बदलाव के बीज
ऐसे बांटी खुशी : फॉरेस्ट फर्स्ट ने पश्चिमी घाट में न केवल पौधों की देशज प्रजातियों को बहाल करने में मदद की बल्कि स्थानीय समुदायों की जिंदगी को भी संवारा.

खुशी की खोज
फॉरेस्ट फर्स्ट समिति
स्थापना: 2010
वायनाड, केरल.
केरल के वायनाड में 16 साल टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) में काम करने के बाद मीरा चंद्रन 2010 में जिले में स्थित अपनी पारिवारिक जमीन देखने क्या गईं कि उनकी जिंदगी ही बदल गई. उन्होंने पाया कि देशज पौधों को नेस्तोनाबूद कर देने वाली हमलावर प्रजाति लैंटाना खरपतवार पूरी जमीन पर उग आए हैं और पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ गया है.
तीन साल तक चंद्रन ने अथक काम करके पूरे इलाके को साफ किया—यानी एक-एक खरपतवार को ऐसे उखाड़ा कि वे दोबारा न उग पाएं—और पौधों की देशज प्रजातियों को बहाल किया. तकरीबन उसी वक्त इस उद्यम की बदौलत चंद्रन के मन में यह इच्छा जागी कि ज्यादा बड़े पैमाने पर प्रकृति के संरक्षण के लिए काम करें और फिर फॉरेस्ट फर्स्ट समिति का जन्म हुआ. चार साल टीसीएस और फॉरेस्ट फर्स्ट दोनों का काम एक साथ साधने की बाजीगरी के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरा वन्न्त संरक्षण के कामों में लगा दिया.
चंद्रन कहती हैं, ''फॉरेस्ट फर्स्ट को विदेशज प्रजातियों से बिगड़ चुकी जमीन को बहाल करके दुर्लभ, विलुप्तप्राय और संकटग्रस्त पेड़-पौधों सहित देशज वृक्ष प्रजातियों की विशाल विविधता को संरक्षित करने की दूरदृष्टि के साथ शुरू किया गया था.’’
शुरुआत के बाद फॉरेस्ट फर्स्ट ने वायनाड में और कर्नाटक के कोडागू में 300 एकड़ से ज्यादा जमीन बहाल की और सालों के जमीनी काम से पश्चिमी घाट की करीब 150 देशज प्रजातियों को नई जिंदगी दी है.
देशी प्रजातियों को फलने-फूलने देने से केवल जंगल ही बहाल नहीं होते, स्थानीय वन्यजीवन और वन समुदायों को भी मदद मिलती है. मसलन, लैंटाना प्रजातियां उन पौधों को खत्म कर देती हैं जिन पर शाकाहारी जानवर पनपते हैं. नतीजतन ये जानवर धीरे-धीरे जंगल से चले जाते हैं और उनके पीछे-पीछे परभक्षी जानवर भी चले जाते हैं, जिससे जन और जानवर के बीच टकराव की नौबत आती है.
देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान की तरफ से 2020 में किया गया एक अध्ययन कहता है कि लैंटाना ने भारत के बाघ क्षेत्र में 1,54,000 किमी जंगलों (कुल क्षेत्रफल के 44 फीसद) पर कब्जा कर लिया है. पेड़-पौधों की बहाली वन्यजीवों को वापस लाएगी और विलुप्तप्राय प्रजातियों को सुरक्षित घर देगी.
इसके अलावा पेड़ों पर लगने वाले खाने लायक फल और बीज स्थानीय समुदायों की आजीविका बढ़ाने में भी मदद करते हैं. चंद्रन कहती हैं, ''जब हम हमलावर प्रजातियों को हटा देते हैं तो महज कुछ हफ्तों की बारिश में कुदरत पूरी धूमधाम से लौट आती है.’’
फॉरेस्ट फर्स्ट समिति स्थानीय पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं का पारिवारिक ज्ञान रखने वाले स्थानीय आदिवासियों के साथ भी बढ़-चढ़कर काम करती है. एनजीओ साल में 10 महीने 20 आदिवासियों की सेवाएं लेता है.
सहायता कॉर्पोरेट और क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म से आती है और रकम खरपतवार उखाड़ने और पौधों की निगरानी में एनजीओ की मदद करने वाले समुदायों तक बढ़ा दी जाती है. मीरा कहती हैं, ''हमने 45 लोगों को बहाली का प्रशिक्षण और इस तरह जंगलों के आसपास गांवों की आजीविकाओं को सहारा दिया.’’ वे यह भी कहती हैं कि उन्हें तब गहरी खुशी होती है जब पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली से लोगों की आजीविका में सुधार आता है.
फॉरेस्ट फर्स्ट ने 2017 में खरपतवारों से कुचली गई अलौकिक वृक्षवाटिकाओं की बहाली का काम शुरू किया और अब तक करीब 20 एकड़ इलाके को बचाया है.
खुशी के सूत्र
''खुशी तब होती है जब हमारे लगाए पौधे बड़े पेड़ बन जाते हैं जिनसे बड़ी संख्या में जैव विविधता में शामिल विभिन्न पक्षी और परागणकारी आकर्षित होते हैं और तंत्र बहाल होता है’’
—मीरा चंद्रन, संस्थापक, फॉरेस्ट फर्स्ट
—सोनाली आचार्जी