आवरण कथाः टेस्टिंग के अहम क्षेत्र में नाकामी
पहली लहर के दौरान टेस्टिंग लैब सुविधाओं का व्यापक पैमाने पर विस्तार हुआ लेकिन दूसरी लहर आने से पहले ही वह लय टूट गई.

पिछले वर्ष मार्च की शुरुआत में जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड को वैश्विक महामारी घोषित किया, तो भारत में 14 आरटी-पीसीआर परीक्षण प्रयोगशालाएं थीं. मार्च के अंत तक देश ने इसमें 106 वायरस अनुसंधान और नैदानिक प्रयोगशालाओं (वीआरडीएल) को जोड़ा था. दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे देशों से परीक्षणों की संख्या के मामले में शुरू में पिछड़े भारत ने परीक्षण क्षमता को तेजी से बढ़ाया. अप्रैल 2020 तक हमारे पास परीक्षण के लिए 166 प्रयोगशालाएं थीं और जुलाई तक 1,600. दैनिक परीक्षणों की संख्या अप्रैल में 1,500 से जून में 2,00,000 और अक्तूबर में 10 लाख तक पहुंच गई. नवंबर में पहली लहर के शांत होने के समय तक भारत में 2,257 कोविड परीक्षण प्रयोगशालाएं थीं, और नतीजे औसतन 12-24 घंटे में आ जाते थे.
ये उपलब्धियां तीन कारणों से थीं. सबसे पहले तो यही कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव और एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया की अध्यक्षता में विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में उत्कृष्टता के 14 केंद्र स्थापित किए गए. इन केंद्रों ने सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों को प्रशिक्षित किया और अंतत: आणविक वायरोलॉजी प्रयोगशाला नेटवर्क बनाया. शुरुआती चरण में देश भर में लगभग 300 मेडिकल कॉलेज काफी कम समय में कोविड परीक्षण करने में सक्षम थे.
दूसरी बात, आइसीएमआर ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआइआर), केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, जैव प्रौद्योगिकी विभाग और रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के साथ लद्दाख, लक्षद्वीप और अंडमान जैसे दूरदराज के क्षेत्रों की मैपिंग की, ताकि वे परीक्षण को बढ़ा सकें. उनके संबंधित क्षेत्रों में अन्य प्रयोगशालाओं के परिणामों को सत्यापित करने के लिए तीस गुणवत्ता नियंत्रण (क्यूसी) प्रयोगशालाएं स्थापित की गईं.
प्रत्येक राज्य में प्रयोगशालाओं को निर्देश दिया गया कि वे अनियमित रूप से चयनित पॉजिटिव और निगेटिव नमूनों को निकटतम नामित क्यूसी लैब में भेजें. तीसरी बात, निजी प्रयोगशालाओं को इस दायरे में लगभग तुरंत ही जोड़ दिया गया. गुणवत्ता आश्वस्त करने के लिए केवल एनएबीएल (नेशनल एक्रीडिएशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग ऐंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज) प्रमाणित प्रयोगशालाओं को चुना गया.
यह मानते हुए कि प्रयोगशालाओं को आरटी-पीसीआर किट और रैपिड एंटीजन परीक्षणों के अधिक आपूर्तिकर्ताओं की आवश्यकता थी, कई निर्माताओं को मंजूरी दी गई थी. पिछले साल दो महीने के पूरे लॉकडाउन के दौरान लगभग 40 टन परीक्षण सामग्री पूरे देश में भेजी गई. जैसे-जैसे लैब नेटवर्क का विस्तार हुआ, इंडिया पोस्ट को भी, जिसके पास देशव्यापी संचालन हैं, आपूर्ति के वितरण को सुव्यवस्थित करने के लिए लगाया गया. आखिरकार, जून 2020 में परीक्षण किट खरीद की प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण किया गया, जिससे राज्यों को अपनी किट खरीदने और अपने स्वयं के प्रयोगशाला संसाधनों को संभालने की अनुमति मिली.
हालांकि, ये उपलब्धियां पहली लहर के घटने के साथ ही समाप्त हो गईं. दिसंबर 2020 से मई 2021 तक, केवल 249 नई कोविड परीक्षण प्रयोगशाला जोड़ी गईं. दूसरी लहर में वायरस के खतरनाक प्रसार के साथ देश की प्रयोगशालाओं में 12-24 घंटे के भीतर परिणाम देने की क्षमता नहीं है. दिल्ली, मुंबई, नोएडा, लखनऊ और कोलकाता में प्रयोगशालाओं को टेस्ट के नतीजे देने में औसतन 3-5 दिन का समय लगता है. परीक्षण शुल्क पर लगी सीमा के कारण भी निजी खिलाडिय़ों को अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश करने से हतोत्साहित किया है.
उत्तर प्रदेश प्राइवेट पैथ लैब के निदेशक डॉ. अजय कुशवाहा कहते हैं, ''सरकार ने कोविड जांच शुल्क को घटाकर 900 रुपये कर दिया है. यह बहुत कम है. कई कर्मचारी और डॉक्ट: कोविड से संक्रमित हो गए हैं. ऐसे में दूसरे डॉक्टरों और कर्मचारियों को ज्यादा वेतन पर रखा गया है, ताकि परीक्षण हो सके. इससे कोविड परीक्षण की लागत में वृद्धि हुई है. मोटे तौर पर यही वजह है कि प्राइवेट पैथ लैब को कोविड की जांच में कोई दिलचस्पी नहीं है.’’
