आवरण कथाः कूटनीति का कड़ा इम्तिहान
उथल-पुथल भरी दुनिया: भारत की विदेश नीति में नए सिरे से संतुलन बिठाना.

बाहर की दुनिया में चुनौती भरे हालात पैदा होते ही भारत की विदेश नीति के लिए वे फौरन और भी बड़ी चुनौतियों में तब्दील हो जाते हैं. बात इतनी-सी ही नहीं कि एकध्रुवीय दुनिया खत्म होकर उसकी जगह बहुध्रुवीय दुनिया बन रही है बल्कि यह भी कि आर्थिक ताकत का पलड़ा अब एशिया की तरफ झुक रहा है.
भारत के लिए खतरों की तिकड़ी—आक्रामक चीन, नई ताकत से उठ खड़ा हुआ तालिबान और जीत की खुशी से झूमते हुए बीच में पैर फैलाता पाकिस्तान, जिसने औजार के तौर पर दहशतगर्दी का इस्तेमाल जारी रखा है—देश के कूटनीतिज्ञों के सामने नई चुनौतियां पेश करती है. अहम ओहदे पर विराजमान भारत के विदेश सचिव हर्ष वी. शृंगला ने भारतीय कूटनीति के लिए आगे के रास्ते पर बात की. ठ्ठ
हर्ष वी. शृंगला, भारत के विदेश सचिव, अफगानिस्तान
‘‘हमने एक (तालिबान) सरकार का गठन होते देखा जो समावेशी या प्रातिनिधित्व आधारित होने से कोसों दूर है. आपने आइएसआइ के डीजी को वहां जाते और एक ऐसी सरकार का गठन करने में मदद करते देखा जिसकी कैबिनेट में 35 सदस्य हैं जिनमें से कई संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सूची में नामजद शख्स हैं, तो यह कोई बहुत अच्छी शुरुआत तो नहीं ही है’’
चीन
''जब तक हमें पूरा संतोष नहीं हो जाता कि पिछले साल हमारी सरहद पर चीनी हठधर्मिता के नतीजतन पैदा स्थिति का समाधान हो गया है, तब तक हम अपने रिश्तों को उस स्तर तक बहाल नहीं ही कर पाएंगे जहां वे कोविड या 2020 के पहले थे’’
पाकिस्तान
‘‘यह पक्का करना पाकिस्तान के लिए लाजिमी है कि उसके किसी इलाके से भारत में सीमा-पार आतंकवाद की कोशिश या सीधा असर न हो. जब तक (वह) प्रतिबद्धता पूरी नहीं होती, हमारे पास गंभीर मुद्दे निश्चित रूप से होंगे. सीमा पार आतंकवाद के लगातार जारी प्रभावों का अपना असर भी होगा ही’’.