

चिनार डे : दीपा सोनी 26 नवंबर, 2022 को श्रीनगर में द ऑटम आर्ट एग्जिबिट के दौरान
चिनार डे : दीपा सोनी 26 नवंबर, 2022 को श्रीनगर में द ऑटम आर्ट एग्जिबिट के दौरान

खुशी की खोज

दीपा सोनी, 38 वर्ष
आर्टिस्ट और फैशन डिजाइनर, श्रीनगर.

कश्मीर से उनका रिश्ता यहां आकर रहने से पहले ही जुड़ गया था. मूलत: पंजाब में पटियाला की रहने वाली और जम्मू के छावनी में रहने आईं दीपा सोनी का परिवार दशकों से एक घुमंतू व्यापारी से पश्मीना शॉल और पापियर माशे (कागज की लुगदी से बनी चीजें) खरीदता था, जिन्हें वे तंगमर्ग के फारूक बाबा के नाम से जानते थे. यह परंपरा पीढ़ियों से उनके परिवार में चली आती थी और उन्हें सबसे बड़ा डर यही था कि उनकी पीढ़ी के साथ यह खत्म हो जाएगी. इस विरासत को आगे ले जाने में युवाओं की न दिलचस्पी थी और न धैर्य.

बाबा की कहानी ने दिल से कलाकार सोनी के दिल को छू लिया. उनके सरीखे दस्तकारों के लिए कुछ करने को वे हमेशा बेताब रहतीं. मौका तब हाथ लगा जब उनके सरकारी सेवक उनके पति को 2021 में श्रीनगर में तैनाती मिली. सोनी हुनरमंद और शौकिया शिल्पकारों और खासकर दूर-दराज की ग्रामीण युवतियों के लिए मुफ्त कार्यशालाएं लगाने लगीं. वे कहती हैं, ''आठ से अस्सी तक हर उम्र के लोग मेरी कार्यशालाओं में आने लगे.’’

जल्द ही बड़े दस्तकार उनकी कोशिशों के मुरीद हो गए. अपनी दूसरी चिल्ले कलां यानी कश्मीर की सबसे तीखी सर्दियां घाटी में बिता रही सोनी कहती हैं, ''मैं पुरानी पीढ़ी के कलाकारों से मिली और उन्हें नए डिजाइन और रंग दिए ताकि उनके शिल्प मौलिकता खोए बगैर आज की कसौटियों पर खरे उतरें. मेरा काम युवाओं को कारखानों में लौटने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित कर रहा है. कश्मीर की दस्तकारी दुनिया में परिचय की मोहताज नहीं. बुनाई की मेरी तकनीक, डिजाइन और पैटर्न से उनका बाजार मूल्य बढ़ जाता है.’’

सोनी परंपरा और खासकर घाटी की सबसे पुरानी शिल्पकला—यानी मुगलों के जमाने से चले आ रहे और जीआइ टैग से सुशोभित कनि शॉल—को जिंदा रखने में भी मदद कर रही हैं. लद्दाख के ऊंचे पहाड़ों में पाई जाने वाली चांगथांग बकरियों से निकले बेहतरीन पश्मीना से बने इन शॉलों को उनका नाम अपने उत्पत्ति स्थल कनिहामा से मिला, जहां वे कनि या तुझी नाम की छिद्रहीन सुइयों की मदद से बुने जाते थे.

हथकरघों से कनि शॉल बनाने की प्रक्रिया लंबी और श्रमसाध्य है. एक स्टॉल बनाने में छह महीने से लेकर साल-दो साल तक लगते हैं. डिजाइन की लिपि ही कागज पर उकेरा गया जटिल कोड या 'तालीम’ है जिनका अर्थ बुनकर ही समझ सकते हैं. इतने सालों में हुनरमंद कामगारों की कमी, खून चूस लेने वाले बिचौलियों और मशीन से बने सस्ते उत्पादों से मिल रही प्रतिस्पर्धा ने दस्तकारों को मायूस कर दिया.

सोनी की कार्यशालाएं लिहाजा 'शिल्पकारों की आखिरी पीढी‘ के लिए आखिरी उम्मीद का काम कर रही हैं. वे कहती हैं, ''आखिरी पीढ़ी अपनी कला अपनी संततियों को नहीं सौंप रही है. वे चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर या कुछ भी बनें पर शिल्पकार नहीं.’’ श्रीनगर में नाटोपोरा का मीर परिवार कनि शॉल बुनकरों का सबसे पुराना परिवार है, जिसे संत कबीर पुरस्कार भी मिल चुका है. वे सोनी की तारीफ करते नहीं अघाते.

पांचवीं पीढ़ी के बुनकर माजिद अहमद मीर कहते हैं कि सोनी के दखल ने इसे नई जिंदगी दी. वे याद करते हैं कि एक वन्न्त वे सब सोच-सोचकर परेशान होते थे कि छांट दिए गए कनि शॉलों का क्या करें. मीर कहते हैं, ''उन्होंने कहा कि पांच मीटर क्रेप कपड़ा लाओ और उसे छांटे गए टुकड़ों से जोड़कर खूबसूरत साड़ी बना दो.’’ मीर कहते हैं, ''न केवल हमारा माल ज्यादा बिकने लगा बल्कि कला में जान आ गई.’’

इतना जुनून उनमें कहां से आता है, यह पूछने पर सोनी कहती हैं, ''खुशी फैलाना ही मेरी प्रेरणा है. कला और रचनात्मकता कश्मीरियों के खून में है. उन्हें बाहर का तजुर्बा नहीं मिला. उसी पुल का काम मैं कर रही हूं.’’ वे कहती हैं, ''कश्मीर के बाहर लोगों को डर है कि यह जगह महफूज नहीं. मगर यहां का जर्रा-जर्रा प्रेरणादायी है. यही संदेश मैं अपनी पेंटिंग के जरिए उकेरना चाहती हूं.’’ यह दिलकश कला है.

खुशी के सूत्र
''खुशी बांटना ही मेरी प्रेरणा है. कला और रचनात्मकता दोनों कश्मीरियों के खून में हैं. उन्हें बाहर का तजुर्बा नहीं है. उसी पुल का काम मैं कर 
ही हूं’’
—दीपा सोनी, आर्टिस्ट और फैशन डिजाइनर

मोअज्जम मोहम्मद

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