बड़े बाजीगर
ठाणे के दबंग से सीएम की कुर्सी तक, शिंदे के उत्थान की गति तूफानी रही है, जिसकी बदौलत तख्तापलट करके उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा ही बदल दी.

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एकनाथ शिंदे, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री
वर्षों से, महाराष्ट्र में अटकलों का बाजार गर्म था: 'वे करेंगे, या नहीं करेंगे?’; एकनाथ संभाजी शिंदे के कुछ प्रशंसकों का कहना था कि उनके लिए यहां अब और आगे बढ़ने की गुंजाइश ही नहीं दिखती, इसलिए उन्हें दूसरे विकल्प तलाशने चाहिए. जबकि अन्य लोग कह रहे थे कि वे आज जो कुछ भी हैं वह शिवसेना की बदौलत है, इसलिए वे इसके साथ कभी धोखा नहीं करेंगे.
लेकिन जब शिंदे ने पार्टी छोड़ दी और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार को गिराकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से हाथ मिला लिया, तो सारी अटकलों पर विराम लग गया. उन्होंने इस पुरानी कहावत को सही ठहाराया कि राजनीति में कुछ भी अससंभव नहीं.
शिवसेना में विभाजन कई बार हुआ, लेकिन शिंदे का विद्रोह ऐतिहासिक था, क्योंकि 56 में से 40 विधायक और 19 लोकसभा सांसदों में से 13 ने उनके साथ पार्टी छोड़ दी, जिससे पार्टी का अस्तित्व खतरे में आ गया. आज, उद्धव की 'शिवसेना’ हाशिए पर है और शिंदे 'बालासाहेबांची शिवसेना’ के प्रमुख हैं, जो दिवंगत सेना सुप्रीमो बालासाहेब ठाकरे की विरासत पर दावा जताती है.
शिंदे का परिवार जब सतारा के एक गांव डारे से ठाणे आया. तब वे किशोरावस्था में थे. राजनेता के रूप में उभरते हुए वे ऑटो रिक्शा चलाते थे, फिर एक मजदूर संघ बनाया और एक पार्टी के शाखा प्रमुख बने. 1997 में, वे ठाणे नगर निगम के लिए चुने गए. पहले करिश्माई नेता 'धर्मवीर’ आनंद दिघे के संरक्षण में और फिर पूर्व शिवसेना नेता नारायण राणे के साथ तीखी लड़ाई के दौरान पार्टी की स्ट्रीट पावर को मजबूत करते हुए, शिंदे ने सत्ता के गलियारों के साथ-साथ जनता, खासकर ठाणे की जनता पर अपनी पकड़ मजबूत की.
हालांकि तभी उद्धव के साथ उनकी तनातनी भी शुरू हुई, जो बाहुबल के लिए तो शिंदे पर निर्भर थे, लेकिन बड़े नेता के रूप में उनके उभार को लेकर सतर्क भी. ठाणे के बाहुबली की महत्वाकांक्षा साफ थी. इसलिए कथित तौर पर उद्धव ने 2014-19 के बीच देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शिंदे को उप-मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया.
हालांकि, महा विकास अघाड़ी सरकार के नेता ठाकरे की कार्यशैली, पार्टी के नेताओं से उनकी बढ़ती दूरी और सरकार में उनके राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बड़े-भाई के रूप में हावी रहने के कारण हुआ यह कि शिवसेना के असंतुष्ट नेता अपना दुखड़ा लेकर तत्कालीन शहरी विकास मंत्री शिंदे के पास ही आने लगे. इसलिए, जब शिंदे ने एमवीए को छोड़ा, तो उनके साथ 49 विधायक भी खड़े थे.
संशयवादियों का कहना है कि शिंदे नंबर-दो के तौर पर तो अच्छे थे, लेकिन वे योग्य कर्णधार हो सकेंगे या नहीं, इस पर संदेह है. बहरहाल, भाजपा के लिए वे कई मानदंडों पर फिट बैठते हैं-वे एक मजबूत मराठा हैं और मुंबई के आसपास मजबूत आधार रखने वाले नेता भी. हवा का रुख कहता है कि भाजपा के पास इस बागी नेता के लिए बड़ी योजनाएं हो सकती हैं.
—धवल कुलकर्णी.