पटना में तख्तापलट
बिहार की सियासत के 'चाचा-भतीजा' नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव भाजपा को चुनौती देने के लिए पांच साल बाद एक बार फिर साथ आए

अन्य सुर्खियों के सरताज
नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव
बिहार के मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री
सब उम्मीद के मुताबिक हो रहा था. 6 अगस्त को नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) यानी जद(यू) के सांसदों ने उपराष्ट्रपति पद के लिए भाजपा उम्मीदवार जगदीप धनखड़ को वोट दिया. एक दिन बाद, राजद नेता और बिहार में तब विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव एनडीए सरकार के खिलाफ पटना में एक विरोध मार्च की अगुआई कर रहे थे.
लेकिन अगले 48 घंटों में दोनों नेताओं ने बेखबर भगवा खेमे को तगड़ा झटका देते हुए एक सफल तख्तापलट की पटकथा लिखी. नीतीश ने 9 अगस्त को अपना इस्तीफा सौंप दिया और तेजस्वी ने भी पलटी मारते हुए जद(यू) प्रमुख को फिर से मुख्यमंत्री बनाने के साथ नई सरकार को अपने विधायकों के समर्थन का वादा किया.
उस वक्त तक भाजपा को हारने के बावजूद दूसरे दलों के नेताओं को अपने पाले में लाने और सरकारें बनाने में उस्ताद तथा इस तरह ''ईवीएम के बाहर की चुनावी जीत'' का चैम्पियन माना जाता था. लेकिन, भाजपा को अपनी ही तिकड़मों का स्वाद चखना पड़ गया जब नीतीश ने विकल्प के रूप में राजद, कांग्रेस और चार अन्य दलों के साथ सरकार बनाने के लिए उसे किनारे लगा दिया. भाजपा ने इसे नीतीश और तेजस्वी का ''अवसरवाद'' बताते हुए उनकी आलोचना करने में कोई देरी नहीं की, वहीं विपक्षी खेमे ने इसे 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा विरोधी सियासत के लिए आशा की किरण के रूप में देखा. नीतीश और तेजस्वी के इस अप्रत्याशित पुर्नमिलन का अगले दो साल में राष्ट्रीय सियासी परिदृश्य पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है.
अपनी 40 लोकसभा सीटों के साथ बिहार भाजपा के लिए हमेशा बड़ी बाजी वाला राज्य रहा है. 2019 में भाजपा की अगुआई में एनडीए ने 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की थी. अब भाजपा को बिहार में अपनी रणनीति में फेरबदल करना होगा. इन वर्षों में, अगर राजद के पास एम-वाई (16 फीसद मुस्लिम वोट और 14 फीसद यादव वोट) गठबंधन का समर्थन रहा है, तो नीतीश के पास अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी) और महादलितों का वैसा ही समूह रहा है. दोनों दलों ने 2015 के विधानसभा चुनावों में जब हाथ मिलाया तो भाजपा को धूल चटा दी थी.
जबकि इसके महज एक साल पहले 2014 के लोकसभा चुनावों में बिहार में भाजपा ने शानदार जीत दर्ज की थी. तब नीतीश और लालू प्रसाद यादव ने एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा था. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनावों की तस्वीर अभी साफ नहीं है, लेकिन नीतीश और तेजस्वी की संयुक्त सियासी पूंजी ने बिहार में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती पेश कर दी है.
बिहार में 40 लोकसभा सीटें हैं, इस लिहाज से नीतीश और तेजस्वी की सियासी पूंजी 2024 में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है.
-अमिताभ श्रीवास्तव