पहाड़ी प्रदेश ने बचाई पुरानी पार्टी की लाज

मोदी रडार की पहुंच से परे उड़ान भरते हुए कांग्रेस ने जमीनी स्तर पर काम किया और भाजपा में छिड़ी बगावत का पूरा फायदा उठाया.

नारी शक्ति :कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा (दाएं) प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के साथ
नारी शक्ति :कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा (दाएं) प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के साथ

हिमाचल प्रदेश के ऊपरी इलाकों में पहली बर्फ गिरने का मौसम आ चुका है और मौसम विज्ञानी नजर बनाए हुए हैं कि इस दफा सर्दियों की तासीर कैसी रहने वाली है. अब तक दिन काफी गर्म रहे हैं, लेकिन लग रहा है कि मध्य हिमालय के पर्वतों में बसे इस राज्य में नया साल बर्फ की सफेदी साथ लाने वाला है. यहां अभी सिर्फ मौसम का जिक्र हो रहा है. वैसे शिमला के रिज पर तापमान आठ दिसंबर को खासा बढ़ा हुआ था.

स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने गेंदे की मालाओं, ढोल और नगाड़ों के साथ जीत का जश्न मनाया. हिमाचल प्रदेश में हर पांच साल में दूसरी पार्टी की सरकार आ जाती है. यह सिलसिला इस बार भी कायम रहा. अब यह अलग बात है कि भाजपा से जीतने का मौका कांग्रेस को रोज-रोज नहीं मिलता. ऐसी जीत कांग्रेस को चारेक साल के चुनावी सूखे के बाद नसीब हुई.

आखिरी बार इस सबसे पुरानी पार्टी को अपने दम पर चुनाव जीतने का मौका 2018 में मिला था. हिमाचल प्रदेश भले ही छोटा राज्य है, और वोटों का प्रतिशत अगर देखा जाए तो जीत का फासला बहुत ज्यादा न था, पर मौका ऐसा बन गया है कि सर्दियों के बीच ही कांग्रेस कार्यकर्ता और नेता वसंतोत्सव मनाने के मूड में आ गए हैं.

नयापन इस बार जीत के गणित में ही नहीं कांग्रेस की रणनीति में भी देखने को मिला. हिमाचल में हुई कांटे की लड़ाई में अगर कांग्रेस ने जीत हासिल की, तो इसकी बड़ी वजह रही पार्टी की बदली हुई रणनीति. इस बार कांग्रेस पूरी तरह से केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर नहीं थी.

पिछली गलतियों से सीखते हुए इस बार टिकट बांटने से लेकर मुख्य मुद्दों के चयन तक, स्थानीय समीकरणों का ध्यान रखा गया था. दिल्ली में बैठे नेतृत्व ने स्थानीय काडर पर भरोसा जताया और इस भरोसे ने अपना काम बखूबी किया. हाइकमान के दूतों का काम बस इतना ही रहा कि जमीन पर पार्टी को एकजुट रखा जाए. नतीजतन पार्टी को 68 में से 40 सीटें मिलीं. भाजपा को 25 और स्वतंत्र उम्मीदवारों को तीन सीटें मिलीं.

मुख्यमंत्री किसे बनाया जाए, इस मसले पर अगला इम्तिहान भी जल्द शुरू होने वाला है. आठ दिसंबर को शाम सात बजे तक सभी नए विधायक मुख्यमंत्री के नाम पर विचार करने के लिए चंडीगढ़ का रुख कर चुके थे. मुख्यमंत्री की कुर्सी का सबसे बड़ा दावेदार मंडी से सांसद प्रतिभा सिंह को माना जा रहा है. वे छह बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके दिवंगत वीरभद्र सिंह की पत्नी हैं.

इस पद के दूसरे अहम दावेदारों में चुनाव प्रचार समिति के मुखिया और विधायक सुखविंदर सिंह सुक्खू और पिछली विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे मुकेश अग्निहोत्री के नाम शामिल हैं. प्रतिभा सिंह को अप्रैल में यह वादा लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था कि वे विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी.

उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह अपनी शिमला ग्रामीण विधानसभा सीट पर काबिज रहे. पार्टी अगर प्रतिभा सिंह को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला करती है तो वे मां के लिए यह सीट छोड़ने को तैयार हैं. हालांकि, पिछले दो दशक से वीरभद्र कैंप के विरोधी रहे सुखविंदर भी इस बार मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहेंगे.

