खुला मैदान
ओलंपिक भावना की कहानियां: भारतीय हॉकी के धुरंधर.

मैदान के बाहर अपनी टीम में केरल के साथी रवींद्रन को मनप्रीत ने अपने दस्ते का सबसे प्यारा इनसान बताया. मनप्रीत ने हंसते हुए कहा, ''जब वह गुस्सा होता है, तो पंजाबी में हमें गाली देता है.’’
महिला और पुरुष, दोनों हॉकी टीमों के अविश्वसनीय प्रयासों की बदौलत तोक्यो 2020 में भारत का प्रदर्शन यादगार रहा. पुरुष टीम ने कांस्य के साथ भारत का 41 साल से चले आ रहे ओलंपिक पदक के सूखे को खत्म किया. महिला टीम अपना पहला पदक जीतने के करीब पहुंच गई थी, पर ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ कड़े मुकाबले में हार गई.
इसके दो महीने बाद, पुरुष टीम के कप्तान मनप्रीत सिंह और गोलकीपर श्रीजेश परत्तू रवींद्रन के साथ ही महिला टीम में उनकी समकक्ष, रानी रामपाल और सविता पुनिया, पहली बार इस बात का एहसास कर रही हैं कि खेल के प्रति लोगों की धारणा कितनी बदल गई है.
रानी कहती हैं कि जो लड़कियां पहले हॉकी स्टिक पकड़ना नहीं चाहती थीं, वे अब ऐसा करने के लिए उतावली हैं. वहीं, रवींद्रन ने जिक्र किया कि कैसे केरल जैसे राज्य ने इस खेल को अपनाना शुरू किया है. तीन साल बाद पेरिस ओलंपिक में उन्हें और बेहतर की उम्मीद है.
रानी रामपाल
कप्तान, भारतीय महिला हॉकी टीम
''2016 का रियो ओलंपिक महिला हॉकी के लिए महत्वपूर्ण मोड़ था. हमने अपने सभी मैच गंवाए लेकिन हमने बड़े मुकाबलों में दबाव को संभालना सीखा. हमने 2020 के खेलों की शुरुआत पहले तीन मैच हारकर की थी, लेकिन उनमें से दो में हमने अच्छी हॉकी खेली थी. टीम को विश्वास था कि हम क्वार्टर फाइनल में पहुंच सकते हैं’’
मनप्रीत सिंह
कप्तान, भारतीय पुरुष
हॉकी टीम
‘‘2012 का ओलंपिक खेल एक बुरा सपना था. हमने अपने सारे मैच गंवाए. 2016 में हम क्वार्टर फाइनल में हार गए थे. इस बार, हमें विश्वास था कि हम यह कर सकते हैं’’
श्रीजेश परत्तु रवींद्रन
गोलकीपर और पूर्व कप्तान, भारतीय पुरुष हॉकी टीम
‘‘हमने युवा पीढ़ी के लिए एक उदाहरण पेश किया है कि भारत ओलंपिक पदक जीत सकता है. अब वे इस खेल को खेलने और देश के लिए पदक जीतने के लिए प्रेरित हैं’’
''खिलाड़ी के जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं होता. आप घायल हो सकते हैं, आपका फॉर्म खराब हो सकता है या आपका प्रतियोगी अपने खेल में सुधार कर सकता है. लेकिन हम अगले खेलों में पदक का रंग बदलने की कोशिश करेंगे. आगे की राह आसान नहीं होगी. उम्मीदें अब ज्यादा हैं’’
सविता पूनिया
गोलकीपर, भारतीय महिला हॉकी टीम
''पहले, हमें सरकारी नौकरियों के लिए इंतजार करना पड़ता था. मैदान पर बेहतर प्रदर्शन करने के लिए यह एक प्रोत्साहन था. ओलंपिक के बाद स्थिति बदल गई है. अब युवा खिलाडिय़ों को नौकरी के ऑफर मिल रहे हैं. आगामी टूर्नामेंटों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना हमारी जिम्मेदारी है’’.