प्रयोगशालाओं के पास आरटी-पीसीआर मशीनों और उन्हें चलाने वाले प्रशिक्षित माइक्रोबायोलॉजिस्टों की संख्या भी सीमित है. मिसाल के तौर पर, नोएडा में जिला चिकित्सा अधिकारी दीपक ओहरी का कहना है कि प्रतिदिन लगभग 6,200-6,500 नमूने एकत्र किए जा रहे हैं, लेकिन सरकारी प्रयोगशालाओं में प्रतिदिन लगभग 2,000 नमूनों को जांचने की क्षमता है, जिसका मतलब है कि नतीजों के आने में और देर होती है. उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ पैथोलॉजिस्ट रमेश जायसवाल उनकी इस बात से सहमत हैं.
वे कहते हैं, ''बढ़ते कोविड मामलों के कारण सरकारी प्रयोगशालाओं पर दबाव बढ़ गया है. पिछले एक महीने के दौरान, राज्य में नमूना संग्रह तीन गुना बढ़ गया है, लेकिन जांच (नमूनों की) मात्र डेढ़ गुना से अधिक ही बढ़ी है. यही कारण है कि बड़े शहरों में आरटी-पीसीआर से कोविड जांच के परिणाम प्राप्त करने में दो से तीन दिन लग रहे हैं. छोटे शहरों में जांच के परिणाम में पांच से छह दिन लग रहे हैं.’’
टेस्ट में देरी होने से इलाज में भी देर होती है, क्योंकि मरीजों के पास जब तक लैब की रिपोर्ट न हो, तो उन्हें कोविड वार्डों में प्रवेश नहीं मिल सकता है या वे कोविड डॉक्टर से नहीं मिल सकते हैं. इस तरह मर्ज गंभीर हो जाता है. नोएडा की 32 वर्षीय ब्लॉग संपादक ज्योति रायचौधरी कहती हैं कि उनमें चार दिनों से लक्षण दिख रहे थे, लेकिन उन्हें इलाज नहीं मिल पाया, क्योंकि उनके टेस्ट का परिणाम नहीं आया था. जब तक उनकी जांच का परिणाम आया, उनकी छाती में संक्रमण हो चुका था और तत्काल अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत थी.
अमेरिका और ब्रिटेन में मरीज ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से यह पता लगा सकते हैं कि टेस्ट रिपोर्ट कितने देर में आ सकती है. डॉक्टरों का कहना है कि इस जानकारी से भी अक्सर उन्हें कुछ प्रारंभिक उपचार शुरू करने में मदद मिलती है. खासकर संक्रमण के मामलों की संख्या में इजाफे के वक्त भी टेस्ट रिपोर्ट के बारे में जानकारी से अराजक स्थिति में भी कुछ व्यवस्था का पुट आ जाता है.
बढ़ी हुई मांग की समस्या इसलिए भी है, क्योंकि कोई भी अब कोविड परीक्षण करवा सकता है. टेस्ट लैब मालिकों का कहना है कि बढ़ती मांग के कारण यह पता लगाना मुश्किल है कि प्राथमिकता के स्तर पर परीक्षण की आवश्यकता किसको है. दिल्ली स्थित डॉ. डांग्स लैब के सीईओ अर्जुन डांग कहते हैं, ''टेस्ट करवाने के नए मामलों के लिए जैसे ही हम अपनी वेबसाइट खोलते हैं, चार से पांच मिनट के भीतर ही हमें सैकड़ों बुकिंग मिल जाती है.
हम जितना चाहें, उतने नमूने इकट्ठा कर सकते हैं, लेकिन मुझे टेस्ट नतीजे देने में अधिक समय लगेगा. बढ़ती मांग के इस दौर में सरकार को चाहिए कि निजी प्रयोगशालाओं को प्रोत्साहन और सहायता के जरिये मदद करे.’’
हाल ही में आइसीएमआर ने टेस्ट की भारी मांग को कम करने के लिए अपने कोविड परीक्षण परामर्श को बदल दिया है, अंतरराज्यीय यात्रा के लिए अब कोविड परीक्षण की जरूरत नहीं है और पॉजिटिव मरीज को दो हक्रते के बाद निगेटिव होने की पुष्टि करने के लिए दूसरी जांच की जरूरत नहीं है. देखना होगा कि क्या इससे प्रयोगशालाओं पर दबाव कम होता है या नहीं.
—सोनाली अचार्जी
क्या करने की जरूरत
निजी पैथ लैब को प्रोत्साहन, क्योंकि कोविड टेस्ट की दर की बांधी गई सीमा से निजी खिलाड़ी अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश करने को प्रोत्साहित नहीं हो रहे
लैब में अधिक कार्यबल की नियुक्ति करनी चाहिए. नमूनों की प्रोसेसिंग की वजह से लैब के नतीजे आने में देरी हो रही है, जिसके लिए प्रशिक्षित तकनीशियनों की जरूरत है
डॉक्टर के पर्चे के आधार पर गंभीर लक्षणों वाले लोगों को कोविड परीक्षण में प्राथमिकता दें
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कोविड परीक्षण प्रयोगशालाएं
जोड़ी गईं दिसंबर 2020 से मई 2021 के बीच भारत में