भाजपा की ओर से कर्नाटक और मध्य प्रदेश में बागियों को तोड़कर कांग्रेस की सरकारें गिराए जाने के पिछले अनुभव से चौकन्ना कांग्रेस हाइकमान इस बार कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता. वह हालात पर कड़ी नजर बनाए हुए है. सरकार बनने की प्रक्रिया सुचारु रूप से चले, इसका ध्यान रखने और तब तक हालात संभालने की जिम्मेदारी हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सौंपी गई है.

हिमाचल के चुनावी मुकाबले का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस ने मजह 0.9 फीसद वोटों से भाजपा पर जीत हासिल की है. भाजपा को मिले कुल 43 फीसद वोटों के मुकाबले कांग्रेस को 43.9 फीसद वोट मिले. दस सीटों पर जीत का फासला 1,500 वोटों से भी कम था. पांच अन्य सीटों पर यह फासला 2,000 तक रहा. कांग्रेस को फायदा मिलने की एक बड़ी वजह भाजपा की कुछ ऐसी खामियां भी रहीं जिनका खामियाजा उसे हार की शक्ल में चुकाना पड़ा.

पार्टी के भीतर हुई गुटबंदी, बगावत और टिकटों का गलत बंटवारा भाजपा को इन चुनावों में भारी पड़ा. जीतने वाले तीनों स्वतंत्र उम्मीदवार—आशीष शर्मा (हमीरपुर), होशियार सिंह (देहरा) और के.एल. ठाकुर (नालागढ़)—भाजपा से ही बागी हुए प्रत्याशी थे. मनोहर लाल धीमान (इंदौरा), इंदु वर्मा (थियोग), तेजवंत सिंह नेगी (किन्नौर) और राम सिंह (कुल्लू) जैसे कुछ दूसरे बागियों ने भी भाजपा के वोटों के वोट बांटे. इंदिरा कुमारी (चंबा) और किरपाल परमार (फतेहाबाद) को भले ही ज्यादा वोट नहीं मिले, लेकिन उनके चुनाव प्रचार की वजह से लोगों के बीच भ्रम पैदा हुआ कि असली उम्मीदवार कौन है, जिसकी वजह से पार्टी का नुक्सान हुआ.

पार्टी के भीतर बगावत के चलते भाजपा और आरएसएस के नेतृत्व की काबिलियत पर भी सवाल उठे. भाजपा ने पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सौदान सिंह को पिछले छह महीने से हिमाचल प्रदेश में तैनात कर रखा था. अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर भी महीने भर से प्रदेश में मौजूद थे. फिर खुद प्रधानमंत्री मोदी की बागी किरपाल परमार से बात करते हुए वीडियो क्लिप भी आई. लेकिन कुछ काम नहीं आया.

पार्टी के पुराने विश्वसनीय नामों पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार को चुनाव प्रचार में शामिल न करके भी भाजपा ने अपना नुक्सान किया. गौरतलब है कि धूमल के गृह जिले हमीरपुर की पांच सीटों में से भाजपा को बस नादौन की ही सीट मिली और ज्यादातर बागी धूमल कैंप के ही थे.

भाजपा ने दरअसल मोदी के हिंदुत्ववाद पर भरोसा किया, जो कि आम तौर पर राज्य में काम कर जाता है. दूसरा दांव समाज कल्याण की योजनाओं पर था. 2019 में पार्टी को 69.11 फीसद वोट और चारों लोकसभा सीटें मिली थीं. इस बड़ी जीत से पार पाने और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के खिलाफ मौजूद सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने के लिए कांग्रेस ने अपना प्रचार बहुत शोर-शराबे के साथ नहीं किया.

राहुल गांधी ने प्रदेश में कोई रैली नहीं की, जबकि प्रियंका गांधी ने पांच और नए अध्यक्ष खड़गे ने एक रैली की. स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने मोदी पर कोई हमला न बोलकर, भाजपा को राष्ट्रवाद की फसल काटने का कोई मौका नहीं दिया. नतीजतन, कांग्रेस को शिमला की आठ में से सात और कांगड़ा की 15 में से 12 सीटें मिलीं. ये वही जिले हैं जहां अधिकतर सरकारी मुलाजिम रहते हैं, जिनके लिए ओल्ड पेंशन स्कीम की वापसी एक बड़ा मुद्दा थी.

शिमला के नाराज सेब किसान और किन्नौर के ऊपरी इलाकों में रहने वाली जनजातियां भी कांग्रेस की ओर झुकीं. हालांकि, इन नतीजों में दोनों ही विरोधी पार्टियों के सीखने के लिए काफी सबक हैं, जो अगली लड़ाई में काम आ सकते हैं. क्या गुटबाजी खत्म होगी? क्या बेहद स्थानीय रणनीति राष्ट्रीय स्तर पर काम आएगी? 

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