आवरण कथाः फौलाद के हैं इरादे

1896 में पहली दफा ओलंपिक आयोजित होने शुरू हुए उसके बाद से सी.ए. भवानी देवी इस खेल के लिए क्वालिफाइ करने वाली पहली भारतीय हैं.

सी.ए. भवानी देवी
सी.ए. भवानी देवी

सी.ए. भवानी देवी, 27 वर्ष 
विधा:
फेंसिंग (सेबर)

कैसे क्वालिफाइ किया: मार्च में हंगरी में आयोजित फेंसिंग विश्व कप के जरिए समायोजित आधिकारिक रैंकिंग (एओआर) के माध्यम से. देवी की विश्व रैंकिंग 42 थी और इससे उन्हें एशिया और प्रशांत क्षेत्र में दो व्यक्तिगत जगहों में से एक पाने में मदद मिली

उपलब्धियां: पहली भारतीय फेंसर जिन्होंने 2017 में आइसलैंड में आयोजित टर्नोई सैटेलाइट फेंसिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल किया, पहली भारतीय जिन्होंने 2019 में कैनबरा में आयोजित सीनियर कॉमनवेल्थ फेंसिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल किया

हर चार साल पर आयोजित होने वाले ओलंपिक खेलों का मतलब यह भी है कि भारतीय अब उन खेलों के बारे में भी जान पा रहे हैं जिनके बारे में उन्हें कम ही पता था. तोक्यो ओलंपिक में खेलों के दीवाने अब फेंसिंग के बारे में भी जान जाएंगे क्योंकि अब इस खेल में भी समर्थन करने के लिए उनके पास एक चेहरा है.

1896 में पहली दफा ओलंपिक आयोजित होने शुरू हुए उसके बाद से सी.ए. भवानी देवी इस खेल के लिए क्वालिफाइ करने वाली पहली भारतीय हैं. वे सेबर (जिसमें एक तरफ धार वाली छोटी तलवार से फेंसर कमर के ऊपर की हर चीज पर निशाना साधते हैं) स्पर्धा में हिस्सा लेंगी. देवी कहती हैं, ''मेरे हिस्सा लेने से शायद भारतीय पहली दफा फेंसिंग का खेल देखेंगे. तभी तो मैं सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहती हूं, उन्हें गौरव की अनुभूति कराना चाहती हूं.’’

देवी ने फेंसिंग को चुना नहीं, वह गले ही आ पड़ी थी. चेन्नै में मुरुगा धनुषकोटि गर्ल्स हायर सेकंडरी स्कूल में देवी और छठी कक्षा के उनके सहपाठियों को स्कवांश, जिम्नास्टिक, वॉलीबॉल और फेंसिंग में एक चीज चुननी थी. देवी की बारी आने तक बाकी के खेलों में सारी जगहें भर चुकी थीं. वे कहती हैं, ‘‘मुझे इसके बारे में कुछ नहीं पता था.

लेकिन तलवार के साथ खेलना अच्छा लगता था.’’ शुरू में वे छड़ी से फेंसिंग करती थीं. एक साल के भीतर उन्होंने अंडर-14 वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण जीता. लेकिन इसमें बेहतर प्रदर्शन के लिए देवी को भारत में सर्वश्रेष्ठ कोच से सीखने की जरूरत महसूस हुई. 16 साल की उम्र में, उन्होंने घर छोड़ा और केरल के तलाशेरी में कोच सागर लागू से सीखने स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया सेंटर चली गईं.

एक अनजाने खेल को चुनने का मतलब था पग-पग पर बाधाएं झेलना. फेंसिंग के लिए प्रायोजक कहां से मिलता? देवी के मां-बाप ने कर्ज लिया ताकि उन्हें प्रशिक्षण और प्रतिस्पर्धाओं में हिस्सा लेने विदेश भेज सकें. क्राउड फंडिंग वेबसाइटों का भी सहारा लिया गया. 2011 से 2015 के अपने सबसे मुश्किल दौर में भी वे इतिहास गढ़ रही थीं.

2015 में उन्होंने अंडर 23 एशियाई चैंपियनशिप और फ्लेमिश ओपन में कांस्य जीता. धीरे-धीरे पहचान बनने लगी थी. गोस्पोर्ट्स फाउंडेशन ने राहुल द्रविड़ एथलीट मेंटरशिप प्रोग्राम के लिए उनका चयन किया और उन्हें पोषण, मानसिक प्रशिक्षण, चोट पुनर्वास और अन्य प्रशिक्षण दिए. अगले साल तमिलनाडु में उनका चयन एलीट स्पोर्ट्सपर्सन में विशेष छात्रवृत्ति के लिए हुआ, जिसमें सालाना 25 लाख रु. की सहायता मिलती है.

नवंबर, 2020 से देवी अपनी कोच निकोला जानोत्ती के साथ तोक्यो की तैयारी इटली के लिवार्नो में कर रही हैं. 2016 से देवी के साथ काम कर रहे जानोत्ती कहते हैं, ‘‘हम एथलीट्स को ऊंचे स्तर तक पहुंचने में तभी मदद कर सकते हैं, जब वह खुद बहुत समर्पित हो और सीखने तथा सुधारने की उसकी मानसिकता हो.

वह परफेक्ट छात्रा है.’’ भारत के उलट, इटली में फेंसिंग का चलन काफी है और वहां इसकी कई अकादमियां हैं. इस देश ने इस खेल के हर संस्करण में एक पदक जरूर जीता है. देवी कहती हैं, ‘‘यहां स्तर बहुत ऊंचा है और यहां का प्रशिक्षण गुणवत्तापूर्ण, गहन और प्रतियोगी है.’’ तोक्यो में कठिनाइयां तो होंगी पर भारत के लिए भवानी का एक चपल-चतुर वार इस खेल के विकास की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा.

कोच की राय
''उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका चरित्र है. जब वे कुछ करने का निर्णय करती हैं तो लक्ष्य हासिल करने के लिए कुछ भी करती हैं. वे कभी अपनी सीमा नहीं तय करतीं. वे ऐसा कुछ करती हैं जो दूसरी को मुश्किल या असंभव लगता है. वे इतने फौलादी सोच की हैं. ओलंपिक के अपने सपने को उन्होंने इसी तरह सच कर दिखाया है’’ 
निकोला जानोत्ती
2016 से देवी की कोच

Read more!